Investment in Nature: हम जो कुछ भी विकास या समृद्घि जुटाने के लिए करते हैं, उसकी कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ती है। हम आज जिसे वैभव मान रहे हैं, वे प्रकृति से लिया हुआ सीधा बड़ा कर्ज है, जिसे हम सदियों से चुकाने से कतरा रहे हैं। जीवन के लिए जल, वायु और पृथ्वी के तत्त्व ही सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। समस्त
प्राणियों का पहला कर्तव्य व धर्म हवा, पानी मिट्टी, अग्नि और सूर्य के प्रति है, क्योंकि पूरे भूमंडल की सभी गतिविधियां इन्हीं के चारों तरफ घूमती हैं। आज का पूरा विकास इन्हीं संसाधनों की कीमत पर खड़ा हो रहा है। वाहन, आलीशान गगनचुंबी अट्टालिकाएं हों या कंप्यूटर और इंटनरेट, सबके अस्तित्व में प्रकृति का दोहन ही शामिल है। अब तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन के बूते समृद्घि की गाथा गाई जाती रही। अक्षय समझे जाने वाले इन प्राकृतिक संसाधनों पर भी खतरा मंडराने लगा है।
इस कमी को भी इंसानी लोभ ने कारोबार की शक्ल दे दी है। पानी, मिट्टी, हवा के भी अब दाम लग चुके हैं। पानी बोतलों में, मिट्टी रसायन के रूप में और हवा सिलेंडर जार में उपलब्ध है। ऐसे में समृद्घि के इस रूप में प्रवेश को विनाशकारी ही माना जा सकता है। वास्तव में समृद्घि और प्रकृति के बीच मे संतुलन की चिंता शुरुआती दौर में ही होनी चाहिए थी। आश्चर्यजनक है कि मनुष्य ने सदियों से बौद्घिक प्रगति की और जीवन को बेहतर बनाने में इसका लाभ उठाया फिर ये कैसे प्राकृतिक संतुलन के प्रति असंवेदनशील हो गया। ऐसा ही चलता रहा, तो जल्द ही हम सब कुछ खो देंगे।
जल्द ही इस दिशा में कोई कदम अगर नहीं उठा, तो हम भावी पीढ़ियों को गंभीर संकट में झोंक देंगे।
जिस तरह से हम समृद्घि का सालाना लेखा-जोखा करते हैं, उसी तरह पर्यावरण और प्रकृति का भी हिसाब-किताब रखना होगा। अगर प्रकृति के मद में हम ज्यादा जमा करेंगे, तो जाहिर तौर पर बैंक की तरह हमें रिटर्न ज्यादा मिलेगा। विश्व के लिए प्रकृति और इसके संसाधन ही सबसे बड़े धन हैं। अपने प्रकृति के इस मूलधन को बचाते हुए उससे मिले ब्याज के बूते जो समृद्घि हासिल हो, वही सच्ची समृद्घि होगी। वही कल्याणकारी होगी। हमें अपने शहरों, गांवों और मानव सभ्यता को बचाना
होगा। बिना पर्यावरण संरक्षण के ऐसा संभव नहीं होगा।
शहरों का अनियोजित विकास भी प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। तेजी से बढ़ रही आबादी शहरों में अनियोजित विकास को बढ़ावा दे रही है। छोटी-छोटी सोसाइटी बगैर ह्रश्वलानिंग ह्रश्वलॉटिंग कर देती हैं। आज गलियों के बाहर वाहन नहीं खड़े हो सकते हैं, वहां अपार्टमेंट खड़े हो रहे हैं। आज हमारे शहर सांस लेने लायक नहीं रह गए हैं। शहरों में आसमान दिखना बंद हो गया है और हर तरफ स्मॉग की चादर छाई रहती है। स्मॉग से खांसी के अलावा आंखों में जलन होती है। कभी-कभी गले व सीने में जलन की शिकायत मिलती है।

शहरों को स्वच्छ बनाए रखने के लिए हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। यथा शहर की सभी प्रमुख सड़कें चौड़ी की जाए। यातायात सामान्य बनाने के लिए सड़कों से अवैध कब्जे हटवाए जाएं। सड़कों के किनारे फुटपाथ जरूर बनाए जाएं। वाहनों के लिए अधिक से अधिक पार्किंग सुविधा उपलब्ध कराई जाए। सार्वजनिक यातायात के साधनों को और सस्ता किया जाए। जनता को अपने वाहन के बजाए सार्वजनिक वाहनों के प्रयोग की सलाह दी जाए। यातायात प्रबंधन को और सुदृढ़ किया
जाए। वायु प्रदूषण से होने वाले नुकसान, वाहनों की समय-समय पर सर्विसिंग कराने के बारे में आम जनता को जागरूक किया जाए। रिहायशी इलाके सलीके से विकसित किए जाए, वहां सभी प्रकार की सुविधाएं दी जाए, इसके साथ ही मुख्य शहर की भीड़ कम करने के उपाय अपनाएं जाए।
हाइवे पर ही बस स्टेशन बनाए जाएं, ताकि शहर में यातायात का भार कम हो सके।
कूड़ा जलाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाए। पेड़ों, पत्तियों व टायरों को जलाने पर भी सख्ती बरती जाए। पार्क, सड़क के किनारे व खाली स्थान पर अधिक से अधिक पौधरोपण किया जाए। सीएनजी के अधिक से अधिक स्टेशन स्थापित किए जाएं। वहीं शहरों में बैटरी आधारित
हाइब्रिड वाहन चलाए जाए। डीजल जेनरेटर से भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर हैवी डस्ट रिमूवल सिस्टम लगाया जाए।
हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण के बिना मानव सभ्यता का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता है। वन संपदाओं में कमी के कारण पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है। हमें पुन: एक आंदोलन चलाकर वन क्षेत्र को बढ़ाना होगा। वृक्ष ही मानव जीवन का आधार होते हैं।
बेहतर भविष्य और सुखद जीवन के लिए हमें अपने वनों को बचाना होगा। यदि वन नहीं बचे, तो यह मानव सभ्यता भी नहीं बचेगी।
