हमारे अनुभव में आने वाला यह संसार विभिन्न नाम-रूप-रस-स्पर्श-गंध का एक विशाल, विस्तृत संघात है। इन विषयों की सूचना ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा मन को मिलती है। यह मन, बुद्धि की सहायता से कुछ निष्कर्ष निकालता है। इन निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए वह इनकी तुलना पूर्व-प्राप्त समान अथवा असमान अनुभवों से करता है। यही मन इन समस्त पिछले अनुभवों को संस्कारों के रूप में संदर्भ के लिए अपनी स्मृति में संजोकर रखता है, जहां प्रत्येक का वर्गीकरण अच्छा-बुरा, सुख-दुख, कष्ट- आराम, प्रेम-घृणा आदि नामों के अंतर्गत किया जाता है।

दर्शनशास्त्र की भाषा में इन्हें द्वंद्व कहते है। इन्हीं द्वंद्वों का शिकार बना हुआ दुखी और निराश संसारी जीव, जिसे इन प्रबल द्वंद्वों की अधीनता समझ नहीं आती, उन्हीं हाथों को चूमता है जो उसे चाबुक मारते हैं और इस प्रकार विलाप करते एवं कष्ट सहते हुए वह संघर्षों तथा निराशाओं से पूर्ण जीवन का बोझ ढोता है। यह सामान्य जानकारी की बात है कि जब कोई भोक्ता जीवन वस्तुओं के संपर्क में आता है, तब वह इन चुनौतियों केप्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है तथा बहुविध अनुभवों को भी प्राप्त करता है।

स्पष्टï है कि जब भोक्ता की दशा अथवा उसकी मन:स्थिति बदल जाती है तब उन्हीं वस्तुओं के ही माध्यम से बिल्कुल भिन्न अनुभवों की उत्पत्ति होती है। सर्दी के दिनों की सुखदायक वस्तु गर्मियों में कष्टïकारक हो जाती है। युवावस्था का आनन्द, बुढ़ापे में पश्चाताप का कारण बनता है। क्रोध के आवेश में आप जिन कामों को कर बैठे थे, उन्हीं को पुन: सामान्य जीवन में करते हुए आपको शर्म आती है।

युद्ध कालीन साहित्य में जिन कर्मों का गुणगान सम्मानित नागरिक के कर्तव्य के रूप में होता है वे ही कर्म शान्तिकालीन साहित्य केअनुसार सभ्यता केमाथे पर कलंक बन जाते हैं, जिनसे मानव सम्मान को ठेस लगती है। सदा परिवर्तनशील अनुभवकर्ता एवं उसकी मन:स्थितियों तथा अप्रत्याशित रूपधारी विषय वस्तुओं एवं उनकी भिन्न दशाओं के कारण यह सुखान्वेषी संसारी मनुष्य परिणाम में दुख ही प्राप्त करता है। दो जंगली और बेलगाम घोड़ों के ऊपर एक साथ सवारी करने का कमाल दुनिया का सर्वाधिक कुशल नट भी नहीं दिखा सकता।

सदैव परिवर्तित होने वाले अनुभवकर्ता एवं विषय वस्तु की अनबूझ पहेली को निरंतर सुलझाने का प्रयास करते रहना ही वह छिपा हुआ नासूर है जो संसारी मनुष्य को व्यथित किया करता है। दिव्य जीवन इस आन्तरिक संसार रूपी कैंसर की रामबाण औषधि है। समस्या का स्थायी हल ढूढ़ निकालने काकेवल एक ही तरीका है और वह है इस समीकरण के कम से कम एक पक्ष को अपरिवर्तित बनाना। ठीक यही संदेश दिव्य जीवन का भी है।

साधना के प्रारंभिक दिनों में ही आध्यात्मिक साधक अपनी सही विवेकशीलता के कारण यह तथ्य भली भांति समझ लेता है कि उसके अंदर का भोक्ता जो जीवन की परिवर्तनशील कठिनाइयों का अनुभव करता हुआ-सा प्रतीत होता है, वास्तव में मिथ्या है तथा समानरूप से मिथ्या वस्तु-संसार भी मानों परिवर्तन की उद्ïदेश्यहीन ताल पर ही नाचता रहता है। अहंकार ही भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व परिचायक नाम धारण कर मिथ्या भोक्ता बन जाता है। अपने ऊपर स्वयं ओढ़ लिया गया अहंकार एक मिथ्या भाव है, केवल एक विचार-पुंज अर्थात अन्त:करण की एक वृत्ति मात्र है।

इस समय तक शायद आप अपनी आराम कुर्सी से उछल कर इस पुस्तक की धज्जी-धज्जी उड़ा देने के लिए उतारू हो जाएं। इस साधु ने जब पहले पहल वेदान्त की कुछ पुस्तकें पढ़ी थीं तब इससे भी कठोर विचार आये थे। आपका यह विद्रोह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है परंतु फिर भी आप यह न भूलें कि हम सब अनन्त आनन्द रूपी सत्य की खोज में लगे हुए है।

इस मार्ग में किया गया कोई भी त्याग इस बहुमूल्य खजाने के लिए चुकाई जाने वाली छोटी सी कीमत के रूप में ही होगा। इस आनन्द के लिए यदि आपको नाम-रूपात्मक व्यक्तित्त्व को मिथ्या समझने की कीमत भी देनी पड़े तो भी इस मूल्य हो हंसते-हंसते दे डालो। सत्य ज्ञान की इस अजेय तावीज को, जिसमें दैनिक कष्टों के निवारण का आश्वासन हो, किसी भी कीमत पर ले लेना सस्ता सौदा ही है।

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