जैसी करनी वैसी भरनी- यह सिद्धान्त सर्वत्र खरा उतरता है। भौतिक संसार में और आध्यात्मिक जगत में भी जीवन में प्रचुरता और संपन्नता प्राप्त करने के लिए पसीना बहा कर उसका मूल्य चुकाना ही पड़ता है। आध्यात्मिक विकास की दिशा में भी ऐसा ही होता है। यहां भी दृढ़ता और निष्ठपूर्ण साधना के बिना प्रगति नहीं की जा सकती।

किसी व्यक्ति में परम सत्य की चाह भी पैदा होती है, जब वह विभिन्न सांसारिक सुख-दुखों का पर्याप्त अनुभव पा चुका होता है। जन्म-जन्मान्तरों में परिच्छिन्न जीव अपने दैनिक अनुभवों से अगणित संस्कार अर्जित कर लेता है। प्रत्येक जन्म में वह जीव ही अपने अज्ञान के कारण भ्रमित होता हुआ केवल आय-व्यय, स्वीकार-अस्वीकार, संग्रह-त्याग, प्रेम-घृणा आदि कर्मों में ही संघर्ष करता रहता है। इसी संघर्ष में एक दिन, जब जीव की हजारों व्यग्र आशाएं-निराशाएं अपनी पूर्ति के लिए प्रतीक्षा करती रहती हैं, उसका शरीरान्त हो जाता है। उसकी मृत्यु पर नाते-रिश्तेदार शोक मनाते हैं परंतु फिर भी उनेसारे अश्रु और अंतिम श्रद्धांजलियां उसे पुनर्जीवित नहीं कर सकतीं। यह मृत शरीर अपने मूल पंच महाभूतों में मिल जाता है।

अनेक पुनर्जन्मों और अल्पकालिक अनिश्चित जीवनों को पाकर असंख्य निष्फल आशाओं, अतृप्त इच्छाओं, अनित्य सुखों, बोझिल कर्मों एवं अनुत्तरित प्रेम प्रसंगों के बीच से गुजरता हुआ यह जीव, उच्च विचार स्तर को प्राप्त होता हुआ, इन प्रश्नों में आ उलझता है- जीवन क्या है? मैं क्यों पैदा हुआ हूं? जीवन का लक्ष्य क्या है? क्या इस जीवन में पूर्णता नहीं प्राप्त की जा सकती? क्या यह जीवन केवल जन्म और मृत्यु के दो अनिश्चित बिन्दुओं के बीच चलने वाला निष्फल संघर्षों का अर्थहीन प्रवाह है? इस स्थल पर हमें एक ऐसे मर्त्य प्राणी का रूप मिलता है, जो सभी निम्न योनियों से गुजरने के बाद एक ऐसे श्रेष्ठ  द्वार पर आ खड़ा हुआ है। जहां से दिव्य जीवन के आनन्दप्रद क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। घृणा के अंधेरे खतरनाक जंगल में से अपना रास्ता टटोलते हुए हम प्रेम के प्रदीप्त और सुरक्षित उद्यान में प्रवेश करते है। अहंकार की नीरस और मलिन गुफाओं को पार करने के बाद हम नि:स्वार्थ प्रेम के खुले और स्वच्छ मैदान में पहुंचते हैं। स्वार्थपूर्ण क्रूरताओं और कामना-जनित छुद्रता की बेड़ियों से तथा वासना एवं लोभ की जबरदस्त पकड़ से अपने को मुक्त कर लेना ही अपनी मौलिक स्वतंत्रता और संतोष की पुनर्प्राप्ति है जिसके द्वारा हमें संपूर्ण सृष्टि की अंतर्निहित एकता का ज्ञान होता है। पूर्णता एक ऐसा लक्ष्य है जिसे अपूर्ण लोगों द्वारा प्राप्त किया जाता है और कौन अपूर्ण नहीं है? दिव्य जीवन के द्वारा ही दिव्य परमात्मा की ओर पहुंचना है।

नि:सन्देह यह मार्ग ऊबड़-खाबड़ और धूल-धूसरित है, परंतु ऐसा केवल प्रारंभ में ही है। इस यात्रा की समाप्ति तो मधुर महकते प्रेम, सहिष्णुता, स्वर्णिम संतोष, मानसिक समता और चिरस्थायी शांति की प्रकाशवान एवं शाश्वत वसंती हरियाली में पहुंच कर होती है। ऐसा भले ही हो सकता है कि कोई आध्यात्मिक साधक आत्मानुभूति के स्वर्ण द्वार में प्रवेश करने का साहस न करते हुए वहीं पर भ्रम और संदेह में खड़ा रह जाए। शायद वह यह न जानता हो कि आत्मानुभूति एक सार्वजनिक उद्यान है। कोई भी व्यक्ति वहां जब चाहे प्रवेश कर सकता है और वहां की मखमली घास पर आराम से लेट सकता है जो सौंदर्य एवं शांति के प्रत्येक फौव्वारों के चारों ओर बड़े विस्तार से लगाई गई है।

आध्यात्मिक जीवन किसी घने जंगल अथवा किसी निर्जन गुफा में नहीं, और न ही यह कुछ विशेष योग्यता के असाधारण मनुष्यों के लिए ही है। संसार से अकस्मात पलायन करके अथवा हिमालय की किसी दुर्गम कन्दरा में दरिद्री, अकर्मण्य जीवन बिता कर उस लक्ष्य को नहीं प्राप्त किया जा सकता। दिव्य जीवन के व्रती को कपड़ा रंगने की आवश्यकता नहीं है।

दिव्य जीवन स्वयं ही एक चिरस्थायी अनुभव है जिसमें जीवन को सदा सुख मिलता है और वह सच्चिदानन्द की परम सत्ता में विलीन होने के लिए आगे बढ़ता है। यही परम सत्ता है और जीवन का परम लक्ष्य है। 

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