मानसिक शांति के अत्यन्त सशक्त क्षण केवल दुर्बल खालीपन अथवा सत्ताहीन शून्यता प्रतीत होते हैं। ऐसा है नहीं। अनेक दिशाओं में भटकते हुए दुर्बल मन की भाषा में यह शांति निष्क्रियता या मृत्यु भासित हो सकती है, किंतु ये क्षण बड़े सशक्त हैं। स्वामी चिन्मयानंद सामान्य रूप से, मन सदा कार्य में लगा रहता है। सदा अस्थिर रहना ही इसकी प्रकृति है। एक क्षण भी, किसी न किसी विचार में व्यस्त रहे बिना वह नहीं रह सकता। अभी तक हमारा यह प्रयास था कि, किसी चुने हुए एक निश्चित क्षेत्र में ही मन को व्यस्त रखा जाये। जब मन को किसी एक सीमित क्षेत्र में कार्य करने के लिए लगाया जाता है, तो वह बड़ा सशक्त और आज्ञाकारी बन जाता है।

यदि हम उस शांति की तुलना विचारों में व्यस्त रहते मन से करें तो हमें यह भ्रम होगा कि उस शांति में कुछ नहीं था, एक रिक्तता मात्र थी। किंतु यह धारणा त्रुटिपूर्ण है। वस्तुत: जब हम इधर-उधर अवारा भटकते मन के सामान्य अनुभव की तुलना उसकी शान्त अवस्था से करते हैं तभी उसकी रिक्तता का भ्रम होता है।

इसीलिए कुछ लोगों को मानसिक शांति के अत्यन्त सशक्त क्षण केवल दुर्बल खालीपन अथवा सत्ताहीन शून्यता प्रतीत होते हैं। ऐसा है नहीं। अनेक दिशाओं में भटकते हुए दुर्बल मन की भाषा में यह शांति निष्क्रियता या मृत्यु भासित हो सकती है, किंतु ये क्षण बड़े सशक्त हैं। यही शांति के क्षण शाश्वत बनकर अमर हो सकते हैं। आधुनिक विश्वविद्यालय का कोई सामान्य छात्र इस वेदान्त सिद्धान्त को सरलता से समझ नहीं सकता। वह तो केवल देश, काल और कार्यकारण से परिच्छिन्न एक सीमित जगत को जानता है। वह जगत अपनी अनन्त वस्तुओं के द्वारा अपनी सत्ता व्यक्त कर रहा है।

यदि हम वस्तु जगत को सावधानी से देखें, तो भी वेदान्त सिद्धान्त की सत्यता भलीभांति समझ सकते हैं। दृष्टांत के लिए, हम आज से एक करोड़ वर्ष पूर्व के जगत की कल्पना करें। उस समय इस जगत की रचना प्रारम्भ हुई थी और इस पृथ्वी पर दो तत्त्व विद्यमान थे। एक ओर भयंकर ज्वालामुखी पर्वत थे, जिनसे पृथ्वी के अंदर उबलते हुए विशाल लावे का उद्ïभव हो रहा था, और दूसरी ओर, एक कोषीय जीवाणु सरोवर के तट पर पड़ा था जो दिखाई तक नहीं देता था। वह बिल्कुल कोमल और शांत था, किंतु सशक्त था।

उन दोनों में से आप का विश्वास किस पर है- ज्वालामुखी पर अथवा जीवाणु पर? इस अवस्था में उन दोनों को देखकर कोई भी नहीं कह सकता था कि जीवाणु अधिक शक्तिशाली है। हम लोग यह आशा कभी नहीं कर सकते कि उस ज्वालामुखी के भीषण विस्फोटों से अथवा भूचालों के भयंकर झटकों से वह छोटा सा जीवन अपनी रक्षा कर पायेगा। फिर, भी अब हम सब देखते हैं उन सब से बचकर जीव विकसित हुआ और अंत में वही जीवन, चेतना, कला, संगीत, देवदूत, महापुरुष, शहीद, वैज्ञानिक और संत सब कुछ बन गया। जीवन तत्त्व देखने में भले ही उपेक्षणीय लगे किंतु वह कर्म से अधिक शक्तिशाली है।

कभी-कभी हम भ्रम के कारण झूठी, खोखली सक्रियता को अधिक महत्त्व देने लगते हैं। अपने ध्यान के समय हम जो शांति के क्षण पाते हैं वह जीवन कार्यव्यापार, संघर्ष, लोभलालच और कामनाओं के बीच परम सत का दर्शन है। इस आन्तरिक शांति में रहने के हम अभ्यस्त नहीं होते। हमने अपने ही शांत और सुखद सत स्वरूप से बहिष्कृत होकर इधर- उधर भटकते रहते हैं। अब हमें यह भी ज्ञात नहीं रहा कि हम अपनी इस शान्ति में कैसे निमग्न हों और उससे सशक्त होकर अपना व्यावहारिक जीवन दिव्य और सार्थ बना सकें।

जब हम पूर्णत: शान्ति की स्थिति में होते हंै तब हमें अपने को सत्य के सशक्त क्षेत्र में समझना चाहिए। मनुष्य की वही सबसे बड़ी उपलब्धि है। उस शांति के क्षण में यदि हम सचेत रहकर उसकी दिव्य शाक्ति का अनुभव कर लें तो हमें समझना चाहिए कि हम उस समय ईश्वरीभाव में थे। किंतु दुर्भाग्य से हम वहां पहुंचकर भी यह नहीं जान पाते कि हम किस महान स्थिति में थे। हमें उस अनुभव का यथार्थ ज्ञान नहीं होता। हमें जान लेना चाहिए कि हम वही परम शाश्वत तत्त्व हैं।

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