Chanting Secret: जप एक प्रकार का प्रशिक्षण है जिसके द्वारा मन को विचार की एक निश्चित दिशा में लगाया जाता है। वही जप सिद्धान्त का मूल रहस्य है।
जप एक प्रकार का अभ्यास है जिसके द्वारा मन की इधर-उधर बिखरने वाली धाराएं एकीकृत
करके किसी एक दिशा में नियंत्रित रूप में प्रवाहित की जाती हैं। इसके फलस्वरूप उनका समन्वित प्रभाव मंत्र-गान की मधुर ध्वनि उत्पन्न करता है।
इस साधना के द्वारा मन बिल्कुल एकाग्र हो जाता है। वस्तुत: उचित ढंग से जप करने से शिथिल ध्यान की अपेक्षा मन को अधिक अच्छी तरह एकाग्र कर सकता है। जप की सहायता लेकर थोड़ी देर भी ध्यान करने से मन एकाग्र होकर स्थिर हो जाता है। जप के द्वारा परिपक्व हुआ मन वैसा ही है जैसे
पहले से पका हुआ भोजन क्षण भर गर्म करते ही खाने योग्य बन जाता है। जप का अभ्यासी मन ध्यान के लिए बैठते ही कुछ ही क्षणों में अकल्पनीय ऊंचाई पर जा पहुंचता है।
मानसिक एकाग्रता की शक्ति से प्राप्त होने वाले फल समस्त संसार में स्पष्ट देखने में आते हैं। विभिन्न कार्य-क्षेत्रों में मनुष्यों ने जो विशिष्ट सफलता प्राप्त की है वह उनकी एकाग्रता से और लक्ष्य की ओर दृढ़ता से बढ़ते रहने पर ही हो सकी है। जिन लोगों में मानसिक एकाग्रता की कमी रही है वे जीवन में असफल हो गये और कुछ न कर पाये हैं।
यदि भौतिक जीवन या आध्यात्मिक जीवन में नाम मात्र की भी सफलता प्राप्त करनी है तो हमारे मन को शान्त, स्थिर और एकाग्र होकर कार्य में दृढ़ता से लगना चाहिए। इस गुण के बिना मनुष्य द्वारा किये गये सारे प्रयास विकीर्ण होकर तितर-बितर हो जाते हैं और उसका कोई भी लाभ नहीं होता। एकाग्रता में कितनी शक्ति है, यह हम सूर्य की किरणों में
स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। सामान्य रूप से सूर्य की किरणें किसी वस्तु पर ह्रश्वाड़ती हैं और उसका कोई प्रभाव नहीं दिखाई देता, किन्तु जब अवतल दर्पण से होकर वे किरणें निकलती हैं और मुड़कर किसी एक बिन्दु पर एकत्र हो जाती हैं तो उन्हीं किरणों से वस्तु सुलग कर जल उठती है।
पूजा-प्रर्थना के लिए एक अलग कमरा या परदा डालकर कमरे का एक कोना अलग रखो। अपने इष्ट देव का एक सुन्दर-सा चित्र जमीन से इतनी ऊंचाई पर रखो कि जब तुम उसके सामने बैठो तो तुम्हारी आंखों के सामने भगवान् के चरण रहें। अपने इष्टदेव के सामने एक आसन बिछाओ और हाथ में 108 गुरियों की माला रखो। प्रारम्भ में द्वार बन्द कर आसन पर बैठो और जप प्रारम्भ करो। आसन पर इस प्रकार पैरों को मोड़कर आराम से बैठो कि कहीं दबाव न पड़े। पहले भगवान्ï के तेजोमय मुख को देखो, फिर शरीर, जंघा और चरणों पर दृष्टि डालो। अब फिर दृष्टिï को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर चरणों से जंघा, शरीर और मुख पर देखो। फिर आंखे बन्द कर अपने अन्दर भगवान्ï
को उपस्थित देखो और बिल्कुल चित्र की तरह उनके स्वरूप को अपने मन में लाओ। अपने आस-पास और अपने अन्दर परमात्मा को उपस्थित समझ कर उनकी कृपा का अनुभव करो।
अब अपने चुने हुए मन्त्र को अपने संपूर्ण प्रेम के साथ धीरे-धीरे और दृढ़ता से बारबार बोलो। ऐसा करने से जप को प्रभावशाली बनाने के लिए तुम्हारे हृदय में भक्तिभाव आ जायेगा जप एक प्रकार का प्रशिक्षण है जिसके द्वारा मन को विचार की एक निश्चित दिशा में लगाया जाता है। मन के द्वारा विचार-वृत्ति उत्पन्न किये बिना हम एक शब्द का भी उच्चारण नहीं कर सकते। इसी प्रकार कोई
भी विचार-वृत्ति उसके नाम के बिना नहीं हो सकती। प्रयास करके देखो….. क्या तुम ‘लेखनी’ शब्द की पुनरावृत्ति उसके रूप के बिना कर सकते हो? नहीं कर सकते। नाम और रूप में जो इतना निकट का संबंध है वही जप सिद्धान्त का मूल रहस्य है।
