वास्तव में यदि उचित प्रकार से जप का अभ्यास किया जाये, तो वह ध्यान के अन्य सभी जल्दबाजी में किये गये तरीकों की तुलना में अधिक प्रभावकारी ढंग से मन में एकाग्रता ला सकता है। जप के द्वारा स्थिर हुआ मन उस तैयार भोजन के समान होता है जिसे कुछ ही क्षण में आग पर गरम करके खाने योग्य बनाया जा सकता है। जप के द्वारा एकाग्र मन को थोड़े समय का ध्यानाभ्यास ही साधक को ऊंचे से ऊंचे पद पर पहुंचा देता है।

एक ही विचार-बिन्दु पर मन को केंद्रित करने के अभ्यास को जप कहते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि हम किसी शब्द का उच्चारण करें और उसका वैचारिक रूप हमारे मस्तिष्क में न उदय हो अथवा ऐसा भी नहीं हो सकता कि वैचारिक रूप तो आये, किंतु उसका नाम न आये। कोशिश कीजिये। क्या आप बिना रूप की कल्पना किये लिख या शब्द बोल सकते हैं? नाम और रूप के इसी घनिष्ट संबंध के सिद्वांत पर ही जप की प्रक्रिया टिकी है।

ध्यान के समय यदि मनुष्य इच्छानुसार, एवं कुछ समय तक के लिए, अपने मन को एक ही विषय पर एकाग्र करने की क्रिया को नहीं जानता अथवा उसने इस प्रकार मन को एकाग्र करने की क्षमता नहीं प्राप्त की है, तब वह मानों पंखविहीन पक्षी के समान है। अन्य विजातीय विचार-तरंगों का पूर्ण बहिष्कार कर, एक ही विचार बिन्दु पर मन को लगा देना, ध्यान कहलाता है।

आध्यात्मिक उन्नति के लिए जप एक प्रभावकारी मानसिक प्रशिक्षण है। इतिहास में हमें शिवाजी के परम पूज्य समर्थ रामदास का उदाहरण मिलता है। उन्होंने श्री राम मंत्र के जपयोग द्वारा सिद्धि प्राप्त कर ली थी। वह राम मंत्र है- ‘श्री राम जय राम जय जय राम’। भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं गीता में कहते हैं: ‘समस्त योगों में मैं जप योग हूं।’

हम जप कैसे प्रारंभ करें?

अपने घर में एक पूजा-कक्ष बनाइये। वहां अपने इष्टïदेव का सुंदर चित्र इस प्रकार लगाइये कि जब आप फर्श पर बैठें, तो भगवान केचरण कमल आपकी आंखों के सामने रहें। इष्टïदेव के सम्मुख अपना आसन बिछाइये और 108 मनकों की माला लेकर बैठिये। प्रारम्भ में दरवाजा बंद करके जप करना आरम्भ कीजिये। शुरू में पैरों को मोड़ कर किसी भी प्रकार सुखासन पर बैठिये और भगवान के प्रदीप्त मुखारविन्दु, शरीर-यष्टिï, एवं चरण-कमलों के सौन्दर्य को देखना प्रारम्भ कीजिये। अब धीरे-धीरे अपनी दृष्टि को भगवान के चरणों से उठाते हुए मुख की ओर ले आइये और आंखें बंद कर लीजिये। अपने हृदय में उनकी उपस्थिति का अनुभव कीजिये। यह भगवद्दर्शन आप अपने प्रेम करने वाले हृदय में कीजिये जो शारीरिक हृदय की ठीक दायीं ओर स्थित है। यही आध्यात्मिक हृदय-केन्द्र है जहां यदि आप ध्यान लगाते हैं, तो आपकी सफलता दूनी निश्चित है। भगवान की उपस्थिति का अनुभव कीजिये, जरूर अनुभव कीजिये।

अब आप अपनी सम्पूर्ण प्रेम-भावना के साथ अपने इष्टमंत्र को कई बार धीरे-धीरे किंतु स्थिरतापूर्वक दुहराना प्रारम्भ कीजिये। इस प्रक्रिया के द्वारा प्रभावकारी ढंग से जप करने के लिए भक्ति का अंकुरण होता है। हाथ में माला लीजिये और सुमेरु को पकड़िए। अनामिका उंगली तथा अंगूठे के सिरों को मिलाइये और इस पर माला को लटका लीजिये। उत्साहपूर्वक इष्टï मंत्र का उच्चारण कीजिये और हर बार मध्यमा उंगली द्वारा माला के एक-एक मनके को खिसकाइये। इस प्रक्रिया में तर्जनी उंगली को सदा दूर ही रखिये।

जब आप अपने इष्ट मंत्र का 108 बार जप कर चुकेंगे, तो सुमेरु मनका पुना: आपकी उंगलियों पर आ जायेगा। यह एक माला 

जप हुआ। इस प्रकार पूर्ण श्रद्धा के साथ दूसरी माला का जप भी पूरा कीजिये। इस तरह 20 माला जप नित्य कीजिये-एक बार प्रात: और एक बार सायंकाल। 

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