यदि ब्रह्मïड एक भव्य महासमुद्र है, तो हम सभी उसके अंग हैं। हम उस महासमुद्र की पृथक बूदें नहीं वरन् हमें उस महासमुद्र से अभिन्न, अभेद संयुक्त हैं, जब हम स्वयं को अस्तित्व से अलग एक पृथक बूंद मानते हैं, तब हमारा अस्तित्व, हमारे अनुभव एक सीमा में सीमित जान पड़ते हैं। इसी को ‘अहंकार’ कहते हैं। 

जब तक हम इस महासमुद्र में एक बूंद के रूप में रहेंगे तब तक  हम जीवन को अस्वीकार करते रहेंगे। हम न तो प्रेम कर पाते हैं और न ही किसी पर विश्वास और हमें आनन्द भी नहीं अनुभव होता है, क्योंकि आनन्द संभव ही तब होता है जब प्रेम और श्रद्धा होती है। यह उन्हीं के लिए संभव है जो इस महासमुद्र से अभिन्नता को अनुभव करने में सक्षम हैं। परमानन्द तभी संभव है जब हमारा हृदय हां कहता है, स्वीकार से भरा होता है। तब अस्वीकार हमारे स्वभाव में पूर्णत: विदा हो जाता है। अस्वीकार अंधकार है। ‘स्वीकार’ प्रकाश है। ‘नहीं’ अहंकार है, ‘हां’ आत्मिकता है। ‘नहीं’ असजग व्यक्ति मार्ग है। ‘हां’ सजग मनुष्य का मार्ग है। हमारे जीवन की सारी पीड़ाएं, सारे संघर्ष, सारे द्वन्द्व अस्वीकार के कारण हैं। ‘नहीं’ एक संघर्ष है। अस्वीकार अस्तित्व के साथ एक युद्ध है। ‘स्वीकार’, अस्तित्व से प्रेम और सहमति है। ‘हां’ है एक गहन समन्वय हमारे वास्तविक स्वरूप की पूर्णता से। उस महासमुद्र से समन्वय आनन्द उस समन्वय का, उस समस्वरता का दूसरा  नाम है।

अहंकार चेतना का अवरुद्ध स्वरूप है। सभी द्वार-दरवाजे बन्द होते हैं। जीवन आवरण युक्त और बन्द हो जाता है। हमारा अहंकार हमें सभी और से घेरा होता है। हमारा अहंकार एक बंद कैप्सूल के समान है। उसमें छोटा सा छेद भी नहीं होता जिसमें से कुछ अन्दर जा पाए। वह भय के कारण सिकुड़ कर स्वयं में कैद हो जाता है। इस प्रकार हम हमारे लिए दुखों का निर्माण करते हैं।

प्रेम है अस्तित्व की धारा में प्रवाहित होते रहने की क्रिया और पूर्णत: अस्तित्व से एक लय हो जाने की स्थिति, अहंकार जमी हुई बर्फ जैसा है और प्रेम तरल पानी जैसा। केवल तभी हम महासमुद्र से एकत्व को प्राप्त कर सकते हैं जब हम तरल हो जाते हैं। उसके पश्चात् हमारा अपना कोई व्यक्तित्व लक्ष्य अथवा गंतव्य नहीं रह जाता है। प्रत्येक क्षण आनन्दपूर्ण होता है। ब्रह्मïण्ड की योजना अनुसार गतिमान होने से प्रतिपल अविश्वसनीय रूप से हर्षोल्लास से भरा हुआ होता है।

मन अहंकार का एक अंग है जिसे पता है कैसे बन्द हुआ जाए परन्तु उसे खुलना कैसे है यह पता ही नहीं है। प्रेम करने का अर्थ खुलना, समर्पण करना है। इसका अर्थ अस्तित्व के लिए उपलब्ध होना है। प्रकृति के प्रति खुल जाना है। फूलों के लिए, औरों के लिए, और तारे नक्षत्रों के प्रति हम कैसे अस्तित्व के इस सुन्दर संगीत को उपलब्ध हो जाएं जो सारे ब्रह्मïण्ड में गुंजरित है? हम कैसे इस निरन्तर चलने वाले उत्सव में सम्मिलित हो जाएं। जहां फूल चलती पवन में नृत्य करते, पेड़-पौधे, तारों और शीतल पवन का आनन्द लेते हैं। जो नित्य आनन्द में है? मनुष्य को छोड़कर सब कुछ एक लय में, एक समन्वय में जान पड़ता है।

समस्या यह है कि हम भूल ही गए हैं कि हम कौन हैं और हमारा जन्म किसलिए हुआ है? हम भिखारी हैं। हमारे भीतर अस्तित्व का पूरा राज उपलब्ध है। फिर भी हम भौतिक वस्तुओं की भीख मांगते रहते हैं। हम भौतिक वस्तुओं को इकट्ठा किए चले जाते हैं यह जाने बिना कि हमारे भीतर अनन्त खजाने के भंडार हैं। हम महासमुद्र हैं फिर भी हम प्यासे हैं, क्योंकि हमारा अपने वास्तविक स्वरूप से संबंध टूट गया है। परन्तु कितना भी हम भूल जाएं। कितने ही समय से हम भुला बैठे हों, इसे एक क्षण में स्मरण कर लिया जा सकता है और हम तुरन्त फिर से जुड़ सकते हैं। 

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