सद्गुरु वह है जिसकी चेतना का, ईश्वर के प्रकाश को पूर्ण रूप से ग्रहण करने और उसे परावर्तित करने के लिए शुद्धिकरण हो चुका हो। सूर्य का प्रकाश कोयले और हीरे पर समान रूप से पड़ता है, परंतु केवल हीरा ही सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है। ईश्वर का प्रकाश भी जीवन के सभी स्तरों पर समान रूप से चमकता है, परंतु कुछ लोग इसे दूसरों की अपेक्षा अधिक परावर्तित करते हैं। ईश्वरानुभूति प्राप्त मनुष्य दिव्य प्रकाश को पूर्ण रूप से परावर्तित करता है। 

प्रत्येक मानव मूल रूप में एक आत्मा है, जो माया के पर्दे से ढकी हुई है। क्रम- विकास और आत्म-प्रयास द्वारा मनुष्य इस आवरण में एक छोटा-सा छिद्र कर लेता है; और समय के साथ-साथ वह इस छिद्र्र को बड़े से बड़ा करता चला जाता है। जैसे-जैसे छेद बड़ा होता जाता है, उसकी चेतना का विस्तार होता जाता है; तथा आत्मा और अधिक व्यक्त होती जाती है। जब आवरण पूर्ण रूप से फाड़ दिया जाता है तो उसमें आत्मा पूर्णत: व्यक्त हो जाती है। वह व्यक्ति सद्गुरु बन जाता है- अपना एवं माया का स्वामी। 

ईश्वर ने महान पुरुषों को विशेष रूप से निर्मित नहीं किया है। वे अपने ही प्रयासों द्वारा दक्ष बने हैं। जिस प्रकार बाकी सारी मानव जाति आत्म-स्वतंत्रता के प्रकाश के लिए संघर्ष करती है, उसी प्रकार उनको भी परिश्रम और संघर्ष करना पड़ा।

जीसस क्राइस्ट एवं यादव कृष्ण जैसी दिव्य विभूतियों ने भी कभी, किसी समय, उस आध्यात्मिक ऊंचाई को विकसित किया था, जिसने अवतारों के रूप में उनके जन्म को पूर्व निर्धारित किया। ऐसी विभूतियां पुनर्जन्म की कार्मिक बाध्यताओं से मुक्त हैं, वे केवल मानव जाति की मुक्ति हेतु उनकी सहायता करने के लिए पृथ्वी पर वापस आती हैं। 

यद्यपि ये दिव्य पुरुष मुक्त होते हैं, फिर भी वे ईश्वर के आदेश पर अपनी मानवीय भूमिका का, संसार के जीवन-नाटक की प्रतीत होने वाली वास्तविकता में अभिनय करते हैं। उनकी अपनी कमजोरियां होती हैं, संघर्ष और प्रलोभन भी होते हैं और फिर उचित व्यवहार और न्यायोचित युद्ध के द्वारा वे विजय प्राप्त करते हैं। इस प्रकार वे यह दर्शाते हैं कि समस्त मानव उन शक्तियों पर आध्यात्मिक रूप से विजयी हो सकते हैं और उन्हें होना भी चाहिए, जो इतर के साथ उनकी अन्तर्निहित एकात्मता की अनुभूति से उन्हें रोकती हैं। 

अपनी ओर से अपनी आत्म-उन्नति के लिए कोई प्रयास किए बिना अपनी भूमिका के लिए संघर्ष करने और सफल होने का दिखावा करने, पृथ्वी पर अपनी परीक्षाओं के लिए संघर्ष करने और सफल होने का मात्र दिखावा करने वाले कृष्ण एवं क्राइस्ट यदि ईश्वर ने आदर्श बनाए होते तो वे दुखी मनुष्यों के अनुकरण हेतु उदाहरण नहीं बन सकते थे। यह वास्तविकता कि महान अवतार भी कभी ऐसे नश्वर मनुष्य थे, परन्तु उन्होंने सफलता प्राप्त कर ली, उन्हें ठोकरें खाती मानव जाति के लिए शक्ति और प्रेरणा के स्तंभ बना देती है। जब हमें पता चलता है कि दिव्य अवतारों को भी स्वयं को पूर्ण बनाने हेतु कभी उसी प्रकार के मानवीय परीक्षणों एवं अनुभवों से गुजरना पड़ा था जिनसे हम गुजरते हैं, तो यह हमें अपने संघर्ष में आशा प्रदान करता है। एक ईश्वर प्राप्त महापुरुष की पहचान उसके आध्यात्मिक कार्यों द्वारा होती है। इनमें चमत्कार सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। किसी महापुरुष की सबसे महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक उपलब्धि है माया या भ्रम पर विजयी होना। उस अनुभूति को प्राप्त करना जो व्यक्ति के जीवन में ईश्वर को सर्वोपरि बना देती है जीवन से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। 

यह भी पढ़ें –कैसा हो मॉनसून में खान-पान?