Osho Revolutionary Philosopher: ओशो क्रांतिकारी विचारक और दार्शनिक हैं। उनके लेख जहां भी मुझे मिलते हैं। मैं उन्हें पढ़ता हूं। कभी उनके दर्शन नहीं कर सका। यह आवश्यक भी नहीं। वे अपने लेखों में पूर्णतया मिलते हैं। देश के चितंकों पर उनका प्रभाव पड़ेगा। कल मैंने जीवन के 73वें वर्ष में प्रवेश किया स्वास्थ्य अवस्थानुसार, यानी छोटी-मोटी कई बिमारियां लगी हुई हैं। इनमें सबसे बुरी हैं रजनीशाइटिस। इसका नामकरण स्वयं भगवान रजनीश ने अपने श्रीमुख से किया है- जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं है। प्रवचनों के दरम्यान भगवान मेरी कविता उद्ïघृत करते रहते हैं यह मेरा परम सौभाग्य है।
आज करे परहेज जगत पर कल पीनी होगी हाला।
आज करे इंकार जगत पर कल पीना होगा प्याला।।
होने दो पैदा मद का महमूद, जगत में कोई फिर।
जहां अभी है मंदिर मस्जिद, वहां बनेगी मधुशाला।।
इस रुबाई में कवि ने जिस मद के महमूद के पैदा होने की कामना की थी वह पैदा हो चुका है, यह विचित्र है कि महमूद के मद में उसके नाम का भी संकेत है। मद को, फारसी में चांद को कहते हैं- रात के राजा को- रजनीश।
ओशो की ‘संभोग से समाधि की ओर एक उच्चकोटि की पुस्तक है। इसे सभी को पढ़ना चाहिए। खासकर नौजवानों को। इस पुस्तक को कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों में एक मुख्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। यह एक ऐसी किताब है जिसे मां-बाप को शादी-ब्याह में जैसे और चीजें दहेज में देते हैं, यह किताब अवश्य दें। यह किताब हर घर में होनी चाहिए। इस किताब के बारे में मैं जो भी कहूं वह थोड़ा है।
मैं उनकी वैचारिक क्रांति का कायल हूँ

ओशो जैसा पढ़ा लिखा, क्रांतिकारी योगी अब इस दुनिया में नहीं है। वह वैचारिक क्रांति लाना चाहते थे। जिन्हें वह क्रांति पसंद नहीं थी उन्हें वह अखरते थे। मैं उनकी वैचारिक क्रांति का कायल हूं। उनकी किताबों में पुन:रुक्ति बहुत है लेकिन जिसे रोज बोलना हो कुछ न कुछ तो पुन:रुक्त होगा ही, इसलिए उस पुन:रुक्ति को ध्यान न देते हुए उन्हें पढ़ना चाहिए। उनकी भाषा में व्यावहारिक-रचाव, विचारों में क्रांति का क्रमिक उद्ïघोष और शैली में अनूठापन मुझे इतना प्रिय लगा कि मैं उनका एक दक्ष संपादक बन गया। मैं गर्व महसूस करता हूं कि मुझे उनकी पुस्तक ‘महावीर वाणी’ को संपादित करने का अवसर मिला, वह चाहते थे कि जब भी कोई वह किताब पढ़े तो उन्हें वह पढ़ा हुआ नहीं बोला हुआ लगे और आदमी को लगे वह उन्हें सुन रहा है। उनकी यह विशेषता थी, और मैं उनकी इसी विशेषता का कायल हूं। मेरा ऐसा मानना है उनकी किताबें, उनकी कैसेट्स आदि सारी चीजों को अधिक से अधिक प्रचार में लाना चाहिए। हो सके तो उसे मुफ्त बांटना चाहिए ताकि लोग अधिक से अधिक लाभ उठा सकें। जान सके कि जब एक प्रोफेसर अपनी पूरी ऊर्जा के साथ, दूसरे रूप में ढलता है तो कितना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। उसको कितनी अहमियत मिल जाती है। यह कोई मामूली बात नहीं थी।
एक प्रज्ञावान विश्लेषक थे ओशो

ओशो का चिंतन जहां अनेक सवाल खड़े करता है, वहीं समाधान की ओर भी इंगित करता है। ओशो ने जीवन एवं इस जगत को अपनी निगाहों से देखा है, परखा है अपने ढ़ंग से सहज संप्रेषणीय बनाया है। कितने बड़े विचारक थे ओशो, यह समय ही बताएगा, पर एक बात जो सबसे महत्त्वपूर्ण है, वह है विश्व के अनेक दार्शनिकों, चितकों के चिंतन को उन्होंने बहुत सरल, सहज सारगर्भित ढंग से व्याख्यायित किया है यह स्वयं में एक अद्भुत उपलब्धि है।
ओशो का जीवन दर्शन उनकी अपनी सोच का परिणाम है, उससे सहमत भी हुआ जा सकता है और हर दृष्टि से असहमत भी।
मुझे लगता है कि अति हर वस्तु को विवादस्पद बना देती है। दर्शन कभी मरता नहीं। यदि समय की कसौटी पर वह सार्थक सिद्ध नहीं होता तो स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। इसमें संदेह नहीं की इतना बड़ा व्याख्याता, विश्लेषक इस युग में दूसरा कोई नहीं दिखता। जिसने अपनी चकाचौंध से अनेक लोगों को सम्मोहित किया हो।
