Osho is the miracle of this century.
Osho is the miracle of this century.

Osho Miracle: ओशो से मेरा परिचय धर्मयुग के कारण हुआ उसमें उनके लेख, साक्षात्कार छपते थे। और मेरे कॉर्टून जिसमें मेरा डब्बू जी के नाम से एक कॉलम आता था, जिसे ओशो बहुत पसंद करते थे, यहां तक कि वह अपने प्रवचनों के बीच संन्यासियों को हंसाने के लिए उस पत्रिका को हाथ में लेते और कहते ‘देखते हैं इस हफ्ते डब्बू जी क्या कहते हैं’ और सबको उसमें से कोई लतीफा सुनाते थे। मैंने ओशो को खूब पढ़ा है। मैं उनके प्रवचनों से बहुत प्रभावित रहा हूं। सबसे पहले मैं ओशो के जिस विषय को पढ़कर प्रभावित हुआ वह था ‘प्रेम, विवाह और लग्न’ इस विषय से प्रभावित होकर मैंने एक नाटक भी लिखा और सबसे पहले जो पुस्तक मैंने उनकी पढ़ी वो थी ‘संभोग से समाधि की ओर’ इसके बाद तो मैंने उन्हें नियमित पढ़ना शुरू कर दिया। ओशो को मैं आज भी बहुत पंसद करता हूं आज भी उन्हें पढ़ता हूं। वह मेरे सबसे प्रिय दार्शनिक हैं।
शायद 60 के दशक का प्रारंभ होगा, तब मैं कॉलेज में था और ओशो मुंबई में आए-आए थे, तब मैंने ओशो को पहली बार दूर से देखा व सुना था। उन दिनों वह पार्क में टेंट लगाकर प्रवचन देते व अपने लोगों को ध्यान कराते थे। एक दिन मैं वहां से गुजर रहा था मेरे कानों में एक मधुर आवाज पड़ी जिसने मुझे आकर्षित किया और जानने के लिए मजबूर किया कि यह कौन बोल रहा है। यह जानने के लिए मैंने गली पार की, मैदान में देखा कि वह बोल रहे थे। ओशो की छवि हमारे पारंपरिक संतों जैसी नहीं थी। वह कभी दबी हुई आवाज में लाग-लपेट वाली बात नहीं करते थे, वह सीधे निर्भीकता से बोलते थे, जो सुनने वाले को चौंकाती भी थी और सोचने लिए मजबूर भी करती थी। ऐसा ‘बोल्ड’ संत हमारे यहां कभी नहीं हुआ।
आज कल के संतों के साथ तो ओशो की कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। ओशो आज के दौर का महान संत है। वह धरती पर इस सदी का चमत्कार है।
ओशो का जो कम्यून है वह अद्भुत है और उसके पीछे जो नाला है उसको तो उन्होंने स्वर्ग बना दिया है। उन्होंने अमेरिका के ऑरेगन जैसी निर्जीव व बंजर भूमि को जीता-जागता शहर बना दिया। यह सब उनके भीतर की सृजन व कलात्मकता की अद्भुत क्षमता को दर्शाता है। ओशो के शिष्य व पढ़ने वाले किसी एक धर्म, समाज या देश के नहीं थे वह पूरे विश्व से थे। यह दर्शाता है कि ओशो एक विशिष्ट व अति असाधारण व्यक्ति थे। आप भारत की जनता को धोखा दे सकते हो, बेवकूफ बना सकते हो क्योंकि वह धर्म व परंपरा के नाम पर कहीं भी आंख बंद करके झुक जाती है परंतु विदेशियों को अपना बना लेना यह बड़ी कमाल की बात थी। ओशो के अनुयायी या प्रशंसक हमेशा से बुद्धिजीवी वर्ग रहा है।

20वीं सदी के परम पुरुष हैं ओशो

Osho is the ultimate man of the 20th century.
Osho is the ultimate man of the 20th century.

ओशो सरस संत प्रफुल्ल दार्शनिक हैं। उनकी भाषा कवि की भाषा है। उनकी शैली में हृदय को द्रवित करने वाली भावना की उच्चतम ऊंचाई भी है और विचारों को झकझोरने वाली सक्त गहराई भी। लेकिन उनकी गहराई का जल दर्पण की तरह इतना निर्मल है कि तल को दिखने में दिक्कत नहीं होती। उनका ज्ञान अंधकार की तरह अस्पष्ट नहीं है। कोई साहस करे, प्रयोग करे तो उनके ज्ञान सरोवर के तल तक सरलता से जा सकता है।
ओशो वहीं पहुंचकर बुलाते हैं यानी सातवें द्वार के झरोंखे से झांक कर जगत की गतिविधियों का लेखा-जोखा लेते हैं। इसलिए लगता है कि उपनिषद की व्याख्या करते समय उनके श्रीमुख से स्वयं वे मंत्र अपनी व्याख्या करने को उत्सुक, विहल और आतुर होकर पुस्तक के पृष्ठïों पर मुखरित हो उठे हैं। दर्शन के क्षेत्र में शब्दों के नये (सम्यक) अर्थ उनके तारतम्य कि वास्तुबिंद उपयोगिता, ओशो की क्रांतिकारी मौलिक देन है। उपनिषद का कोई भी व्याख्याकार इतनी गहराई में उतरकर सावधानी पूर्वक शब्दों के इतने करीब नहीं जा पाया जितने करीब से ओशो इस ब्रह्मï सरोवर के शब्द मुक्ताओं को स्पर्श कर और अर्थ पूर्णां को सूंघ कर आ पाए हैं। 20वीं सदी के जिस परम पुरुष ने अगम को सुगम, कठिन को सरल और निरस को सरस करके ज्ञान और दर्शन के जटिल कपाट अपनी व्याख्या के एक-एक पृष्ठï पर बोलकर स्पष्टï रूप से प्रभुसत्ता की झलक को रूपांतरित कर दिया है उनके प्रति अंत में इतना ही कहूंगा:
धर्म तेरा नहिं कोई लेकिन तू धर्मों का सरताज है।
तेरी वाणी में वीणा की झंकार है गीत का साज है।

आज दुनिया को तेरी जरूरत है ये दुनिया जानेगी कल सत्य कहता हूं मैं तेरी आवाज ईश्वर कि आवाज है।