Osho Source of Energy: मेरे माता-पिता के जरिए ओशो मेरी जिंदगी में 11-12 साल की छोटी उम्र में ही आ गये थे। वह पूना आश्रम में परफॉर्म करने जाते थे तो मैं भी उनके साथ जाया करती थी।
पहली बार जब मैं वहां गई तो मुझे कुछ खास समझ नहीं आया। लेकिन दूसरी तीसरी बार जब जाना हुआ तो मुझे इस जगह से एक खास लगाव होने लगा। धीरे-धीरे ओशो की तरफ रुझान बढ़ने लगा। उसके बाद मैं खुद पापा से कहने लगी ‘वहां चलिए जहां लोग महरून रंग के कपड़े पहनते हैं।’ हमारे घर में हमेशा ओशो के कैसेट्ïस चलते रहते थे, जो शुरुआत में समझ में नहीं आते थे परंतु जब समझ आने लगे तो उसकी आदत सी हो गई थी। अभी भी काफी बार मैं सुबह उठकर ओशो का कोई न कोई प्रवचन जरूर सुनती हूं। ओशो से बढ़कर कोई और मास्टर या फ्रेंड मुझे समझ नहीं आता।
उनके मुख से निकला प्रत्येक वचन अपने आप में खास है लेकिन ओशो जहां संगीत या धर्म की बात करते हैं वो मुझे बहुत गहराई से छूता है। उनकी बातें ही नहीं, उनकी आंखें भी मैं कभी नहीं भूल सकती। उनकी खोजती और भेदती हुई आंखें मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। उनकी दी हुई ध्यान विधियों में से नादब्रह्मï ध्यान मेरी सबसे प्रिय ध्यान विधि है। एक गायक की दृष्टि से भी देखूं तो उसकी ऊर्जा बहुत डिवाइन है। और ओशो कम्यून की बात करूं तो उसका माहौल चुम्बकीय है वहां जाकर आप उस माहौल से तुरंत कनेक्ट हो जाते हैं। जैसे आप वहां से कभी गये ही नहीं। मैं जब-जब कम्यून जाती हूं तो ऐसे लगता है जैसे ओशो कुछ नया सिखा रहे हैं। कुछ हमने नया सीखा है, कोई नई रोशनी साथ लेकर आये हैं और फिर नये के लिए दुबारा जाना है।
मैं तो कम्यून इसलिए भी जाती हूं ताकि यहां से रिचार्ज होकर वापस शहर के आर्टिफिशियल जंगल में रह सकूं। ओशो की हर बात अलग और निराली है। ओशो उन साधु-संतों की तरह नहीं हैं जो अपने आप को गुरु बनकर पुजवाने में लगे रहते हैं। ओशो को तो बल्कि इस बात से बहुत नफरत थी कि कोई उन्हें गुरु कहे, भगवान कहे, कोई उनकी पूजा करे या उनके लिए व्रत रखे। वो हमेशा स्वयं को सबका मित्र कहते थे।
आज भी ओशो को सुनने समझने वाले लोग बड़े अलग हैं। ओशो तक हर कोई नहीं पहुंच सकता। ओशो तक पहुंचने में लोगों को वक्त लगेगा। जब आप दस जगह धक्के खा लेंगे तब आप यहां आ पाएंगे। ओशो की वाणी को समझने के लिए जहन भी वैसा होना चाहिए। अगर दकियानूसी बातों से आपका दिमाग बंद है तो आप कभी ओशो तक नहीं पहुंच पाएंगे।
ओशो के प्रवचन एक सुरीली बंदिश है

1967 में मैंने ओशो को सुना और मेरे भीतर गहरी हलचल मच गई। मुझे इतना याद है कि वे श्वेत वस्त्र पहनकर आए, डेढ़ घंटे कब बोले और मेरे पास से गुजरकर चले गए। मैं देखता ही रह गया। मैं सिर्फ उनकी किताबें पढ़ता था। उनके कार्यक्रमों के विज्ञापन अंग्रेजी अखबारों में आते थे और मैं केवल मराठी अखबार पढ़ता था। इसलिए मुझे उनके कार्यक्रमों की कोई खबर नहीं होती थी। अब मजे की बात देखिए, मैं उनकी किताबें इस त्वरा से पढ़ता था, लेकिन इतनी किताबें पढ़ने के बावजूद मेरी बेचैनी कायम थी। तो एक बात तो साफ थी कि बेचैनी को मिटाने के लिए किताबें पढ़ना कोई उपाय नहीं था।
वह बेचैनी को क्षणिक रूप से छिपाता था, मिटाता नहीं था। 1981 में ओशो अमेरिका गए। यह खबर मैंने अखबार में पढ़ी और मुझे इतना धक्का लगा जितना मेरे प्रियजनों की मृत्यु पर भी नहीं लगा था। वह भाव कुछ ऐसा था जैसे नाव निकल गई और मैं अभी तक किनारे पर खड़ा हूं। 1982 में मैंने अपने दिल की व्यथा ओशो को लिखी और पूछा, अब मैं क्या करूं? अमेरिका से पत्र आया कि पूना आश्रम जाकर ध्यान करो। उस पत्र का पहला ही वाक्य था जीवन प्रयोजनहीन है। मैं हिल गया। जीवन का कोई प्रयोजन ही नहीं है तो फिर जीना किस लिए? दूसरा वाक्य था बुद्धि की मत सुनो। संन्यास का भाव है तो ले लो। मेरे लिए एक-एक वाक्य हथौड़े की चोट कर रहा था। ओशो के प्रवचन एक सुरीली बंदिश होती हैं।
शास्त्रीय संगीत में जैसे बड़ा ख्याल पेश किया जाता है, पहले विलंबित, उसके बाद मध्य लय और फिर द्रुत बंदिश, उसी तरह ओशो के प्रवचन का प्रारंभ विलंबित लय में होता है, बाद में धीरे-धीरे उसकी लय बढ़ती जाती है। लय के साथ उनका स्वर भी एक बुलंद गर्जना बन जाता है। बिजलियां सी कड़कने लगती हैं और झंझावात के शिखर पर जाकर धीरे-धीरे वापिस मध्य लय में उतरते हुए एक शानदार तिहाई के साथ उनका उद्ïबोधन समाप्त होता है। उनकी आवाज के उतार-चढ़ाव से आप जान सकते हैं कि अब प्रवचन का समापन निकट है। जैसे आकाश में उड़ान भरने के बाद पक्षी एक शानदार वर्तुल बनाकर फिर डाल पर आकर बैठ जाए।
