Osho does not give ready-made principles
Osho does not give ready-made principles

Osho Philosophy: 1965 की बात है मैंने सुना था कि ओशो जीवन के हर पहलू पर बेबाक बोलते हैं। मुझे भी जिज्ञासा हुई और धीरे-धीरे उनके टेप सुनने शुरू कर दिए। सबसे ज्यादा जिस बात ने मुझे छुआ वह थी उनकी ‘क्लैरिटी’। उस क्लैरिटी से आप एकदम प्रभावित हो जाते हैं। उनकी जादूगरी आप पर छा जाती है। और उनकी तरफ से कोई जोर नहीं है कि आप उनसे सहमत हों या न हों। ओशो की बातें बहुतों को विवादास्पद लगती हैं। ये बातें विवादास्पद इसलिए लगती हैं क्योंकि हमने बचपन से कुछ और सीखा है, किताबों में कुछ और पढ़ा है और ओशो से कुछ और ही सुनते हैं। विवाद से खलबली मचती है और लोग सोचने लग जाते हैं कि सही क्या, गलत क्या। जो कबीर ने कहा है वही ओशो कहते रहे उसका कोई असर नहीं होगा। यदि ओशो कबीर को गलत सिद्ध करते हैं तो हम सोचने पर मजबूर हो जाएंगे। दो और दो चार तो सभी कर सकते हैं, लेकिन आप कहें कि दो और दो पांच भी हो सकते हैं तो आपने विवाद तो खड़ा किया लेकिन लोगों को झकझोर कर जगा भी दिया। इसलिए विवाद को मैं बुरा नहीं मानता। उससे तो नई खोज का जन्म होता है।

ओशो को जब आप पहली बार सुनें तो जड़े तक हिल जाती हैं। ओशो दो और दो चार की तरह सब कुछ हमारे सामने खोलकर रख देते हैं। उससे हमें भीतर की एक ऐसी क्लीयरिटी मिलती है कि हम चीजों को खुद अपनी रौशनी में देख सकते हैं। यही ओशो की सबसे बड़ी देन है कि वे हमें कोई बना-बनाया सिद्धांत नहीं देते, हमारे भीतर की क्लीयरिटी को जगाते हैं। ओशो ने अपने शब्दों और विषयों में वह सब चुना जो विवाद खड़ा कर दे। लेकिन भीतर ही भीतर चुपचाप संदेश वही देते रहे जिससे ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ का निर्माण हो। व्यक्तियों के भीतर तो उन्होंने सौंदर्य जगाया ही, आसपास के संसार को सुंदर बनाने की कीमिया भी उन्होंने दे दी। मैं तो इसे ही वास्तविक धर्म मानता हूं। जैसे ओशो कम्यून के पीछे जो ‘नाला, पार्क’ बना उसे मैं धार्मिक कृत्य कहता हूं। कितना गंदा नाला था उसे इतना खूबसूरत बगीचा बना दिया है। वह बगीचा ऐसा है कि उसे देखकर लगता है वहां हर पौधा, हर पत्थर सुर में है। इसलिए कुल मिलाकर उसका असर ऐसा होता है जैसे सुरीली गजल छिड़ी हो। धर्म इससे अलग क्या होगा? इंसान के साथ भी ओशो ने यही किया कि हर आदमी सुर में हो। ओशो हमारी बेसुरी तानों की जमीन पर ही सुर के ऐसे बीज बो देते हैं कि बस फिर जीवन में गीत ही गीत फूटते चले जाते हैं।

जीवन के बसंत हैं ओशो

Osho is the spring of life
Osho is the spring of life

मैं पंडित हूं भी (नाम से) और नहीं भी हूं। क्योंकि शास्त्रों में मेरी कोई गति नहीं है और शब्दों से इतना ज्यादा लगाव भी मुझे नहीं है। हां, भावदशा से जरूर परिचित हूं, हृदय और प्रेम से परिचित हूं- और इन्हीं से मैंने ओशो को और उनके परिवार को जाना है। ओशो के संपूर्ण व्यक्तित्त्व को मैंने संगीत के माध्यम से ही समझा है। संगीत की तरह उनमें भी आरोह-अवरोह थे, सभी स्वरों को वे सजाते-संवारते थे, और शून्य के महासमुद्रों को उलीच देते थे। ओशो का दर्शनाकांक्षी मैं सदा रहा, पर सशरीर उन्हें मिलने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला है। ओशो को समझ कर लगने लगता है कि अभी तो हमने अपनी बैठक ही ठीक की थी, कान सुनने के लिए तैयार ही किए थे- कि तुम मौन हो गए। पर नहीं, शायद ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि फिर ईशावास्य की उद्घोषणा है- पूर्ण से पूर्ण की, और पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बचे रहने की। उन अर्थों में मेरा शरीर के तल पर उनसे मिल पाना या न मिल पाना क्या मायने रखता है? किसी और के लिए भी क्या मायने रखता है? मेरे लिए ओशो का कोई भी कथन एक विशेष महत्त्व रखता है। क्योंकि उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके हर वक्तव्य के साथ ध्यान जुड़ा है। कुछ भी समझाने की चेष्टा उसमें नहीं, कुछ करवाने का अथक प्रयास है। ऐसा कुछ जिससे हर व्यक्ति का जीवन ‘उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र’ हो सके। मैं कई बार ओशो कम्यून गया हूं।

ओशो की झलक मुझे उनके उपवन में मिली, कम्यून के मित्रों से मिली, उनके समाधिस्थल के मौन में मिली कम्यून में लगता कि सुबह है तो गुजरी तोड़ी के स्वर आस-पास मंडरा रहे हैं, और शाम है तो उपवन के वृक्ष मारवा के स्वरों पर लहरा रहे हैं। एक शून्य संगीत पूरे समय मुझे घेरे रहता और एक अजीब सा मौन भीतर गहराता। वहां गाता हूँ तो स्वयं भी मौन से ही मुखरित होते हैं, मौन में ही रहते हैं और मौन में ही विलीन हो जाते हैं। और फिर मौन ही पूर्णरूपेण बचा रहता है। क्या यह मौन ईशावस्य के पूर्ण से कोई मेल रखता है या यह मात्र संयोग है कि मैं अनपढ़ आदमी आज ईशावास्य का आमुख लिख रहा हूं सत्य कुछ भी हो, एक जीवंत मौन को, शून्य को मैं अपने भीतर अब भी अनुभव कर रहा हूं। वे जीवन के बसंत हैं। उनकी मधुरिमा हर जगह महसूस होती है।