Osho: प्राचीन भारत में हमेशा यह माना जाता रहा है आप केवल गुरु के चरणों तक पहुंच सकते हैं या छू सकते हैं, क्यों? क्योंकि केवल उनके चरण पृथ्वी को छूते हैं जबकि वह स्वयं अज्ञात में समाये रहते हैं। चूंकि वह इस धरती की कीचड में कमल के रूप में प्रकट हुए हैं, इसलिए उनके चरणों को लोटस फीट या चरण कमल कहा जाता है। पूरब में शिष्य और भक्तों के लिए गुरु के चरणों में बैठने की परंपरा रही है। उनके जीवन
में ऐसे क्षण परिवर्तनकारी हो सकते हैं और वे पुस्तकों या शिक्षाओं के माध्यम से सीखने की तुलना में अपने गुरु से अधिक गहन और गूढ़ अनुभव ले सकते हैं।
‘कमल चरण’ शब्द का उपयोग हजारों वर्षों से किया जा रहा है, यह देवताओं, संतों और अन्य उच्च आध्यात्मिक
व्यक्तियों के दिव्य चरणों के लिए एक रूपक की तरह प्रयोग किया जाता है, कमल आध्यात्मिक विकास का एक अद्भुत प्रतीक है। जैसे कमल कीचड़ में खिलता है फिर भी उससे प्रभावित नहीं होता है, वैसे ही इस संसार में रहने वाले गुरु, इस संसार की सांसारिकता से दूर रहते हैं। जब शिष्य आशीर्वाद के लिए गुरु के चरण स्पर्श करता है, तो चक्र पूरा करने के लिए गुरु उसके सिर को छूता है। उत्कृष्टï व्यक्तित्वों के चरणों को सांचे में ढाला जाता है, जिसे ‘चरण कमल’ कहते हैं। वे पांच धातुओं से बने होते हैं और शुभ माने जाते हैं। कहा जाता है कि वे लंबे समय तक ऊर्जा को धारण करते हैं।
गुरु के चरणों में बैठकर, किसी भी शब्द की जरूरत नहीं है। उनके सामने मन मस्तिष्क ठहर जाता है। एक मौन संवाद संभव है और समर्पण भी। ओशो संन्यास कम्युनिटी में यह बहुत से लोगों को ज्ञात नहीं है कि ओशो के चरणों का सांचा उनके मुंबई में रहने के दौरान बनाया गया था और ऐसे बारह सेट बनाए गए थे जो जानकारी में हैं। ओशो के मुंबई से पुणे जाने के ठीक पहले, मा योग तरु, जिन्हें ओशो ने नाइटिंगेल का भी नाम दिया था, ओशो को अपने घर दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया। दोपहर के भोजन के बाद, मां योग तरु ने भावुक होकर ओशो से निवेदन किया कि वह उन्हें अपने चरणों के तलवों को कुमकुम (जिसे हिन्दू महिलाएं अपने माथे पर बिंदी लगाने के लिए इस्तेमाल करती हैं) से रंगने के बाद एक साफ सफेद कपड़े पर उन रंगे हुए चरणों की छाप रखने की अनुमति दें ताकि वह उसे सदा के लिए संरक्षित कर सके। ओशो ने इस पर अपनी सहमति दे दी।
इस घटना से ओशो को एक हवाई यात्रा में सह-यात्री के रूप में एक बहुप्रसिद्ध दिवंगत मूर्तिकार ब्रमेश वाघ के साथ हुई मुलाकात की याद आ गयी, अपनी उस मुलाकात में ओशो ने उनसे ऐसे ही पूछा था कि सैकड़ों वर्षों तक एक धातु की मूर्ति कैसे संरक्षित रह सकती है? तब वाघ ने उत्तर दिया कि प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार मूर्तियों को पांच धातुओं या पंच (पांच) धातु (धातुओं) के एक यौगिक से बनाया जाता था। इसके कुछ दिनों बाद, एक भक्त ने उनके चरण कमलों को अधिक स्थायी रूप देने के लिए प्रार्थना की। इसके लिए ओशो
ने स्वर्गीय वाघ को याद किया, उन्हें सांचा बनाने के लिए आमंत्रित किया गया, चरणों के उस सांचों को बनाने में
लगभग चार घंटे लगे। उस सांचे से उन्होंने ओशो के चरण कमलों का एक सेट तैयार किया।

आज भी पुणे में रहने वाली मंजू के अपार्टमेंट में इन चरण कमलों का पहला तांबे का रंगीन सेट शोभायमान है। बाद में, जब 1974 में मेरे संन्यास की शुरुआत हुई और ओशो ने नैरोबी में स्थित अपने ध्यान केंद्र का नाम ‘प्रेम
नीड’ दिया, मंजू ने अनुरोध किया कि इस केंद्र के लिए भी एक सेट को देने की मंजूरी दी जा सकती है, जैसे कि
नैरोबी में स्थित सबसे पहले केंद्र, आनंद नीड में भी एक सेट देने की मंजूरी पहले मंजू को दी गयी थी। इस बार सेट का रंग सुनहरा था और यही रंग अन्य सभी सेटों के लिए मंजूर किया गया था। ओशो ने मा योग लश्मी को संकेत दिया कि वे मुझे पत्र दे कर वाघ के पास सांचों का एक सेट के लिए भेजे। मैं मुंबई में वाघ के स्टूडियो में गया (जो उनकी तीन पीढ़ियों में 100 वर्षों से चल रहा है) और मैंने उस सेट के लिए तीन हजार रुपए का भुगतान किया जिसे दो सप्ताह में तैयार कर दिया गया। इसे लेने के बाद, मैं वापस पुणे गया और उनको मा
लक्ष्मी को दिया जिन्होंने इसे ओशो के शयनकक्ष में तीन रातों के लिए रखा ताकि सेट को उनकी ऊर्जा से चार्ज किया जा सके।
तब नैरोबी के कई अन्य संन्यासी भी चरण कमल के सेट का अनुरोध करने लगे और इस तरह आधा दर्जन से अधिक चरण कमल नैरोबी में रखे गए, प्रत्येक का एक भव्य उत्सव के साथ स्वागत किया गया। बाद में, हमने सुना कि इस प्रक्रिया को बंद कर दिया गया था। सत्तर के दशक के मध्य से, कई नैरोबी संन्यासी नैरोबी से ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा चले गए और इन चरण कमलों ने भी उनके साथ यात्रा की।
मंजू ने यू.के. में अपने बच्चों के लिए एक और सेट देने का अनुरोध किया, वे सभी उस समय संन्यासी थे और इसलिए जैसे कि मेरा संन्यासी परिवार दिल्ली में रह रहा था उनके लिए मैंने भी सेट देने का अनुरोध किया, तब हम दोनों को दो सेट मिले।
दर्शन के दौरान, मुझे सेट दिया गया था और मैंने नैरोबी को टेलीग्राम किया कि चरण कमल आ रहे हैं। ओशो के चरण कमल के स्वागत के लिए लगभग 50 संन्यासियों ने हवाई अड्डे का रुख किया और जब वे ‘प्रेम नीड’ के नए घर पहुंचे,तो घंटों तक गायन और नृत्य का जश्न जारी रहा।
सत्तर के दशक के दौरान मैं एक ओशो फिल्म की स्क्रीनिंग कर रहा था, जिसे मैंने अपने परिवार के लिए नई दिल्ली में एक छत पर शूट किया था। अगले दिन, मेरी एक पड़ोसी, निर्मल खन्ना मेरे घर आयी, और मुझसे पूछा कि इस फिल्म में यह आदमी कौन था। इस तरह वे ओशो से परिचित हुई और वे पुणे गई, जहां उन्होंने संन्यास लेने की पहल की और तब उन्होंने एक सेट चरण कमल देने का अनुरोध किया। उनके पति और बेटी भी
संन्यासी बन गए। सन् 2000 में भारत लौटने पर, हम उनसे मिलने गए और हमने देखा कि उन्होंने उस सेट को एक अलमारी में रखा हुआ था, क्योंकि तब वह किसी अन्य गुरु का अनुसरण करने के लिए आगे बढ़ चुकी थी। इसलिए, हमने सुझाव दिया कि यह सेट ओशो धाम में अधिक उपयुक्त रूप से रखा जा सकता है और वह उसे दान करने के लिए सहमत हो गई।
इस बात को लेकर स्वामी ओम प्रकाश और स्वामी अतुल प्रसन्न थे और हम इस सेट को बुद्ध हॉल के पास स्थित ओशो धाम ले गए जहां सैकड़ों संन्यासियों ने फूल की पंखुड़ियों के साथ एक बड़ा उत्सव मना कर सेट का स्वागत किया। क्या ओशो के चरण कमलों में उनकी ऊर्जा रिस रही थी? मुझसे यह सवाल पूछा गया है। तो निश्चित रूप से इसका जबाब है ‘हां’। यदि आप उन्मुक्त हैं और ध्यानपूर्ण अवस्था में हैं, तो आप इसे स्पष्ट
रूप से अनुभव कर सकते हैं। मैंने यह तब अनुभव किया जब कुछ संन्यासी हमारे ओशो के कमरे में प्रवेश करते हैं और वे उसके द्वारा स्वयं ऊर्जावान महसूस करते हैं। वह उसमें स्थित हैं।
ओशो धाम में बुद्ध हॉल में ध्यान के बाद युवा संन्यासियों को भी इसी तरह का अनुभव प्राप्त हुआ है।
लगभग एक दर्जन से अधिक निम्नलिखित संन्यासियों और ओशो ध्यान केंद्रों के पास ओशो के चरण कमल होने कीजानकारी है: भारत (नई दिल्ली-3, पुणे-2, देहरादून-1, भागेश्वर-1), ब्रिटेन (लंदन-5), कनाडा (टोरंटो-1) और एक अज्ञात स्थान पर।
