कर्म और ज्ञान का संतुलन,

सांसारिक जीवन से विशुद्ध शान्ति और आनन्द प्राह्रश्वत करने की आशा न रखें। यह आपकी नई प्रवृत्ति होनी चाहिए। चाहे आपके अनुभव कैसे भी क्यों न हों, उनका निष्पक्ष भाव से आनन्द लें, जैसे कि आप एक चलचित्र का लेते हैं। आपको सच्ची शान्ति एवं आनन्द अपने अन्दर ही खोजना पड़ेगा। आपके बाह्य अनुभव तो केवल मनोरंजन के लिए होने चाहिए। आप उन सबको दुखदायी अनुभवों में बदल सकते हैं यदि आप अपने मन को वैसा करने की अनुमति दे देते हैं। आपका अच्छा स्वास्थ्य हो और आप इसे बिल्कुल भी सराहते न हों। परन्तु यदि आप अस्वस्थ हो जाएं तो, हो सकता आप उसका महत्त्व समझेंगे कि स्वस्थ होने का अर्थ क्या है। ईश्वर ने जो कुछ भी आपको प्रदान किया है उसके लिए उनका आभार प्रकट करें, विपरीत परिस्थितियों की प्रतीक्षा किए बिना कि वे आपको कृतज्ञ बनाएं।

आप एक अमर सन्तान हैं। आप इस पृथ्वी पर दूसरों को आनन्दित करने और स्वयं आनन्दित होने के लिए आए हैं। इसलिए जीवन ध्यान और कार्य दोनों का समिश्रण होना चाहिए। यदि आप अपना आन्तरिक संतुलन खो देते हैं, तो निश्चित रूप से यही वह समय है जब आप सांसारिक कष्टों के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं। ईश्वर के नाम का अपमान मत करें, जिनके प्रतिरूप में आप बनाए गए हैं।

अनुभूति के साथ यह कह सकने के लिए कि सब कुछ मन में ही है, आपको पहले ईश्वरीय शांति की उस आन्तरिक चेतना को विकसित करना होगा, जो इस जगत के अनुभवों से अप्रभावित रहती है। उन्हें स्वह्रश्वन की भांति स्वीकार करें और एक ऐसा समय आएगा जब आप पाएंगे कि मात्र आपके प्रबल विचार की शक्ति से, जो कुछ भी आप सोचेंगे वह साकार हो जाएगा। ऐसा करना बहुत कठिन तो है, परन्तु ऐसा किया जा सकता है।

व्यक्ति की सर्वप्रथम एकाग्रता ईश्वर के साथ ऐक्य पर होनी चाहिए। प्रतिदिन संसार की विभिन्न परिस्थितियों से गुजरते समय मानसिक रूप से ईश्वर के साथ अपने एकत्व का अभ्यास करें। यदि उस चेतना को विचलित करने के लिए पीड़ा आ जाए तो आपको तर्क करना चाहिए, अच्छा यदि मैं सो रहा होता तो इस पीड़ा को अनुभव नहीं करता, तो अब मुझे इसका बोध क्यों होना चाहिए? सभी अनुभव क्षणिक स्वह्रश्वन हैं। इस प्रकार सभी परीक्षणों पर विजय पाने का अभ्यास करें।

एकाग्रता की पहली अवस्था है कि जो कुछ भी आप चाहते हैं उसे अपने मन की आंख से देखने में सक्षम होना। उदाहरण के लिए, मैं इस कमरे को देखना जारी रख सकता हूं और इस पर एकाग्रता रख सकता हूं कि मैं आंखें बन्द करने पर भी इस कमरे को ठीक इसी प्रकार देख सकूं। गहन एकाग्रता का यह प्रथम चरण है, परंतु अधिकांश लोगों को इसका अभ्यास करने के लिए धैर्य ही नहीं है। मुझमें धैर्य था।

आप निरंतर मानस दर्शन का अभ्यास करते जाएं तो आप पाएंगे कि आपके विचारों ने मूर्त रूप ले लिया है। ब्रह्मïण्डीय नियम इस प्रकार व्यवस्थित हो जाएगा कि आप जो कुछ भी सोचेंगे वही वास्तव में उत्पन्न हो जाएगा, यदि आप ऐसा होने के लिए आदेश करें।

व्यक्ति सत्य को दो तरीकों से सीख सकता है- अनेक अच्छे और बुरे अनुभवों से गुजरकर या ज्ञान विकसित करके। जिसे आप प्राथमिकता देते हैं उसे आप चुन लें। भगवान कृष्ण ने कहा है- ज्ञान की प्राह्रिश्वत तुरन्त सर्वोच्च शान्ति प्रदान करती है। जीसस ने कहा- सर्वप्रथम तू ईश्वर के साम्राज्य की खोज कर। यदि आप पहले अन्य किसी वस्तु को खोजते हैं, तो आपका मोह अवश्य भंग होगा। प्रत्येक व्यक्ति तर्क देता है, ठीक है, दूसरों ने धोखा खाया है, परंतु मैं नहीं खाऊंगा। फिर भी उसके साथ धोखा अवश्य होगा। केवल एक ही अनुभव जो सच्चा है, केवल एक ही अनुभव जो आनन्द लाता है, वह है ईश्वर की उपस्थिति की जानकारी।

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