‘ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:॥’

पुराणों के अनुसार राहु सूर्य से 10,000 योजन नीचे रहकर अंतरिक्ष में भ्रमणशील रहता है। कुंडली में राहु-केतु परस्पर 6 राशि और 180 अंश की दूरी पर दृष्टिगोचर होते हैं जो सामान्यत: आमने-सामने की राशियों में स्थित प्रतीत होते हैं। इनकी दैनिक गति 3 कला और 11 विकला है। ज्योतिष के अनुसार 18 वर्ष 7 माह, 18 दिवस और 15 घंटे, ये संपूर्ण राशियों में भ्रमण करने में लेते हैं।

कथा

यह कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी है। देव और असुरों को अमृत मिला। भगवान विष्णु ने अमृत को असुरों से बचाने की युक्ति सोची। उन्होंने मोहिनी का रूप धरा और देवताओं और दैत्यों को अलग-अलग बिठाकर अमृत पान कराने लगे। एक असुर स्वरभानू को कुछ संदेह हुआ। उसने देवताओं का रूप धरा और चन्द्र और सूर्य के बीच जाकर बैठ गया। जब मोहिनी रूप धरे विष्णु उन्हें अमृत पिलाने लगे तब चन्द्र और सूर्य ने उसे पहचान लिया और कहा कि यह तो असुर है। तब विष्णु भगवान ने अपने चक्र से उसका सिर और धड़ अलग कर दिया। इस बीच अमृत की कुछ बूंदें उसके मुंह में जा चुकी थीं। इसलिए सिर और धड़ अलग होकर भी अमर हो गए। असुर का वही सिर राहु और पूंछ यानी धड़ केतु कहलाया। स्वरभानू की मां सिमिहिका उसका सिर उठाकर ले गई और धैर्यपूर्वक उसकी देखभाल की। एक समय के बाद सिर को सर्पिला धड़ मिल गया और वह राहु कहलाया। असुर का धड़ एक मिनी नाम का ब्राह्मïण ले गया। वह अपने बेटे के लिए ले गया था। भगवान विष्णु ने उसे सर्पिला सिर दिया। यही केतु बना जो समय के साथ संत बन गया। राहु और केतु ने सूर्य और चन्द्र को उसका भेद खोलने के लिए क्षमा नहीं किया और उनके ग्रहण का कारण बना।

राहु और केतु

राहु और केतु वैदिक ज्योतिष में ग्रह के रूप में स्वीकारे गए हैं। उनका कोई आकार नहीं है लेकिन संवेदनशील बिन्दुओं की गणितीय गणना का पृथ्वी वासियों पर बहुत प्रभाव पड़ा है। चन्द्रमा अपनी कक्षा में दक्षिण से उत्तर की ओर है जो सूर्य के प्रभामंडल को पार करता हुआ चक्कर लगाता है। प्रतिच्छेदन का यही बिंदु राहु के नाम से जाना जाता है। इस बिंदु से 180 डिग्री दूर चन्द्रमा सूर्य के प्रभामंडल को उत्तर से दक्षिण की ओर काटता है। यह बिंदु केतु कहलाता है। राहु और केतु हमारे ज्योतिष पद्धति में बिलकुल विलक्षण हैं, क्योंकि इनके प्रभामंडल के परिच्छेदन बिंदु पर इतना तनाव मिलता है यह समझा जा सकता है। जबकि सूर्य शरीर और चन्द्र मस्तिष्क है और उनका प्रतिच्छेदन भारी प्रभाव देता है। राहु और केतु अंतरिक्ष में स्थिर नहीं हैं लेकिन उनकी धीमी गति एक साल में लगभग 19 डिग्री और 30 मिनट है। इसका अर्थ यह हुआ की इसे पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करने में लगभग 18 साल 6 महीने लगते हैं। यह गति पीछे जाने वाली है। एक मध्यम राहु और सत्य राहु की अवधारण है। हिन्दू ज्योतिष में हम राहु और केतु की वास्तविक स्थिति को लेते हैं।

उत्तर काल अमृत के अनुसार राहु ग्रह निम्न के कारक हैं: गलत तर्क, कठोर वक्तव्य, चंडाल, नास्तिक व्यक्ति, विदेश यात्रा, गन्दगी, हड्डी, पेट का अल्सर, झूठ, दक्षिण पश्चिम दिशा, सर्पिला, बुढ़ापा, नाना, सांस लेना, तेज दर्द, दादा, वाणी, खोजी प्रवृत्ति, विदेश भ्रमण, चमड़ी पर धब्बे, त्वचा रोग, सांप का काटना, जहर, महामारी, दूसरी स्त्री से संबंध, नाना- नानी, बिना बात के तर्क-वितर्क, कपटी, धोखेबाज, वैधव्य, दर्द, सूजन, कमजोरों को दबाना, अंधेरा पसंद, चुगलखोर, पाखंडी, बुरी आदतों वाला, डर, अंग-भंग होना, कुष्ठ रोगी, ताकत, खर्चे, शत्रु, देश से निष्कासन होना, तस्करी करना, जासूसी करना, आत्महत्या करना, शिकार, गुलामी, पत्थर, नैत्यकोण। मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान, स्वयं को लेकर गलतफहमी, आपसी तालमेल में कमी, बात पर आपा खोना, वाणी का कठोर होना व अह्रश्वशब्द बोलना, व कुंडली में राहु के अशुभ होने पर हाथ के नाखून अपने आप टूटने लगते हैं। राजक्ष्यमा रोग के लक्षण प्रगट होते हैं। वाहन दुर्घटना, उदर कष्ट, मस्तिष्क में पीड़ा अथवा दर्द रहना, भोजन में बाल दिखना, अपयश की प्राप्ति, संबंध खराब होना, दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहता है, शत्रुओं से मुश्किलें बढ़ने की संभावना रहती है। जल स्थान में कोई न कोई समस्या आना आदि।

राहू का प्रभाव

ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार राहु को असुर का ऊपरी धड़ और केतु को पूंछ का हिस्सा होता है। केतु ग्रह के पास मस्तिष्क नहीं है, जिस भाव में या जिस ग्रह के साथ रहता है, उसी के अनुसार फल देता है। कन्या राशि राहू का घर है। यह वृषभ राशि में उच्च का और वृश्चिक में निम्न रहता है। हालांकि इसमें मतभेद हैं। कुछ लोग उच्च और निम्न बिंदु मिथुन और धनु को मानते हैं। यह कहा गया है की राहु अगर कर्क राशि में रहे तो योगकारक परिणाम देता है। हालांकि यह देखा गया है कि एक छाया ग्रह के नाते राहु ग्रहों के प्रभाव के आधार पर परिणाम देता है। यह सांसारिक सुख-सुविधा के लिए एक अच्छा ग्रह माना गया है। हालांकि राहु के साथ बहुत सी माया जुड़ी हुई है। आधुनिक काल में राहु कंह्रश्वयूटर, इन्टरनेट और जन संचार का प्रतिनिधित्व करता है। राहु बृहस्पति, शुक्र और शनि के साथ मित्रता रखता है। सूर्य और चन्द्र इसके शत्रु हैं और बुध के साथ निष्पक्ष रहता है। राहु और केतु यदि केंद्र-त्रिकोण में उनके स्वामियों के साथ बैठे हों या उनके साथ शुभ दृष्टि में हों तो योगकारक बन जाते हैं और शुभ परिणाम जैसे की लंबी आयु, धन, भौतिक सुख आदि देते हैं। सूर्य, राहु या केतु के साथ: व्यवसाय, पिता की सेहत, मान-प्रतिष्ठा, आयु, सुख आदि पर बुरा प्रभाव होता है। चंद्र यदि

राहु या केतु के साथ: व्यक्ति मानसिक रोग, वातरोग, पागलपन, आदि का प्रभाव होता है। चंद्र और राहु लग्न में हों तो जातक को भूत-प्रेत बाधाओं का सामना करना पड़ता है। मंगल राहु या केतु के साथ: हिंसक क्रोधी कातिल हो सकते हैं। मंगल व राहु की युति से अंगारक होता है। बुध राहु या केतु के साथ: लाइलाज बीमारी, पागल, सनकी, चालाक। शुक्र राहु या केतु के साथ: दूसरों की स्त्रियों के प्रति आकर्षित होना। शनि राहु या केतु के साथ: आत्महत्या कर सकता है। आतंकवादी हो सकता है। शनि व राहु की युति नंदी योग का बनता है। राहु व गुरु की युति से गुरु चांडाल योग: जातक कपटी व अविष्वासी होता है। स्त्री के जन्म लग्न या नवांश लग्न में: राहु या केतु हो तो उसके बच्चे का जन्म ऑपरेशन से होगा।

तत्त्व प्रकृति रंग:‘ यह ग्रह वायु तत्त्व म्लेच्छ प्रकृति तथा नीले रंग पर अपना विशेष अधिकार रखता है।’ जानवरों में हाथी, बिल्ली व सर्प पर राहु ग्रह का विशेष प्रभाव माना गया है।’ धातुओं में कोयले पर राहु का अधिकार होता है।’ राहु को नीले फूल प्रिय हैं।’ सरस्वती इनकी ईष्ट देवी है।’ ध्वनि तरंगों पर राहु का विशेष अधिकार है।’ शरीर में कान, जिह्वा, समस्त सिर तथा गले में राहु का विशेष प्रभाव रहता है।’ सोच-विचार, कपट, झूठ चोर-बाजारी, स्वह्रश्वन, पशु मैथुन आदि क्रियाओं को यह संचालित करता है।

राहु रत्न गोमेद: यह राहु ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। यह लोहा एवं जस्ता तथा अन्य द्रव्यों का मिश्रण है। लोहे का अंश अधिक होने पर गोमेद को चुंबक खींच लेता है। गोमेद का शाब्दिक अर्थ होता है गाय के मूत्र का रंग वाला। यह रत्न गोमूत्र के रंग जैसा होता है। राहु की शांति के लिए यह रत्न असरकारक है। यह, मानसिक तनाव एवं क्रोध को शांत कर, आत्मज्ञान में वृद्धि करता है। गोमेद को संस्कृत में गोमेदक, पिगस्फटीक, पीतरक्तमणि, तमोमणि, राहु रत्न, अंग्रेजी में ऐगेट, चीनी में पीली, बंगला में मोदित मणि, अरबी में हजार यमनी कहते हैं। यह लाल लिये हुए पीले रंग का पारदर्शक चमकीला रत्न होता है। इसका रंग शहद जैसा भूरा होता है। गाय की चर्बी जैसा होने के कारण इसे गोमेद कहा गया है।

प्राप्ति स्थान: लंका, भारत, थाईदेश, कंबोडिया, मैडागास्कर। गोमेदक उपरत्न: तुरसाब, जिरकन, तुस्सा और साफी। इसके अतिरिक्त तृणकांत भी है। यह कहवा पेड़ का गोंद है, जो समय पा कर पत्थर का रूप ले लेता है। यह पीला, चमकीला और सुंदर होता है। विदेशी मतानुसार गोमेद अगस्त में जन्में व्यक्ति का जन्म रत्न ‘बर्थ स्टोन’ होता है। 15 फरवरी से 15 मार्च, यानी कुंभ के सूर्य में जन्में व्यक्ति को यह रत्न अवश्य धारण करना चाहिए। अंक विज्ञान ‘न्यूमरोलॉजी’ के अनुसार 4, 13, 22 एवं 31 तारीख को जन्में व्यक्ति को गोमेद धारण करना चाहिए। कन्या राशि और कन्या लग्न वालों द्वारा गोमेद धारण करने से उनका मन प्रसन्न रहता है, चिंता दूर रहती है।

गोमेद का भौतिक गुण

प्रथम वर्ग: यह गोमेद प्रसिद्ध है। इसके दो रंग हैं- पीला और श्वेत। यह सरलता से तराशा नहीं जा सकता है। इसमें अपूर्व चमक होती है। यह सामान्य जन के लिए सुलभ नहीं है।

द्वितीय वर्ग: यह भूरा रंग लिए होता है। इसमें अन्य गुण प्रथम श्रेणी के ही पाये जाते हैं। गया का गोमेद, जो संसार में प्रसिद्ध है इसी वर्ग का गोमेद है।

तृतीय वर्ग: इसमें हरे रंग की झांइयां होती हैं। यह भूरे और नारंगी रंग में भी पाया जाता है। गोमेद कभी भी सवा चार रती से कम का नहीं धारण करना चाहिए। राहु, मिथुन राशि में उच्च और धनु राशि में नीच माना जाता है। यह कन्या राशि में रहता है, अत: 6, 11, 7, 10 रती का धारण कर सकते हैं, परंतु 9 रती का कभी भी धारण न करें। रत्न के अभाव में सफेद चंदन, नीले डोरे में बांध कर, गले में धारण करें।

गोमेद से लाभ:- धारण करने वालों के भ्रम का नाश करता है। निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।- आत्मबल का संचार करता है।- दरिद्रता मिटा कर आत्मसंतुष्टि देता है।- शत्रु पर विजय होती है। वह अजात शत्रु बन जाता हैं।- सफलता सुगमता से मिलती है।- नशा, परस्त्री/परपुरुष दारा गमन एवं अपहरण जैसी बुरी आदत में शीघ्र सुधार करता है।- पाचन के स्थान के मुख्य अंग आमाशय की गड़बड़ी को दूर करता है।- अभद्र खाद्य वस्तु को त्यागने की भावना का संचार करता है।- विवाह संस्कार में आने वाली बाधा को दूर कर शीघ्र शादी करवाता है।- संतान बाधा को दूर कर शीघ्र संतान प्रदान करता है।- जीवन की बाधा को दूर कर व्यक्ति को विकास पथ पर स्वत: अग्रसर करवाता है।

राहु शांति के उपाय

राहु शनि के फलों जैसे फल देता है। राहु जिस स्थान में स्थित होता है, जिस ग्रह से युक्त होता है, अगर ग्रह की दृष्टि में होता है, तो इन तीनों में जो बलवान होता है, उस जैसा फल प्राप्त होता है। राहु के वक्री होने पर जीवन में परेशानियां आती हैं। व्यापार में नुकसान, सगे-संबंधी, पति-पत्नी के बीच हमेशा झगड़ा ही होता है। सरकारी परेशानी बराबर आती रहती है। बराबर नुकसान ही होता रहता है। जीवन में किसी प्रकार की शांति नहीं रहती। राहु-केतु को काल पुरुष का दुख माना गया है। यदि कुंडली में राहु की अशुभ स्थिति हो, तो व्यक्ति को जानवरों एवं जहरीले कीड़े-मकोड़ों से हानि होती है। राहु पेट संबंधी बिमारियां देता है। इसके अतिरिक्त हाथ-पैरों में सूजन, बवासीर, गंडमाला, कुष्ठ रोग, सर्प दंश आदि राहु की अशुभ स्थिति के कारण होते हैं। मिर्गी, गठिया, कान दर्द, हृदय की कमजोरी, सन्निपात आदि भी राहु के हिस्से में आते हैं।

पूजा विधि: स्नान कर के, काला कपड़ा पहन कर, हनुमान जी की आराधना करना और काले रंग के चावल से स्वस्तिक बना कर, दीपक, अगरबत्ती जलाकर, कमलगट्टा, किशमिश का नैवेद्य करना। काले तिल के लड्डू का प्रसाद बांटना।

राहु के बीज मंत्र- ऊं भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: का 18000 जप अनुष्ठान करवाएं। गोमेद एवं राहु यंत्र धारण करें। राहु से संबंधित वस्तुएं, जैसे गेहूं, रत्न, घोड़ा, नीला कपड़ा, कंबल, तिल, तेल, लौह, अभ्रक आदि का दान करें। जल में कस्तूरी, गजदंत, लोबान एवं मुरथरा मिला कर स्नान करवाएं। मूंग की खिचड़ी खा कर 21 बुधवार उपवास करना और 11 कोयले नदी में बहाना। घर में जितने सदस्य हों, उतने नारियल नदी में बहाना। राहु की अंगूठी पहनना। विधि करना और यंत्र जेब में रखना जरूरी है। नीले कपड़े में तिल बांधकर हनुमान जी के मंदिर में चढ़ाएं। बूंदी के लड्डू पर 4 लौंग लगाकर हनुमान जी को अर्पित करें। सरसों के तेल में नील मिलाकर हनुमान जी के चित्र के आगे दीपक जलाएं। हनुमान जी के चित्र अथवा मूर्ती पर नीले फूलों की माला चढ़ाएं।

पान के पत्ते पर कत्था लगाकर हनुमान की को अर्पित करें। ऊं रां राहवे नम: का प्रतिदिन एक माला जाप करें। दुर्गा चालीसा का पाठ करें। पक्षियों को बाजरा खिलाएं। दुर्गा, शिव व हनुमान की आराधना करें। तिल, जौ किसी हनुमान मंदिर में या किसी यज्ञ स्थान पर दान करें। जौ या अनाज को दूध में धोकर बहते पानी में बहाएं, कोयले को पानी में बहाएं, मूली दान में देवें, भंगी को शराब, मांस दान में दें। सिर में चोटी बांधकर रखें। सोते समय सिर के पास किसी पत्र में जल भरकर रखें और सुबह किसी पेड़ में डाल दें, यह प्रयोग 43 दिन करें। इसके साथ हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमानाष्टक, हनुमान बाहुक, सुंदरकांड का पाठ और ऊं रं राहवे नम: का 108 बार नित्य जाप करना लाभकारी होता है। धान्य का दान करते रहें। शिवलिंग को जलाभिषेक करें। र्नैत्य कोण में पीले रंग के फूल लगाना ठीक रहता है। तामसिक आहार व मदिरापान नहीं करना चाहिए।

यह भी पढ़ें –बुद्घ सारे संसार की ज्योति है