Hindi Kahaniya: रिया ने मोबाइल खोला। ऊपर आरव की नई कहानी चमक रही थी—
गिटार की वही उदास धुन, वही बेमन-सा चेहरा।
वो हल्के से मुस्कुराई, फिर उँगलियाँ ठिठक गईं।
एक दिल का चिन्ह डाला, और तुरंत मिटा दिया।
अब वह पहले जैसी नहीं रही थी। कुछ महीने पहले तक दोनों के बीच हर दिन कोई न कोई संवाद होता था। पहचान टिंडर पर हुई थी—फिर देर रात तक चलने वाले संदेश,
वॉइस नोट्स में उलझी हँसी,
और सुबह तक खिंचती बातें—
“तू तो मेरी कॉफ़ी बन गई है।”
रिया को लगता था, यह रिश्ता किसी दिशा में बढ़ रहा है,
पर धीरे-धीरे आरव बदलने लगा।
पहले “गुड मॉर्निंग” की जगह अब ‘सीन’ दिखता था।
फिर “कैसी हो?” की जगह बस एक ‘लाइक’।
अब वह न बातें करता, न हाल पूछता।
बस रिया की कहानियाँ देख लेता—
कभी आग का इशारा, कभी “खूबसूरत” इमोजी,
कभी “मूड वही।”
बस इतना कि दिल को लगे—वो अब भी कहीं पास है,
पर दिमाग कहे—नहीं, वो बहुत दूर जा चुका है। रिया को समझ नहीं आता था—
अगर दिलचस्पी नहीं, तो हर तस्वीर पर क्यों आता है?
और अगर है, तो बात क्यों नहीं करता?
वो उलझन में जीती रही—एक ऐसे धागे में बँधी,
जो दिखता तो था, पर पकड़ में नहीं आता था।
कभी वह अपनी सहेली अनुष्का से कहती,
“पता नहीं ये क्या चाहता है… कभी पास आता है, फिर गायब।”
अनुष्का हँसकर कहती—
“डिजिटल मोहब्बत का यही साइड इफेक्ट है,
यहाँ लोग भावनाओं से नहीं, नोटिफिकेशन से जुड़ते हैं।”
रिया को यह मज़ाक नहीं लगा।
क्योंकि उसके लिए वह रिश्ता वर्चुअल नहीं था—
वह उतना ही सच्चा था, जितना उसका इंतज़ार।
एक दिन उसने कहीं पढ़ा—
“ब्रेड क्रंबिंग”— यानी रिश्तों में छिटपुट रुचि दिखाना।
वह ठिठक गई।
क्या आरव रिश्तों से खेल रहा है? प्यार के एहसास को बनाए रखने के लिए रिश्तों में रोटी के टुकड़े छोड़ देना—
ताकि सामने वाला रास्ता न छोड़े,
पर मंज़िल तक भी न पहुँचे।
रिया को लगा, यही तो उसके साथ हो रहा है।
वह उन टुकड़ों को समेटती रही,और आरव उन्हें बिखेरता गया।
अब वह पहले जैसी भोली नहीं थी।
उसे एहसास हुआ—
आरव कभी पूरी तरह ग़ायब नहीं होता।
जब भी वह आगे बढ़ने की कोशिश करती,
वह किसी रील, किसी कमेंट या किसी स्टोरी रिएक्शन में लौट आता।
बस इतना कि सब कुछ ताज़ा हो जाए,
और वह फिर वहीं लौट आए, जहाँ से निकली थी। कई बार मन हुआ—सब खत्म कर दे।
उसके नंबर, यादें, तस्वीरें।
पर जैसे ही नोटिफिकेशन आता—
“आरव ने तुम्हारी कहानी पसंद की,”
दिल फिर पिघल जाता।
जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर ताज़ा मरहम लग गया हो—
जो राहत नहीं देता, बस दर्द को ज़िंदा रखता है।
धीरे-धीरे रिया की दुनिया सिमटने लगी।
काम करते हुए, पढ़ते हुए,
वह बार-बार मोबाइल देखती—
क्या उसने देखा? क्या कुछ लिखा?
हर ‘टाइपिंग…’ देखकर दिल तेज़ धड़कता,
और जब कुछ न आता,
तो भीतर जैसे कोई दीवार गिर जाती।
एक शाम उसने खुद से कहा—
“यह रिश्ता अब प्रेम नहीं, आदत बन चुका है।”
पर उस आदत को तोड़ना उसे अभी नहीं आता था।
एक रात बारिश हो रही थी।
खिड़की पर थपथपाती बूँदों की आवाज़ के बीच
उसने देखा—
आरव की नई कहानी में किसी और का हाथ उसके हाथ में था।
कैप्शन था— “नई शुरुआत ।”
रिया कुछ देर तक देखती रही।
कोई आँसू नहीं निकला,
बस भीतर कुछ ठंडा-सा जम गया।
उसने फ़ोन नीचे रखा,
पुरानी चैट खोली—
सैकड़ों अधूरी बातें,
अधूरे इशारे, अधूरी उम्मीदें।
हर “टेक केयर” के नीचे
एक अनकहा “आई केयर” छिपा था,
जो अब अर्थहीन लगने लगा था।
उसने बारी-बारी सब मिटा दिया—
‘अनफॉलो’, ‘रिमूव फ़ॉलोअर’, ‘ब्लॉक’।
हर क्लिक के साथ कुछ टूटा,
पर हर टूटन में एक हलकापन भी था।
स्क्रीन काली हुई, और दिल हल्का।
रिया ने आईने में खुद को देखा।
चेहरे पर एक थकी, पर शांत मुस्कान थी।
उसे लगा—अब उसका चेहरा उसके अपने जैसा लग रहा है।
वह रसोई में गई,
कॉफ़ी बनाई—वैसी ही, जैसी पहले आरव के साथ बनाती थी।
मगर इस बार उसमें कड़वाहट नहीं थी,
बस आत्मसम्मान की सुगंध थी।
कप से उठती भाप में उसे अपनी परछाईं दिखी—
थोड़ी टूटी, पर अडिग।
उसने फ़ोन उठाया,
कैमरा ऑन किया,
कॉफ़ी के कप की तस्वीर खींची,
और एक नई कहानी डाली—
“रोटी के टुकड़े कभी पेट नहीं भरते।”
फिर उसने मोबाइल साइड में रख दिया,
बाल बाँधे, किताब उठाई और खुद में लौट आई।
बाहर बारिश अब भी गिर रही थी,
मगर भीतर का मौसम साफ़ था।
वह जानती थी—
कभी-कभी प्रेम का अंत ही
आत्म-सम्मान की शुरुआत होता है।
