एक ही विचार-बिन्दु पर मन को केंद्रित करने के अभ्यास को जप कहते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि हम किसी शब्द का उच्चारण करें और उसका वैचारिक रूप हमारे मस्तिष्क में न उदय हो अथवा वैचारिक रूप तो आये, किंतु नाम न आये। नाम और रूप के इसी सिद्वांत पर जप की प्रक्रिया टिकी है।
