जहां भी आपका मन है, वहीं आप अपना समय बिताएंगे। यदि ईश्वर ने आपको खेलने, पढ़ने या कार्य करने की शक्ति न दी होती तो क्या होता? आप कुछ नहीं कर सकते थे। इसलिए ईश्वर का स्थान आपके जीवन में सर्वप्रथम होना चाहिए। ईश्वर जानते हैं कि आपके हृदय में क्या है, अत: वहां उनको प्रथम स्थान दें।

केवल प्रेम ही ईश्वर को पकड़ने का एकमात्र रास्ता है। ईश्वर पर ध्यान लगाएं और गहन प्रार्थना करें। ‘हे प्रभो! मैं आपके बिना नहीं रह सकता। आप मेरी चेतना के पीछे विद्यमान शक्ति हैं। मैं आपसे प्रेम करता हूं। मुझे दर्शन दें।’ उनका ध्यान करने के लिए जब आप नींद को त्याग देते हैं, तब आप स्वार्थ को छोड़ देते हैं और स्वयं ईश्वर को अपने बन्धुओं में कष्ट भोगते देखकर रोते हैं तो वे आपके पास आ जाता है। जब आप वास्तव में उनके लिए त्याग करते हैं, तो वे आपके प्रेम जाल में फंस जाते हैं। अन्य कुछ उन्हें बांध नहीं सकता।

ज्ञान प्रेम के लिए रास्ता बनाता है। आप उसे प्रेम नहीं कर सकते जिसे आप जानते ही नहीं। इसलिए ईश्वर से प्रेम करने से पहले उनका ज्ञान आवश्यक है। यह ज्ञान क्रिया योग के अभ्यास से आता है, वह प्रविधि जो लाहिड़ी महाशय जी ने दी थी। जब आप ईश्वर को जान जाएंगे, तब आप उनसे प्रेम करेंगे और जब आप उनसे प्रेम करेंगे, तब आप स्वयं को उन्हें समॢपत कर देंगे।

जब तक आपकी ईश्वरीय भक्ति और ईश्वरीय बोध पूरे नहीं हो जाते, विश्राम से न बैठें, ध्यान करने के समय नींद में न चले जाएं। ईश्वर की अपेक्षा अन्य किसी वस्तु को प्राथमिकता कभी न दें उनका प्रेम ही महानतम प्रेम है। जब तक आप दूसरी वस्तुओं को प्रथम स्थान देते रहेंगे, वे प्रतीक्षा करते रहेंगे। परन्तु आपका विलम्ब बहुत लम्बा हो सकता है और आपके कष्ट और अधिक बढ़ सकते हैं। टालिए मत। अपनी अन्तरात्मा की सच्चाई में विश्वस्त हो जाएं कि आपने उनसे संपर्क करने का पूरा प्रयास कर लिया है। विश्राम मत करें, तब तक प्रयास न छोडें जब तक कि आप उन्हें अपनी आंखों से देख न लें या अपने हृदय में उन्हें अनुभव न कर लें। जन्म, खेलकूद, विवाह, संतान, वृद्धावस्था और फिर जीवन समाह्रश्वत हो जाता है। यह जीवन नहीं है। मैंने अनुभव किया है कि जीवन इससे कहीं अधिक गहनतर है और उससे अधिक अद्भुत है।

जब आप ईश्वर को जान लेते हैं, तब कोई दुख नहीं रह जाता। जिनसे आपने प्रेम किया और वे मृत्यु में समा गए व सब शाश्वत जीवन में फिर से आपके साथ होंगे। आप नहीं जानते कि किसको आप अपना समझें, क्योंकि वहां प्रत्येक आपका अपना है। ईश्वर की सुन्दरता अपार है। पुष्पों की मनोहरता का आनन्द लेना ठीक है, परन्तु उससे कहीं अधिक अच्छा है उनकी सुन्दरता और पवित्रता के पीछे ईश्वर के चेहरे को देखना। संगीत की, मात्र उससे मिलने वाले आनन्द में अपने आप में बह जाने की तुलना, उसमें विद्यमान ईश्वर की रचनात्मक वाणी को सुनने से नहीं की जा सकती। यद्यपि ईश्वर सृष्टि के सीमित सौन्दर्य में अन्तॢनहित हैं, फिर भी भौतिक स्वरूप और सीमितता से परे शाश्वत आत्मा की अनुभूति करना ही ज्ञान है।

आप जानते हैं कि मैं यहां माउंट वाशिंगटन और एंसिनिटास आश्रमों के अपने बगीचों के प्रति कितना स्नेही हूं। मैं उनकी सुन्दरता से कभी नहीं ऊबता हूं। लेकिन हाल ही में ईश्वर ने मुझे जाग्रत करने वाला एक अनुभव कराया। मैंने अन्तर में देखा कि लोग बैठे हैं और बातें कर रहे हैं। उनमें से एक ने किसी कार्य का प्रस्ताव रखा, लेकिन दूसरे ने कहा, नहीं परमहंस जी ने सिखाया है कि हमें वह कार्य नहीं करना चाहिए। मैंने अचानक अनुभव किया कि यही वह मानस दर्शन है, जिसे आने वाले समय में फलीभूत होना है, जब मैं इस शरीर में यहां नहीं रहूंगा। एक क्षण के लिए मैं हिल गया और फिर मैं अपनी सामान्य चेतना में वापस आ गया।

यह भी पढ़ें –सत्य को खोजना होगा – आचार्य महाप्रज्ञ