मातृत्व स्वास्थ्य कार्यक्रम

गंगा पुत्र भीष्म जब परेशान होते थे तब अपनी मां गंगा से परामर्श लेने जाते थे, गंगा उनकी सहायता भी करती थी परंतु जब गंगा ने देखा कि उनका पुत्र उनके बिना जीवन का निर्णय लेने में दुर्बल प्रतीत हो रहा है तब गंगा ने उन्हें सचेत कर दिया कहा कि जीवन का निर्णय स्वयं लेना सीखो पुत्र, क्या तुमने प्रतिज्ञा मुझसे पूछकर की थी? बार-बार कायरों की तरह मेरे पास रुदन करते हुए मत आओ। तब से भीष्म ने जीवन का निर्णय लेना स्वयं आरंभ कर दिया। जब भीष्म के जीवन का अंतिम समय आया, तब भीष्म के हृदय में यही संदेह था कि न चाहते हुए भी उन्हें कौरवों का साथ देना पड़ा इस कारणवश उन्हें मोक्ष मिलेगा कि नहीं। तब गंगा ने ही उन्हें आश्वस्त किया कि ‘पुत्र तुम पवित्रता की कोख से जन्में हो पुत्र एक क्षण के लिए भी तुमने अपने लिए नहीं जिया तुम्हें मोक्ष अवश्य मिलेगा।’ एक मां का कर्तव्य है कि अपने मातृत्व को सिंचित करने के लिए वो अपनी संतान को चंदन रूपी शीतल मातृत्व -देवप्रिया सिंह मातृ दिवस मई 2021 साधना पथ ५९ की छांव दे और कर्तव्य का पालन करने हेतु हिमालय रूपी प्रहरी बने। हिन्दू धर्मशास्त्रों में तीन ऋणों का वर्णन है- देव ऋण, पितृ ऋण, मातृ ऋण, देव ऋण और पितृ ऋण से तो मुक्ति मिल जाती है पर मातृ ऋण से कोई मुक्त नहीं हो पाता।

स्वामी विवेकानन्द ने अपने निधन से पूर्व अपनी अंग्रेज शिष्या भगिनी निवेदिता को आदेश दिया था कि वह ब्रिटेन में विधवा जीवन बिताने वाली अपनी मां के स्वास्थ्य की जानकारी लेती रहे। जनवरी 1909 में जब निवेदिता को पता चला कि उनकी मां मेरी ईसावेल कैंसर रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु से जूझ रही हैं तो वह व्यथित हो उठीं और तुंरत इंग्लैंड जा पहुंची। मेरी ईसावेल ने शैय्या के पास जब अपनी पुत्री मारग्रेट एलिजाबेथ नोबुल को खड़ा देखा तो वह भावविहवल होकर उठ बैठीं। उन्होंने कहा ‘बेटी अब तो तुम संसार के आध्यात्मिक सिरमौर भारत की सेवा के लिए समर्पित हो चुकी हो, मेरे लिए वहां से क्या लाई हो?’

भगिनी निवेदिता ने थैले में से ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ तथा रुद्राक्ष की माला निकाली और मां के हाथों में थमाकर बोली ‘मां, गीता संसार भर को श्रेष्ठ कर्म की प्रेरणा देने वाला महान ग्रंथ है तथा उन्होंने चांदी की शीशी गंगाजल को दिखाते हुए कहा इसमें दिव्य पवित्र गंगाजल है जिसकी एक-एक बूंद को भारतीय तरसते हैं।’ पुत्री अपनी मां की सेवा में जुट गई। 26 जनवरी को मेरी ईसावेल ने अपनी पुत्री की गोद में सिर रखकर अंतिम सांस ली।

मां का स्थान उत्कृष्ट एंव अद्वितीय है। गांधारी ने अपने कुल के विनाश से कुपित होकर भगवान श्रीकृष्ण के शाप दे दिया पर कृष्ण ने माता के शाप को भी आशीर्वाद समझकर ग्रहण किया। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं कि महिलाओं के अंदर समर्पण का भाव अधिक होता है। अक्सर महिलाएं अपने जीवन साथी से सुख-दुख को साझा करती हैं परंतु यशोधरा ने अपने जीवन साथी के साथ दांपत्य जीवन इस प्रकार जिया है कि उसके पति को यह महसूस ही न हो कि इस संसार में दुख भी है, उसने न सिद्धार्थ से अपेक्षा की थी न सिद्धार्थ की उपेक्षा। सिद्धार्थ जब बुद्ध बनते हैं तो वह उन्हें संन्यासी कहकर संबोधित करती है और शिक्षा भी देती है कि ‘ऐ संन्यासी जिस कार्य के लिए तुमने संन्यास लिया है उस उद्ïदेश्य से तुम कभी मत भटकना, भिक्षु का भेष धारण करना सरल है परंतु संन्यास धर्म का आजीवन पालन करना अत्यन्त कठिन है।’ जब राहुल पूछता है, मां पिता जी बुद्ध हो गए हैं वे भिक्षा मांगने आएंगे तुम उन्हें क्या दोगी? यशोधरा बड़े प्रेम से राहुल के प्रश्न का समाधान करती हैं कहती हैं ‘तुम धीरवीर, राजपुत्र हो तुम्हें इतनी अधीरता शोभा नहीं देती।’ बुद्ध को वह भिक्षा के रूप में राहुल को देती है और कहती हैं ‘इसे भी लोक सेवा का अनुगामी बनाइए।’ एक माता अपनी संतान की सबसे प्रिय मित्र व सच्ची मार्गदर्शक होती है। जब बालक ध्रुव को अपनी विमाता सुरुचि के द्वारा अपमान मिला तब धु्रव ने अपनी माता सुनीति से ही अपनी समस्या बताई पूछा, ‘क्या मां राजा की गोद से ऊंचा स्थान भी हो सकता है?’ सुनीति ने उत्तर दिया ‘पुत्र तेरे प्रश्न का उत्तर तो विधाता के पास है क्योंकि इस संसार में सर्वश्रेठ ईश्वर ही है।’ मां की प्रेरणा से ही ध्रुव ने तपस्या प्रारंभ की और संसार में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया।

विभीषण राक्षस कुल के थे। जब रावण ने सीता का हरण किया विभीषण से यह देखा न गया। उन्होंने माता केकसी के समक्ष अपनी शंका व्यक्त की, इनकी मां ने कहा ‘पुत्र तुम बड़े भाई को समझाओ यदि वह न माने तो तुम श्रीराम की शरण में चले जाओ यदि बड़ा भाई धर्म के मार्ग से भटक गया है तो तुम भी धर्म के मार्ग से विचलित न हो।’ माता केकसी की आज्ञा पाकर विभीषण श्रीराम की शरण में चले गए।

जब भारत वर्ष पराधीन था, तब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस आजाद हिंद फौज के संगठन के लिए बैंकॉक गए। वहां के प्रवासी भारतीयों ने उनका भव्य स्वागत किया। एक सभा में उन्होंने परतंत्र भारत की दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए भारत की स्वतंत्रता हेतु प्रवासियों को प्रेरित किया नेता जी को धन की भी आवश्यकता थी। कुछ महिलाओं ने उनके इस संकोच को समझा, चार-छह महिलाओं ने मंच पर आकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की तो एक भव्य वातावरण बन गया, महिलाओं में आभूषण देने की होड़ मच गई, भाव भरे रूधे कंठ से सुभाष चंद्र बोस बोले ‘आज मातृशक्ति का ऐसा प्रेम मुझ पर उमड़ा है कि हजार हाथों से मेरी मां मुझे दुलारने आ गई है, भारत देश की आजादी का दर्शन मेरे भाग्य में है कि नहीं इसे मैं नहीं जानता किंतु आजादी के इस अभियान में मुझे मां की महिमा के दर्शन हो गए।

एक पुरुष साधन संपन्न रहते हुए भी एक संतान की सुन्दर परवरिश करने में अक्षम होता है परंतु एक महिला साधनहीन होते हुए संतान को अच्छे संस्कारों से सींचती है। श्री राम के बिना ही सीता ने अपने पुत्र लव-कुश की परवरिश की, सुनीति ने धु्रव की, कुंती ने पांचों पांडवों की परवरिश की, शकुंतला ने भरत जैसे पुत्र का सुगठित ढंग से पालन-पोषण किया। एक मां के अंदर परिस्थितियों से जूझने की, विषम परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने की अद्ïभुत क्षमता होती है।

वृतासुर का वध करने क लिए देवराज इन्द्र को महर्षि दधीचि के अस्थियों की आवश्यकता थी। उस समय ऐसी स्थिति थी जब तक महर्षि दधीचि की पत्नी भगवती वेदवती उपस्थित थी तब तक इन्द्र का आश्रम में प्रवेश करना कठिन था इन्द्र सबसे छुप सकते थे पर सती के अपूर्व तेज के समक्ष छदम्ïवेष छिपा सकना उनके लिए संभव नहीं था। एक दिन जब वेदवती जल भरने के लिए आश्रम से बाहर निकली तब इन्द्र ने आश्रम में प्रवेश किया और महर्षि दधीचि से अस्थिदान ले लिया वेदवती जब लौटीं तब दान दिया जा चुका था तथा महर्षि के प्राण निकल चुके थे। वेदवती ने एक ही क्षण में सारी स्थिति का अनुमान कर लिया। उन्होंने इन्द्र को ज् यों ही शाप देना चाहा, दिव्य देहधारी महर्षि ने उन्हें परावाणी में समझाया, ‘भद्रे देवत्व की रक्षा के लिए यह दान मैंने स्वेच्छा से दिया है, अब तुम्हारा यह कर्तव्य है कि शाप न देकर गर्भ में पलने वाली आत्मा का ऐसा निर्माण करो कि तत्त्वशोध की हमारी साधना अधूरी न रहने पाए।’ वेदवती ने कहा ‘आज्ञा शिरोधार्य है देव।’ यह कहकर वेदवती तपश्चर्या में संलग्न हो गई एवं अपने गर्भ से महर्षि पिह्रश्वपलाद जैसा महान ऋषि उत्ह्रश्वान्न कर उन्होंने अपने पति की अंतिम आकांक्षा भी पूरी कर दी। यही है नारीत्व, नारी के त्याग और करुणा से अंकुरित होकर प्रस्फुटित होता है मातृत्व।

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