भारत पर्व, उत्सव, त्योहारों का देश है। यहां हर दिन किसी-न-किसी पर्व, व्रत एवं आयोजन से जुड़ा है। ये पर्व व्यक्ति के जीवन में स्फूर्ति, ऊर्जा और नवीनता लाते हैं। ये समस्त उल्लासमय अवसर वैदिक काल से ही जीवन का अंग रहे हैं। वैदिक काल के अनंतर उपनिषदों एवं पुराण साहित्य में भी व्रत-पर्वों आदि का उल्लेख मिलता है और साथ ही इनसे जुड़ी कई कथाएं भी मिलती हैं, जो इन पावन अवसरों को सार्थक बनाती हैं। ये भारतीय जीवन की मंगलमयी संस्कृति का अंग है, जहां हर वृक्ष, जीव, तत्त्व, प्रकृति, पाषाण एवं नदी को किसी-न-किसी अवसर पर पूजा जाता है। ऐसे अवसरों की महिमा, आध्यात्मिकता, ग्रह एवं नक्षत्र ज्योतिष लोक जीवन से गहरे तक जुड़े हैं। गांवों से शहरों तक भारतीय जीवन में इनका गहरा प्रभाव एवं महात्म्य है।

गंगा द्वारा लोक जीवन के कल्याण, परोपकार की जो राह युगों पहले दिखाई थी, उस पथ का अनुसरण आज भी किया जाता है। मनुष्य जाति गंगा के इस परोपकार, मानवता, कृपा के प्रति कृतज्ञ एवं दंडवत है। गंगा अपनी विभिन्न कथाओं, प्रसंगों के माध्यम से जन-जन को नैतिकता, मानवता, कल्याण और संघर्ष का पाठ पढ़ाती है। उनका मनोबल बढ़ाती है, प्रेरक बनाती है, पुण्य अर्जन के प्रति प्रोत्साहित करती है। गंगा की ऐसी ही अनेक प्रेरक महागाथाएं, व्रत, उत्सव, पर्व के रूप में अनुसरण की जाती हैं। ऐसे विभिन्न अवसरों पर गंगा की पूजा-अर्चना की जाती है और पुण्य लाभ अर्जित करने की कामना होती है। ऐसे ही कुछ पावन पर्वों का विधिवत् स्मरण करना प्रत्येक हिंदू धर्मावलंबी का कर्त्तव्य है-

कुंभ एवं अर्धकुंभ

कुंभ पर्व का प्रचलन अति प्राचीन समय से है। देश में हरिद्वार, प्रयाग (इलाहाबाद) के संगम पर प्रति 12 वर्ष के बाद यह महापर्व आयोजित होता है, जबकि हरिद्वार एवं प्रयाग के अलावा नासिक व उज्जैन में हर छह वर्ष के पश्चात अर्धकुंभ आयोजित होता है। इन अवसरों पर देश-भर में पवित्र नदियों पर मेले लगते हैं, श्रद्घालु स्नान कर अमृतसत पाने की अभिलाषा करते हैं, देवपूजन होता है। कुंभ का उल्लेख वेदों एवं विभिन्न धर्मग्रंथों एवं उनके वेद मंत्रों में भी मिलता है। सूर्य, बृहस्पति और चंद्रमा के योग में इन चारों पुण्य तीर्थों में कुंभ का पर्व मनाया जाता है। सूर्य ने समुद्रमंथन से निकले अमृत कलश को फुटने नहीं दिया था। बृहस्पति ने इसे राक्षसों के हाथों में जाने से रोका था और चंद्रमा ने इसे छलकने नहीं दिया था।

कथा

समुद्र मंथन से निकले अमृतकलश का अमृत असुरों को न मिले, इसलिए भगवान विष्णु ने  मनमोहक मोहिनी रूप धारण कर देव-असुर के बीच छिड़े संग्राम को शांत किया था और छल से केवल देवों को ही अमृतपान कराया था, लेकिन इससे पहले जब इंद्र का पुत्र अमृत कलश की रक्षा हेतु उसे लेकर भागा तो असुरों ने उसे छीनना चाहा-इसी छीना-झपटी में अमृत की कुछ बूंदे हरिद्वार, प्रयाग, नासिक, उज्जैन में गिरी थीं, जहां उसका सत् पाने के लिए कुंभ एवं अर्धकुंभ में लाखों तीर्थयात्री एकत्र होते हैं और नदियों में स्नान करते हैं। पूरे देश में अन्य नदियों में भी इस दिन भक्तगण डुबकी लगाकर पुण्य कमाते हैं।

कार्तिक-पूर्णिमा और स्नान पर्व

काशी, मथुरा, हरिद्वार, रामेश्वरम् आदि तीर्थस्थलों पर कार्तिक महीने में नदियों विशेषकर यमुना नदी में नदी-स्नान करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसे कार्तिक मास का स्नान पर्व भी कहते है; क्योंकि इसमें अश्विन महीने की पूर्णिमा आरंभ करके कार्तिक मास की पूर्णिमा तक प्रतिदिन स्नान किया जाता है, इसलिए कार्तिक पूर्णिमा के नाम से लोकप्रिय है।

इस स्नान क्रिया में प्रात:काल उठकर भगवान विष्णु का नाम स्मरण करते हैं। स्नान में गायत्री मंत्र का जाप करना पुण्यकारी होता है। कार्तिक महीने में स्नान क्रिया में तुलसी के पौधे में प्रतिदिन तर्पण करते हैं, तो कहीं आंवले के वृक्ष की जड़ो में जल दिया जाता है। देवमंदिर में दीप जलाकर तुलसी, आंवला, कमल पुष्प आदि की पुष्पमाला अर्पित की जाती है। नदी तट पर भी दीपदान करते हैं। प्रतिदिन हरिकीर्तन के उपरांत फलाहार ग्रहण करते हैं।

माघ स्नान का पर्व माघ संक्रांति

माघ महीने में प्रतिदिन गंगा-यमुना नदियों में स्नान करना पुण्यदायक कहा गया है, तो प्रयाग में संगम स्नान करना विशेषकर शुभ होता है। लोहड़ी के पर्व की अगली सुबह खिचड़ी का दान देते हैं। स्वयं भी खिचड़ी का सेवन करते हैं। ब्राह्मïणों को खिचड़ी एवं तिल का दान करना शुभफलदायी कहा गया है। पौष महीने की पूर्णिमा से माघ महीने की पूर्णिमा तक स्नान किया जाता है। मौनी अमावस्या का व्रत भी रखते हैं।

कहते हैं कि अरुणोदय काल में गंगा में स्नान करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है। वैशाख में अन्न एवं जल का दान उत्तम होता है। कार्तिक मास में तपस्या एवं पूजा की प्रधानता होती है, किंतु माघ महीने में जप, होम और दान का महात्म्य है। अपनी प्रिय वस्तु का त्याग कर तथा नियमों का सदाचारपूर्वक पालन करने पर धर्म का पुण्य मिलता है और अधर्म का नाश होता है। माघ स्नान में सकाम भाव से स्नान करने से मनोवांछित फल की सिद्घि होती है और यह मोक्षदायी कहा जाता है।

माघ स्नान का महात्म्य बताते हुए महर्षि भृगु ने मणिपर्वत पर विद्याधर से कहा था – ‘जो माघ के महीने में, जब उषाकाल की लालिमा बहुत अधिक हो, जो मनुष्य गांव से बाहर नदी या पोखर में नित्य स्नान करता है। वह पिता और माता के कुल की सात-सात पीढ़ियों का उद्घार कर स्वयं देवताओं के समान शरीर धारण कर स्वर्गलोक में चला जाता है…।’

कथा

एक बार महाराज दिलीप ने यज्ञ अनुष्ठïन पूरा किया और ऋषियों द्वारा मंगल विधान होने के पश्चात् अवमृथ स्नान किया उनके इस सद्कर्म का समस्त प्रजा ने अभिवादन किया। प्रजा के हितार्थ वह समय-समय पर वशिष्ठïजी की अनुमति से प्रजा का श्रेष्ठ करते थे। एक दिन महाराजा दिलीप ने वशिष्ठïजी से कहा – ‘भगवन्! आपके प्रसाद से मैंने आचार, दंडनीति, नाना प्रकार के राजधर्म, चार वर्णों और आश्रमों के कर्म, दान, दान की विधि, यज्ञ के विधान, अनेक व्रत-उद्यापन तथा भगवान विष्णु की आराधना आदि के विषय में सुना है। अब मुझे माघ स्नान का फल सुनने की इच्छा है।’

इस पर वशिष्ठ जी ने कहा – ‘हे राजन! जो लोग होम यज्ञ तथा इच्छा पूर्व कर्मों के बिना ही उत्तम गति प्राप्त करना चाहते हैं, वे माघ में प्रात:काल बाहर के जल में स्नान करें। जो गौ, भूमि, तिल, वस्त्र, सुवर्ण और धान्य आदि वस्तुओं का दान किए बिना ही स्वर्ग लोक में जाना चाहते हैं, वे माघ में सदा प्रात:काल स्नान करें।’

यदि जो तीन-तीन रात्रि तक उपवास कर और पराक आदि व्रतों के द्वारा अपने शरीर को सुखाए बिना ही स्वर्ग पाना चाहते हैं, वे माघ में सदा प्रात:काल में स्नान करें।

माघ-स्नान के संबंध में श्रीकृष्ण ने बताया है कि प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में या फिर जहां चाहे माघ-स्नान कर सकते हैं, किंतु स्नान करने वाले का मन, कर्म आदि आस्थायुक्त होने चाहिए, क्योंकि श्रद्घाहीन, पापी, नास्तिक, संशयात्मा और हेतुवादी तीर्थफल के भागी नहीं होते हैं। विद्या, तप तथा कीर्तियुक्त प्राणी संपूर्ण तीर्थफल पाता है। सूर्योदय के समान ही स्नान आरती से सब महापातक निवृति पाते हैं और उन्हें प्रजापत्य यज्ञ का फल मिलता है।

पौष फाल्गुन के बीच मकर के सूर्य में 3 दिन माघ-स्नान करें। माघ के प्रथम दिन ही संकल्पपूर्वक स्नान का नियम करें। तीर्थ पर जाकर स्नान कर मस्तक पर मिट्ट लगाकर सूर्य को अर्घ्य दें। पितरों को तर्पण कर जल से निकलकर इष्ट देव को प्रणाम करें, शंख व चक्रधारी पुरुषोत्तम श्रीमाधव का पूजन करें। यदि प्राणी सामर्थ्ययुक्त हो तो नित्य हवन कर एक बार भोजन, ब्रह्मïचर्य व्रत और भूमि पर शयन करें। यदि सामर्थ्य न हो तो भी प्रात: स्नान अवश्य करना चाहिए।

मौनी एवं सोमवती अमावस्या

सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन हरिद्वार में हर की पौड़ी, प्रयाग में संगम तथा काशी में गंगाघाट पर स्नान पुण्यकारी एवं फलदायी होता है। उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत में भी कावेरी, गोदावरी एवं तुंगभद्रा आदि नदी-तटों पर स्नान का महात्म्य है, विशेषकर स्त्रियों के लिए यह सौभाग्यकारी एवं शुभ फलदायी कहा गया है।

इस स्नान विधि में भक्तगण प्रात:काल स्नान कर अश्वरथ वृक्ष की जड़ की 108 बार प्रदक्षिणा करते हैं। प्रदक्षिणा के दौरान भगवान विष्णु का नाम स्मरण कर कच्चे सूत्र का धागा लपेटते हैं। ब्राह्मïण को भोजन कराने के पश्चात् ही व्रत रखने वाले भोजन ग्रहण करते हैं। यह व्रत संतान की दीर्घायु के लिए रखा जाता है।

कथा

इस संबंध में महाभारत की कथा प्रचलित है कि कुरुक्षेत्र युद्घभूमि में शरशय्या पर पड़े भीष्म के पास भीम उनसे ज्ञान लेने पहुंचे। भीष्म ने पांडवों की सत्ता को चिरंजीवी बनाने के लिए सोमवती व्रत रखने को कहा और एक कथा सुनाई।

बहुत पहले कांचीपुर में राजा रत्नसेन का शासन था। उसी राज्य में देवस्वामी नामक एक ब्राह्मïण अपनी पत्नी धनवती, सात पुत्रों और गुणवती नाम की कन्या के साथ रहता था। पुत्री के लिए उन्हें सुयोग्य वर की तलाश थी। एक दिन एक तपस्वी ब्राह्मïण के घर आया। वह प्रकांड ज्योतिषी भी था। उसने सभी को सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद दिया, लेकिन गुणवती को धर्मवती होने का आशीर्वाद ही दिया। यह देख कौतुहलवश ब्राह्मïण की पत्नी ने इसका कारण जानना चाहा। तपस्वी ने बताया कि इस कन्या के भाग्य में विधवा होने का योग है और इसके पति की मृत्यु फेरों के दौरान ही हो जाएगी। तब ब्राह्मïणी ने इस अनिष्ट को दूर करने का उपाय जानना चाहा। तपस्वी ने बताया कि सिंहल देश में सोम नाम की एक धोबिन ही इसका उपाय जानती है।

कन्या के दुर्भाग्य से चिंतित ब्राह्मïण ने अपने सातवें पुत्र शिवस्वामी और पुत्री गुणवती को सिंहल देश भेज दिया। दोनों ने नाव से नदी पार कर ली, किंतु आगे विशाल समुद्र देखकर निराश हो गए और तट पर लगे विशाल वट वृक्ष से नौका बांधकर वहीं बैठ गए। सागर की भीषण लहरों के बीच उनकी छोटी-सी नौका नहीं जा सकती थी। इसी बात पर वे विचार करने लगे।

उसी वृक्ष पर एक गिद्घराज और उसके बच्चे रहते थे। उस दिन गिद्घराज जब बच्चों को दाना चुगाने लगा तो उन्होंने खाने से मना कर दिया और कहा कि जब तक वृक्ष के नीचे बैठे दोनों अतिथियों को भोजन नहीं मिलेगा, तब तक हम भी नहीं खाएंगे। गिद्घराज ने अपने बच्चों की उदारता देखी और नीचे बैठे शिवस्वामी और गुणवती से उदासी का कारण पूछा। दोनों ने अपनी व्यथा सुनाई। गिद्घराज ने न केवल उन्हें भोजन कराया, बल्कि उन्हें समुद्र पार ले जाकर सोमा को अपने साथ धोबिन तक पहुंचाया। वहां दोनों ने अपने व्यवहार व सेवा से सोमा को अपने साथ कांची चलने को मना लिया।

स्वयं सोमा अपने शुभकर्मों की शक्ति के बल पर उन दोनों को कांची तक ले आई। वहां उज्जयिनी के रुद्र शर्मा नामक युवक से गुणवती का विवाह तय हुआ। तपस्वी के वचनानुसार सप्तपदी के दौरान ही रुद्र शर्मा की मृत्यु भी हो गई, किंतु अपने पुण्यकर्मों के प्रभाव से सोमा ने उसे जीवित कर दिया।

वास्तव में सोमा की ऐसी अद्भुत शक्ति एवं पुण्यकर्म के पीछे एक कारण था। वह सोमवती अमावस्या के व्रत रखती थी और नियम से उनका पालन करती थी। यह चमत्कारी शक्ति इसी व्रत का प्रताप थी।

अब सोमा के पुण्य का उपयोग हो चुका था, इसलिए उसके घर वापस जाने के दौरान ही उसके पति, पुत्र, पुत्री और जमाता (पुत्री के पति) की मृत्यु हो गई। इस बात का ज्ञान सोमा को मार्ग में ही हो गया। संयोगवश उस दिन भी सोमवती अमावस्या का दिन था। उसने विधिवत व्रत रखा, पूजन किया और व्रत के फल से प्राप्त प्रताप से अपने परिवारजनों को जीवित किया उसने घर जाकर यह बात बताई कि उसके पुण्य प्रताप के क्षय होने के कारण ही उनकी मृत्यु हुई थी, इसलिए उसने व्रत कर पुन: पुण्य फल पाया और उन सभी को जीवित किया।

इस कथा का महात्म्य जानकर पांडवों ने भी अपने बच्चों की दीर्घायु के लिए सोमवती एवं मौनी अमावस्या का व्रत रखा।

माघ या माघी पूर्णिमा

यह पर्व माघ महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है एक मास तक कई लोग कल्पवास भी करते हैं और पूर्णिमा के दिन गंगा आदि नदियों में स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन करते हैं। कुछ लोग पितरों का श्राद्घ भी करते हैं।  अनेक प्रकार के धन-धान्य, वस्त्र, पात्र आदि दान करते हैं। कहते हैं कि इस दिन तीर्थराज प्रयाग में स्नान-दान-यज्ञ आदि का बड़ा महत्त्व होता है। साधुओं, ब्राह्मïणों को भोजन कराया जाता है। दान स्वरूप घी और खिचड़ी दी जाती है और व्रती स्वयं भी खिचड़ी का ही सेवन करते हैं तथा पुण्यफल व इष्टसिद्घि के पात्र बनते हैं।

पंजाब प्रदेश में माघी से पहले पूर्व रात्रि में लोहड़ी का पर्व मनाते हैं। और अगले दिन गन्ने के रस में बने धान के चावल की खीर पकाई जाती है।

गंगा नवमी (भाद्रपद कृष्ण नवमी)

भाद्रपद महीने में कृष्ण पक्ष की नवमी को गंगा नवमी पर्व मनाया जाता है। इस पर्व का संबंध अत्रि ऋषि से माना जाता है। इसके संबंध में एक लोककथा प्रचलित है, जो व्रत के दौरान पढ़ी और सुनी जाती है तथा पूजन किया जाता है।

लोक कथा के अनुसार, एक बार वर्षा न होने के कारण सब ताल-तलैया सूख गए, हाहाकार मच गया। लोगों ने महर्षि अत्रि को अपनी व्यथा सुनाई। महर्षि अत्रि ने लोक कल्याण के लिए तपस्या की। उनकी पत्नी अनसूया ने भी निराहार रहकर तपस्या में उनका साथ दिया। समाधि टूटी तो महर्षि ने पीने के लिए जल मांगा। अनसूया ने कमंडल लेकर जल की हर जगह तलाश की, किंतु वर्षा के अभाव में सर्वत्र सूखा व्याप्त था। अनसूया निराश और हताश हो गई। तभी उसे वृक्षों के पीछे से एक युवती आती दिखाई दी। हताश अनसूया को देख उनके वन में घूमने का कारण पूछा। अनसूया ने सारा प्रसंग कह सुनाया। उत्तर में युवती ने कहा कि क्योंकि काफी समय से वर्षा नहीं हुई है, इसलिए जल कहीं भी नहीं मिलेगा। यह सुनकर अनसूया क्रोधित हो गई और उन्होंने उत्तेजित होकर कहा कि ‘पानी अवश्य मिलेगा और यहीं पर मिलेगा।’

इसके पश्चात् उन्होंने भगवान को नमस्कार किया और आकाश की ओर हाथ उठाकर कहा- ‘यदि मैंने मन-वचन-कर्म से अपने पति को परमेश्वर मानकर उनकी पूजा की है, तो मेरे पतिव्रत धर्म की रक्षा करते हुए गंगा की निर्मल धारा यहां प्रकट करें।

अनसूया के इस पतिव्रत वचनों को सुनकर उस युवती ने मुस्कराकर कहा- ‘देवी! भगवान तुम पर पहले से ही प्रसन्न हैं, इसलिए मैं यहां आई हूं।’

आश्चर्यचकित अनसूया ने युवती का परिचय जानना चाहा। युवती ने बताया कि वह स्वयं गंगा है और कहा- ‘देवी अनसूया! तुम अपने पांवों के नीचे जमीन को खोदकर देखो। यही पानी मिलेगा और उससे अपना कमंडल भर लो।’

अनसूया के ऐसा करते ही वहां जलधारा फूट पड़ी। अनसूया ने कमंडल भरा और गंगा से वहीं प्रतीक्षा करने की प्रार्थना कर जाने लगीं। तभी गंगा ने कहा- ‘यदि तुम अपनी एक वर्ष की तपस्या मुझे दे दो, तभी मैं यहां ठहरकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर सकती हूं।’

किंतु इसके लिए अनसूया को अपने पति की अनुमति लेनी अनिवार्य थी, इसलिए वह आश्रम चली गई।

सर्वत्र सूखे की स्थिति में जल से भरा कमंडल देख महर्षि अत्रि ने जिज्ञासावश पूछा कि उन्हें जल कहां से प्राप्त हुआ? तब अनसूया ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। महर्षि अत्रि स्वयं दौड़े-दौड़े वन में गंगा के दर्शन हेतु पहुंचे और भाव-विभोर होकर निवेदन किया- ‘मां गंगे! आपने इस आश्रम को पावन कर दिया है। आपका प्रवाह अब कभी न सूखने पाए, यही मेरा विनम्र निवेदन है।’

तत्पश्चात्ïा् महर्षि अत्रि की आज्ञा से अनसूया ने देवी गंगा को अपनी एक वर्ष की तपस्या का दान किया। साथ ही भगवान शिव का आह्वïान कर गंगा के धरती पर रहने का निवेदन भी किया। शिव की कृपा से चहुंओर खूब वर्षा हुई। समस्त परिवेश हरियाली से आच्छादित हो गया। महर्षि अत्रि ने अपने आश्रम के निकट ही शिव का एक मंदिर बनवाया और उसका नाम रखा वज्रेश्वरनाथ। वहां से बहने वाली गंगा की अत्रिगंगा का नाम मिला और जगत में गंगा नवमी का महात्म्य बढ़ा।

गंगा दशहरा

गंगा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अवतरित हुई थी, इसलिए इस दिन होने वाले पर्व को गंगा दशहरा कहते हैं। वास्तव में दशहरा मां गंगा ही है, जो दस पापों को हरती है। गंगा की धारा में स्नान कर पूजा करने वाले के इन समस्त दस पापों को धोकर वह उस भक्तगण को पापमुक्त करती है। वह निर्मल होता है, इसलिए यह गंगा दशहरा कहलाता है।

इन दस पापों में तीन दैहिक (देह से जुड़े), चार वाचिक (वचनों से जुड़े) तथा तीन मानसिक (चिंतन से जुड़े) हैं। स्कंद पुराण के काशीखंड के अनुसार तीन दैहिक पाप हैं- बिना दी हुई वस्तु को लेना, निषिद्घ हिंसा एवं पर-स्त्री गमन।

तीन मानसिक पाप हैं- दूसरे के धन को लेने का कुविचार, मन में दूसरे का बुरा सोचना, असत्य वस्तुओं में आग्रह रखना।

इन दस पापों का प्रक्षालन गंगा में डुबकी लगाने से होता है।

किंतु व्यवहार में मन के मैल धोने पर तन का मैल स्वयंमेव ही धुल जाएगा। स्वयं को निर्मल करके ही गंगा को निर्मल बनाने की बात की जा सकती है। सर्वप्रथम मन को गंगामय करना होगा, तभी गंगा सच्चे अर्थों में निर्मल हो पाएगी।

भक्तगण गंगा नदी में स्नान कर पूजा-अर्चना कर दिन में केवल फलाहार करते हैं।

कथा

गंगा दशहरा के प्रसंग में अयोध्या के सम्राट महाराजा सागर द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने, उनके 60000 हजार पुत्रों को कपिल मुनि द्वारा भस्म करने तथा उनके उद्घार के लिए उनके वंसज राजा भगीरथ द्वारा गंगा को धरती पर लाने की कथा सुविख्यात है। ज्येष्ठï शुक्ल दशमी को गंगाजी धरती पर अवतरित हुई थी, इसलिए गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। कथा का एक अन्य अर्थ यह भी लिया जाता है कि राजा भगीरथ ने कठोर परिश्रम से पर्वतों को काटकर गंगा के बहाव के लिए समतल भूमि पर मार्ग बनाया था, जिससे राजा सागर के 60000 हजार पुत्रों का तथा प्रजा का उद्घार हुआ था। उनकी कृषि भूमि गंगाजल मिलने पर लहलहा उठी थी। 

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