भारत की इस परम पावन नदी का उल्लेख धर्म ग्रंथों में वृहद रूप में मिलता है। उसके महात्म्य की महिमा का गुणगान प्राचीन और वैदिक युग के अग्रणीय महात्माओं ने भी किया है। समय, सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ-साथ गंगा का महात्म्य निरंतर बढ़ता रहा है। इतिहास में यह एकमात्र अवतरित नदी है। इसके जल के बिना कोई भी धार्मिक संस्कार, कर्म-कांड पूरा नहीं होता। गंगाजल की कुछ बूंदें किसी स्थान को पवित्र और कीटाणुरहित करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। गंगाजल प्रत्येक धार्मिक गतिविधि का अभिन्न हिस्सा रहता है। अपने प्रवाहमार्ग में पड़ने वाले औषधीय पेड़-पौधों, चमत्कारी जड़ी-बूटियों और पर्वत शिलाओं में उपस्थित खनिज लवणों के गुण के साथ-साथ गंगाजल में वातावरण की ऑक्सीजन को आत्मसात् करने का अभिन्न गुण है, जो इसे रोगनाशक, अद्भुत बनाता है। प्राचीनकाल से ही गंगाजल अद्भुत औषधि के समकक्ष माना जाता है, इसलिए ऋषि, मुनि, संत-महात्मा गंगाजल का ही सेवन करते थे। राजा-महाराजा आदि भी दूर-दूर से गंगाजल मंगाकर पीते थे। 

संस्कृति की वाहक

वास्तव में गंगा एक संपूर्ण संस्कृति की वाहक रही है, जिसने विभिन्न साम्राज्यों का उत्थान-पतन देखा, किंतु गंगा का महत्त्व कम न हुआ। आधुनिक शोधों से भी प्रमाणित हो चुका है कि गंगा की तलहटी में ही उसके जल के अद्भुत और चमत्कारी होने के कारण मौजूद है। यद्यपि औद्योगिक विकास ने गंगा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है, किंतु उसका महत्त्व यथावत् है। उसका महात्म्य आज भी सर्वोपरि है। गंगा स्वयं में संपूर्ण संस्कृति है, संपूर्ण तीर्थ है, जिसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है। गंगा ने अपनी विभिन्न धाराओं से, विभिन्न स्रोतों से भारतीय सभ्यता को समृद्घ किया गंगा विश्व में भारत की पहचान है। वह मां है, देवी है, प्रेरणा है, शक्ति है, महाशक्ति है, परम शक्ति है, सर्वव्यापी है, उत्सवों की वाहक है। एक महान तीर्थ है। पुराण कहते हैं कि पृथ्वी, स्वर्ग, आकाश के सभी तीन करोड़ तीर्थ  गंगा में उपस्थित रहते हैं। गंगाजल का स्पर्श इन तीन करोड़ तीर्थों का पुण्य उपलब्ध कराता है। श्रीहरि के चरणों से उत्पन्न धर्ममय विष्णुपदी गंगा ‘वैष्णवीÓ भी कही जाती है। जिसे विष्णु ने अपने जल की प्रतिमूर्ति बताया है। जिसे विष्णु अपनी ही लीला से धारण करते हैं।

विष्णु ने गंगा के सम्मान में कहा कि यह गंगा मेरी ही जल के स्वरूप वाली दूसरी मूर्ति है। यह शिवात्मिका है। यह अनेक ब्रह्मांडो का आधार एवं परा-प्रकृति है।

गंगाजल सभी दोषों को दूर करता है

गंगा ब्रह्मांड  के हर कण में विद्यमान रहती है और समस्त धर्म, वेद, देव, तप, शक्तियां गंगा के ही सूक्ष्म अंश हैं। इसलिए गंगाजल का सेवन करने वाला समस्त योग नियमों को पा लेता है। दोनों का प्रदाता और तपस्वी समान होता है। कहते हैं कि कई योनियों में जन्म के पश्चात् दुर्लभ मनुष्य योनि में जन्म मिलता है और गंगाजल का सान्निध्य पाने वाला परमधर्म को पाता है। भगवान महादेव ने विश्व कल्याण के लिए समुद्र मंथन से निकले हलाहल को धारणकर सभी की रक्षा की थी। इस महापरोपकार के प्रतिफल स्वरूप उन्हें गंगा को धारण करने का अवसर मिला। शिव के प्रताप से ही गंगा के माध्यम से स्वर्ग जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

कलियुग के तीर्थ में गंगा जी सर्वोंत्तम तीर्थ है, इसलिए भारतभूमि अति सौभाग्यशाली, अति श्रेष्ठ व पावन है, जिसे शिव की जटाजूट से निकली एक लहर ने ही पुण्य पावन किया है। गंगा का जल समस्त मानसिक एवं तामसिक दोषों को दूर करता है। उसमें मौजूद शिव का तेजस समस्त पाप कर्मों का नाश कर देता है। कहते हैं निरंतर रूप से एक मास तक किया गया गंगास्नान इन्द्रलोक में स्थान दिलाता है, तो एक वर्ष तक निरन्तर स्नान करने से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है और जीवनकाल में नित्य गंगास्नान करने वाला जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति पाता है। गंगा का दर्शन मात्र ही समस्त पापों का विनाश करना है। कोई भी यज्ञ, तप, जप, नियम, यम, दान, योग आदि गंगा से बड़ा नहीं है। गंगा प्राप्ति से बड़ा कोई लाभ नहीं। गंगाजल से विलग मनुष्य का हर कर्म व्यर्थ रहता है।

अवतरित नदी

विश्व में अनेक नदियों का प्रवाह सिंचित एवं समृद्घ करता है। नदियां किसी भी देश की जीवन रेखा, प्राण रेखा होती हैं। प्राचीन समय में सभी नदी-सभ्यताओं का विकास नदी किनारे हुआ। नदी किनारे ही नगर विकसित हुए, व्यापारिक उद्देश्य पूरे किए गए। हर नदी किसी-न-किसी स्रोत से उत्पन्न हुई, लेकिन विश्व में अकेली गंगा का अवतरण हुआ। वह विभिन्न अवसरों पर किए आह्वïान पर धरती पर उत्पन्न हुई। गंगा आवरण का सशक्त प्रमाण ‘भगीरथ कथाÓ से मिलता है। जब देवलोक की सुरसरि को भागीरथ का तप धरती पर ले आया और उसने मृत्युलोक के जीवों के उद्घार के लिए आना स्वीकार किया। धरती पर आकर राजा सागर के साठ हजार पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया। गंगा की जीवनदायी धारा आज भी धरती को मोक्ष दिला रही है। लोक मोक्ष पाने के लिए विपरीत भाव से गंगास्नान करते हैं। क्योंकि गंगा धरती पर केवल सागर पुत्रों का उद्घार करने नहीं आई थी, अपितु उसका लक्ष्य नश्वर मानव जाति को पुण्य एवं मोक्ष प्रदान करना था।

देवी और मां

सृष्टि की रचना करने वाली शक्ति भगवान विष्णु द्वारा ही मां गंगा को धरती पर भेजा गया है। वह धात्री है, जननी है, देवी और मां है। वह एक पुण्यसलिला देवी की तरह अपनी कृपा बरसाती है। प्राणों के जन्म से लेकर मरण तक मातृतुल्य कर्त्तव्य का निर्वाह करती है। वह कहती है – ”हे मनुष्य! मैं तुझे मोक्ष प्रदान करने के लिए अभी तक धरती पर विराजमान हूं।ÓÓ

मां गंगा ने पृथ्वीवासियों के कल्याण हेतु यहीं अवतरण लिया और समस्त मानव जाति को धन्य किया। अपनी पूजा-अर्चना का प्रतिफल उन्होंने यहां आकर दिया। उन्होंने अपने उद्देश्य हेतु दिव्य विष्णु धाम को भी छोड़ दिया। वह कार्तिकेय और भीष्म की मां ही नहीं है, समूची मानवजाति की मां है, जो कलयुग में भी धरती का उद्घार कर रही है।

पावन जल का अद्भुत स्रोत

गंगाजल विश्व में अद्वितीय है। उसके जल समान चमत्कारी जल दुनिया में दुर्लभ है। यह जल परम पवित्र एवं स्वास्थ्यवर्धक है, जिसमें रोगवाहक कीटाणुओं को भक्षण करने की क्षमता है। यह कृमिनाशी है, क्योंकि गंगा की धारा अपने प्रवाहमार्ग से विभिन्न जड़ी-बूटियों, खनिज लवणों के अद्भुत गुण लेकर चलती है, जो उसके जल में विलय होकर उसे चमत्कारी गुण प्रदान करते हैं। इसलिए यह जल वर्षों तक खराब नहीं होता है। यह तथ्य वैज्ञानिक आधार पर भी प्रमाणित हो चुका है।

जल की पवित्रता, शुद्घता ही गंगा से सटे वनप्रदेश, तटीय कृषि क्षेत्रों आदि को प्रदूषण मुक्त करती है। वातावरण एवं पर्यावरण को स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त बनाती है।

ब्रह्मांड की महाशक्ति

गंगा पुराकाल से ही मोक्षदायी शक्ति रही है, जिसमें केवल स्नान करने मात्र से ही ज्ञानीजन मोक्ष पा लेते हैं। कहते हैं सृष्टिï के आरंभ से पहले सर्वत्र जल विद्यमान था। उसी में महाशक्ति गंगा विद्यमान थी। जब ब्रह्मïा, मधुकैटभ दैत्यों से भयभीत हुए, तब इसी महाशक्ति ने निद्रालीन श्रीहरी को जाग्रत कर ब्रह्मïा को बचाया था। महाशक्ति का अलौकिक प्रभाव जानकर ही ब्रह्मïा ने उसे अपने कमंडल में रख लिया था, जो धर्मद्रव्या कहलाई और धर्म द्वारा कर्म के विश्लेषण के पश्चात् ही सृष्टिï की रचना हुई। इसी महाशक्ति से सुर-असुर जन्मे। इसी बहुरूपा महाशक्ति का एक रूप गंगा है, जो जल की शक्ति है। जलस्वरूप लिए यह शक्ति अपनी महाशक्ति से मोक्ष प्रदान करती है, इसलिए लोकमाता कहलाती है। महाप्रलय और विप्लन होने पर भी यह महाशक्ति विद्यमान रहती है। कण-कण में व्याप्त रहती है। परम रचना में यह ‘आद्य शक्ति’ कहलाती है, जो युगप्रवर्तन करने की क्षमता रखती है। यहां तक कि महाशक्ति का रूप धारण कर शरीर में ब्रह्म रन्ध्र से होकर उतरती है।

राष्ट्रीय महातीर्थ

गंगा का भौगोलिक, व्यापारिक महत्त्व सभी जानते हैं, किंतु भारत की एक बड़ी जनसंख्या गंगा के प्रति श्रद्घाभाव और आस्था भाव रखती हैं। यह भारत की एक वैदिक, पौराणिक और राष्टï्रीय नदी है, जिसे एक राष्ट्रीय तीर्थ माना जाता है। गीता को भारत में जो आध्यात्मिक महत्त्व प्राप्त है, वही महत्त्व, वही स्थान, वही आदर, धर्म क्षेत्र में गंगा को दिया जाता है। साधारण स्थानों को तीर्थ बनाने वाली गंगा स्वयं एक महातीर्थ है। पुराणों में भी पृथ्वी के सभी तीर्थों में गंगा को प्रधान तीर्थ कहा गया है, जहां मनुष्य मृतक ही नहीं, कीट-पतंगे, जीव-जन्तु भी मोक्ष पाते हैं। गंगा का दर्शन और स्मरण ही पाप मुक्त करता है। जबकि गंगाजल का स्पर्श ब्रह्मïहत्या, गोहत्या आदि अनेक पापों से छुटकारा दिलाता है। कहते हैं कि गंगा स्नान यदि अज्ञानतावश भी कर लिया जाए, तो भी वह मुक्ति दिलाता है और ज्ञानपूर्वक स्नान का फल मोक्षकारी होता है। इसलिए काशी और प्रयाग स्नान की महत्ता है, विशेषकर पर्वादि पर गंगा स्नान की महिमा अपरम्पार है। चुंकि गंगातट पर मृत्यु का आलिंगन और शवदाह स्वर्ग प्राप्ति कराता है, इसलिए मरणासन्न व्यक्ति भी यहां आकर डेरा जमाते हैं। यह गंगा के प्रति अगाध विश्वास का परिचायक है।

जल का अद्भुत स्रोत

भारत की इस सबसे लंबी नदी का प्रवाह क्षेत्र एवं नदी घाटी अत्यंत उपजाऊ है। इसी के आस-पास घनी आबादी वास करती है। एक ओर तो इसके प्रवाह मार्ग के आसपास तीर्थ स्थल विकसित हुए, तो दूसरी ओर कलकत्ता, हावड़ा, पटना, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर आदि नगरों का विकास हुआ, जहां उद्योग-धंधों ने अपनी आधारशिला मजबूत की। अंगे्रजी शासन काल में यह एक प्रमुख व्यापारिक जलमार्ग था, विशेष हुगली जलमार्ग व्यापारिक एवं औद्योगिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण था। उपजाऊ, सुविधाजनक होने के कारण ही अंग्रजों ने न केवल कलकत्ता को विकसित किया, अपितु राजधानी भी बनाया। गंगा सिंचाई का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत साबित हुई। इससे नहरें निकाली गई। बांध बनाकर पानी को व्यर्थ जाने से रोका गया और बिजली का उत्पादन किया गया। साथ ही रेलपुलों का विकास हुआ।

जीवनदायी गंगा

उत्तर में हिमालय के बर्फीले हिमनद से रिस-रिसकर निकलने वाली जलधाराएं नदी रूप में अनेक तीर्थों को धन्य एवं पावन करती हैं। भारतीय संस्कृति में नदियों का मातृतुल्य एवं पूजनीय माना गया है, क्योंकि ये जल का आधार है और जल ही समस्त प्राणीजगत का जीवन है। भारतीय संस्कृति ने इन्हीं नदियों का आंचल थामकर विकास एवं प्रगति की है। तटीय क्षेत्र समृद्घ हुए हैं। जिनमें कई तीर्थरूप में विख्यात हुए। सरयू ने अयोध्या, मंदाकिनी ने चित्रकूट, नर्मदा ने ओंकारेश्वर, होशंगाबाद, जबलपुर को प्रसिद्घि दी तो गंगा किनारे स्थित हरिद्वार, प्रयाग, काशी, गंगासागर आदि तीर्थों में उच्च स्थान पाया। वैदिक काल से ही नदी तट ऋषि-मुनियों का निवास स्थल थे, जहां रहकर उन्होंने महान गं्रथों की रचना की। भक्ति-मुक्ति, ज्ञान, वैराग्य और साधना प्राप्त की। चेतना का अनुभव किया। संसार का वास्तविक ज्ञान समझा। धर्म, कर्म, काम, मोक्ष, लोक आदि का अनुभव किया। नदियां ही उनकी साधना की प्रमुख साधन बनीं, जिससे देश में आध्यात्मिक, शांति और धर्म की अविरल धारा का प्रवाह हुआ।

उत्सवों की वाहक

वायु देव ने स्वर्ग, पृथ्वी एवं आकाश में तीन करोड़ तीर्थ बताए हैं। इस का उल्लेख पुराणों में मिलता है। पृथ्वी पर होने वाले अधिकार उत्सवों में तीर्थों का विशेष महत्त्व है। विशेष तौर पर ग्रहण कुंभ एवं संस्कृति आदि पर्वों का माहात्मय महान बताया गया है। उत्सव जीवन में नए रंग भरते हैं, इसलिए कुंभ आदि के समय में संबंधित तीर्थों की छटा अद्भुत दिखाई देती है, नवीन ऊर्जा का संचार होता है। गंगा पर हाने वाले स्नान पर्व एवं मेले इसी जीवटता के प्रतीक हैं। देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, उत्तरकाशी में माघ मेले पर होने वाले स्नान श्रद्घालुओं को आकर्षित करते हैं। उपस्थित जनसमूह में गंगा के प्रति श्रद्घा आदर व सम्मान चरम् पर पहुंचता है। नदियां ऐसी ही सांस्कृतिक, पारंपरिक, सामाजिक एवं धार्मिक धराहरों की वाहक रही है।

दान की प्रेरणा

भारत, कर्ण, हर्षवर्धन जैसे दानवीरों की भूमि है। पापकर्मों से मुक्ति पाने, अपने लोक को संवारने तथा पितरों की शक्ति के लिए दान की परंपरा युगों पुरानी है। गंगा ने भी स्वर्ग के लोभ का त्याग त्रिलोक को अपना सर्वस्व दान कर दिया और आज भी उसके निहितार्थ ही रत् है। प्राणी विभिन्न रूपों में दान देते हैं। कोई विद्यादान देता है, तो कोई वस्त्र, धन, भूदान आदि। हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य अनुसार दान देता है। कहते हैं कि यदि धन न हो तो गंगा नाम एवं मंत्र का उच्चारण भी पापमुक्ति कराता है। गंगा के कई मंत्र याचक को लक्ष्यप्राप्ति कराने में सहायक है, जैसे कि –

-ऊं नमो गंगे विश्व रूपणे नारायणे।

-ऊं मां गंगा त्रिदेव चेतन्या शक्ति नमो नम:।

-ऊं नमो गंगा विश्व रूपणे नारायणे हरिप्रिया,चतुर्भज विष्णु जगतपाते परमेश्वर मो ऊं।

कोई भी मंत्र जातक की मनोकामना सिद्घ कर सकता है, चाहे मंत्र एक साथ उच्चारण करें अथवा अलग-अलग, सभी का फल एक समान मिलता है।

गंगा का निरंतर स्मरण ही सर्वोपरि धर्म है, जो सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है। विशेषकर गंगा स्नान कर शिवलिंग का समर्थन एक ही जन्म में परामुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता हैं कहते हैं गंगा का भली-भांति सेवन कर जीवन सांसारिक बंधनों से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाता है। किंतु गंगा में स्नान करते और गंगा के तीर्थ पर रहते, अन्यत्र तीर्थ का स्थान पुष्पकारी नहीं होता। गंगा को द्वेषभाव से देखना महाअर्धम कहा गया है। 

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