वह सोच ही रही थी कि एक और बड़ा सा पत्थर उसके बंगले के गेट पर जा लगा। अब तो भुनभुना कर सविता ने गेट खोला और बाहर देखा कि भला कौन बदतमीजी कर रहा है। और जो उसने देखा तो कुछ बोल ही नहीं पायी। बाहर दो लड़कियां खड़ी थी। एक के पैर में शायद गिरने या वाहन की टक्कर होने से चोट लग गयी थी और पैर से खून बह रहा था। उसके साथ खड़ी लड़की के हाथ में पत्थर था। सविता ने उसके हाथ में पत्थर देख उसे थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया तो घायल लड़की ने लगभग कराहते हुए कहा, वो गूंगी है? आपसे दवाई और पानी वह कैसे मांगती, इसलिए वह पत्थर मारकर ही आपको बुला सकती थी। उसकी गलती को माफ कीजिये।

अब सविता का मन थोड़ा करुणा से भरने लगा, वह झटपट अन्दर जाकर चोट में लगाने की दवा और रूई ले आयी। दवा से खून बहना बन्द हो गया तो वह गूंगी लड़की बहुत खुश हो गई। सविता का दिया बिस्कुट का बंडल हाथ में थाम कर वे दोनों धीरे-धीरे चली गयीं और आखों से ओझल हो गयी।

इस घटना को छह बरस बीत गये हैं पर सविता ने बंगले के गेट पर लगी पत्थर की धचक या निशान अभी भी हूबहू वैसी ही रहने दी है। सविता अब जब भी अपने बंगले को निहारती है तो अपने कान गेट के बाहर होने वाली हर आहट पर टिकाये रखती है।

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