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बस अब और नहीं—गृहलक्ष्मी की कहानी: Inspiration Story
Bas Ab or Nahi

Inspiration Story: सविता और सरिता दो बहने हैं सरिता नाम के अनुरूप मृदुभाषी शांत और शालीन स्वभाव की युवती है, दूसरी ओर सविता चंचल , नटखट और दामिनी की भाँति गर्जना करने वाली।दोनों के स्वभाव विपरीत हैं, किंतु दोनों जुड़वा बहने हैं। उनके परिवार में माता-पिता और दादा-दादी के अतिरिक्त और कोई नहीं है। दोनों बहनें पढ़ाई में अव्वल हैं। बाल्यावस्था से ही दोनों साथ -साथ पढ़ी हैं । दोनों के चेहरे -मोहरे कद काठी में इतनी समानता है कि अक्सर उनके कक्षा अध्यापक भी भ्रमित हो जाते हैं कि कौन सी सविता है और कौन सी सरिता ।धीरे-धीरे दोनों युवावस्था की दहलीज तक पहुँच गयीं हैं। अब सरिता पाक कला में निपुण और गृह कार्य में दक्ष हो गई है क्योंकि वह माँ के साथ रसोई घर में पूर्ण सहयोग करती है।
इसके विपरीत सविता बाहर भीतर के काम में अधिक रुचि लेती है। उसे बाजार से सामान लाना ..बिजली का बिल पेमेंट करना और अन्य ऐसी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना बहुत अच्छा लगता है। वह घर में जैसे एक बेटे के सभी दायित्वों को पूरा करती है। बाबूजी का राइट हैंड बनकर रहती है। सविता ने मार्शल आर्ट भी सीखी हुई है और वह आत्मरक्षा के सभी गुर सीख चुकी है। एक दिन सरिता अकेली बाजार जा रही थी, तो कुछ मनचले लड़कों ने चौराहे पर उसे छेड़ना शुरू कर दिया। वे मवाली लड़के वासना भरी नजरों से उसे देखने लगे उसके दुपट्टे को छूने की कोशिश करने लगे, सरिता डरी- सहमी सी दौड़ने लगी ।आस-पास भीड़ -भाड़ देखकर लड़के स्वयं ही लौट गए अन्यथा सरिता के साथ कोई अनहोनी घटित हो जाती ।सरिता आँखों में आँसू लिए घर आ गई। उसका उदास चेहरा देखकर सविता ने उसे अपने पास बुला कर उसकी व्यथा जाननी चाही, तो सरिता के आँसू सब्र का बाँध तोड़कर बहने लगे और उसने कातर स्वर में कहा
“आज बाजार में कुछ लड़के अश्लील फब्तियाँ कस रहे थे ।क्या लड़की होना अपराध हो गया है …?”
सविता ने कहा
“बिल्कुल अपराध नहीं है मेरी बहन ,लेकिन हमें समाज के अनुरूप खुद को सशक्त बनाना होगा। यदि समाज में भेड़िए घूम रहे हैं तो हमें आत्मरक्षा के गुर सीखने होंगे। हमें एक मिट्टी के गोले के समान नहीं बनना है, कि बारिश की चंद बूँदें ही उसका अस्तित्व मिटा दें ,अपितु हमें मरुस्थलीय पौधा बनना है ,जो प्रत्येक मौसम में स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखता है और रेगिस्तान में भी अपनी सुगंध बिखेरता है। खुद को सूरज बनाओ ,ताकि कोई भी तुम्हें नजर भर देखे तो उसकी आँखों में से स्वतः ही पानी आ जाए .. “
और फिर अगले दिन सरिता के सादगी भरे परिधान पहनकर सविता बाजार के लिए निकली ।उसने बिल्कुल सरिता के जैसी ही अपनी बालों की वेणी बनाई हुई है। जैसे ही वह चौराहे के उस मोड़ पर पहुँची जहाँ वे आवारा लड़के सरिता को छेड़ रहे थे, तो उसे आज भी तीन-चार ऐसे ही लड़के वहाँ नुक्कड़ पर दिखाई दिए ।जिस तरीके के नैन नक्श सरिता ने वर्णित किए थे, इन्हें देखकर ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि यह कल वाले वही लड़के हैं, जो सरिता को बीच बाजार परेशान कर रहे थे। सविता की मुट्ठी बंध गई। आग्नेय नेत्रों से वह सड़क से गुज़रने लगी ।कुछ देर तक उसने डरे- सहमे होने का अभिनय किया ।लड़के सविता को सरिता समझ कर उसका पीछा करने लगे। सविता भी उन से डर कर भागने का उपक्रम करती हुई उन्हें एक एकांत जगह पर ले गई, जैसे ही लड़कों ने उसका हाथ छूना चाहा, सविता ने अपने हाथों की मुट्ठी बनाकर एक जोरदार मुक्का हाथ बढ़ाने वाले लड़के के मुँह पर जड़ दिया। जिससे उसके दाँत में से खून निकल आया। बाकी तीनों लड़के आश्चर्यचकित रह गए, कि आखिर कल तक इतना डरने वाली लड़की एकदम से इतना साहसी कैसे हो गई ।सविता ने शेरनी की भाँति गर्जना करते हुए कहा
“क्यों हम लड़कियों को कमजोर समझते हो तुम लोग..? क्यों अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हो ..?क्यों कमजोर का फायदा उठाना चाहते हो …जिस मासूम लड़की को तुम कल छेड़ रहे थे ना, वह मेरी हमशक्ल बहन सरिता है ।उसी का बदला तुमसे लेने के लिए आज मैं बाजार आई हूँ।आगे से किसी भी लड़की को छेड़ने का दुस्साहस नहीं करोगे।”
ऐसा कहते ही वह शेरनी की तरह उन चारों पर टूट पड़ी ।अपने पैर की ठोकर से उसने उनकी मर्दानगी को ललकारना शुरू कर दिया। उसका रौद्र रूप देखकर चारों भाग निकले, किंतु सविता ने उन चारों के बदन पर अपने मार्शल आर्ट के हुनर को आजमाना शुरू कर दिया। और अंत में उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया अब वे स्वप्न में भी किसी लड़की से बदतमीजी करने के विषय में नहीं सोचेंगे। साथ ही साथ उन्होंने अपने दुर्व्यवहार के लिए सविता से हाथ जोड़कर माफी भी माँग ली।
और फिर सरिता के लिए भी सविता ने मार्शल आर्ट की क्लास ज्वाइन करा दी। अब दोनों बहनें आत्मरक्षा के गुर सीख चुकी हैं,और मोहल्ले का कोई भी मनचला उनकी ओर निगाह उठाकर भी नहीं देखता है।
अब उन दोनों ने मन में ठान लिया है कि बस अब और नहीं अबला होने का दंश उन्हें सहन करना है…बस अब और नहीं यातना और अत्याचार सहन करना है…

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