Story of Mother: आज एक साथ अपने दोनों बेटे चिराग और दीपक का बड़े धूमधाम से बाजे-गाजे के संग, ब्याह कर शालिनी देवी फूले नहीं समा रही थी. उनकी दोनों बहुओं का पूरे रीति रिवाज के संग गृह-प्रवेश हुआ. गृह-प्रवेश के दिन घर के हर एक सदस्य ने दोनों बहुओं को अपने पलकों पर बिठा लिया और बिठाते भी क्यों ना? ये दोनों बहू ही तो थी जो अपने पूर्वजों को पानी देने वाली थी, उन्हें तारने वाली थी, घर आंगन में दिया जलाने वाली थी. घर का चिराग दे कर वंश को आगे बढ़ाने वाली थी.शालिनी देवी तो एक साथ दो बहू को अपने घर आंगन में पा कर खुशी से झूम उठी थी.
शालिनी देवी को शुरू से ही इस बात का गुमान था कि वह दो बेटों की मां है. उन्हें कभी किसी की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, खास कर अपनी जेठानी सविता जी की तो बिल्कुल भी नहीं. असल में सविता जी तो स्वयं बेचारी व दुखियारी की श्रेणी में आती थी क्योंकि वह दो बेटियो की मां थी. वैसे भी यह मान्यता जग जाहिर है कि बेटियां पराया धन होती है. भला बेटियां भी कभी अपने मां-बाप या मायके के लिए कुछ कर सकती हैं ?, बेटियां ना तो कुल का नाम रौशन कर सकती है और ना ही बुढ़ापे में अपने माता-पिता का सहारा ही बन सकती है.
अपनी इसी सोच की वजह से शालिनी देवी बेटियों की मांओं से स्वयं को श्रेष्ठतर समझती थी व अपनी जेठानी सविता जी को बेबस व लाचार. इतना ही नहीं वे बात बात पर सविता जी को खरी खोटी सुनाने से भी नहीं चूकती थीं, दो-दो बेटी जनने का ताना देना और उन्हें अपमानित करना तो जैसे उन्होंने अपना अधिकार ही समझ लिया था. रिश्ते व उम्र दोनों में छोटी होने के बावजूद परिवार और समाज में शालिनी देवी का ओहदा अपनी जेठानी सविता जी से ऊपर था क्योंकि वह दो-दो बेटों की मां थी और सविता जी दो बेटियों की. शालिनी देवी इस बात से आश्वस्त थी की वह दो बेटों की मां है इसलिए उन्हें बुढ़ापे में कभी भी किसी की ओर मुंह ताकने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
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दो बेटों की मां होने का गुरूर शालिनी देवी पर कुछ इस तरह से छाया हुआ था कि वह हमेशा शान व रूआब से भरी रहती और सविता जी परिवार वालों के समक्ष सदा झुकी हुई, मानो बेटियों को जन्म देकर उन्होंने कोई पाप कर दिया हो, वैसे तो सविता जी अपनी दोनों बेटियों से अत्यंत स्नेह रखती थी परंतु उन्हें भी इस बात का मलाल था कि उनका कोई बेटा नहीं है यदि होता तो उनका भी बुढ़ापा आराम से सुरक्षित व सुगम हो जाता क्योंकि सविता जी भी इस पूर्वाग्रह से ग्रसित थी कि बेटा ही बुढ़ापे का सहारा होता है, बेटियां आज नहीं तो कल ब्याह कर पराए घर चली ही जाएंगी.
दोनों बेटों का ब्याह कर शालिनी देवी को ऐसा लग रहा था मानो उन्होंने गंगा नहा लिया हो, वे यह सोच कर निश्चिंत हो गई कि अब उनका बुढापा व परलोक दोनों सुधर गया क्योंकि उन्हें और उनके पित्रों को दिया दिखाने वाली बहुएं जो घर आ गई है. शालिनी देवी का घमंड चरम पर था और वह सर पर दो बेटों की मां व दो बहुओं की सासू मां होने का गौरवान्वित ताज पहने घूम रही थी और वक्त का पहिया भी अपनी रफ़्तार से घूम रहा था.
समय का काल चक्र कुछ इस तरह से करवट बदला कि दिन प्रतिदिन समय बीतने के साथ ही साथ शालिनी देवी का अंहकार भी क्षीण होने लगा. पति के अरिष्टी के उपरांत तो जैसे शालिनी देवी का पूरा अलंकार ही स्वाहा हो गया. दो बेटों और बहुओं के होते हुए भी शालिनी देवी अपने ही घर में एक ऐसे निर्जीव वस्तु में तब्दील हो गई जिसका स्थान घर का पिछला कोना या स्टोररूम होता है. परिवार के किसी भी सदस्य को अब शालिनी देवी से कोई मतलब ना था. दोनों बेटे प्रतिष्ठित पद पर थे किन्तु उन्हें अपनी मां से कोई सरोकार ना था. बहूएं घर आंगन में रोज दीपक जलाती लेकिन शालिनी देवी के जीवन में तमस गहराता जा रहा था.
इधर सविता जी का जीवन पूर्ण रूप से परिवर्तित हो चुका था, उनकी दोनों बेटियां अमृता व रौशनी अब प्रशासनिक अधिकारी बन चुकी थी. समाज में सविता जी की पूछ परख बढ़ गई थी. दोनों बेटियां ब्याह कर अवश्य अपने ससुराल चली गई थी परन्तु उन्होंने अपनी मां और मायके का साथ नहीं छोड़ा था. समय समय बराबर दोनों बेटियां अपनी मां के पास आती और सविता जी के स्वास्थ्य व जरूरतों का पूरा ख्याल रखती. अब सविता जी का चेहरा खुशी से दमकने लगा था, आंखों में चमक आ गई थी. अब उन्हें दो बेटियों को जन्म देने व कोई बेटा ना होने का लेशमात्र भी अफसोस ना था.
समय की दशा के संग शालिनी देवी का मन भी शनै: शनै: अपने बेटे व बहुओं के दुर्व्यवहार से क्षीण व आघात होने लगा. एक वक्त ऐसा भी आया जब शालिनी देवी की वेदना इतनी बढ़ गई कि उनका हृदय चित्कार उठा. बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से जब उनकी शारीरिक दुर्बलता बढ़ने लगी तब दोनों बेटे-बहूओं ने उन्हें अपने साथ व पास रखने से इंकार कर दिया और उन्हें वृद्धाश्रम पहुंचाने की योजना बनाने लगे. यह जान कर शालिनी देवी के हृदय से आह निकली और वह मन ही मन विलाप करती हुई ईश्वर से बोली –
“हे ईश्वर तुम ने मुझे दो बेटों के बजाय दो बेटियों की मां क्यों नहीं बनाया.”
तभी आवाज आई काकी मां… ओह…काकी मां चिरपरिचित आवाज सुन शालिनी देवी भावुक हो उठी और बोली –
” कौन अमृता…. रौशनी….”
“हां काकी मां हम है” अमृता और रौशनी दोनों साथ में बोली
दोनों को अपने सामने खड़ा देख शालिनी देवी की आंखों से अश्रुधार बहने लगे जिसे दोनों बहनों ने पोंछते हुए कहा-
“काकी मां अब चलो यहां से, आपको और तिरस्कृत होने की जरूरत नहीं है .आप केवल दो बेटों की नहीं, दो बेटियों की भी मां है. अमृता और रौशनी से संबल, सम्मान व अपनत्व पा कर शालिनी देवी ने दोनों को गले से लगा लिया और फूट-फूटकर रो पड़ी. बहते आंसूओं की धार में बेटों की मां होने का अंहकार, अभिमान सब धुल गया. शालिनी देवी आज हृदय से दो बेटियों की मां बन कर स्वयं को सौभाग्यशाली समझ रही थी.
