Kahani in Hindi: मनजीत ने द्वार पर खड़े नये ब्याहे बेटे बहू की जोड़ी के सिर के ऊपर से सात बार पानी वारा और छह बार रोकने के बाद सातवीं बार बेटे ने उसे पानी पीने दिया, इसके साथ ही आसपास खड़ी औरतों के मंगल गीत और हंसी ठिठोली वातावरण को हँसी मजाक और उल्लास से भर रहे थे।
पंजाबियों में होने वाली गृह प्रवेश की रस्म हो चुकी थी,सबने लाल जोड़े में लिपटी बहू का हाथ पकड़ा और उसे अंदर लेकर जाने लगे कि तभी मनजीत ने रोक दिया,” अभी रुको!”
उसके इतना कहते ही सबकी प्रश्न पूछती निगाहें मनजीत के चेहरे पर टिक गईं ।
घूंघट के अन्दर नई बहू के चेहरे पर भी उदासी छा गई, “शायद इस घर में उसका प्रवेश इतना आसान नहीं होगा,बेटे की खुद की पसंद हूँ, सास की पसंद शायद नहीं बन पाऊंगी।
लोगों को दिखाने के लिए ब्याह तो हो गया है पर क्या प्रवेश होगा?” सोचती बहू की आंखों में मोटे मोटे आंसू आ गए…..कि तभी चावलों से भरा हुआ कलश और आलते से भरी हुई परात देखकर उसके चेहरे पर हैरानी आ गई।
बाकी सब औरतें भी मनजीत की तरफ देख रही थीं, मानो पूछना चाहती थीं, “कि यह क्या है?”
मनजीत ने वो दोनों चीजें चौखट के अंदर रखवाईं और बहू के सिर पर प्यार से हाथ फेर कर बोली ,”चलो बेटा !अब जैसे तुम्हारे यहां रस्म होती है वैसे इस कलश को पैर मार कर अनाज अंदर की ओर फैला दो और अपने शुभ कदम इस आलते में डुबोकर अपने घर में प्रवेश करो।”
मनजीत की बात सुनकर जहां नई बहू का चेहरा खुशी से खिल गया वही उसके साथ विदाई में साथ आये भाई के चेहरे पर भी राहत नजर आई।
कुछ और लोगों की प्रतिक्रियायें भी देखने लायक थीं ।
मनजीत के ससुराल पक्ष के लोगों की त्योरियां चढ़ी हुई थी और उसके मायके की तरफ से उसके भाई-बहन मनजीत की तरफ मुस्कुराते हुए देख रहे थे।
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उन्हें पता था दीदी बीच का कोई ना कोई रास्ता निकाल ही लेंगी।
दरअसल मनजीत का परिवार सिख समुदाय से था और इकलौते बेटे ने बिरादरी के बाहर अपने लिए जीवनसाथी पसंद की थी।
पिता को गुजरे अरसा बीत चुका था इसलिए जब बेटे ने अपनी पसंद के बारे में मां को बताया तो साथ ही साथ लड़की वालों की यह शर्त भी बताई कि वो विवाह अपनी रीति रिवाज से करना चाहते हैं।
इकलौते बेटे पर जान छिड़कने वाली मनजीत ने जब देखा की लड़की हर तरह से बेटे के योग्य है तो उसने इस विषय पर दूसरा विचार भी अपने दिमाग में आने नहीं दिया।
हमेशा से स्वावलंबी और अपनी शर्तों पर जीने वाली मंजीत लोगों के दबाव में आकर फैसले बदलने वालों में से नहीं थी, इसीलिए जब उसके ससुराल वालों ने इस बात पर ऐतराज जताया कि शादी उनके रीति रिवाज से नहीं होगी ….मनजीत ने किसी की बात पर भी कान नहीं दिया था ,उसे पता था कि उसे क्या करना है।
हिंदू रीति रिवाज से विवाह संपन्न हो चुका था और बहू सात फेरे लेकर घर में आ गई थी।
मनजीत ने सभी को थोड़ा आराम करने को कहा और खुद बहन के साथ कुछ खास तैयारियों में व्यस्त हो गई।
किसी काम से अलमारी में से कुछ निकालने के लिए कमरे में गई तो ससुराल पक्ष की बातें कानों में पड़ गईं, “यह भी कोई शादी हुई? हमारे रीति रिवाज का तो किसी ने मान ही नहीं रखा… ना तो लड़की ने चूड़ा (पंजाब में पहनी जाने वाली खास डिज़ाइन की चूड़ियाँ)पहना, ना ही उसने कलीरे डालें और ना ही हमारी रीति के हिसाब से फेरे हुए ,हम तो इस शादी को पूरा ही नहीं मानते….पर ठीक है भाई …कौन सुनता है यहां किसी की …सबको अपनी मर्जी करनी है… हम तो चुप बैठे हैं, आज हमारा भाई होता तो शायद बात कुछ और होती, अब तो हम कुछ कहने लायक ही नहीं रहे”, सब कुछ कहने के बाद भी मनजीत की ननद स्वयं को चुप बता रही थी।
यह सब सुनकर भी मनजीत सामान निकाल कर चुपचाप वहाँ से निकल आई।
मनजीत की कोई प्रतिक्रिया ना पाकर ननद को और मुँह जोड़कर बातें करने का मौका मिल गया ।
इन सब बातों पर ध्यान न देती मनजीत ने लगभग घंटे भर बाद सबको आंगन में इकट्ठा होने के लिए कहा…आंगन में सुंदर सा पंजाबी सूट पहने बहू बैठी हुई थी।
मनजीत का भाई दूध में भीगा हुआ चूड़ा बहू के हाथों में पहना रहा था ,यह रस्म मामा की तरफ से होती है।
अब मामा ससुर ने बहू का मामा बनकर यह रस्म पूरी कर दी थी।
दूसरी तरफ दोनों मौसियाँ कलीरे लेकर खड़ी थीं ।
कलीरे बहुत सुंदर लंबी-लंबी लटकन जैसी होती हैं जिन्हें पारंपरिक रूप से कौड़ियों और सूखे नारियल के साथ तैयार किया जाता है और इन्हें चूड़ियों पर बांधा जाता है।
सुनहरे रंग के चमकते कलीरे दोनों मौसियों ने बहू की चूड़ियों पर बांध दिए और उसके सिर के ऊपर से पैसे वार के कामवाली के हाथ में थमा दिये कि बहू को नजर ना लगे।
छुई मुई सी बहू ससुराल में ये सब दुलार देख कर फूली नहीं समा रही थी,माँ बाप से बिछड़ने का दुख सास का प्यार देख कर कम हो गया था।
जहां मनजीत यह सब देख कर अपने बहू पर वारे वारे जा रही थी वही ससुरालियों की आंखें हैरानी से फटती जा रहीं थीं।
मनजीत ये भी कर सकती है ये तो उन्होंने सोचा ही नहीं था,जिस बात पर वो मनजीत को उम्र भर ताना मार सकते थे ,”कि इकलौते बेटे की शादी में भी अपने मन से कुछ नहीं कर पायी”,मनजीत ने वो वजह ही खत्म कर दी थी।
बेटे की आंखों में मां के लिए प्यार और विश्वास था , मानो उसे पता था कि मां और बहू को भी नई नई बनी सास में मां का रूप दिख रहा था।
सारे शगुन करने के बाद मनजीत पूरे परिवार के साथ गुरुद्वारे पहुंची और वहां पर पंजाबी रीति रिवाज से फिर से बेटे बहू के फेरे गुरु साहब की हजूरी में दिलवा दिए और बची खुची कसर भी पूरी कर दी।
कटाक्ष करने वाले हर व्यक्ति के मुँह पर ताला पड़ा हुआ था।
घर आकर मनजीत ने बेटी को दी जाने वाली शिक्षा जो गुरुद्वारे में पढ़ी जाती है उस रस्म को निभाने के लिए बहू को अपने सामने बैठाया और उसका हाथ अपने हाथों में लेकर बोली,”हालाँकि फेरों की रस्म दोबारा करवाने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी पर फिर भी कुछ लोगों को ऐसा लगता था मानो हमारे रीति रिवाज से विवाह संपन्न नहीं हुआ तो विवाह हुआ ही नहीं है, कल को कोई तुम दोनों पति पत्नी पर कटाक्ष ना करें इसलिए मैंने यह एक छोटी सी पहल की है।
मैं माँ बन कर तुम्हें ये सीख दे रही हूँ, इसलिए आज से तुम मेरी बेटी हुई।
यह घर सिर्फ मेरा नहीं रहा.. अब यह हमारा हो गया है, इस घर में तुम्हें कोई भी परेशानी हो …तो मुझसे आकर कहना… कोई भी बात मन में मत रखना… मन में रखी बातें बड़ी हो जाती हैं ।
अगर कभी किसी आस-पड़ोस या रिश्तेदारी में तुम्हें यह सुनने को मिले कि मैंने तुम्हारे खिलाफ कुछ कहा है तो सीधे मुझसे बात करना, कही सुनी पर कभी यकीन मत करना ,यही बात मुझ पर भी लागू होती है मैं भी खुद को तुम्हारी मां समझ कर अपने मन में कोई बात नहीं रखूंगी ,एक मां की यह सीख बेटी का जीवन खुशियों से भर देगी” कहते हुए उसने बहू का माथा चूम लिया और अपने सभी संबंधियों की तरफ देखते हुए बोली ,”बेटी के मां बाप बेटी को हमेशा अपनी रस्मों के साथ ही विदा करना चाहते हैं इसलिए मैंने बहू के मायके वालों की इच्छा का मान रखा लेकिन इसके साथ ही आप सबकी इच्छा को ध्यान में रखते हुए मैंने अपने रीति-रिवाजों को भी पूरा किया है।
आशा करती हूं कि अब किसी के मन में कोई संदेह नहीं होगा कि मेरे बेटा बहू बिना विवाह किए साथ रह रहे हैं बल्कि अब तो उनका बंधन और भी मजबूत हो गया है हँसते हुए मनजीत बोली,” दो दो बार विवाह हो चुका है।”
बिरादरी से बाहर की बहू आने पर होने वाले किसी भी तमाशे की उम्मीद पर मनजीत में पानी फेर दिया था और जिन नजरों से उसकी बहू से देख रही थी उससे ना सिर्फ मनजीत बल्कि बाकी सब रिश्तेदारों को भी यकीन हो गया था कि यह एक स्वस्थ रिश्ते की शुरुआत हुई है निश्चय ही सफर भी बढ़िया ही गुजरेगा बहू का भाई भी वापस जाने से पहले यह सब देख कर संतुष्ट हो गया था,उसने हाथ जोड़ कर घर वापस जाने की आज्ञा माँगी, जल्दी से जल्दी घर पहुँच कर उसे माँ पापा को भी तो बताना था कि उसकी बहन सच में अपने ही घर में है।
सच कहा है किसी ने कि रिश्ते की शुरुआत सकारात्मकता से की जाए तो उसका निभना आसान हो जाता है।
मनजीत ने एक सशक्त मां बनकर अपने बच्चों की खुशी के लिए वो किया जो आमतौर पर हमारे समाज में नहीं देखा जाता है।
उसकी यह पहल काबिले तारीफ है और उम्मीद करते हैं कि इस कारवां में और भी लोग जुड़ते जाएंगे और एक स्वस्थ समाज की रचना होगी।
कहते हैं कि किसी रिश्ते की शुरुआत सकारात्मकता से की जाए तो उसका निभना आसान हो जाता है।
मनजीत ने एक सशक्त मां बनकर अपने बच्चों की खुशी के लिए वो किया जो आमतौर पर हमारे समाज में नहीं देखा जाता है।
उसकी यह पहल काबिले तारीफ है और उम्मीद करती हूँ कि इस कारवां में और भी लोग जुड़ते जाएंगे।
