भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
मंजम्मा बैठी सोच रही थी, क्यों ऐसा हुआ? क्यों लोग बदल गये हैं? इतने अहसानफरामोश! मेरे कारण, वे दिन की रोशनी देख पाते हैं, मेरे ही कारण उनके घरों में चूल्हा जलता है। फिर भी ऐसी बेरुखी! सोच-सोचकर उसका दिमाग भन्ना रहा था। अभी कल की ही तो बात है-गुंडप्पा, रामप्पा, यलप्पा और राजप्पा सुबह-सुबह आये थे। मेरे साथ-साथ मुर्गे की भी तारीफ कर रहे थे। बार-बार पैरों पर गिरकर शुक्रिया अदा कर रहे थे। राजप्पा ने कहा था “अज्जी, तुम और तुम्हारा मुर्गा न होता तो हम सब क्या करते?”
रामप्पा- “हमारा जीवन तो अँधेरे में ही डूबा रह जाता।”
यलप्पा- “और भोजन बिना कितने दिन जीवित रह पाते?”
सुनकर, मंजम्मा फूलकर कुप्पा हो गई थी। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता, जब गाँव की औरतें उसके लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यंजन लातीं और उसकी प्रशंसा करते नहीं थकती। लोग सुबह होते ही आते, उसके और मुर्गे के भी चरण स्पर्श करते और अपने घर में आग जलाकर, खाना बनाने के लिए उसकी भट्ठी से चिंगारी ले जाते। अज्जी मुर्गे से बातें करतीं और उसे भगवान का रूप ही मानती। उसे गुस्सा तब आया, जब उसने बाबू और चन्द्रप्पा को बातें करते सुना। चन्द्रप्पा कह रहा था, “सब पागल हो गये हैं। मंजम्मा के आगे-पीछे घूमते रहते हैं। उसका मुर्गा बाँग नहीं देगा, तो भी दिन तो होगा ही।”
बाबू बोला था, “पर आग का क्या करोगे?”
चन्द्रप्पा- “आग का क्या, पड़ोस के गाँव से ले आयेंगे।”
सुनकर वह सकते में आ गई थी। सोचा, कुछ दिनों के लिए अपनी बेटी के घर चली जाती हूँ। मेरे चले जाने के बाद इस गाँव में न दिन होगा और न ही खाना बनेगा। जब भूखों मरने लगेंगे तो दौडे-दौडे आकर मुझसे माफी माँगेंगे। उसने लाठी उठाई, मुर्गे और भट्ठी को साथ लेकर चल पड़ी। रास्ते भर कुढती रही। गाँववासियों को बुरा-भला कहती रही। ठंडी-ठंडी हवा और पक्षियों की चहचहाहट भी उसके विचलित हृदय को शांत न कर सकी। माँ को अचानक आया देखकर रंगम्मा हैरान हो गई। बोली- “माँ, क्या हुआ? अचानक यहाँ!”
मंजम्मा- “अरे! गाँववालों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। पहले जैसा आदर नहीं करते।”
रंगम्मा- “कोई बात नहीं माँ, परेशान मत हो। जितने दिन चाहो, आराम से रहो।”
मंजम्मा- “नहीं रे! गाँव वाले तंग आकर दो-चार दिनों में ही मुझे लेने आ जाएंगे। मेरे बिना उनका गुजारा नहीं हो सकता।”
“अच्छा, बाहर बहुत गर्मी है, प्यास लगी होगी, पानी पी लो।”
“पुट्टी दिखाई नहीं दे रही?”
“अंदर ही है, तुम थक गई होगी। भूख भी लगी होगी। हाथ-मुँह धो लो. मैं खाना परोसती हैं।”
दरअसल मंजम्मा को वहम हो गया था कि सवेरा तभी होता है, जब उसका मुर्गा बाँग देता है। उसके बिना तो गाँव अँधेरे में ही डूबा रहेगा। लोग आग कहाँ से लेंगे और खाना कैसे बनाएँगें। इस बात का उसे बहुत घमंड हो गया था। वहाँ भी लोगों के सामने बड़ी-बड़ी डींगे हाँकती, अपनी तारीफ के पुल बाँधती रहती। ऐसे ही कुछ दिन बीत गये। कोई उसे बुलाने नहीं आया। एक दिन अपनी नाती के साथ जंगल में लकडियाँ लेने गई, तो वहाँ गाँव के गुंडप्पा को देखकर खुश हो गई, पूछा- “गाँव में सब कैसे हैं?”
“अच्छे हैं।”
“लोग तो अँधेरे में ही रहते होंगे।”
“कैसी बातें करती है, अज्जी। अँधेरे में क्यों रहेंगे भला?”
“अरे पागल, मेरा मुर्गा यहाँ है और उसकी बाँग के बिना तो सुबह हो ही नहीं सकती।”
“तुम सठिया गई हो, दिन-रात तो भगवान ने बनाये हैं। इससे तुम्हारे मुर्गे का क्या लेना-देना?”
“खाना बनाने के लिए क्या करते हो, तब तो मेरी याद आती होगी।”
“अज्जी, सपनों में जीना छोड दो, आग भी मिलती है और खाना भी बनता है। लोग आराम से रहते हैं, खुश भी हैं। किसी भुलावे में मत रहो, गाँव लौटने की सोचो।”
मंजम्मा हैरानी से उसका मुख देखती रह गयी। यह बात उसके मन को कचोटने लगी। उससे रहा नहीं गया और उसने अपने गाँव लौटने की ठान ली। वापस पहुँची तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। जीवन एकदम सामान्य लग रहा था। बचम्मा देखते ही बोली- “अज्जी, कैसी हो?”
“मैं ठीक हूँ, तुम बताओ, गाँव में सब कैसे हैं?”
“सब मजे में हैं। तुम बहुत दिनों बाद लौटी।”
“बस वैसे ही।”
कह न सकी कि गाँववासियों को सबक सिखाना चाहती थी, पर उसने ही बहुत बड़ा सबक सीख लिया है और उसका घमंड चकनाचूर हो गया है। समझ गई है कि रात के बाद दिन और दिन के बाद रात सृष्टि का नियम है। अग्नि पर भी किसी विशेष व्यक्ति का अधिकार नहीं हो सकता। कुदरत के नियम न तो बदल सकते हैं और न ही किसी व्यक्ति की इच्छा अनुसार कार्य करते हैं। सृष्टि से बडा मनुष्य नहीं हो सकता।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
