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डर-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Father's Fear Story
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Father’s Fear Story: थोड़ी देर के लिए मुझे झपकी आ गई। एक चेहरा दिखाई दिया। बुरी तरह से घायल और खून से लथपथ।…हाथ का अंगूठा कटा हुआ…। एक ओर कान पड़ा…एक ओर कलाई, घुटने की गोलाई…। फिर वह अजय के चेहरा में बदल गया। वह चीख रहा था, ‘मुझे बचाओ। कोई तो मुझे बचाओ। बचाओ…बचाओ…बचाओ…।” मैं आस-पास हाथ झटकते हुए उठ बैठा। शायद मेरी भी चीख निकल गई थी। मेरा एक हाथ मनजीत के सीने पर जोर से पड़ा। वह दर्द से कराह उठी। खीझते हुए बोली, “पागल हो गए हो।” अपना सीना दबाते वह मेरी ओर पलटी। तेजी से चलती मेरे सांस को देख कर, वह अपना दर्द भूल गई। उसने घबरा कर पूछा, “क्या हुआ?” “कुछ नहीं…।” मैंने कहा। उसने फिर पूछा, “आपके दिल की धड़कन बता रही है कि आप डरे हुए हैं।” मैंने अंधेरे में चारों ओर नजर घुमाई। सिर में हाथ फिराया। सुरति कुछ संभली। मैंने गहरी सांस ली और उसे अपने सपने के बारे में बताया। उसने लाईट जला दी और कहने लगी, “मैंने आप से कितनी बार कहा है कि सोते समय अपने सिरहाने की ओर चप्पल उल्टी कर के रखा करो। फिर बुरे सपने नहीं आते। यह तरीका मुझे माताजी ने बताया था। इससे बहुत फर्क पड़ता है। मेरी याददाशत बुरी है। आप इतना सा काम भी नहीं कर सकते।” मैंने उसकी ओर देखा। वह मुझसे अधिक भयभीत दिखाई दी।

“तुम्हें इन दिनों कैसे सपने आते हैं?” मैंने उससे पूछा।

वह बताने लगी, “मुझे रात को नहीं, दिन में सपने आते हैं। बड़े अजीबो-गरीब से। आज दोपहर का ही सुनो। मुझे हल्की-सी झपकी आई तो देखा…मैं और बलराज कहीं जा रहे हैं। अगले स्टेशन पर अजय भी गाड़ी में आ गया। गाडी बहत तेज जा रही थी। फिर गाडी में एक सांड घुस आया। एकदम तेज भागते हुए। जैसे पागल हो गया हो। मैं चीखने लगी। बचाओ… बचाओ। फिर एक अजीब-सा आदमी दिखाई दिया। उसके हाथ में कुछ अजीब प्रकार का हथियार था। वह राक्षस समान हंसने लगा। उसने अजय व बलराज को खाने के लिए मुंह खोला। मेरी चीख निकल गई। फिर मेरी आंख खुल गई। उसके बाद नींद नहीं आती। पता नहीं ऐसा क्यों होता है।”

अकसर मुझे इसी प्रकार के सपने आते हैं। कई सपनों का कोई सिर-पैर नहीं होता। ऊट-पटांग से। कई ऐसे स्थानों को देखता हूं, जिन्हें मैंने पहले देखा होता है, कई बार नहीं। इसी प्रकार अनेक चेहरे दिखाई देते हैं, जिनमें कुछेक जाने-पहचाने और कुछ एकदम अनजाने होते हैं। परन्तु एक बात अवश्य है कि इनमें एकाध नौजवान होता है, जिसकी सूरत अजय या बलराज से मिलती है। मैं अपने बुरे सपनों के बारे में मनजीत को कम ही बताता हूं। वह भी नहीं बताती। पिछले कुछ बरसों से वह भी मेरी तरह गहरी नींद में नहीं सो पाती। एक बार इस बारे में बात करने पर उसने चिंतित स्वर में कहा, “लड़के सैट हो जाएं। उनके विवाह हो जाएं। हमारी चिन्ता खत्म हो जाएगी। वे अपने पैरों पर खड़े हो जाएं। हमें भले कुछ न दे।”

मैंने उसे सुरिंदरपाल के बेटे के साथ हुए हादसे के बारे में बताया। सुरिंदर पाल मेरा कुलीग है। उसने एपैडिक्स का आपरेशन पटेल अस्पताल करवाया था। कल रात जयपाल अस्पताल से वापस आ रहा था। रात के बारह बजे थे। जयपाल बस स्टैंड से करतार नगर चौक की ओर मुड़ा, सामने से आते तीन लोगों ने उसे रोक लिया। लड़का जवान और जोशीला था। उनसे उलझ गया, हाथापाई होने लगी। एक आदमी ने जोर से हथियार जयपाल की बाजू पर दे मारा। बांह बच गई मगर फ्रैक्चर हो गया। वे लोग जयपाल का मोटर-साइकिल, मोबाइल और सोने की चैन लूट कर ले गए। सुरिंदरपाल ने बताया, उसने जयपाल से अस्पताल में ही रुक जाने के लिए बहुत कहा, मगर वह माना नहीं। ‘कुछ नहीं होगा…कुछ नहीं होगा…’ कहते हुए चला गया। उसे अपने पुत्र पर गुस्सा आ रहा था कि उसने उसका कहा नहीं माना था। उसने भर्राए हुए कहा, “यार क्या करें। लड़के परवाह नहीं करते। वे मां-बाप को बेवकूफ समझते हैं। अगर मेरा कहा माना होता तो इतना नुकसान न होता। चलो नुकसान की इतनी बात नहीं….जान बच गई…यही काफी है। मैं यहां अस्पताल में हूं। उसकी मां का ब्लड-प्रेशर बढ़ा हुआ है। जयपाल को पलस्तर लग गया है….।”

मैंने मनजीत को इस हादसे के बारे में बता कर गलती कर दी। अब उसकी नींद रफू-चक्कर हो गई। वह बार-बार करवटें बदलने लगी। उसे बेचैनी होने लगी। उसके दिल की तेज धड़कन मुझे परेशान करने लगी। वह बहुत कुछ बताना चाहती है। मगर मैं उससे कुछ पूछना नहीं चाहता। मुझे मालम है, वह बार-बार उन्हीं बातों को दोहराएंगी, जिनके बारे में मैं पहले कई बार उससे सुन चुका हूं। अब हमारे बीच प्यार-मुहब्बत की नहीं, फिक्र की साझ बन गई है। वह मुझसे अधिक सोचती है। अड़ोस-पड़ोस, रिश्तदारों और दूर-नजदीकी जानने वालों में ऐसा बहुत कुछ बहुत घटता रहता है, जिन से चिन्ता होने लगती है। वह अधिकतर घटनाओं के बारे में बाद में बताती है। सुनने पर मैं अक्सर कहता हूं, “इसमें बताने वाली क्या बात थी?” उसका जवाब होता है, “अगर तुम्हें न बताऊं तो किसे बताऊं। इस घर में आपके अलावा मेरी सुनने वाला और कौन है?” इस समय भी उसे मेरी चुप्पी अखरने लगी। वह मेरी ओर मुंह करके कहने लगी, “अपना अजय तो ढाई बजे के बाद आता है। उसे फोन करके कहें, चलने से पहले एक बार फोन कर दे।” मैंने कहा, “इस समय उसका फोन बंद होता है।” मगर उसने मेरी बात की ओर ध्यान नहीं दिया, “आप मेरी बात मानते क्यों नहीं। हो सकता है, वह कॉफी पीने के लिए उठा हो।” मैंने उसका नंबर मिलाया। फोन बंद था। मैंने दोपहर में ऑफिस से उसे फोन किया था। समझाया था, “तुम गलियों में से मत आया करो। पेट्रोल का अधिक अंतर नहीं पड़ता। कपूरथला चौक से फुटबाल चौक, वहां से नकोदर चौक, उसके आगे रविदास चौक और वहां से माडल हाउस की ओर का रास्ता लिया करो। इन सड़कों पर सारी रात चहल-पहल रहती है। कोई बड़ा खतरा नहीं रहता।” आगे से अजय मुझसे पूछने लगा, “आप क्यों इतना डर रहे हैं? कुछ नहीं होता। मैं तो गीत गाते-गाते घर पहुंच जाता हूं।”

अजय और बलराज को लेकर मनजीत कुछ अधिक ही चिंतित रहने लगी। वह अजय की कारगुजारियों पर अधिक नजर रखती। अजय को कुछ समझाने पर, आगे से वह कहता, “मम्मी जी, मेरे लिए आपको इतनी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। मुझे मालूम है, मुझे क्या करना और क्या बनना है। बी रिलैक्स…।” उसने अजय को चुप करवाते हुए कहा, “मां-बाप की भी कोई चिन्ता होती है कि नहीं।”

मैं मां-पुत्र की बातों में कोई दखल नहीं देता। मनजीत मेरी चुप्पी को दूसरे अर्थों में देखती है। उसने बात को पलट कर कहा, “क्या आप भी अजय से डरने लगे हैं?” मैंने पूछा, “किस बात का डर?” उसे बिना किसी छिपाव के कहा, “जवान पुत्र का डर।” मैं उसकी बात से सहमत नहीं हुआ।

मुझे अपने कलीग रवि की बात याद आ गई, “आजकल लडकों को सैट करना बहुत मुश्किल है। पुत्रों से बेटियां अच्छी। पढ़ाओ और ब्याह दो। समझो चिन्ता खत्म। लड़के तो मुकाबला करने लगे हैं। रोकने या डांटने पर आगे से आंखें दिखाने लगते हैं। मेरा साला पंजाब रोडवेज में ऑडीटर लगा है। उसने अपने लड़के को न्यूजीलैंड पढ़ने के लिए भेजा। कुछ रकम उसके पास थी, कुछ उसने संबंधियों से इकट्ठे किए। दो साल का कोर्स था। अभी पहला भी साल नहीं बीता था कि लड़के का फोन आया, उसे फलां लड़की के साथ शादी करनी है, वह आ रहा है। बाप ने समझाया, उसके पास जो पैसे थे, वह उसे बाहर भेजने में लगा दिए हैं। उसके बाद दो सेमेस्टर की फीस भेजी है। अब विवाह के लिए पैसे कहां से आएंगे। लड़का माना नहीं। उसने मौसी और बुआ से बाप को फोन करवा दिए। आजकल के लड़के कहां कुछ मानते-समझते हैं। लड़के ने एक ही जिद पकड़ रखी थी, वह छुट्टियों में घर आ रहा है। वह विवाह की तैयारी करें। मां-बाप भी क्या करते। लड़का आया। विवाह करवाया। पिछले महीने लड़की भी न्यूजीलैंड चली गई। बाप और कर्जा में डूब गया।”

अजय अक्सर मुझसे कहता, “योर प्रीसैप्शनस आर रौंग।” वह मुझे कम अक्ल समझता है। मझसे पूछता है, “आप कभी एल.टी.सी. लेकर कहीं घूमने गए हैं?” किसी मल्टीप्लैक्स में मूवी देखी है? किसी मॉल में गए हैं? नहीं ना। फिर आप को दुनिया की क्या खबर है? आप अपने फैसले मुझ पर मत थोपा करो।” कुछ याद आने पर, अजय फिर कहने लगा, “एक बार बलराज आप के बहुत पीछे पड़ गया कि आप उसे छतबीड़ चिड़िया-घर दिखा कर लाएं। आप उसे टालते रहे। क्यों? ना आप कुछ देखना चाहते हैं और न ही अपने बच्चों को ही कुछ दिखाना चाहते थे। आपकी दुनिया केवल घर से ऑफिस तक ही सीमित है। आज का स्लोगन है…. हैप्पी चिल्ड्रेन आर मोर इंपोटेंट दैन सक्सैसफुल चिल्ड्रन।’ बताएं…क्या मैं गलत कह रहा हूं?” उसने मुझे निरुत्तर कर दिया। मेरे पास उसकी बातों का कोई जवाब नहीं था। बलराज ने भी उसी के स्वर में स्वर मिलाया, “डैडी तो खुद कभी कहीं जाते नहीं। साल में एकाध बार मौसी या बआ से मिलने जाते है। बाकी दिन तो घर से ऑफिस और ऑफिस से घर। घर में बैठे ही अखबारों के टेंडर नोटिस तक पढ़ते रहते हैं।”

यह सच है कि मेरी दुनिया घर से ऑफिस तक ही सिमटी हुई है। छः बरस मैं चंडीगढ़ लगा कर आया। वहां भी मेरी यही रूटीन रही। मेरे कुलीग घूमते-फिरते रहते। मुझसे भी कहते, “बाबू जी, घूमा-फिरा करो। शाम को। सत्रह सेक्टर की मार्किट में। बाईस में किरन थिएटर है। रेहड़ी-मार्किट है। छत्तीस में बड़े पार्क हैं। आपका मन बहल जाएगा।” मैं उनके साथ सिर्फ एक बार रॉक गार्डन गया था। वहां लगे शीशों में अपना चेहरा देखा। उल्टा-सा। मुझे अपनी जिन्दगी ही उल्टी दिखाई दी। यह कभी सीधी हुई ही नहीं। इसे सीधा होने का मौका नहीं मिला या मैंने इसे सीधा करने के बारे में कभी सोचा ही नहीं। मुझे तो मेरे बाप के डर ने कुछ सोचने ही नहीं दिया। लेकिन अब मैं स्वतंत्र हैं। फिर भी मैं आजादी को महसस नहीं करता। मेरा ऑफिस अठारह सेक्टर में पड़ता था। सत्रह के बस स्टैंड तक मैं पैदल आता। पैंतीस या छः नंबर बस पकड़ कर मैं अपने कमरे में आ जाता। एक घंटा आराम कर, फिर बैग से अखबार निकाल कर कुछ-न-कुछ पढने लगता। साढ़े आठ बजे खाना खाता। दूध का गिलास पीकर मैं सो जाता। मैं इस कोठी में पक्का पी.जी. था। नौजवान लड़के आते। जल्दी ही चले जाते। कोई ऑलैट्स करने आता, कोई किसी एग्जाम की तैयारी करने। एक बार आठ लड़के एक साथ आए थे। संपन्न घरों से थे। वे रोज रात को टी. वी. की आवाज फुल कर देते। किसी रोमांटिक गाने पर नाचने-फांदने लगते। बारह बजा देते। मेरी नींद उखड़ जाती। उसके बाद करवटें बदलते-बदलते मैं थक जाता। मैं ऊब कर इस बात की शिकायत मकान-मालिक से की। उसने कहा, “लड़के हैं। मौज करने दो। जब ब्याहे गए, फिर इनमें से कोई भी ऊंचा नहीं बोलेगा। आप कानों में रूई डाल कर सो जाया करें। आप के बच्चों जैसे हैं।” मुझे नींद न आती, मैं छत पर टहलने लग जाता। मैं उतनी देर तक घूमता-फिरता, जब तक लड़के अपने-अपने कमरों में जा कर सो न जाते।

एक दिन अजय और बलराज आदमी की उत्पत्ति के बारे में बातें कर रहे थे। मैं भी उनके पास बैठ गया। मैंने उन्हें बताया, “उपनिषदों में इस सृष्टि के बारे में लिखा है कि पहला ब्रह्मा था, आत्मा थी। फिर आकाश पैदा हुआ। उसके बाद हवा, आग, पानी, धरती, औषधि, खुराक, सीमैन और अंत में आदमी पैदा हुआ।… नाम, बाणी, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, तेज, सिमरन, आशा, लोभ, ईर्ष्या, गुस्सा, चिन्ता, जलन, निराशा, कुरुपता, अकेलापन, सभ्यता, परंपराएं, प्रशिक्षण, संगत-सोहबत, झुकाव, पृष्ठभूमि, इच्छा, संघर्ष, अंतर्विरोध, मानसिक द्वैयता, अच्छा, बुरा, दासता, निर्भरता, एकांत, यादें, संस्कार, शोर, परम सुंदर, अलौकिक परम होता, अलौकिक… आजादी। मुक्ति…।” अजय ने कहा, “बस, अब बस भी करो। आपने तो पांचवी क्लास के बच्चे की तरह इन शब्दों को रट रखा है। सदियों से जो कुछ आपके गुरुओं, पीरों, पैगबरों, संतजनों ने, आपके धार्मिक ग्रंथ बताते आए हैं, आप दुध पीते बच्चे की तरह उसे सच मान लिया। आप बातों के साथ जीते हो। आपकी जिन्दगी खाली और खोखली है। आप नकलची है। कुछ भी असल, मौलिक और साफ नहीं है…आप जैसे अधिकतर जीने से भी डरते हैं। दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं। मेरी नौकरी न चली जाए। अपनी सुरक्षा और अन्य सैकड़ों बातों को ले कर डरते रहते हैं। सीधी-सी बात यह है कि सभी डरे हुए हैं। किससे डरे हुए, यह मालूम नहीं। आप जीवन को एक बेहोशी और नींद की हालत में जीते हैं…आदमी के पास एकदम अलग किस्म की पहुंच होनी चाहिए। अब मैं दूसरी ओर की बात करता हूं। आप डार्विन की पुस्तक ‘ओरिजन ऑफ स्पेसीज’ पढ़िए। जब कोई व्यक्ति अधिक ही धार्मिक हो जाता है तो उसकी पर्सनिलटी की डेवलपमेंट रुक जाती है। उसकी सोच का विकास नहीं होता। आपको यह पुस्तक खरीदनी नहीं, मैं आप को ला कर दूंगा। या आप बलराज से कंप्यूटर पर पढ़ लीजिए। फिर मैं इसके बाद आपको कुछ ऐसी ही प्रकाशित पुस्तकें पढ़ने को दूंगा, जिससे आप की सोच बदल जाएगी।”

अजय अपने कमरे में चला गया। बलराज शुरू हो गया था, “पिछले दिनों में इंटरनेट पर गुरचरन दास की पुस्तक ‘इंडिया अनवाऊंड’ पढ़ रहा था। एक दिन गुरचरन दास को पुणे के दो लड़के मिले। यदि ये लड़के अस्सी बरस पहले के होते तो अवश्य इनके हीरो गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रवादी होते। पचास साल पर गांधी और नेहरू होते। अब इनके हीरो धीरू भाई अंबानी और अजीम प्रेम जैसी शख्सियतें हैं। वे नरीमन प्वाइंट की एक बिल्डिंग को देख कर रुक गए। एक ने दूसरे से कहा, “अच्छा तो यह बिल्डिंग है।’ दूसरे ने धीरू भाई अंबानी के ऑफिस की ओर श्रद्धा से देखते हुए कहा, “अच्छा। तो यही है। वह पता नहीं कहां से आया था मगर ऊपर ही ऊपर चढ़ता चला गया। कईयों को लगता था कि वह नीचे आ जाएगा परन्तु उसने इंडिया की सबसे बड़ी कंपनी बनाई।” गुरचरन दास ने बड़ी आयु वाले लड़के से उसकी शिक्षा के बारे में पूछा। उस लड़के ने बताया, “पहले मैं आई.आई.टी. में जाऊंगा। फिर आई.आई. एम. में। फिर किसी कंस्लटेंसी या फाइनेन्शियल विभाग में नौकरी करूंगा। कुछ सालों बाद अपनी कंपनी खड़ी करूंगा।’ गुरचरन दास ने उस लड़के से पूछा, “कॉलेज में तुम ने आर्ट्स पढ़ने के बारे में नहीं सोचा था?” लड़के ने अजीब नजर से उसकी ओर देखा और बोला, “आर्टस तो डफर्स के लिए है। साहित्य-सा कविता पढ़ने से क्या मिलेगा? आर्ट्स के विषयों में अधिक नंबर नहीं आते। मेरे लिए साइंस मुश्किल नहीं थी। आई.आई. टी. में कुछ तथ्य समूहों को याद करना होता है। यदि हम कुछ प्राप्त करना चाहते हैं तो मेहनत करनी ही पड़ती है। चलिए छोड़ो….आप इस दुनिया को नहीं समझ सकते।”

मैं लाईट ऑफ करने लगा, मनजीत ने मुझे रोक दिया।

मेरे चेहरे के हाव-भाव ताड़ते हुए, उसने कहा, “अब तुम्हें भी नींद कहां आएगी?”

मैं उसे क्या बताऊ! सच तो यह है कि अपने आस-पास घटते हादसों के कारण मैं अत्यधिक डरा हुआ हूं। जब तक अजय घर पहुंच नहीं जाता, तब तक मुझे नींद नहीं आती। आज मालूम नहीं, कैसे झपकी आ गई थी। अजय बाहर का गेट खोलता तो मुझे पता लग जाता। वह ड्राईंग-रूम का दरवाजा बंद करके रसोई में जाता। बिना कोई आहट किए खाना खाता। बीस मिनट के बाद उसके कमरे की लाईट बंद हो जाती। उसके बाद मेरी आंखें नींद से बंद होने लगती।

अपने पुत्रों से मैं बहुत कुछ कह न पाता। यदि मैं कुछ कहूं भी तो वे मानते कहां हैं। और अपनी ही बातें सुनाने लगते हैं। मुझे भी लगता है कि मैं उनकी बहुत सारी बातों के जवाब नहीं दे सकता।

“क्या समय हो गया?” उसने मेरे कंधे पर अपना सिर रखते हुए पूछा।

“साढ़े बारह।”

“उठिए, टाईम पास करने के लिए टेलीविजन देखते हैं।”

“तुम कॉफी बना कर लाओ…।” कहते हुए मैं उठा। ड्राईंग-रूम में आ कर टेलीविजन लगा दिया।

जब उसने कॉफी के कप मेज पर रखे, ‘आज तक’ चैनल पर प्रभु चावला शाहरुख खान का इंटरव्यू ले रहा था। प्रभु चावला के एक सवाल के जवाब में शाहरुख खान ने बताया, “प्रभु जी, अब आप का समय नहीं रहा। आपके समय में लड़के-लड़कियों के पीछे भागते थे। अब समय यह है कि लड़कियां लड़कों के पीछे भागती हैं।”

मनजीत ने टेलीविजन की स्क्रीन पर नजरें टिकाए कहा, “शाहरुख ठीक कह रहा है।”

मैंने उसे छेड़ते हुए कहा, “तुम्हें कैसे मालूम?”

“अपना बलराज कई बार बाथरूम में होता। उसका मोबाईल बजने पर मैं उठा लेती। सामने से कोई-न-कोई लड़की की आवाज आती। एक दिन मैंने गुस्से से पूछ लिया, “तुम कौन बोल रही हो?” मालूम, आगे से कहने लगी, “आंटी जी, आप गुस्से से क्यों बोल रहे हो। मैं बलराज की फ्रैंड हूं। उससे कहिएगा, मुझे फोन करे। बलराज बाहर आया, मैंने उसे फोन के बारे में बताया और पूछा, “यह कौन-सी नयी सहेली बनाई है?” उसका जवाब था, “कोई नहीं। मेरी क्लास-फैलो है।” मैंने बात पलट कर पूछा, “पिछले हफ्ते किसी प्रोफेसर की बेटी का फोन आया था।” बलराज खीझ गया। उसने मुझे समझाते हुए कहा, “मेरी भोली मां….आज के जमाने में आप क्या बोलते है से ज्यादा आप कैसा बोलते हैं, अधिक इंपोर्टेट हो गया। मुझे तो दस-पन्द्रह लड़कियों के फोन आते हैं। किसी की कोई समस्या है, किसी की कोई। आज…जिस का फोन आया, उसका नाम सतविंदर है। गरीब घर की लड़की है। कॉल सेंटर में जॉब करना चाहती है। अजय से हैल्प चाहती है। मैं अजय से कह दूंगा। मैं खुद चाहता हूं, इसे जॉब मिल जाए।”

मुझे उसके व्यवहार पर हैरानी हुई। दो साल पहले की बात है। बलराज अपने दोस्तों के साथ मोटर साइकिल पर ज्वालामुखी गया था। एक मोड़ मुड़ते हुए, उसका नियंत्रण मोटर साइकिल पर से खो गया। वह एक खाई में जा गिरा। उसके बाएं कान और टांग पर काफी चोट आई थी। पन्द्रह टांके लगे थे। उसके क्लासफैलो उसका पता लेने के लिए आए। मैं ऑफिस गया था। शाम को मनजीत ने बहुत उत्साह से बताया, “आज बलराज के साथ पढ़ने वाली लड़कियां उसका हाल-चाल पूछने आई थी। सभी ने जीन्स पहन रखी थी। हंस-हंस कर, एक-दूसरे से मजाक कर रही थी। मुझे भी बार-बार अपनी बातों में शामिल कर लेती, “आंटी जी, ठीक है न?” मुझे लगा ही नहीं कि ये लड़कियां कहीं बाहर से आई है। बहुत अपनापन था, उनमें। मैं बलराज को बाथरूम लिजाने के लिए उठाने लगी, तभी एक लड़की बोल उठी, “आंटी जी, आप बैठें। मैं छोड़ आती हूं।” मुझे शर्म आ गई। मगर उस लड़की ने कोई झिझक महसूस नहीं की। बलराज के सिर के नीचे से हाथ का सहारा देकर उसे उठा लिया। फिर बाथरूम में छोड़ आई।

मैंने कहा, “इसमें कौन-सी खास बात है?” वह खीझ कर बोली, “क्यों, खास क्यों नहीं। आज कल लड़कियों को कितनी आजादी है। कोई मुझसे पूछे, मैंने कितने मुश्किल भरे दिन देखे हैं। आपको याद है, आपका एक दोस्त होता था, गुरबचन। एक बार वह अपनी पत्नी के साथ आया। मैं नंगे सिर आपके लिए चाय ले कर गई थी। माताजी ने मेरा वो हाल किया था कि रहे भगवान् का नाम! मैं सारी रात रोती रही थी…।”

मुझे अपने विलायती मित्र सतवंत उप्पल की बात याद आ गई। उसने बताया. उसके लडके का कई लडकियों के साथ अफेयर चल रहा था। उसे इस बात में कोई बुराई महसूस नहीं हई, बल्कि उसे गर्व महसुस हआ। मैंने यह बात मनजीत से नहीं कही थी। यदि बता देता तो वह कहती, “बस यूं ही लड़कों को मत बिगाड़ो। यदि एक बार बिगड़ जाए तो काबू करना मुश्किल हो जाता है।” उसे इस बात का बुरा लगता कि अब बेटों को उसके द्वारा खरीदे कपड़े पसंद नहीं आते। पिछली दीवाली पर वह चंडीगढ़ अपनी बहन से मिलने गई। सेक्टर बाईस की मार्किट से बेटों के लिए पैंट-कमीज के कपड़े ले आई। उसने बहुत उत्साह से बताया, यह कपड़ा अभी-अभी मार्किट में आया था। अजय ने कपड़ों की ओर देखा तक नहीं। बस कहा, “मम्मी जी, मुझे ये कपड़े नहीं सिलवाने। आप डैडी जी के लिए रख लें।” बलराज भी बोला, “मैं भी रेडीमेड पहनता हूं। आप ऐसे ही पैसे बर्बाद न किया करें।” बाद में वे कपड़े मैंने सिलवा कर पहने।

मैंने न्यूज चैनल लगा दिया। अजय एक घंटे तक आएगा। कोई खास खबर नहीं है। मैं अलग-अलग चैनल बदलने लगा। कोई भी प्रोग्राम अच्छा नहीं लग रहा। मैंने रिमोट मनजीत की ओर सरका दिया। उसने सिटी चैनल लगा दिया। खबरें आ रही है। कुछ खास खबरें ब्लिट के अक्षरों के रूप में दिखाई दे रही है। अधिकतर खबरें शहर में हो रहे जगरात्रे, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, ज्योतिषयों और नेताओं के बारे में हैं। वह कहने लगी, “पता नही, लोगों के पास इतना पैसा कहां से आ गया। जहां देखो, मॉल ही मॉल खुलने लगे। छोटे दुकानदारों का क्या होगा।” मैंने उसकी इस बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि वह पहले भी ऐसी बातें कर चुकी है। उसने टेलीविजन बंद कर दिया। मैंने कहा, “मैं और बलराज जाकर अजय को ले आएं?” उसने इन्कार में सिर हिलाया, “बलराज को सोने दो। वह समय पर सो जाता है। सुबह उठ कर पढ़ता है।” मैंने फिर कहा, “बस आना-जाना ही है।” उसने मेरी कलाई थाम कर रोक लिया। कांपती आवाज में कहने लगी, “पहले ही अजय की चिन्ता लगी है। पीछे से मुझे कुछ हो गया तो कौन संभालेगा।”

मैं बेमकसद ड्राईंग-रूम में चहलकदमी करने लगा।

उसने तेजी से कहा, “उससे कहे, यह जॉब छोड़ दे।”

“तुम खुद ही कह कर देख लेना।”

“मैं तो कई बार कह चुकी हूं। मेरी तो एक नहीं सुनता। आगे से अपनी ही सनाने लगता है। एक दिन उसने मझे रुला ही दिया था। मैंने घर कर देखा तो समझाने लगा. “आप मेरी सिचएशन क्यों नहीं समझते। मैं यह जानता हूं कि मैंने इस कॉल सेंटर में कितना कुछ सीखा है। पिछले हफ्ते मद्रास से एक्सपर्ट आए थे। उनकी उम्र तीस बरस होगी। पानी समान इंगलिश बोल रहे थे। उन्होंने बहुत प्यार से हमें समझाया। मैंने इतना इंटेलेक्चुअल आदमी पहले कभी नहीं देखा। वह एक हफ्ते के लिए आए थे। हम सभी ने मिल कर उन्हें प्रीत बार हाउस में पार्टी दी। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। यदि मैं इस कॉल सेंटर में न जाता तो मेरा इंगलिश बोलने का फ्लो न बन पाता।” बात खत्म कर मेरी ओर देखने लगा।

चाहता मैं भी नहीं कि वह कॉल सेंटर की जॉब करे। जब उसे ट्रेनिंग के बाद एप्लायमैंट लेटर मिला तो मैंने उसकी इस जॉब का विरोध किया। समझाया, “बेटा, यह जॉब तुम्हारी स्टडी के एकदम उलट है। मुझे समझ में नहीं आ रहा, तुमने इसे एक्सेप्ट कैसे कर लिया?” उसने जवाब दिया, “कुछ नया सीखने के लिए।”

अजय इन दिनों सिविल अस्पताल में इंटर्नशिप कर रहा है। सुबह ग्यारह से एक बजे तक वहां जाता है। एक से साढे तीन बजे तक कक्कड़ अस्पताल में बतौर फिजियोथैरिपिस्ट डॉक्टर के मरीजों को देखता है। छः बजे से दो बजे तक फस्टटोन कॉल सेंटर में जाता है। एक दिन वह बलराज को समझा रहा था कि वह किताबों की दुनिया से बाहर भी देखें और समझे। यह ठीक है कि उन्हें अपना सिलेबस कवर करना होता है मगर साथ ही साथ अपने आस-पास घट रही घटनाओं को भी जानें और उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए। उसने बलराज को लंबा-चौड़ा भाषण दिया, “आज के आदमी की साइक्लोजी में एक बात शामिल है कि जो कुछ भी मिल सकता है, उसे जल्दी से जल्दी हासिल कर लिया जाए। वश में कर लिया जाए। कैसे न कैसे कामयाब हो जाए। पैसा कमाओ और ऐश करो….। तुम कम से कम एक घंटा नए खुले मॉल्स में जाया करो। तुम्हें मालूम होगा, बाजार में क्या नया ट्रेंड चल रहा है। मैं सप्ताह में एक बार इन मॉल्स में अवश्य जाता हूं। एक दिन ‘मोर’ वालों के यहां गया। मुझसे पहले दो लड़के वहां खड़े थे। उन्होंने सेल्सगर्ल्स से कोई भद्दा मजाक किया। सेल्सगर्ल्स ने बुरा नही माना। मैंने उससे इस बारे में पूछा, उसने मुझ से मेरे बारे में ही पूछ लिया। मैंने उसे अपने बारे में बताया तो कहने लगी, “आप डॉक्टर हैं, इसलिए पूछ रहे हैं। यहां रोज कितने ही कस्टमर आते हैं। अगर मैं गुस्सा करने लगूं तो मैनेजर शाम को मेरी छुट्टी कर देगा।” मैं दो-चार बार गया तो वह मझसे खल कर बात करने लगी। उसने बताया. “वो जो सामने से लड़की आ रही है, वह भी मेरे साथ ही यहां भर्ती हुई थी। उसकी मैनेजर के साथ गिटमिट है। चार महीने बाद उसकी तनख्वाह मुझसे दुगुनी हो गई। मुझे भी मैनेजर ने दाना डाला था मगर मैंने अनसुना कर दिया। यह मेरी भूल थी। अब मुझे लगता है कि यदि प्राइवेट सेक्टर में कामयाब होना है तो पुरानी सोचों को छोड़ना पड़ेगा।’ देखो, अगर मैं मार्किट न जाता तो मुझे ये बातें कैसे मालूम होती। हम भले कुछ न खरीदे मगर हमें उसकी वैल्यू का पता अवश्य होना चाहिए।”

बलराज ने उसे बताया, “तुम मुझे बेवकूफ मत समझो। मैं शहर के सभी मॉल्स घूम चुका हूं। अभी माडल टाऊन में एक नया मॉल खुला है। रमणीक नाम का। डाकखाने के पास। तुम खुद जा कर देखो। कितने ब्रांडेड जीन्स वहां देखी जा सकती है…।”

यही बातें उसने मुझे भी बताई। और भी बहुत कुछ बताया। यह भी कहा, “आजकल के कपल दोहरी जिन्दगी जीते हैं। एक घर की, एक बाहर की। मतलब दफ्तर की। वह घर को दफ्तर नहीं ले जाते और दफ्तर को घर नहीं। उन्हें बाहर कई समझौते करने पड़ते है। कईयों संग मित्रता करनी पड़ती है। किसी के साथ लंच, किसी के साथ डिनर। किसी के साथ किसी प्राइवेट स्थान पर जाना पड़ सकता है। मगर जब वे घर पर होते हैं, तो वह एक-दूसरे के साथ पूरी जिम्मेवारी दिखाते हैं।”

मैंने उससे पूछा, “तुमने भी अपने लिए कोई लड़की पसंद की हो तो बता दो।”

“नहीं, अभी नहीं। जब होगी, मैं बता दूंगा।”

“झूठ तो नहीं बोल रहा मुझसे?”

“मुझे झूठ बोलने की क्या जरूरत है। मैंने मम्मी से कह दिया है, मेरे लिए चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। मुझे अपना विवाह स्वयं ही करना है। उन्हें बहू चाहिए, वो मिल जएगी।”

मैं ड्राईंग-रूम में चहलकदमी करते हुए, बलराज के बैडरूम की ओर चला गया। वह गहरी नींद में सो रहा था, मगर ट्यूब जल रही थी। सामने वाली दीवार पर उसने कंप्यूटर से बोल्ड शब्दों में कंपोज करवा कर लिखा है, “डेवलपमेंट का केन्द्र और उद्देश्य अब मनुष्य नहीं रहा बल्कि डेवलपमेंट मनुष्य का केन्द्र और उद्देश्य बन गया है।” मेरा सिर चकरा गया। मैंने लाईट बंद कर दी। तेजी से बाहर निकल आया। अजय के बैडरूम में जा घुसा। लाईट जलाई। उसका कमरा अत्यन्त करीने से सजा हुआ है। मेरी नजर बाई ओर की दीवार पर चली गई। वहां बराक ओबामा की तस्वीर लगी है। नीचे अजय ने लिख रखा है: “हिस्टोरिकल विक्टरी।” दायीं ओर की दीवार पर उसने लिख रखा है, “व्यक्ति इतिहास बनाते हैं, इतिहास व्यक्ति नहीं बनाता….।”

दो बज गए। मैंने अजय के मोबाईल पर फोन किया। मोबाईल बंद मिला। दस मिनट बाद फिर से फोन किया। अब अजय की आवाज सुनाई दी, “आप अभी तक सोए नहीं?”

“नहीं…। तुम कहां हो…?”

“बस पांच-दस मिनट में घर पहुंच रहा हूं।”

मनजीत रसोई में चली गई। अजय के आने से पहले मैंने फैसला कर लिया, अब उसे यह जॉब नहीं करने दूंगा। मुझे अपने पिताजी का कहा याद आ गया, ‘बाप बनना आसान है मगर उसके फर्ज निभाने बहुत मुश्किल होते है। बाप की अग्नि-परीक्षा तब होती है, जब पुत्र बराबर का हो जाता हैं। ऐसे में पूरी समझदारी, सब्र-संतोष और संयम से काम लेना चाहिए। मुझे उनका कहा, सच लगा। मैं उनके कहे अनुसार चलने की कोशिश करता हूं। मुंह की तब खाता हूं, जब मैं कुछ सोच कर बैठा हूं और आगे से वह कुछ और ही कह दे। तब लगता है, मेरा काम, बस उन्हें पैसे देने तक ही सीमित रह गया है। अन्य किसी काम के लिए उन्हें मेरी आवश्यकता नहीं। मनजीत भी स्वयं को बेबस पाती है। पिछले हफ्ते हम सभी बैठे थे। मैंने उसे बताया, अगले महीने से पांचवें पे-कमीशन की रिपोर्ट लागू हो जाएगी। मुझे ढाई लाख के करीब मिलेंगे।” मनजीत ने तुरन्त कहा, “आप वो सारे पैसे मुझे दीजिएगा। मुझे एक कमरा बनवाना है। किसी के आने पर अलग कमरा नहीं है।” बलराज को मम्मी की स्कीम अच्छी लगी। उसने कहा, “मम्मी ठीक कह रहे हो।” अजय बोला, “महीने में एकाध गैस्ट आता है। उसे मेरा कमरा दे दिया करो। मैं ड्राईंग-रूम में सो जाया करूंगा।” मनजीत ने कहा, “आज नहीं तो कल तो कमरे की आवश्यकता होगी।” अजय ने उसे निरुत्तर कर दिया, “आप किस के लिए सोच रहे हैं। मुझे अभी तक यह मालूम नहीं, मुझे कहां सैट होना है। बलराज कहां सैट होगा…इस बारे में हम कुछ कह नहीं सकते। जहां कोई रहेगा, वहीं अपना मकान बना लेगा। आप दोनों के लिए यह घर काफी है। घर पर कोई पैसा लगाने की आवश्यकता नहीं।”

अजय रोटी खा कर बैडरूम में जाने लगा। मैंने उसे रोक लिया। कहा, “बेटा! यह नौकरी छोड़ दे। नहीं तो तुम्हारी मम्मी तुम्हारे बारे में सोच-सोचकर बीमार हो जाएगी।”

वह गुस्से से कहने लगा, “आप मम्मी का सहारा लेकर क्यों बात कर रहे हैं। आप मम्मी से ज्यादा डरपोक होते जा रहे हैं….।” उसने सीधे मेरी आंखों में झांकते हए कहा. “आप मझे कामयाब होने देना चाहते हैं कि नहीं। आपकी जिन्दगी की सबसे बड़ी गलती यही है कि आपने कभी अपने बारे में सोचा ही नहीं। दूसरों के बारे में ही सोचते रहे। आज का समय कहता है, पहले अपने बारे में सोचो। फिर दूसरों के बारे में सोचो। वह भी तब, जब आपके पास फालतू समय हो। अब मैं सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचता है। ठीक है न डैडी जी?” आखिरी शब्द उसने समझाने के अंदाज में कहे। मैं सिर झुका कर अपने बैडरूम की ओर चल दिया।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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