लॉन की नमी को उन्होंने चप्पलों के पार भी महसूस किया। कैसी शांति थी! वर्गाकार लॉन के चारों तरफ़ की क्यारियों की फूल और मेंहदी की लाइनें चाँदनी में पड़ती अपनी परछाइयों के साथ ऐसी लगती थीं जैसे किसी ने हरे कैनवास पर चौखटा जड़ दिया हो। मसहरी लगी, बीच में पास-पास पड़ी दोनों चारपाइयों तक पहुँचते हुए मिसेज वर्मा को ऐसा लगा जैसे वे गहरे हरे पानी के बीच में बने संगमरमर के दो द्वीपों तक जा रही हों। मिस्टर वर्मा टेबल-लैंप लगाए अपनी फ़ाइलों में उलझे थे। काली-काली मोटी कमानियोंवाला उनका चश्मा उसके चेहरे को साधारणतः पूरी तरह ढके हुए था। इतना बड़ा चश्मा मिसेज वर्मा को कभी अच्छा नहीं लगा, लेकिन मिस्टर वर्मा का तर्क था कि आँखें बहुत कमजोर हैं, और ज़्यादा पॉवर के मोटे-मोटे काँचों को पतली कमानियाँ सँभाल नहीं सकतीं। प्लेट में रखे हुए गिलास को टेबल-लैंप की बगल में रखते हुए मिसेज वर्मा ने झुँझलाकर कहा, ‘इतनी अच्छी चाँदनी छिटकी है, और आज भी तुम इन फ़ाइलों से ही मगजपच्ची करते रहोगे?’

बिना कोई प्रतिक्रिया दिखाए मिस्टर वर्मा ने व्यस्त-सी ‘हूँ’ की और अपनी फ़ाइलों में उलझे रहे। फिर सहसा चौंककर बोले, ‘बस, जरा यह एक पेज रह गया है, उसके बाद अभी रखता हूँ।’

‘तुम्हारा पेज आज तक कभी खत्म हुआ भी है जो अभी होगा!’ मिसेज वर्मा ने खट टेबल-लैंप का स्विच दबा दिया। पहले तो मिस्टर वर्मा कुछ भी न देख पाए, लेकिन फिर मसहरी के चंदोवे के नीचे बच्चू के बगल में बैठी शरारत के साथ मुस्कराती हुई मिसेज वर्मा का चेहरा उनकी आँखों के आगे स्पष्ट हो गया। गोदी में दोनों हाथ रखे चारपाई की पाटी पर बैठी हुई मिसेज वर्मा दोनों पाँव हिला रही थीं, मानो कह रही हों, पढ़ो अब कैसे पढ़ते हो?’ मिस्टर वर्मा ने रुपहले अबीर से छाए आसमान को देखते हुए पूछा आखिर आज बात क्या है?’ मिसेज वर्मा एकदम बोलीं, ‘सुनो, सुबह स्टेट्समैन में जो ख़बर पढ़ी थी, दिन-भर मेरे दिमाग में घूमती रही।

अँगुलियों से माथा टटोलते हुए मिस्टर वर्मा ने अलसाते स्वर में पूछा, ‘कौनसी खबर? मुझे तो याद नहीं है।’

‘अरे लो! सुबह इतनी बातें हुई थीं। वही, फाँसी पाए हुए कैदी से एक लड़की ने शादी कर ली है। मैं दिन-भर सोचती रही… आखिर उसने क्या सोचकर उससे शादी की? उसके मन में यह बात नहीं आई कि पंद्रह दिन बाद ही उसे जिंदगी भर को वैधव्य का कलंक लग जाएगा?’

सारा आलस्य छोड़कर मिस्टर वर्मा एक झटके के साथ उठ बैठे, ‘हुँह , बेवकूफ़ी के सिवा और इसमें है क्या! तुम्हारे दिमाग को भी अधकचरी भावुकता की बातें ही अपील करती हैं।’ हाथ बढ़ाकर उन्होंने फिर स्विच ऑन कर दिया और खुली पड़ी हुई फ़ाइल की ओर मुड़े।

अप्रभावित मिसेज वर्मा अपने प्रवाह में कहती रहीं, ‘अधकचरी भावुकता! मैं भी तो यही सोचती रही दिन-भर कि आखिर कैसी यह भावुकता है, जिसके बहाव में पूरी जिंदगी को यों दाँव पर लगा दिया जाए? अच्छा देखो, मैंने इसी पर दोपहरी में एक कहानी लिखी। सारी स्थिति को ऐसे ढंग से रखने की कोशिश की है कि तुम भी मान जाओगे।’ और उन्होंने झुककर झट तकिए के नीचे रखे मुड़े हुए काग़ज़ों को बाहर निकाल दिया। बोलीं, ‘इस कहानी का हीरो आतंकवादी क्रांतिकारी है।’

लेकिन जब मिसेज वर्मा ने देखा कि मिस्टर वर्मा फिर अपनी फाइलों में डूबने लगे हैं, तो उनका मन झुंझलाहट से भर गया। कहा, ‘तुम मुझे दस मिनट का समय नहीं दे सकते हो? आखिर कितनी ज़रूरी हैं ये फाइलें?’

मिसेज वर्मा उठीं और मिस्टर वर्मा के पीछे जाकर शरारती बच्चे की तरह उनका मोटे शीशोंवाला चश्मा उतार लिया, जिसके बिना वर्मा साहब काफी असहाय हो जाते हैं।

‘अरे, यह क्या कर रही हो?’

‘अब तुम्हें मेरी कहानी सुननी ही पड़ेगी। तुम चाहे इस घटना को महज़ बेवकूफ़ी कहो, पर मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि मेरी कहानी सुनने के बाद निश्चय ही तुम अपनी राय बदल दोगे।’

वर्मा साहब को लगा, जैसे एकाएक उनका जी मिचला रहा है। बड़ी बेचैनी के साथ बोले, ‘आज दूध कैसा था? जी जाने कैसा कैसा हो रहा है।’

‘दूध में तो कुछ भी नहीं था। मैंने भी अभी-अभी पिया, मुझे तो कुछ नहीं हो रहा।’ कहानी सुनाने को अधीर मिसेज वर्मा बोलीं, और कहानी लेकर बैठ गईं। बिना चश्मे के मिस्टर वर्मा ने अपनी अँगलियों से अपनी आँखें बंद कर लीं, और अधलेटी मुद्रा में वे कहानी सुनने लगे। उन्होंने आँखें खोली तो देखा, चाँदनी की चमक बहुत धुंधली पड़ गई है। उन्हें लगा जैसे धुंध की एक परत सारे वातावरण में छा गई है, और आसपास का सभी कुछ बड़ा धुंधला, बड़ा अस्पष्ट हो उठा है। हाथों में काग़ज़ लिए सामने बैठी मिसेज वर्मा की धुंधली आकृति और भी धुंधली हो गई… होती गई और एकदम गायब ही हो गई। मिसेज वर्मा के हलकी झुर्रियोंवाले साँवले चेहरे की जगह एक कमनीय, कमसिन-सा गोरा-चिट्टा चेहरा उभर आया, फूल-सा खिला हुआ…

‘कहो गीत पसंद आया?’ पुस्तक बंद करते हुए शैल ने पूछा।

‘धत्तेरे की, ऐसी चाँदनी रात में ऐसा नीरस गीत!’ निर्मल ने चिढ़ाते हुए कहा।

‘जाओ, आगे से तुम्हें कभी गीत नहीं सुनाएँगे।’

‘तो कहा किसने था तुम्हें गीत सुनाने को?’

शैल का फूला हुआ मुँह एकाएक कुछ याद आ जाने से खिल पड़ा। गुस्सा भूलकर चोटी को अंगुलियों में लपेटते हुए एक नटखट बच्चे की तरह वह बोलीं, ‘एक खबर सुनाऊँ तुम्हें? देखें, तुम कहाँ तक गेस कर सकते हो?’

‘मुझे क्या मालूम तुम क्या सुनाओगी? मैं क्या कोई ज्योतिषी हूँ!’

‘बस, हार गए अभी से?’ और वह खिलखिला पड़ी, ‘अरे, कुछ तो अंदाज़ भिड़ाओ, दिमाग लगाओ कि शुरू में ही हाथ-पैर पटक दिए।’

‘सुनाना हो तो सुनाओ, नहीं तो अपने पेट में रखो। हमें नहीं सुननी तुम्हारी बात।’

‘कैसे नहीं सुननी है मिस्टर निर्मल वर्मा!’ ठुनकते हुए, शैल बोली, ‘सुनना ही पड़ेगा; फिर कोई बात हमारे अकेले की तो है नहीं, तुम्हारी भी तो है…’

‘…अच्छा बताएँ…पापा ने अगले साल गर्मियों में शादी तय कर दी है…23 मई।’ उसके गालों में गुलाब खिल आए।

‘अरे, तुम्हारा ध्यान कहाँ है?’ मिसेज वर्मा ने शून्य में खोए हुए मिस्टर वर्मा की ओर देखकर कहा।

‘हूँ।’ स्वर जैसे कहीं दूर घाटियों से टकराकर आया।

‘देखो, ध्यान से सुनना। इसकी एक-एक बात मार्क करने लायक है।’

‘हाँ, हाँ। तुम पढ़ो, मैं सुन रहा हूँ।’ खोए से स्वर में मिस्टर वर्मा बोले।

मिसेज वर्मा ने अपनी कहानी के टूटे हुए सूत्र को जोड़ते हुए कहानी को पढ़ना आरंभ किया।

‘मैंने कितनी बार कहा, लीला, तुम यहाँ न आया करो। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि मुझमें ऐसा कौनसा आकर्षण है, जो तुम यो सुध-बुध भूलकर अपने को वारे बैठी हो। जिसका हर पल खतरे से भरा हो, उस व्यक्ति के जीवन से तुम्हें क्या मिलेगा? हम लोगों की जिंदगी का क्या ठीक है…आज पुलिस ने धर लिया, कल फाँसी। क़दम-कदम पर खतरा…’

‘कैसी बातें करते हो, तुम यदि बड़े-से-बड़ा ख़तरा झेल सकते हो, तो क्या मैं नहीं झेल सकती? मुझे इतना पराया समझते हो?’

‘देखो लीला! मैं बड़े-से-बड़ा ख़तरा उठा सकता हूँ, पर नहीं चाहता कि दुःख की एक हल्की -सी लौ भी तुम्हारे तन-मन को झुलसाए। तुम्हारा छोटा-सा दुःख भी शायद मुझसे बर्दाश्त न होगा। इसी से कहता हूँ तुम यहाँ मत आया करो…मत आया करो!’

मिस्टर वर्मा को लगा जैसे मिसेज वर्मा के शब्द निस्तब्ध शून्य वातावरण में खोते चले जा रहे हैं। जाने कहाँ से आती हुई ध्वनियाँ उसके कानों में टकराने लगी…

‘तुम यहाँ मत आया करो शैल, जानती हो मुझे चिकन पॉक्स है। कहीं तुम्हें भी हो गया तो…?

‘दुत! पागल कहीं के।…और हो जाए तो हो जाए। इस डर से क्या मैं तुम्हारे पास आना छोड़ दूँ? मेरा वश चलता तो तुम्हें अपने घर ले जाकर रखती, पर छोटी ममी छूत-छात मानती हैं- इसी से कहने की हिम्मत नहीं होती।’

‘छूत-छात की बीमारी में परहेज़ तो रखना ही चाहिए। अच्छा उठो, मेरे बिस्तर पर तो मत बैठो।’

‘मैं तो यहीं बैठूँगी। मैं तुम्हारी जगह होऊँ और तुम मुझसे ऐसा परहेज़ करो, तो तुमसे बात भी करूँ।’ और वह बड़े प्यार से बालों में अँगुलियाँ डालकर सहलाने लगी। निर्मल के बदन की जलन पर मानो किसी से ठंडी चीज़ का लेप कर दिया। एक घंटा बिताकर वह गई, तो आधी बीमारी अपने साथ लेती गई। दूसरे दिन ढेर सारे फल और फूलों के साथ वह आई, और बोली, ‘तुम्हारे पिताजी की स्वीकृति का पत्र आ गया। पर वे चाहते हैं कि तुम अच्छे होते ही एक साल की ट्रेनिंग के लिए चले जाओ। बोलो जाओगे?’ उसका उत्तर सुनने के लिए शैल की आँखें निर्मल के चेहरे पर टिक गईं, और अनार छीलते हुए हाथ जहाँ के तहाँ रुक गए। अपने नेत्रों से शैल के गालों को दुलारते हुए निर्मल ने कहा, ‘मन नहीं होता तुमसे दूर होने का। यहाँ हूँ तो रोज़ मिल तो लेते हैं। और तुम्हें कैसे बताऊँ शैल! यह मुलाक़ात मेरे जीवन का आवश्यक अंग बन गई है, जिसके बिना अब मैं शायद रह न सकूँ।’ अनार के लाल दानों को अपनी गुलाबी अंगुलियों से निर्मल के मुँह में डालते हुए शैल ने पूछा, ‘तब पिताजी को क्या लिखोगे?’

अनार की प्लेट को अपनी ओर सरकाते हुए निर्मल ने कहा, ‘लाओ, मैं खुद खा लूँगा।’ और वह बैठने का प्रयास करने लगा।

‘क्यों मेरे हाथ से क्या अनार की मिठास जाती रहती है?’ और प्लेट उसने वापस खींच ली।

‘पगली!’ निर्मल फिर लेट गया, और बड़े भावपूर्ण नेत्रों से घूमते पंखे को निहारते हुए बोला, ‘पिताजी के सामने कुछ बहाना तो बनाना ही होगा शैल, पर मैं यहाँ से कहीं नहीं जाऊँगा।’

मन-ही-मन निहाल होते हुए शैल ने बड़ी अदा से आँखें नचाते हुए कहा, ‘हाय राम! इतने बड़े होकर झूठ बोलेगे?’ और अपनी ही बात पर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।

बच्चू के चीख पड़ने से मिस्टर वर्मा के कानों में पड़ती हुई खिलखिलाहट की ध्वनि जाने कहाँ खो गई। खीझकर बोले, ‘अरे, पहले उसे तो चुप कराओ!’ उन्हें लगा जैसे कोई बहुत ही सुंदर स्वप्न वे देख रहे थे, जो इस बच्चे के रोने से बिखर गया।

मिसेज वर्मा उठी। बच्चू को थपकाकर सुलाते हुए बोली, ‘यह नींद में जाने क्या-क्या देखता है। हर रोज़ एक-दो बार इसी तरह चीख पड़ता है।’

बच्चे को चुप कराकर मिसेज वर्मा ने काग़ज़ उठाया और फिर कहानी पढ़ने बैठ गईं। पर आँखें मूंदे वर्मा साहब अपने में ही लीन उस बिखरे सपने के टूटे हुए सूत्र को खोज रहे थे। लेकिन बच्चे के रोने में खिलखिलाता हुआ चेहरा खो गया सो खो ही गया, लाख प्रयत्न करने पर भी वह फिर नहीं उभरा। उसकी जगह एक कुम्हलाया हुआ चेहरा उनकी आँखों के आगे घूम गया।…

‘यह क्या शैल। तुम्हें तो बुखार लग रहा है।’ शैल के गाल को छूते हुए हुए निर्मल ने कहा।

‘जाने क्यों, शाम को रोज़ ऐसा ही लगता है। बड़ी थकान भी लगती है, पर कभी टेम्प्रेचर लिया नहीं।’

‘कितने दिनों से ऐसा रहता है?’

‘करीब महीना भर होने आया।’

‘बड़ी मूर्ख हो तुम!’ और ड्रेसिंग टेबल की दराज में से थर्मामीटर निकालकर उसने शैल के मुँह में लगाया।

इसके बाद डाक्टर, दवाई अस्पताल, ऐक्स-रे…

ममी निर्मल को समझा रही हैं, ‘मैं कहूँगी तो शैल और ये दोनों ही सोचेंगे कि मैं सौतेली माँ हूँ, सो ऐसा कह रही हूँ, इसलिए तुम उन्हें समझाकर शैल को सैनिटोरियम में भेजने की व्यवस्था करवा दो।’

‘पर ममी, अभी डाक्टरों ने निश्चय राय तो दी नहीं है कि टी.बी. ही है। अभी तो उन लोगों को संदेह-मात्र है। इस स्थिति में यदि उसे सैनिटोरियम में भेजा जाएगा, तो ज़रा सोचो, उसके मन पर कितना खराब असर पड़ेगा!’

पर ममी के आगे किसी की नहीं चलती।

सैनिटोरियम के लंबे अहाते को पार कर निर्मल पीछेवाले लॉन में पहुँचा। आरामकुर्सी पर बैठी शैल की पीली निस्तेज आँखों में चमक आ गई।

‘तुम्हें रोज़ इतनी दूर आने में तकलीफ़ होती होगी न?’

‘नहीं तो, ज़रा भी नहीं।’

‘हाँ, तब भी आया करना। सच कहती हूँ, मैं सारा दिन इसी आसरे काटती हूँ कि शाम को आओगे। आ जाते हो, तो बड़ा हलका-हलका लगने लगता है, मानो मैं बिलकुल स्वस्थ हूँ।’

शैल के बालों में अँगुलियाँ चलाते हुए निर्मल ने कहा, ‘तुम सोचती हो कि मिलने की उत्सुकता केवल तुम्हीं में है। जबसे तुम यहाँ आई हो, किसी काम में मन नहीं लगता। शाम हुई न हुई, मैं दौड़ पड़ता हूँ।’ फिर शैल की लंबी-पतली अँगुलियों में अपनी अँगुलियाँ फँसाते हुए निर्मल ने कहा, ‘जाने क्यों मेरा मन हर घड़ी कहता है कि तुम्हें टी. बी. होती है, वे सब तो तुम्हारे जीवन में है नहीं। तुम अच्छा खाती हो, अच्छा पहनती हो, साफ-सुथरी, खुली जगह में रहती हो। पापा और मेरा प्यार तुम्हारे जीवन की हर घड़ी को सरस बनाए रहता है, फिर वह अपने-आप ही निश्चयात्मक स्वर में बोल पड़ा, ‘नहीं-नहीं! यह डॉक्टरों का भ्रम मात्र है, तुम्हें टी.बी. हो नहीं सकती। असंभव, एकदम असंभव!’

‘हो सकने का सवाल नहीं निर्मल, शायद है ही। मेरी ममी टी.बी. से ही तो मरी थीं। हो सकता है शायद यही कारण हो!’

कुछ सोचते हुए निर्मल ने कहा, ‘अच्छा…?’ उसके स्वर में उतार आ गया और बालों में से अगुँलियाँ एकाएक ही शिथिल हो गईं।

‘तब तो इसका मतलब हुआ कि तुम्हारे बच्चों को भी टी.बी. होगी!’ बालों में से अँगुलियाँ निकालते हुए उसने कहा।

‘शैल खिलखिलाकर हँस पड़ी, ‘मेरे ही बच्चे क्यों? क्या तुम्हारे नहीं होंगे? अरे कहो, अपने बच्चे!’

निर्मल ने देखा, उसके चेहरे पर मातृत्व उमड़ आया और आँखें लाज से झुक गईं, पर जाने क्यों, निर्मल इस बात पर न हँस सका और न हमेशा की तरह शैल के इस रूप पर बिखर-बिखर जाने को उसका मन हुआ।

आँखों में आए लाज के उस भाव से अपने सारे चेहरे को गुलाबी रंग से रँगते हुए शैल ने कहा, ‘देखो, आज डॉक्टर आए थे तो मैंने उनसे कह दिया कि 23 मई तक मुझे अच्छा कर ही दीजिए, चाहे मुझे टी.बी. हो या टी.बी. का बाप। मुझे तब तक अच्छा होना ही है।’ पूछने लगे-क्या बात है 23 मई को?

‘अच्छा बताओ तो, भला मैं अपने मुँह से अपनी शादी की बात कैसे कहती? पर देखो? तुम जाकर कह देना कि हमारी शादी है। समझे? कह दोगे न?…’ पर निर्मल का मन जाने कहाँ खोया था। धीरे से वह कुर्सी के हत्थे से उठा और सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। निर्मल की उदासीनता की ओर बिना ध्यान दिए शैल अपनी धुन में कहती गई, ‘देखो, यहाँ सारे दिन पड़े-पड़े मन नहीं लगता, सो मैंने एक साड़ी काढ़ना ही शुरू कर दिया है। हम लोग जब घूमने जाएँगे तो तुम देखना, मैं रोज़ एक-से-एक बढ़िया साड़ी पहनकर चला करूँगी। लोग-बाग कहेंगे-वाह साहब, क्या ठाठ है तुम्हारी बीवी के!’…और उसका मन छ: महीने की अवधि लाँघकर एक क्षण में ही उस जगह जा पहुँचा, जहाँ के सुनहरे सपने बुनते-बुनते ही शैल के रात-दिन बीता करते थे। पर जाने क्या था कि निर्मल न शैल की इन बातों में ही अपना मन रमा पा रहा था, न अपनी ओर से कोई ऐसी हल्की-फुल्की बात ही कर पा रहा था, जिससे शैल का कष्ट कुछ घटे ही। अवसाद के काले मेघ उसके मन पर धीरे-धीरे घने होते जा रहे थे। वह स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि वह कौनसी मजबूरी है, कैसी बेबसी है जो उसे खुलकर हँसने नहीं देती। विचित्र-विचित्र शंकाएँ उसके मन में उमड़-घुमड़ रही थीं, और उसके नीचे दबा भावशून्य नज़रों से वह दूर कहीं देख रहा था, मानो उसे शैल की उपस्थिति का अहसास ही न हो।…

मिस्टर वर्मा की भावशून्य नज़रें दूर से किसी अदृश्य हृदय में उलझी देखकर मिसेज वर्मा एक क्षण को रुकीं। पर उनका मौन भी मिस्टर वर्मा के ध्यान को अपनी ओर आकर्षित न कर सका। मिसेज वर्मा अपनी कहानी की इस उपेक्षा पर बुरी तरह खीज पड़ीं, और अपने पैर से उसके पैर को झकझोरते हुए बोलीं, ‘कहाँ ध्यान है तुम्हारा? कहानी सुन भी रहे हो या मैं यों ही बक रही हूँ?’ ।

‘एँऽ!’ अपने फैले-बिखरे मन को समेटने का असफल-सा प्रयास करते हुए मिस्टर वर्मा ने मिसेज वर्मा की ओर देखा। उसके हाथ में कहानी के पन्ने देखकर उनकी चेतना लौटी तो सफ़ाई देते हुए बोले, ‘कहानी ही तो सुन रहा हूँ। रात के इस सन्नाटे में तुम्हारी इस कहानी से मन जाने क्यों भारी-भारी हो गया!’ मिस्टर वर्मा के इस वाक्य को अपनी कहानी की सफलता मानकर परम तृप्ति के साथ मिसेज वर्मा ने पढ़ना आरंभ किया :

‘लीला भारी कदमों और उससे भी भारी मन लिए जेल में अपने पति से मिलने जा रही है। उसका रोम-रोम जानता है कि पति से जेल में मुलाकात करने का यह अंतिम दिन है। वह चाहती है कि वह हँसकर अपने पति को विदा दे। पर लाख प्रयत्न करने पर भी मन का दुख आँखों में फूटा-फूटा पड़ता है, और उसके कदम और अधिक भारी और अधिक शिथिल हो जाते हैं, फिर भी एक अलौकिक संतोष और तृप्ति की भावना उसके मन में है कि मरने से पहले वह अपने पति को अपना सब-कुछ दे सकी। अपने को लुटाकर उसने उसे सुखी बनाया, धनी बनाया। जेल का फाटक आ गया, एक क्षण वह ठिठकी।’

सैनिटोरियम के फाटक पर निर्मल के कदम रुक गए। जिन क़दमों को अपनी सारी शक्ति लगाकर वह यहाँ तक खींच लाया, उन्होंने जैसे अब जवाब दे दिया। निर्मल जानता है कि फाटक में घुसकर लंबे अहाते को पार करते ही वह शैल के कमरे के सामने जा पहुँचेगा। शैल, जिससे मिलने के लिए कभी उसके क्षण युग-युग जैसे लंबे हो जाया करते थे, वही शैल आज उसके इतने समीप है, फिर भी उसके मन में मिलने की कोई उत्सुकता नहीं, आतुरता नहीं। वह हृदय से शैल के पास जाना चाहता है, पर न जाने कौन है जो उसे निरंतर पीछे की ओर घसीट रहा है। इस कशमकश में वह नहीं जानता, वह क्या करे। एक ठंडी निश्वास उसके सीने से निकल जाती है, और शैल का नाचता हुआ जर्द, कुम्हलाया चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम जाता है, जिसमें न कोई सौंदर्य है, न कोई आकर्षण और न इनकी संभावना ही…फिर भी वह अहाते की ओर बढ़ता है। सैनिटोरियम के भवन की छत पर लगे हुए क्रॉस में उसकी दृष्टि उलझ जाती है। ओह! वह वहाँ से नज़रें हटा लेता है। न जाने क्यों, उसे ईसाइयों का यह पवित्र क्रॉस बड़ा ही मनहूस-सा दिखाई देता है। इसी क्रॉस पर तो कुछ निर्दयी लोगों ने निर्दोष ईसा को टाँगकर उसके प्राण ले लिए थे। वह नीचे अपनी परछाई को देखते हुए आगे बढ़ता है। शैल के कमरे की निकटता उसकी चाल को और अधिक शिथिल कर देती है। आज पूरे पंद्रह दिन बाद वह शैल के पास आया है। उसे कुछ-न-कुछ सफ़ाई देनी होगी। पर उसके रीते मन में कोई बात नहीं सूझती। वह दरवाजे पर पहुँचकर देखता है-शैल पलंग पर लेटी है। पंद्रह दिनों में ही वह जैसे बहुत कमजोर हो गई है। शैल ने देखा तो ऐसे स्वर से बोली, जिसमें जीवन का कोई लक्षण ही न था, ‘बाहर ही बैठो निर्मल! मेरे कमरे में मत आओ। अब तो कफ में बुरी तरह खून निकलने लगा है।’ निर्मल दरवाज़े पर ही ठिठक गया। बड़ी बेबस निगाहों से उसने एक बार शैल की ओर देखा तो महसूस किया, मानो शैल का मौन चीख-चीखकर कह रहा है तुम्हें रोकना मेरा फर्ज था, मैंने रोक दिया, पर तुम्हें तो इस तरह न रुकना चाहिए न! पंद्रह दिन बाद आए हो, क्या एक बार भी अपनी प्यार-भरी अँगुलियों से मेरे बालों को नहीं सहलाओगे?

उसका मन होता है कि भीतर चला आए, शैल को सीने से लगा ले; पर वह जहाँ-का-तहाँ रह जाता है-मौन निरुत्तर।

शैल की आँखों में आँसू छलछला आते हैं, वह नज़र फेर लेती है। निर्मल का मन बुरी तरह कचोट उठता है। तभी ममी आ जाती हैं। बाहर खड़ी-खड़ी वे तबीयत का समाचार पूछ लेती हैं, उसकी आवश्यकता और सुख-सुविधा की बात पूछ लेती हैं, फिर कहती हैं, ‘शैल, बिन्नी और पप्पू आए हैं। रो-रोकर घर भर दिया कि दीदी को देखेंगे। हारकर लाना ही पड़ा। बाहर खड़ा कर आई हूँ। तुम ज़रा खिड़की से सिर निकालकर दिखा दो उन्हें तसल्ली हो जाए।’

बच्चों के इस स्नेह की बात सुनकर शैल की आँखों में आँसू ढुलक पड़ते हैं। वह खिड़की से मुँह निकालती है, हाथ हिलाती है। उसके बाद उसका चेहरा भावशून्य हो जाता है। वह न ममी की ओर देखती है, न निर्मल की ओर। ममी फिर आने का आश्वासन देकर चल देती हैं। निर्मल अजीब-सी घुटन महसूस करता है। शैल उसे पंद्रह दिन बाद आने के लिए उलाहने और मौन भाव से स्वीकार कर लिया है। बात-बात पर मचलने, रूठने और मुँह फुलानेवाली शैल की यह मौन स्वीकृति निर्मल से जैसे बर्दाश्त नहीं होती, पर…जब वह सोचता है कि यदि शैल इस लंबी अनुपस्थिति का कारण पूछ बैठे, तो उसके पास क्या उत्तर है? अपने मन के चोर से वह स्वयं भयभीत है, वह स्वयं उससे अनजान ही बना रहना चाहता है, शैल को बताने की बात उठती ही नहीं। उचित सच्चाई के अभाव में शैल के मौन से उसे व्यथा के साथ-साथ कुछ राहत भी मिलती है। शैल की नज़रों से अपने-आपको चुराती हुई उसकी नज़र बगलवाली दीवार में कैलेंडर पर जा टिकती है। वह देखता है-कैलेंडर में से फरवरी, मार्च और अप्रैल के पन्ने फाड़कर मई का पन्ना निकालकर रखा गया है, और 23 तारीख के चारों ओर लाल पेंसिल से गोला बना रखा है। उसका मन तड़प उठता है। वह चाहता है-शैल बोले, पर शैल बोलती नहीं। उसका मौन तुड़वाने के लिए अपनी सारी शक्ति बटोरकर निर्मल कहता है, ‘शैल, पिताजी का पत्र आया है। लगता है ट्रेनिंग के लिए मुझे जाना ही होगा।’ शैल सुनती है, पर न उसके चेहरे पर कोई विकार उत्पन्न होता है, न उसका मौन ही टूटता है। अपने-आपको बड़ी कुशलता से बचाते हुए निर्मल शैल से कहता है, तुम सो जाओ शैल, अधिक देर बैठना तुम्हारे लिए ठीक नहीं। अधिक बात करने के लिए भी शायद तुम्हें मना किया गया है। ठीक है, तुम चुप ही रहो। मैं भी चला। और देखो, समय-समय पर अपनी तबियत के समाचार देती रहना। न हो तो ममी से लिख भेजना।’ फिर अत्यंत स्नेह से, कोमल स्वर में, बड़े आग्रह से उसने पूछा, ‘खबर भेजोगी न?’ स्वर की इस आर्द्रता ने अनायास शैल के हृदय के मौन गुप्त तारों को झनझना दिया। उसकी भावहीन आँखें एक क्षण निर्मल महसूस करता है, जैसे वह बहुत बड़ा झूठ कहता हुआ पकड़ लिया गया है। पर निर्मल में इतना साहस न था कि वह उसका सामना कर सकता। हाथ हिलाया और जल्दी से मुड़ गया।

आते समय उसके क़दम शिथिल और भारी हो रहे थे, लौटते समय उतनी ही स्फूर्ति के साथ वह चला जा रहा है। वह उस कमरे से काफी दूर आ गया है, फिर भी उसे लगता है जैसे खिड़की में से झाँकते दो आँसू-भरे व्यथित नयन उसकी पीठ में चुभे जा रहे हैं। वह सीधा रास्ता छोड़कर अकारण ही मुड़ जाता है।…

मिस्टर वर्मा के चेहरे पर अपनी कहानी की प्रतिक्रिया देखने की उत्सुकता में मिसेज वर्मा ने मिस्टर वर्मा की ओर देखा। वर्मा साहब की दृष्टि कहानी के पन्नों पर टिकी हुई थी, और उसके ललाट पर दो सल पड़े हुए थे, जिसका कारण शायद चश्मे की अनुपस्थिति हो। पति को अपनी कहानी में यों डूबा हुआ देखकर मिसेज वर्मा के चेहरे पर प्रसन्नता की आभा छलक पड़ी। उन्होंने कहा, ‘देखो, इस पत्र को ध्यान से सुनना। यह लीला का अपने पति के नाम अंतिम पत्र है।’ फिर स्वर में चैलेंज का पुट लाकर बोलीं, ‘मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि पत्थर-दिलवाला आदमी भी इसे पढ़कर बिना पसीजे नहीं रहेगा।’ पर मिस्टर वर्मा कानों में ‘पत्र’ शब्द के अतिरिक्त मिसेज वर्मा का और कोई शब्द नहीं पहुँचा। मिसेज वर्मा ने पत्र पढ़ना आरंभ किया। लेकिन मिस्टर वर्मा की धुंधली आँखों के सामने एक और अस्पष्ट-सा पत्र उभर आया। धीरे-धीरे पत्र का एक-एक शब्द स्पष्टतर होता गया…

‘प्रिय बेटा निर्मल,

समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह पत्र तुम्हें कैसे लिखें, पर लिखे बिना रहा भी नहीं जा रहा है। शैल की हालत तो जैसी तुम छोड़कर गए थे, वैसे ही है; पर डॉक्टरों का कहना है कि यदि 23 ता. को किसी भी तरह शैल की शादी कर दी जाए, तो शैल के अच्छे हो जाने की संभावना है। इस स्थिति में शैल से विवाह करने की बात कहते हुए भी बड़ा संकोच होता है। किस मुंह से कहूँ, पर बेटी के प्राणों का मूल्य कहने को मजबूर कर रहा है। एक दिन शैल का जीवन तुम्हारे हाथों में सौंपने का निश्चय किया था, वह आज भी तुम्हारे ही हाथों में है-चाहे बचा लो, चाहे खो दो। बहुत सोचकर क़दम उठाना मेरे बच्चे! एक निर्दोष बच्ची और बेबस बाप की आत्मा तुम्हें युग-युग तक दुआएँ देगी।

मिस्टर वर्मा को एकाएक लगा, जैसे उनकी साँस रुक रही है। उन्होंने दोनों हाथों से अपनी आँखें बंद कर दीं। वह पत्र विलीन हो गया। पर उसकी जगह एक तार उभर आया, जिसमें 23 मई को शैल की मृत्यु होने का समाचार था। मिस्टर वर्मा बदहवास से उठ बैठे और चिल्लाकर बोले, ‘मेरा चश्मा दो!’ मिस्टर वर्मा की इन सारी हरकतों को अपनी कहानी की सफलता का प्रमाण मानकर मुस्कुराते हुए मिसेज वर्मा ने कहा, ‘बस, चार लाइनें और सुन लो।’

‘तुम मेरा चश्मा दो!’ वर्मा साहब क्रोध से झल्ला उठे। उनका स्वर बुरी तरह भर्राया हुआ था। इस अप्रत्याशित क्रोध को मिसेज वर्मा समझ नहीं पा रही थीं कि तभी वर्मा साहब चीख़ पड़े, ‘मैं कहता हूँ मेरा चश्मा दो, नहीं तो मेरा दम घुट जाएगा!’ मिसेज वर्मा के हाथ से चश्मा लेकर उन्होंने काँपते हाथों से अपनी आँखों पर चढ़ाया तो उन्हें ऐसा लगा मानो किसी अतल समुद्र की गहराई में से, जहाँ केवल अंधकार था और उनका दम घुट रहा था, वे बाहर निकल आए हैं। निश्चिंतता की एक लंबी साँस खींचकर उन्होंने अपने चारों ओर देखा। सामने मिसेज शर्मा श्वेत साड़ी में लिपटीं, चेहरे पर आतुरता का भाव लिए बैठी थीं! पास ही पलंग पर बच्चू निश्चिंत भाव से सो रहा था। लॉन के चारों ओर के पेड़ रुपहली चाँदनी में नहाए खड़े थे, और उसके अपने छोटे-से सुंदर बँगले की दीवार से सटा हुआ रातरानी का पेड़ उन्मुक्त भाव से अपना सौरभ बिखेर रहा था।

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