वो सत्तर साल की बुजुर्ग थी, नाम था कुसुम। पति के स्वर्गवास बाद कठिनाइयों का सामना करते हुए बेटों की परवरिश की, उन्हें पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया की वे समाज में इज्जत से रहें। बेटे भी मां का आदर करते, लेकिन विवाह के बाद बहुओं और बच्चो में व्यस्त होने से उनका ध्यान मां […]
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बहारें लौट आएंगी – गृहलक्ष्मी की कहानियां
उसका हँसना पता नहीं क्यों मुझे अच्छा लगा। वह बार-बार मेरी ओर देखे जा रहा था। जब-जब उससे मेरी निगाहें मिलती, वह धीरे से मुस्करा जाता। मेरी समझ में नहीं आया कि वह मुझे देखकर क्यों मुस्करा रहा है, किन्तु उसका मुस्कराना मुझे अच्छा ही लगा। मासूम चेहरा, शक्ल सूरत से अच्छा पढ़ा-लिखा और सभ्य […]
मुन्ने की वापसी – गृहलक्ष्मी कहानियां
पहले-पहल राइचरण जब मालिक के यहाँ नौकरी करने आया, तब उसकी उम्र बारह वर्ष की थी। जैसोर ज़िले में उसका घर था। लंबे बाल, बड़ी-बड़ी आँखें, साँवला, चिकना और छरहरा। जात से कायस्थ। उसके मालिक भी कायस्थ थे। मालिक के एक साल के बच्चे की देखभाल और पालन-पोषण में सहायता करना ही उसका प्रधान कर्त्तव्य था।
जरिया – गृहलक्ष्मी कहानियां
आखिर नंबर घुमाते ही कान चोंगे से सट जाते हैं । घंटी बज रही है । ‘हलो’ भी होने लगी । निगम ‘हलो’ को बहुत खींचते हैं…मगर प्रत्युत्तर में वह कुछ खींचती-सी खामोश हो आई । यूं…यूं मजा नहीं आएगा । फोन उसके चेहरे पर थिरकते इंद्रधनुष को अभिव्यक्त नहीं कर पाएगा । उसकी उत्तेजक खुशी मात्र सूचना बनकर रह जाएगी ।
भीड़ साक्षी है- गृहलक्ष्मी कहानियां
……अचानक अस्पताल में हो-हंगामा मच गया, ‘क्या हुआ, क्या हुआ?’….कहते हुये लोग ‘अपातकालीन कक्ष’ की ओर भागने लगे। तीन बच्चे, एक महिला व एक पुरुष बुरी तरह छटपटा रहे थे। नीचे जमीन में पड़े वे इतने छटपटा रहे थे कि लगता था अब प्राण छोड़ें और तब प्राण छोड़ें।
अपनेपन की महक – गृहलक्ष्मी लघुकथा
सोमेश ने घर में घुसते ही सभी को आवाज लगाई ,”चलो सभी ,सुगंधा (सोमेश की पत्नी ) नितिन ( बेटा ) नीति (बेटी) जल्दी इधर आ जाओ । नए घर का नक्शा बनकर आ गया है, जिसको जो भी चेंज कराने हो अभी बता देना, एक बार नक्शा फाइनल हो गया तो फिर कुछ नहीं हो सकता। ”
सुभा – गृहलक्ष्मी कहानियां
जब कन्या का नाम सुभाषिणी रखा गया, तब कौन जानता था कि वह गूँगी होगी। उसकी दोनों बड़ी बहनों का नाम सुकेशिनी और सुहासिनी रखा गया था, अतः मेल के अनुरोध पर उसके पिता ने छोटी कन्या का नाम सुभाषिणी रखा। अब सब उसे संक्षेप में सुभा कहते।
चोरी का धन – गृहलक्ष्मी कहानियां
महाकाव्य के युग में स्त्री को पौरुष के बल पर प्राप्त किया जाता था, जो अधिकारी होते वही रमणी-रत्न प्राप्त करते। मैंने कापुरुषता के द्वारा प्राप्त किया, यह बात जानने में मेरी पत्नी को विलंब हुआ। किन्तु, विवाह के बाद मैंने साधना की; जिसे धोखा देकर चोरी से पाया, उसका मूल्य प्रतिदिन चुकाया है।
क्या नहीं हो सकता – गृहलक्ष्मी कहानियां
उसकी निगाह मुझ पर आकर टिक गई तो मुझे लगा कि वह मुझे कुछ पहिचानने की कोशिश कर रहा है। तभी उसने दूर से नाम लेकर मुझे आवाज लगाई और मेरी ओर बढ़ने लगा। मुझे भी यह चेहरा कुछ जाना पहचाना लग रहा था। मैंने दिमाग पर जोर डाला, ‘कौन हो सकता है यह आदमी? है भी निकट का, नाम लेकर साधिकार आवाज दी है उसने मुझे।’ किन्तु पुरजोर कोशिश करने के बाद भी मैं उसे पूरी तरह नहीं पहचान सका।
दीदी – गृहलक्ष्मी कहानियां
किसी ग्रामवासिनी अभागिन के अन्यायी अत्याचारी पति के सब दुष्कृत्यों का सविस्तार वर्णन करते हुए पड़ोसिन तारा ने बड़े संक्षेप में अपनी राय प्रकट करते कहा‒ऐसे पति के मुँह में आग!
सुनकर जयगोपाल बाबू की पत्नी शशि ने बड़े कष्ट का अनुभव किया‒पति जाति के मुख में सिगार की आग छोड़ अन्य किसी दूसरी तरह की आग की किसी दशा में भी कामना करना स्त्री जाति को शोभा नहीं देता।
