राधा का जवाब सुनते ही राघव का चेहरा तमतमा गया।
‘क्यों? आखिर क्यों ! तुम नहीं जानती तो और कौन जानता है?
‘कौन है वह जिससे मैं पूछने जाऊं? जब भी मैंने तुमसे पूछा, तुमने हमेशा ही उल्टा जवाब दिया।’
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राधा का जवाब सुनते ही राघव का चेहरा तमतमा गया।
‘क्यों? आखिर क्यों ! तुम नहीं जानती तो और कौन जानता है?
‘कौन है वह जिससे मैं पूछने जाऊं? जब भी मैंने तुमसे पूछा, तुमने हमेशा ही उल्टा जवाब दिया।’
चाय की चाह का जवाब कोई नहीं, हर सवाल का जवाब चाय होती है। इस देश के सभी वासी जानते हैं कि चाय की महिमा है अपरंपार। देखिए, इसी की एक बानगी।
काँठालिया के ज़मींदार मतिलाल बाबू सपरिवार नौका से अपने घर जा रहे थे। रास्ते में दोपहर के समय नदी किनारे की एक मंडी के पास नौका बाँधकर भोजन बनाने का आयोजन कर ही रहे थे कि इसी बीच एक ब्राह्मण बालक ने आकार पूछा, “बाबू, तुम लोग कहाँ जा रहे हो?” प्रश्नकर्ता की आयु पंद्रह-सोलह से अधिक न होगी।
नीम अंधेरी रात थी। मौन रात के सन्नाटे के बीच रह-रह कर फड़फड़ाते पत्तों की आवाज़ दिल में अजीब सी दहशत पैदा करने लगी थी। दूर कहीं बहुत दूर से आती कुत्तों की आवाज़ और दरवाजों के बंद होने व खुलने की चरमराहट वातावरण में मनहूसियत घोलने लगी थी। पिछले आधे घंटे से निधि इस सुनसान अंधेरी सड़क पर खड़ी विरेन का इंतज़ार कर रही थी। सामने की बिल्डिंग में अब भी कुछ घरों की बत्तियां जल रही थी।
डोंगे में लबालब ‘फ्रूटक्रीम’ भरकर उसका ढक्कन लगाने से पहले उमा ने प्रिया को गुहार लगायी कि वह रसोई में आकर ‘फ्रूटक्रीम’ देखकर तनिक अंदाजा लगा ले कि एक डोंगा ‘फ्रूटक्रीम’ से उनकी पिकनिक का काम चल जायेगा या उमा शेष बची ‘फ्रूटक्रीम’ मिलाकर उसे किसी बड़े डिब्बे में भरकर पूरी की पूरी उन्हें दे दे ।
बालकों के सरदार फटिक चक्रवर्ती के दिमाग़ में चट से एक नए विचार का उदय हुआ नदी के किनारे एक विशाल शाल की लकड़ी मस्तूल में रूपांतरित होने की प्रतीक्षा में पड़ा था; तय हुआ, उसको सब मिलकर लुढ़काते हुए ले चलेंगे।
आज उसकी घंटी नहीं बजी, न ही आवाज सुनाई दी ।
रोज सुबह दरवाजे के बाहर से उसकी आवाज सुनाई पड़ती-‘बाई, कचरा!’ इसी तर्ज में वह यानी अंजा हमारे लंबे कॉरीडोर से जुड़े हुए फ्लैट की घंटी बजाती हुई ‘कचरा’ शब्द का उच्चारण करती, फिर कचरा लेने उसी फ्लैट के सामने पहुंच जाती जिसकी घंटी उसने सबसे पहले बजाई थी । ऐसा शायद वह सुविधा के लिए करती थी कि तब तक हर फ्लैट का बाशिंदा अपने-अपने कचरे का डिब्बा दरवाजे के बाहर रख दे और अंजा को व्यर्थ प्रतीक्षा न करनी पड़े । दस माले की ऊंची इमारत के हर घर से उसे कचरा इकट्ठा करना पड़ता था । लोगों को भी आदत हो गई थी । वे उसकी घंटी पहचानते थे । सुबह दूधवाले की घंटी…पेपर…वाले की…और अंजा की । सुबह की व्यस्तता के बावजूद लोग उसकी आवाज सुनते ही दरवाजा खोल अपना कचरे का डिब्बा बाहर रख देते और बिना अंजा की प्रतीक्षा किए हुए अपने काम में लग जाते । अंजा एक-एक का कचरा क्रमशः अपने प्लास्टिक के भारी झाबे में उड़ेलती, खाली डिब्बा यथास्थान रखकर दूसरे फ्लैट के दरवाजे पर पहुंच जाती । बाद में लोग अपना-अपना डिब्बा सुविधानुसार उठा लिया करते । शुरुआत के दिनों में मैं भी ऐसा ही करती थी ।
हमेशा की भांति आज भी वह छड़ी लिए अपनी ही धुन में सवार उस सड़क पर चलते-चलते बहुत दूर निकल गया था। प्रातःकाल की इस सुनहरी बेला में चिड़ियों का चहचहाना नव प्रभात का सन्देश दे रहा था। सामने की ओर बर्फ से आच्छादित पहाड़ियां अत्यधिक मनमोहक लग रही थी। मन्द-मन्द चल रहे पवन के झोंको से जहां आनन्द की अनुभूति हो रही थी, वहीं गरम कपड़ों से पूरी तरह ढके अंग-प्रत्यंग में भी एक सिहरन सी दौड़ जाती थी। मौसम खराब होने के साथ-साथ आस-पास की सारी पहाड़ियां बर्फ से पूरी ढक सी गई थी। अन्य दिनों की अपेक्षा आज नदी का प्रवाह भी बढ़ गया था।
माफी मांग लेने से की गई गलती सही तो नहीं हो जाती, पर इससे मन का भार काफी हद तक कम हो जाता है। सुभाष नीरव की ये कहानी भी कुछ ऐसी ही मानवीय संवेदना को व्यक्त करती है।
उसे लगा कि बरसों पुरानी घिसन से चिकनी हो आई लकड़ी की सीढ़ियों में रपटन हो रही है। पैर सावधानी से जमा-जमाकर नहीं रखे और बाई तरफ जो ढबढबाते अंधेरे में काली चादर-सी तनी दीवार है, उस पर टेक के लिए पंजा नहीं जमाया तो निश्चित ही किसी भी क्षण दुर्घटना से उसकी मुठभेड हो सकती है । दीवार से पंजा छूते ही एक लिसलिसी चिकनाहट हथेलियों को भेदती पूरे शरीर में सिहर गई । मन एकबारगी घिना आया । न जाने कितनी और कैसी-कैसी हथेलियां टेक की खातिर इन दीवारों से चिपकी होंगी और… उसे टॉर्च साथ लेकर आनी चाहिए थी । लेकिन उसे क्या पता था कि इतनी खस्ताहाल सीढ़ियों और हिकाते अंधेरे से उसका पाला पड़ेगा ।