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कथा-कहानी

यूं तो इस नदी को वह नित्य प्रति देखता था, किन्तु आज इस नदी को अनवरत देखते ही रहने की उसकी न जाने क्यों प्रबल इच्छा हो रही थी।

तीव्र वेग से बहता नदी का जल उसे अपनी ओर खींचे जा रहा था। उसके हृदय में एकाएक अनेक भाव तरंगों की भांति उठते और फिर शान्त हो जाते। वह सोच में डूब गया-

‘मैं जब भी घूमने आया, जब भी मैंने इसे देखा यह नदी इसी भांति अनवरत वेग से बहती दिखाई दी। शायद इसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने की जल्दी है। लेकिन इसका वह लक्ष्य क्या हो सकता है? नदी के जल का भी लक्ष्य होने लगा? हा ! हा ! हा!’ वह अपने ही प्रश्न पर पागलों की तरह अट्टहास करने लगा। फिर कुछ देर शान्त हो जाने के बाद उसकी अन्तरात्मा में जैसे एक आवाज आई – ‘यह नदी श्रेष्ठ है, बहुत श्रेष्ठ ।’

अहर्निश अनवरत गति से चट्टानों और पहाड़ों से टकराती हुई भी यह अपने लक्ष्य की ओर अबाध गति से बढ़ती रहती है। सर्वजन हिताय निरन्तर बहती हुई यह पल भर भी विश्राम नहीं करती। बिजली के उत्पादन का लक्ष्य हो या सिंचाई का, मनुष्य मात्र के जीवन का प्रश्न हो अथवा समस्त प्राणी जगत के जीवन का, यह परोपकारी नदी सभी को जीवन दान दे रही है।

यह कहीं भटकते प्राणी को शक्ति प्रदान करती है, तो कहीं प्यासों की प्यास बुझाती है। इसके लिए अमीर-गरीब, छूत-अछूत में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं । इस जल को अमृत समझ, चाहे इसका पान करो अथवा इससे कलुषादि के पर्माजन का कार्य, इसके लिए ऊंच-नीच का कोई भेदभाव है ही नहीं। यह तो सर्वथा परहित में निहित है। वास्तव में यह महान है। बहुत महान ! श्रद्धा से उसका हृदय गदगद हो उठा वह अन्तःकरण से सिर झुकाकर नदी को प्रणाम करने लगा।

ज्यों ही उसने दृष्टि उठाई कि अचानक उसकी नजर स्थिर हो गई। उसकी विचार तन्द्रा टूटी। उसने देखा कि सड़क के किनारे एक अर्द्धनग्नावस्था में कोई व्यक्ति सिकुड़ा-सिमटा सा बैठा है। पास ही राख का एक ढेर था। ऐसा लगा जैसे इस सर्दी में उसने रात आग के सहारे काटी हो।

दुष्यन्त अवाक् ज्यों का त्यों खड़ा वहीं खो गया था। वह कभी नदी की ओर देखता तो कभी उस व्यक्ति की ओर । उसकी इस दुर्दशा को देख वह तड़फ सा उठा। शायद जीवन में आज पहली बार उसे इतनी पीड़ा का अनुभव हो रहा था। सर्दी से ठिठुरते इस व्यक्ति की पीड़ा उससे देखी न गई। उसने सिर हिला कर आंखें बन्द कर ली।

दुष्यन्त बड़ी तेजी से उसकी ओर बढ़ा। आवाज दी, किन्तु मानों उसने कुछ सुना ही न हो। उसने अपना सिर तक न उठाया।

दुष्यन्त ने पास जाकर दोनों हाथों से उसके माथे को ऊपर किया वह कुछ देर तक एकटक दुष्यन्त की ओर देखता रहा और फिर पूर्ववत घुटनों पर सिर रख दोनों हाथों से कसकर घुटनों को पकड़े बैठ गया।

उसकी यह दशा दुष्यन्त से देखी न गयी। दुष्यन्त की वेदना बढ़ती चली गई। कुछ देर इन्तजार के बाद उसने अपने हाथों से फिर उसका सिर ऊपर उठा लिया। सिर उठाते ही देखता है कि उसकी आंखों में आंसुओं की बाढ़ सी आ गई। उसका सारा चेहरा आंसुओं से तर हो गया था।

दुष्यन्त ने जेब से रूमाल निकाला और उसके आंसू पोंछने लगा, थोड़ी ही देर में पास रखी बोरी हिली तो दुष्यन्त चौंक उठा-

‘यह क्या है?’

सिसकता हुआ वह व्यक्ति बोला, ‘मालिक अभागा लड़का है।’

‘लड़का है? और यह दूसरी बोरी?’ दुष्यन्त ने अचम्भित होकर पूछा।

‘अभागिन लड़की है मालिक ।’

दुष्यन्त के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह जैसे पत्थर का हो गया था। अगले ही क्षण उसकी आंखें आंसुओं से डबडबा गयी।

‘तुम और बच्चों को साथ लेकर यहां?’

‘मजदूरी तलाश करता आया हूं मालिक।’

‘आज तक क्या करते थे?’

‘सरकारी नौकरी पर था कलर्क, सब कुछ बर्बाद हो गया।’

‘पत्नी कहां है?’

‘साहब औरत ने ही तो बर्बाद किया है मुझे। न वो बीमार पड़ती न मैं अपना सब कुछ बेचता और न ही नौकरी से हाथ धोना पड़ता। फिर भी कुछ हाथ न लगा, न पत्नी न जमीन जायदाद। पहले तो जमीन-जायदाद ही कितनी थी, फिर भी इतनी तो थी ही कि इन अभागो का पेट तो पाल ही सकता था। रहने के लिए एक झोपड़ी थी किन्तु सब कुछ लुट गया। ईश्वर न जाने कैसी परीक्षा ले रहा है?’ कहकर पुनः उसकी आंखें डबडबा आई।

‘एक हथौड़ा सा पड़ा दुष्यन्त की चेतना पर। ईश्वर सचमुच परीक्षा लेता है। आज वह मौज-मस्ती में जी रहा है। कल कौन जाने वह भी सड़क पर………।

उसे लगा जैसे वह स्वयं ही सड़क पर दो-दो बच्चों के साथ पड़ा हो और इस पीड़ा को स्वयं ही झेल रहा हो।

‘तुमने इन बच्चों को अनाथाश्रम में क्यों नहीं डाल दिया, कुछ तो देख-रेख होती इनकी?’

‘साहब जीते-जी कैसे इनको अनाथ बनाऊं? कई बार सोचा किन्तु मन ने गवाही नहीं दी। कुछ लोगों ने कहा कि सरकार इस समय गरीबों को मदद दे रही हे। हाथ जोड़-जोड़कर थक गया, कई अर्जियां लिखी परन्तु सरकार के कानों में जूं तक न रेंगी। अब आप ही बताइये कि इस संसार में मुझ बदकिस्मत से भी बढ़कर कौन गरीब होगा? सरकार पर तो तनिक भी मुझे अब विश्वास नहीं रहा।’

‘लेकिन ऐसी स्थिति में कब तक रहोगे?’

‘साहब झेल रहा हूं। जिस दिन बिल्कुल ही हाथ-पांव काम करने बन्द कर देंगे, इन अभागो को लेकर इस नदी में कूद जाऊंगा। कोई सहायता नहीं करेगा मेरी, किन्तु यह नदी जरूर सहायता करेगी। इस पर मेरा पूरा विश्वास है।’

अपने कठोर जीवन में दुष्यन्त पहली बार इतना भावुक हुआ था, जब हर बात पर उसकी आंखों में आंसू छलक आये। वह रह-रह कर अपने को कोसने लगा।

किसी के पास तो न खाने को अन्न का एक दाना है और न तन ढकने के लिए कपड़े का टुकड़ा। न सिर छिपाने को किसी छत का सहारा है, और न जीवनयापन करने हेतु कोई आजीविका है। किसी तरह जिन्दगी जी रहे हैं लोग, और एक मैं हूं जिसे दिन भर जुआ खेलने और शराब पीने से फुर्सत नहीं, यों ही अपनी जिन्दगी भर की कमाई ऐशो-आराम में बर्बाद कर दी है मैंने। मैं कितना गिरा हुआ इन्सान हूं। अपनी इन बुरी आदतों के कारण ही मुझे अपनी योग्य और देवी जैसी पत्नी से भी हाथ धोने पड़े। पास-पड़ोसी, सगे-सम्बन्धी सभी खो दिये मैंने, सब मुझे घृणा की दृष्टि से देखते हैं। क्यों न देखें? घृणित हरकत जो करता हूं। मुझ जैसे घृणित व्यक्ति के जीने का क्या धिक्कार है।’ दुष्यन्त को जैसे स्वयं से भी घृणा होने लगी थी।

दुष्यन्त एक उच्च अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुआ था। पैसे की कोई कमी नहीं थी किन्तु वह जरूरत से ज्यादा लालची था। उसकी कोई सन्तान नहीं थी फिर भी सदैव धन दौलत इकट्ठा करने में जुटा रहता था। सभी उसके इस स्वभाव से बहुत दुःखी थे।

इसी लालचीपन और दुर्गणों के कारण पत्नी से उसकी एक न बनती थी। जब तक दुष्यन्त नौकरी पर रहा, पत्नी को कुछ राहत थी, किन्तु पेन्शन आ जाने के बाद चौबीसों घण्टे शराब में धुत्त व अनाप-शनाप बकता रहता था। पत्नी को एक-एक क्षण गुजारना दूभर हो गया था। सन्तान के अभाव से दुःखी व दुष्यन्त के चिड़चिड़े स्वभाव से परेशान होकर आखिर एक दिन उसने आत्महत्या कर ली।

दुष्यन्त अकेला रह गया था। अब तो वह और भी विक्षिप्त सा हो गया था। नौकर भी उसकी आदत के कारण दूसरे ही दिन भाग जाते थे। उसके उग्र स्वभाव और विक्षिप्त मानसिकता के कारण कोई उसके पास ठहरता ही न था। मजबूर होकर उसने होटल में खाना शुरू कर दिया था। दिन भर इधर-उधर टहलता और बाकी वक्त होटल में शराब पीने व जुआ खेलने में गुजारता, घर तक जाना भी उसने छोड़ दिया था। रह भी क्या गया था उस खाली-खाली इतने बड़े मकान में ? वह तो उसे खाने को दौड़ता था।

सारी कमाई अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही थी। इस तरह अब उसका पेन्शन से भी गुजारा नहीं हो रहा था और इस वृद्धावस्था में उसे एक घूंट पानी का भी सहारा न था, यही सोचकर वह कभी व्याकुल हो उठता था।

वह उस मजदूर को बड़े गौर से देर तक देखता रहा। जवान होने पर भी भूख और परिस्थितियों का मारा वह बूढ़ा हो चला था।

दुष्यन्त ने उसका नाम पूछा- ‘अमीरदास’

‘अमीरदास’ सुनकर उसे हंसी आयी, उसके शहर में एक बहुत बड़ा सेठ था, जिसका नाम गरीबदास था।

‘ईश्वर की भी क्या लीला है। गरीबदास को भरपूर सुख-समृद्धि दी और अमीरदास को कंगाल बना दिया। उसने धीरे से बोरियों से ढके इन बच्चों को देखा। गोरे-चिट्टे किन्तु दरिद्रता और भूख की महामारी ने इन मासूम चेहरों को झुलसा दिया था। बच्चों को देखते ही उसके हृदय में वात्सल्य जाग उठा। उसने दोनों बच्चों को बांहों में सिमेटकर सीने से लगा लिया।

अमीरदास का हाथ पकड़ कर बोला, ‘तुम्हारी कहीं ठौर-ठिकाना नहीं तो तुम मेरे साथ चलो भाई। मेरा बहुत बड़ा मकान यूं ही निर्जन पड़ा है, तुम बच्चों सहित वहीं मेरे साथ रहना।’

अमीरदास को इतनी आत्मीयता से भरे शब्द जीवन में पहली बार सुनाई दिये थे। उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। एकटक वह दुष्यन्त के चेहरे की तरफ देखने लगा मानों अपने सुने की पुष्टि करना चाहता हो। ‘‘हाँ….हाँ, तुम मेरे साथ चलो मेरे घर” दुष्यन्त पुनः बोला। उसे दुष्यन्त के रूप में साक्षात ईश्वर नजर आया और उसने बच्चों सहित दुष्यन्त के घर जाना सहर्ष मंजूर कर लिया।

जंगल सा वीरान दुष्यन्त का ये घर बच्चों के आने से खुशियों से भर गया। दुष्यन्त ने सार घर अमीरदास को सौंपते हुए कहा-

‘भाई ये सब कुछ तुम्हारा है, अब जैसा चाहो इस घर को सजाओ-संवारों, ये जिम्मेदारी अब तुम्हारी है, सिर्फ तुम्हारी।’

दुष्यन्त ने घर आकर दूसरे ही दिन बच्चों को विद्यालय में भर्ती कर दिया। दुष्यन्त के जीवन में एकाएक तमाम परिवर्तन आने लगे। होटल में जाना बन्द हो गया था। शराब ही नहीं, बीड़ी-सिगरेट तक बन्द हो गई थी।

बच्चों की खुशी का ठिकाना न था, उन्हें तो जैसे नयी जिन्दगी मिल गयी थी। मजदूरी करती उनकी बीमार मां ने तो उनके जन्म के कुछ समय बाद ही दम तोड़ दिया था।

अमीरदास को लगा कि ईश्वर के रूप में उसे दुष्यन्त मिल तो गया, और किसी प्रकार की कोई कमी भी नहीं है उसके बच्चों को, किन्तु घर में काम-काज ही क्या हैं जो दिन भर उन्हीं में लगा रहूं, उसने पूरी तरह ठान लिया था कि वह दुष्यन्त को समझा-बुझाकर कहीं भी छोटी-मोटी नौकरी कर लिया करेगा।

अमीरदास की भावनाओं की कद्र करते हुए दुष्यन्त ने उसे अपने ही विभाग में सरकारी नौकरी पर लगा दिया था।

घर का सारा काम-काज निपटाकर अमीरदास नौकरी पर जाता और सांयकाल घर लौटकर सारा काम करता। इससे पहले वह जब-तब अपने मनुष्य योनी में जन्म लेने को कोसता रहता था, किन्तु अब वह पूरी तरह से संतुष्ट था। जीवन में किसी और खुशी की चाह अब उसे न थी।

दुष्यन्त को देखकर सारा शहर बड़ा आश्चर्य करता था। जो दुष्यन्त अपनी पत्नी को भी कोई सुख न दे सका, वही आज दूसरों के बच्चों को कंधों पर लिए घूमता-फिरता था। इन बच्चों में तो वह जैसे अपने आपको भी भूल गया था।

दुष्यन्त का यह बदला रूप वास्तव में देखने लायक हो गया था। उसके चेहरे का तनाव, उसका उग्र रूप, उसका कटु व्यवहार सब न जाने कहां लोप हो गये थे। सबको विस्मय था कि जीवन भर से पाले ढेर सारे दुर्व्यसनों को दुष्यन्त ने एक ही झटके में छोड़ डाला। लोग उससे स्नेह करने लगे थे। दुष्यन्त में आये इस परिवर्तन से लोग बहुत खुश थे।

आज दुष्यन्त के चारों ओर खुशियां बिखरी थी। सारी दुनिया जैसे उसे अपनी ही लगती थी और इस दुनिया के वे सभी लोग जो कभी उसे बहुत बुरे लगते थे, आज उसे अपने लगने लगे थे। आज उसे सिर्फ एक ही पीड़ा थी कि उसकी पत्नी नहीं हैं। पत्नी होती तो कितनी प्रसन्न होती, किन्तु उसके दुर्व्यसनों ने उससे उसकी पत्नी को छीन लिया। वह फिर मन को तसल्ली देता- ‘शायद ईश्वर सचमुच परीक्षा लेता है। वह दुर्व्यसनी न होता तो उसे बुरे दिन न देखने पड़ते, पत्नी को न खोना पड़ता, सारी दुनिया का बुरा न बनना पड़ता, किन्तु अब इस सबके प्रायश्चित के लिए ईश्वर ने शायद इन बच्चों को उसके पास भेजा है, यही सोचकर वह निश्छल मन से इन बच्चों की सेवा में जुट गया था।

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