मतिबाबू ने उत्तर दिया, “काँठालिया।”

ब्राह्मण बालक ने कहा, “मुझे रास्ते में नदीगाँव उतार देंगे क्या?”

बाबू ने स्वीकृति प्रकट करते हुए पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

ब्राह्मण बालक ने कहा, “मेरा नाम तारापद है।”

गौरवर्ण बालक देखने में बड़ा सुंदर था। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों और मुस्कराते हुए ओष्ठाधरों पर सुललित सौकुमार्य झलक रहा था। वस्त्र के नाम पर उसके पास एक मैली धोती थी। उघरी हुई देह में किसी प्रकार का बाहुल्य न था, मानो किसी शिल्पी ने बड़े यत्न से निर्दोष, सुडौल रूप में गढ़ा हो। मानो वह पूर्व-जन्म में तापस-बालक रहा हो और निर्मल तपस्या के प्रभाव से उसकी देह का बहुत-सा अतिरिक्त भाग क्षय होकर एक सम्मार्जित ब्राह्मण्य-श्री परिस्फुट हो उठी हो।

मतिलाल बाबू ने बड़े स्नेह से उससे कहा, “बेटा, स्नान कर आओ, भोजनादि यहीं होगा।”

तारापद बोला, “ठहरिए!” और वह तत्क्षण निस्संकोच भोजन के आयोजन में सहयोग देने लगा। मतिलाल बाबू का नौकर अबंगाली था, मछली आदि काटने में वह इतना निपुण नहीं था; तारापद ने उसका काम स्वयं लेकर थोड़े ही समय में अच्छी तरह से संपन्न कर दिया और दो-एक सब्ज़ी भी बड़ी कुशलता से तैयार कर दी। भोजन बनाने का कार्य समाप्त होने पर तारापद ने नदी में स्नान करके पोटली खोली और एक सफ़ेद वस्त्र धारण किया; काट की एक छोटी-सी कंघी लेकर सिर के बड़े-बड़े बाल माथे पर से हटाकर गर्दन पर डाल लिए और स्वच्छ जनेऊ का धागा छाती पर लटकाकर नौका में मतिबाबू के पास जा पहुँचा।

मतिबाबू उसे नौका के भीतर ले गए। वहाँ मतिबाबू की स्त्री और उनकी नौवर्षीया कन्या बैठी थीं। मतिबाबू की स्त्री अन्नपूर्णा इस सुंदर बालक को देखकर स्नेह से उच्छ्वसित हो उठीं, मन-ही-मन कह उठीं, ‘अहा! किसका बच्चा है। कहाँ से आया है‒इसकी माँ इसे छोड़कर किस प्रकार जीती होगी।’

यथासमय मतिबाबू और इस लड़के के लिए पास-पास दो आसन डाले गए।

लड़का ऐसा भोजन-प्रेमी न था, अन्नपूर्णा ने उसका अल्प आहार देखकर मन में सोचा कि घबरा रहा है; उससे यह-वह खाने को बहुत अनुरोध करने लगीं, किन्तु जब वह भोजन से निवृत्त हो गया, तो उसने कोई भी अनुरोध न माना। देखा गया, लड़का हर काम अपनी इच्छा के अनुसार करता, लेकिन ऐसे सहज भाव से करता कि उसमें किसी भी प्रकार की ज़िद या हठ का आभास न मिलता। उसके व्यवहार में लज्जा के लक्षण लेश-मात्र भी नहीं दिखाई पड़े।

सबके भोजनादि के बाद अन्नपूर्णा उसको पास बैठाकर प्रश्नों द्वारा उसका इतिहास जानने में प्रवृत्त हुई। कुछ भी विस्तृत विवरण संग्रह न हो सका। बस इतनी-सी बात जानी जा सकी कि लड़का सात-आठ बरस की उम्र में ही स्वेच्छा से घर छोड़कर भाग आया है।

अन्नपूर्णा ने प्रश्न किया, “तुम्हारी माँ नहीं हैं?”

तारापद ने कहा, “है।”

अन्नपूर्णा ने पूछा, “वे तुम्हें प्यार नहीं करतीं?”

इसे अत्यंत विचित्र प्रश्न समझकर हँसते हुए तारापद ने कहा, “प्यार क्यों नहीं करेंगी?”

अन्नपूर्णा ने प्रश्न किया, “तो फिर तुम उन्हें छोड़ क्यों आए?”

तारापद बोला, “उनके और भी चार लड़के और तीन लड़कियाँ हैं।”

बालक के इस विचित्र उत्तर से व्यथित होकर अन्नपूर्णा ने कहा, “मैया री मैया, यह कैसी बात है। पाँच अँगुलियाँ हैं, तो क्या एक अँगुली त्यागी जा सकती है?”

तारापद की उम्र कम थी, उसका इतिहास भी उसी मात्रा में संक्षिप्त था; किन्तु लड़का बिलकुल असाधारण था। वह अपने माता-पिता का चौथा पुत्र था, शैशव में ही पितृहीन हो गया था। बहु संतान वाले घर में भी तारापद सबको अत्यंत प्यारा था। माँ, भाई, बहन और मुहल्ले के सभी लोगों से वह अजस्र स्नेह-लाभ करता। यहाँ तक कि गुरुजी भी उसे न मारते थे‒मारते तो भी बालक के अपने-पराये सभी उससे वेदना का अनुभव करते। ऐसी अवस्था में उसके घर छोड़ने का कोई कारण न था। जो उपेक्षित रोगी लड़का हमेशा चोरी करके पेड़ों से फल और गृहस्थों से उसका चौगुना प्रतिफल पाता घूमता फिरता, वह भी अपनी परिचित ग्राम-सीमा के भीतर अपनी कष्ट देनेवाली मां के ही पास पड़ा रहा; और समस्त ग्राम का दुलारा यह लड़का एक विदेशी यात्रा-दल1 में शामिल होकर निर्ममता से ग्राम छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

लोग उसका पता लगाकर उसे गाँव लौटा लाए। उसकी माँ ने उसे छाती से लगाकर आँसुओं से आर्द्र कर दिया, उसकी बहनें रोने लगीं, उसके बड़े भाई ने पुरुष-अभिभावक का कठिन कर्तव्य पालन करने के उद्देश्य से उस पर मृदु भाव से शासन करने का यत्न करके अंत में अनुतप्त चित्त से ख़ूब प्यार किया और नाना प्रलोभनों से उसे वश में करने की चेष्टा की। किन्तु बंधन, यही नहीं स्नेह का बंधन भी उसे सहन न हुआ, उसके जन्म-नक्षत्र ने उसे गृहहीन कर रखा था। वह जब भी देखता कि नदी में कोई विदेशी नौका अपनी रस्सी घिसटाती जा रही है, गाँव के विशाल पीपल वृक्ष के तले दूर देश के किसी संन्यासी ने आश्रय लिया है, अथवा बनजारे नदी के किनारे ढालू मैदान में छोटी-छोटी चटाइयाँ बाँधकर खपच्चियाँ छीलकर टोकरियाँ बनाने में लगे हैं, तब बाह्य पृथ्वी की स्नेहहीन अज्ञात स्वाधीनता के लिए उसका मन बेचैन हो उठता। लगातार दो-तीन बार भागने के बाद उसके कुटुंबियों और गाँव के लोगों ने उसकी आशा छोड़ दी।

पहले उसे एक यात्रा-दल का साथ पकड़ा। सब अधिकारी उससे पुत्र के समान स्नेह करने लगे और वह दल के छोटे-बड़े सभी का प्रिय पात्र हो गया। यही नहीं जिस घर में यात्रा होती उस घर के मालिक, विशेषकर घर का महिला-वर्ग जब विशेष रूप से उसे बुलाकर उसका आदर-मान करने लगा, तब एक दिन किसी से बिना कुछ कहे वह भटककर कहाँ चला गया, इसका फिर कोई पता न चल सका।

तारापद हरिण-शिशु के समान बंधनभीरु था, और हरिण के ही समान संगीत-प्रेमी भी। यात्रा के संगीत ने ही उसे पहले घर से विरक्त किया था। संगीत का स्वर उसकी समस्त धमनियों में कंपन पैदा कर देता और संगीत की ताल पर उसके सर्वांग में आंदोलन उपस्थित हो जाता। जब वह बिलकुल बच्चा था, तब भी वह संगीत-सभाओं में जिस प्रकार संयत गंभीर प्रौढ़ भाव से आत्म-विस्मृत होकर बैठा-बैठा झूमने लगता; उसे देखकर प्रवीण लोगों के लिए हँसी संवरण करना कठिन हो जाता। केवल संगीत ही क्यों, वृक्षों के घने पत्तों पर जब श्रवण की वृष्टि-धारा पड़ती, आकाश में मेघ गर्जते, पवन अरण्य में मातृहीन दैत्यशिशु की भाँति क्रंदन करता रहता, तब उसका चित्त मानो उच्छृंखल हो उठता।

निस्तब्ध दोपहरी में आकाश में बड़ी दूर से आती चील की पुकार, वर्षाऋतु की संध्या में मेढकों का कलरव, गहन रात में सियारों की चीत्कार-ध्वनि सभी उसको आकृष्ट करते। संगीत के इस मोह से आकृष्ट होकर वह शीघ्र ही एक पाँचाली दल2 में भर्ती हो गया। मंडली का अध्यक्ष उसे बड़े यत्न से गाना सिखाने और पाँचाली कंठस्थ कराने में प्रवृत्त हुआ; और उसे वक्ष-पिंजर के पक्षी की भाँति प्रिय समझकर स्नेह करने लगा। पक्षी ने थोड़ा-बहुत गाना सीखा और एक दिन तड़के उड़कर चला गया।

अंतिम बार वह जिमनास्टिक करनेवालों के दल में शामिल हुआ। जेठ के अंतिम दिनों से लेकर आषाढ़ के समाप्त होने तक का अंचल में जगह-जगह क्रमानुसार समवेत रूप से अनुष्ठित मेले लगते। उनके उपलक्ष्य में यात्रावालों के दो-तीन दल, पाँचली-गायक, कवि, नर्तकियाँ एवं अनेक प्रकार की दुकानें, छोटी-छोटी नदियों, उपनदियों के रास्ते नौकाओं द्वारा एक मेले के समाप्त होने पर दूसरे मेले में घूमती रहतीं। पिछले वर्ष से कलकत्ता की एक छोटी जिमनास्टिक-मंडली इस पर्यटनशील मेले के मनोरंजन में योग दे रही थी। तारापद ने पहले तो नौकारूढ़ दुकानदारों के साथ मिलकर मेले में पान की गिलौरियाँ बेचने का भार लिया। बाद में अपने स्वाभाविक कौतूहल के कारण इस जिमनास्टिक-दल के अद्भुत व्यायाम-नैपुण्य से आकृष्ट होकर उनमें प्रवेश किया। तारापद ने अपने-आप अभ्यास करके अच्छी तरह वंशी बजाना सीख लिया था‒जिमनास्टिक के समय वह द्रुत ताल पर लखनऊ की ठुमरी के सुर में वंशी बजाता‒यही उसका एकमात्र काम था।

उसका आख़िरी पलायन इसी दल से हुआ था। उसने सुना था कि नंदीग्राम के ज़मींदार बाबू बड़ी धूमधाम से एक शौकिया यात्रा-दल बना रहे हैं‒अतः वह अपनी छोटी-सी पोटली लेकर नंदीग्राम की यात्रा की तैयारी कर रहा था, इसी समय उसकी भेंट मतिबाबू से हो गई।

एक के बाद एक नाना दलों में शामिल होकर भी तारापद ने अपनी स्वाभाविक कल्पना-प्रवीण प्रकृति के कारण किसी भी दल की विशेषता प्राप्त नहीं की थी। वह अंतःकरण से बिलकुल निर्लिप्त और मुक्त था। संसार में उसने सर्वदा अनेक कुत्सित बातें सुनीं और अनेक अशोभन दृश्य देखे, किन्तुु उन्हें उसके मन में संचित होने का रत्ती-भर अवकाश न मिला। उस लड़के का ध्यान किसी ओर था ही नहीं। अन्यान्य बंधनों की भाँति किसी प्रकार का अभ्यास-बंधन भी उसके मन को बाध्य न कर सका। वह उस संसार में पंकिल जल के ऊपर शुभ्रपक्ष राजहंस की भाँति तैरता फिरता। कौतूहलवश वह जितनी भी बार डुबकी लगाता, उसके पंख न तो भीग पाते थे, न मलिन हो पाते थे। इसी कारण इस गृह-त्यागी लड़के के मुख पर एक शुभ्र स्वाभाविक तारुण्य अम्लान भाव से झलकता रहा, उसकी यही मुखश्री देखकर प्रवीण दुनियादार मतिलाल बाबू ने बिना कुछ पूछे, बिना संदेह किए बड़े प्यार से उसका आह्वान किया था।

भोजन समाप्त होने पर नौका चल पड़ी। अन्नपूर्णा बड़े स्नेह से ब्राह्मण-बालक से उसके घर की बातें, उसके स्वजन-कुटुंबियों का समाचार पूछने लगी, तारापद ने अत्यंत संक्षेप में उनका उत्तर देकर बाहर आकर परित्राण पाया। बाहर परिपूर्णता की अंतिम सीमा तक भरकर वर्षा की नदी ने अपने आत्म-विमृत उद्दाम चांचल्य से कृति-माता को मानो उद्विग्न कर दिया था। मेघ-मुक्त धूप में नदी-किनारे की अर्धनिमग्न काशतृश्रेणी एवं उसके ऊपर के सरस सघन ईख के खेत और उससे भी परवर्ती प्रदेश में दूरदिगंगत चुंबित नीलांजनवर्ण वन-रेखा सभी कुछ मानो किसी काल्पनिक कथा की सोने की छड़ी3 के स्पर्श से सद्य जाग्रत नवीन सौन्दर्य की भाँति नीरव नीलाकाश की मुग्धदृष्टि के सम्मुख परिस्फुट हो उठा हो, सभी-कुछ मानो सजीव, स्पंदित, प्रगल्भ, प्रकाश में उद्भासित नवीनता से मसृण और प्राचुर्य से परिपूर्ण हो।

तारापद ने नौका की छत पर पाल की छाया में जाकर आश्रय लिया। ढालू हरा मैदान, पानी से भरे पाट के खेत, गहन श्याम लहराते हुए आमन4 धान, घाट से गाँव की ओर जानेवाले सँकरे रास्ते, सघन वन-वेष्टित छायामय गाँव‒एक के बाद एक उसकी आँखों के सामने से निकलने लगे। जल, स्थल, आकाश, चारों ओर की यह गतिशीलता, सजीवता, मुखरता, आकाश-पृथ्वी की यह व्यापकता और वैचित्र्य एवं निर्लिप्त सुदूरता, यह अत्यंत विस्तृत, चिरस्थायी, निर्निमेष, नीरव, वाक्य-विहीन विश्व तरुण बालक के परमात्मीय थे, पर फिर भी वह इस चंचल मानव को क्षण-भर के लिए भी स्नेह-बाहुओं में बाँध रखने की कोशिश नही करता था। नदी के किनारे बछड़े पूँछ उठाए दौड़ रहे थे, गाँव के टट्टू रस्सी से बँधे अपने अगले पैरों के बल कूदते घास चरते फिर रहे थे, मछरंग पक्षी मछुओं के जाल बाँधने के बाँस के डण्डे से बड़े वेग से पानी में झप कूदकर मछली पकड़ रहा था, लड़के पानी में खेल रहे थे, लड़कियाँ उच्च स्वर से हँसकर हुई बातें करती हुई छाती तक गहरे पानी में अपना वस्त्रांचल फैलाकर दोनों हाथों से उसे धो रही थीं, आँचल कमर में खोंसे महरने डालिया लेकर मछुओं से मछली ख़रीद रही थीं, इस सबको वह चिरनूतन अश्रांत कौतूहल से बैठा देखता था, उसकी दृष्टि की पिपासा किसी भी तरह निवृत्त नहीं होती थी।

नौका की छत पर जाकर तारापद ने धीरे-धीरे खिवैया-माँझियों से बातचीत छेड़ दी। बीच-बीच में आवश्यकतानुसार वह मल्लाहों के हाथ से लग्गी लेकर ख़ुद ही ठेलने लग जाता; माँझियों को जब हुक़्क़ा पीने की ज़रूरत पड़ती, तब वह स्वयं जाकर हाल सँभाल लेता, जब जिधर हाल मोड़ना आवश्यक होता वह दक्षतापूर्वक संपन्न कर देता।

संध्या होने से कुछ पूर्व अन्नपूर्णा ने तारापद को बुलाकर पूछा, “रात में तुम क्या खाते हो?”

तारापद बोला, ” जो मिल जाता है, वही खा लेता हूँ; रोज खाता भी नहीं।”

इस सुंदर ब्राह्मण-बालक की आतिथ्य ग्रहण करने की उदासीनता अन्नपूर्णा को थोड़ी कष्टकर प्रतीत हुई। उनकी बड़ी इच्छा थी कि खिला-पिलाकर, पहना-ओढ़ाकर इस गृहच्युत यात्री बालक को संतुष्ट करें। किन्तु वह किससे संतुष्ट होगा, यह वे न जान सकीं। नौकरों को बुलाकर गाँव से दूध-मिठाई आदि ख़रीद मँगाने में अन्नपूर्णा ने धूमधाम मचा दी। तारापद ने पेट-भर भोजन तो किया, किन्तु दूध नहीं पिया। मौन स्वभाव मतिलाल बाबू तक ने उससे दूध पीने का अनुरोध किया; उसने संक्षेप में कहा, “मुझे अच्छा नहीं लगता।”

नदी पर दो-तीन दिन बीत गए। तारापद ने भोजन बनाने, सौदा ख़रीदने से लेकर नौका चलाने तक सब कामों में स्वेच्छा और तत्परता से योगदान दिया। जो भी दृश्य उसकी आँखों के सामने आता, उसी ओर तारापद की कौतूहलपूर्ण दृष्टि दौड़ जाती; जो भी काम उसके हाथ, उसका मन सर्वदा ही गतिशील बने रहते, इसी कारण वह इस नित्य चलायमान प्रकृति की भाँति सर्वदा निश्चिन्त उदासीन रहता; किन्तु सर्वदा क्रियासक्त भी। यों तो हर मनुष्य की अपनी एक स्वतंत्र अधिष्ठान भूमि होती है, किन्तु तारापद इस अनंत नीलांबरवाही शिव-प्रवाह की एक आनंदोज्जवल तरंग था‒भूतभविष्यत् के साथ उसका कोई संबंध न था, आगे बढ़ते जाना ही उसका एकमात्र काम था।

इधर बहुत दिनों तक नाना संप्रदायों के साथ योग देने के कारण अनेक प्रकार की मनोरंजनी विद्याओं पर उनका अधिकार हो गया था। किसी भी प्रकार की चिन्ता से आच्छन्न न रहने के कारण उसके निर्मल स्मृति-तट पर सारी बातें अद्भुत सहज ढंग से अंकित हो जातीं। पाँचाली कथकता, कीर्तन-गान, यात्रा, अभिनय के लंबे अवतरण उसे कंठस्थ थे। मतिलाल बाबू अपनी नित्य-प्रति की प्रथा के अनुसार एक दिन संध्या समय अपनी पत्नी और कन्या को रामायण पढ़कर सुना रहे थे, लव-कुश की कथा की भूमिका चल रही थी, तभी तारापद अपना उत्साह संवरण न कर पाने के कारण नौका की छत से उतर आया और बोला, “किताब रहने दें। मैं लव-कुश का गीत गाता हूँ, आप सुनते चलिए!”

यह कहकर उसने लव कुश की पाँचाली शुरू कर दी। बाँसुरी के से सुमिष्ट उन्मुक्त स्वर में वह बड़ी तेज़ गति से दासुराय के अनुप्रासों की वर्षा करने लगा; डाँडी, मछुए सभी दरवाज़े पर आकर झुके पड़ रहे थे। उस नदी-नीर के संध्या-काश में हास्य, करुणा एवं संगीत का एक अपूर्व रस-स्रोत प्रवाहित होने लगा। दोनों निस्तब्ध किनारे कौतूहलपूर्ण हो उठे, पास से जो नौकाएँ गुज़र रही थीं, उनमें बैठे लोग क्षण-भर के लिए उत्कंठित होकर उसी ओर कान लगाए रहें। जब गीत समाप्त हो गया तो सभी ने व्यथित चित्त से लंबी साँस लेकर सोचा इतनी जल्दी क्यों समाप्त हो गया।

सजलनयना अन्नपूर्णा की इच्छा हुई कि उस लड़के को गोद में बैठाकर छाती से लगाकर उसका माथा चूम लें। मतिलाल बाबू सोचने लगे, इस लड़के को यदि किसी प्रकार अपने पास रख सकूँ तो पुत्र के अभाव पूरा हो जाए। केवल छोटी बालिका चारुशशी का अंतःकरण ईर्ष्या और विद्वेष से परिपूर्ण हो उठा।

चारुशशी अपने माता-पिता की इकलौती संतान और उनके स्नेह की एकमात्र अधिकारिणी थी। उसकी धुन और हठ की कोई सीमा न थी। खाने, पहनने, बाल बनाने के संबंध में उसका अपना स्वतंत्र मत था, किन्तु उस मन में तनिक भी स्थिरता नहीं थी। जिस दिन कहीं निमंत्रण होता, उस दिन उसकी माँ को भय रहता कि कहीं लड़की साज-सिंगार को लेकर कोई असंभव ज़िद न कर बैठे। यदि दैवात् कभी केश-बंधन उसके मन के अनुकूल न हुआ, तो फिर उस दिन चाहे जितनी बार बाल खोलकर चाहे जितने प्रकार से बाँधे जाते, वह किसी तरह संतुष्ट न होती; और अंत में रोना-धोना मच जाता। हर बात में यही दशा थी, पर कभी-कभी जब उसका चित्त प्रसन्न रहता तो उसे किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति न होती। उस समय वह प्रचुर मात्रा में स्नेह प्रकट करके अपनी माँ से लिपटकर चूमकर हँसती हुई बात करते-करते उसे एकदम परेशान कर डालती। यह छोटी बालिका एक दुर्भेद्य पहेली थी।

यह बालिका अपने दुर्भेद्य हृदय के पूरे वेग का प्रयोग करके मन-ही-मन विषम ईर्ष्या से तारापद का निरादर करने लगी। माता-पिता को भी उसने पूरी तरह से उद्विग्न कर डाला। भोजन के समय रोदनोन्मुखी होकर भोजन के पात्र को ठेलकर फेंक देती, खाना उसको रुचिकर न लगता, नौकरानी को मारती, सभी बातों में अकारण शिकायत करती रहती। जैसे-जैसे तारापद की विद्याएँ उसका एवं अन्य सबका मनोरंजन करने लगीं, वैसे-ही-वैसे मानो उसका क्रोध बढ़ने लगा। तारापद में कोई गुण है, इसे उसका मन स्वीकार करने से विमुख रहता और उसका प्रमाण जब प्रबल होने लगता तो उसके असंतोष की मात्रा भी बढ़ गई। तारापद ने जिस दिन लव-कुश का गीत सुनाया, उस दिन अन्नपूर्णा ने सोचा, ‘संगीत से वन के पशु तक वश में आते हैं, आज शायद मेरी लड़की का मन पिघल गया है; उससे पूछा, “चारु, कैसा लगा?” उसने कोई उत्तर दिए बिना बड़े ज़ोर से सिर हिला दिया। भाषा में इस मुद्रा का तर्जुमा करने पर यह रूप होता; ज़रा भी अच्छा नहीं लगा और न कभी अच्छा लगेगा।

चारु के मन में ईर्ष्या का उदय हुआ है, यह समझकर उसकी माँ ने चारु के सामने तारापद के प्रति स्नेह प्रकट करना कम कर दिया। संध्या के बाद जब चारु जल्दी-जल्दी खाकर सो जाती, तब अन्नपूर्णा नौका-कक्ष के दरवाज़े के पास आकर बैठतीं और मतिबाबू और तारापद बाहर बैठते और अन्नपूर्णा के अनुरोध से तारापद गाना शुरू करता। उसके गाने से जब नदी के किनारे की विश्राम-निरता ग्राम-श्री संध्या के विपुल अंधकार में मुग्ध निस्तब्ध हो जाती और अन्नपूर्णा का कोमल हृदय स्नेह और सौन्दर्य-रस से उछलने लग जाता, तब सहसा चारु बिस्तर से उठकर तेज़ी से आकर सरोष रोती हुई कहती, “माँ, तुमने यह क्या शोर मचा रखा है। मुझे नींद नहीं आती।” माता-पिता उसको अकेला सुलाकर तारापद को घेरकर संगीत का आनंद ले रहे हैं, यह उसे एकदम असह्य हो उठता। इस दीप्तकृष्णनयना बालिका की स्वाभाविक उग्रता तारापद को बड़ी मनोरंजक प्रतीत होती। उसने इसे कहानी सुनाकर, गाना गाकर, बंशी बजाकर वश में करने की बहुत चेष्टा की, किन्तु किसी भी प्रकार सफल न हुआ। केवल जब मध्याह्न में तारापद नदी में स्नान करने उतरता, परपिूर्ण जलराशि में अपनी गौरवर्ण सरल कमनीय देह को तैरने की अनेक प्रकार की क्रीड़ाओं में संचालित करता तरुण जल-देवता के समान शोभा पाता, तब बालिका का कौतूहल आकर्षित हुए बिना न रहता। वह इसी समय की प्रतीक्षा करती रहती, किन्तु आंतरिक इच्छा का किसी को भी पता न चलने देती; और यह अशिक्षापटु अभिनेत्री ध्यानपूर्वक ऊनी गुलूबंद बुनने का अभ्यास करती हुई बीच-बीच में मानो अत्यंत उपेक्षाभरी दृष्टि से तारापद की संतरणलीला देखा करती।

नंदीग्राम कब छूट गया, तारापद को पता ही न चला। विशाल नौका अत्यंत मृदुमंद गति से कभी पाल तानकर, कभी रस्सी खींचकर अनेक नदियों की शाखा-प्रशाखाओं में होकर चलने लगी; नौकारोहियों के दिन भी इन सब नदी-उपनदियों के समान, शांति-सौन्दर्यपूर्ण वैचित्र्य के बीच सहज सौम्य गति से मृदुमिष्ट कलस्वर में प्रवाहित होने लगे। किसी को किसी प्रकार की जल्दी न थी; दोपहर को स्नानागार में बहुत समय व्यतीत होता; और इधर संध्या होते-न-होते बड़े दिखनेवाले किसी गाँव के किनारे घट के समीप, झिल्ली मंद्रित खद्योतखचित वन के पास नौका बाँध दी जाती।

इस प्रकार दसेक दिन में नौका काँठालिया पहुँची। ज़मींदार के आगमन पर घर से पालकी और टट्टुओं का समागम हुआ; और हाथ में बाँस की लाठी धारण किए सिपाही-चौकीदारों के दल ने बार-बार बंदूक़ की ख़ाली आवाज़ से गाँव के उत्कंठित काक-समाज को ‘यत्परोनास्ति’ मुखर कर दिया।

इस सारे समारोह में समय लगा। इस बीच में तारापद ने तेज़ी से नौका से उतरकर एक बार सारे गाँव का चक्कर लगा डाला। किसी को दादा, किसी को काका, किसी को दीदी, किसी को मौसी कहकर दो-तीन घंटे में सारे गाँव के साथ सौहार्द बंधन स्थापित कर लिया। कहीं भी उसके लिए स्वभावतः कोई बंधन नहीं था, इससे यह बालक ग़ज़ब की शीघ्रता और आसानी से सबके साथ परिचय कर लेता था। तारापद ने देखते-देखते थोड़े ही दिनों में गाँव के समस्त हृदयों पर अधिकार कर लिया।

इतनी आसानी से हृदय हरण करने का कारण यह था कि तारापद हरेक के साथ उसका अपना बनकर स्वाभाविक रूप से योग दे सकता था। वह किसी भी प्रकार के विशेष संस्कारों द्वारा बँधा न था, अतएव सभी अवस्थाओं और सभी कामों में उसमें एक प्रकार की सहज प्रवीणता थी। बालकों के लिए वह बिलकुल स्वाभाविक बालक था और उनसे श्रेष्ठ और स्वतंत्र, वृद्धों के लिए वह बालक तो न रहता, किन्तु पुरखा भी नहीं; चरवाहों के साथ वह चरवाहा था फिर भी ब्राह्मण। हरेक के हर काम में वह चिरकाल के सहयोगी के समान अभ्यस्त भाव से हस्तक्षेप करता। हलवाई की दुकान पर बातें करते-करते हलवाई कह उठता, “भैया जी, ज़रा बैठो तो भाई, मैं अभी आता हूँ”‒तारापद अम्लानवदन से दुकान पर बैठकर साल के पत्ते से संदेश पर बैठी मक्खियाँ उड़ाने लग जाता। मिठाइयाँ बनाने में भी वह पक्का था, करघे का मर्म भी उसे थोड़ा-बहुत मालूम था, कुम्हार का चाक चलाना भी उसके लिए बिलकुल नया न था।

तारापद ने सारे गाँव को वश में कर लिया, केवल ग्रामवासिनी एक बालिका की ईर्ष्या वह अभी तक नहीं जीत पाया था। यह बालिका उग्र भाव से उसके बहुत दूर निर्वासन की कामना करती थी, यही जानकर शायद तारापद इस गाँव में इतने दिन आबद्ध बना रहा।

किन्तु बालिकावस्था में भी नारी के अंतर-रहस्य का भेद जानना बहुत कठिन है, चारुशशी ने इसका प्रमाण दिया।

ब्राह्मण पुरोहिताइन की कन्या सोनामणि पाँच वर्ष की अवस्था में विधवा हो गई थी; वह चारु की समवयस्का सहेली थी। अस्वस्थ होने के कारण वह घर पर ही थी, जिसके कारण सहेली से कुछ दिनों तक भेंट न कर सकी। स्वस्थ होकर जिस दिन भेंट करने आई, उस दिन प्रायः अकारण ही दोनों सहेलियों में कुछ मनोमालिन्य की नौबत आ गई।

चारु ने अत्यंत विस्तार से बात आरंभ की थी। उसने सोचा था कि तारापद नामक अपने नवर्जित परम रत्न को जुटाने की बात का विस्तारपूर्वक वर्णन करके वह अपनी सहेली के कौतूहल एवं विस्मय को आकाश पर चढ़ा देगी। किन्तु, जब उसने सुना कि तारापद सोनामणि के लिए तनिक भी अपरिचित नहीं था, पुरोहिताइन को वह मौसी कहता है और सोनामणि उसको भैया कहकर पुकारती है, जब उसने सुना कि तारापद ने केवल बाँसुरी पर कीर्तन का सुर बजाकर माता और पुत्री का मनोरंजन ही नहीं किया है, सोनामणि के अनुरोध से उसके लिए अपने हाथों बाँस की एक बाँसुरी भी बना दी है, न जाने कितने दिनों से वह उसे ऊँची डाल से फल और कंटक-शाखा से फूल तोड़कर देता रहा है, तब चारु के अंतःकरण को मानो तप्तशूल बेधने लगा। चारु समझती थी कि तारापद विशेष रूप से उन्हीं का तारापद था‒अत्यंत गुप्त रूप से संरक्षणीय; अन्य साधारण जन केवल उसका थोड़ा-बहुत आभास-मात्र पाएँगे, फिर भी किसी भी तरह उसका सामीप्य न पा सकेंगे, दूर से ही उसके रूप-गुण पर मुग्ध होंगे और चारुशशी को धन्यवाद देते रहेंगे। यही अद्भुत, दुर्लभ, दैवलब्ध ब्राह्मण बालक सोनामणि के लिए सहजगम्य क्यों हुआ? हम यदि इसे इतना यत्न करके न लाते, इतने यत्न से न रखते तो सोनामणि आदि इसका दर्शन कहाँ से पातीं। सोनामणि का ‘भैया’ शब्द सुनते ही उसके सारे शरीर में आग लग गई।

चारु जिस तारापद को मन-ही-मन विद्वेष-वाणों से जर्जर करने की चेष्टा करती रही है, उसी के एकाधिकार को लेकर इतना प्रबल उद्वेग क्यों? किस सामर्थ्य है, जो यह समझे!

उसी दिन किसी अन्य तुच्छ बात के सहारे सोनामणि के साथ चारु की गहरी कुट्टी हो गई और वह तारापद के कमरे में जाकर उसकी प्रिय वंशी लेकर उस पर कूद-कूदकर उसे कुचलती हुई निर्दयतापूर्वक तोड़ने लगी।

चारु जब प्रचंड रोष में इस वंशी-ध्वंस-कार्य में व्यस्त थी, तभी तारापद ने कमरे में प्रवेश किया। बालिका की यह प्रलय-मूर्ति देखकर उसे आश्चर्य हुआ। बोला, “चारु, मेरी वंशी क्यों तोड़ रही हो?” चारु रक्त नेत्रों और लाल मुख से “ठीक कर रही हूँ, अच्छा कर रही हूँ।” कहकर टूटी हुई वंशी को और दो-चार अनावश्यक लातें मारकर उच्छ्वसित कंठ से रोती हुई कमरे के बाहर चली गई। तारापद ने वंशी उठाकर उलट-पुलटकर देखी, उसमें अब कोई दम न था। अकारण ही अपनी पुरानी वंशी की यह आकस्मिक दुर्गति देखकर वह अपनी हँसी न रोक सका। चारुशशी दिनोंदिन उसके परम कौतूहल का विषय बनती जा रही थीं।

उसके कौतूहल का एक और क्षेत्र था, मतिलाल बाबू की लाइब्रेरी में अंग्रेज़ी की तस्वीरों वाली किताबें। बाहरी जगत् से उसका यथेष्ट परिचय हो गया था, किन्तु तस्वीरों के इस जगत् में वह किसी प्रकार भी अच्छी तरह प्रवेश नहीं कर पाता था। कल्पना द्वारा वह अपने मन में बहुत-कुछ जमा लेता, किन्तु उससे उसका मन किसी प्रकार तृप्त न होता।

तस्वीरों की पुस्तकों के प्रति तारापद का यह आग्रह देखकर एक दिन मतिलाल बाबू बोले, “अंग्रेज़ी सीखोगे? तब तुम इन सारी तस्वीरों का अर्थ समझ लोगे!” तारापद ने तुरंत कहा, “सीखूँगा।”

मतिबाबू ने ख़ूब ख़ुश होकर गाँव के एंट्रेंस स्कूल के हेडमास्टर रामरतन बाबू को प्रतिदिन संध्या समय इस लड़के को अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए नियुक्त कर दिया।

तारापद अपनी प्रखर स्मरण-शक्ति एवं अखंड मनोयोग के साथ अंग्रेज़ी अध्ययन में प्रवृत्त हुआ, मानो वह किसी नवीन दुर्गम राज्य में भ्रमण करने निकला हो। उसने पुराने जगत् के साथ कोई संपर्क न रखा; मुहल्ले के लोग अब उसे न देख पाते; जब वह संध्या के पहले निर्जन नदी-तट पर तेज़ी से टहलते-टहलते पाठ कंठस्थ करता, तब उसका उपासक बालक-संप्रदाय दूर से खिन्न चित्त होकर संभ्रमपूर्वक उसका निरीक्षण करता, उसके पाठ में बाधा डालने का साहस न कर पाता।

चारु भी आजकल उसे बहुत नहीं देख पाती थी। पहले तारापद अंतःपुर में जाकर अन्नपूर्णा की स्नेह-दृष्टि के सामने बैठकर भोजन करता था‒किन्तु इसके कारण कभी-कभी देर हो जाती थी। इसलिए उसने मतिबाबू से अनुरोध करके अपने भोजन की व्यवस्था बाहर ही करा ली। अन्नपूर्णा ने व्यथित होकर इस पर आपत्ति प्रकट की, किन्तु अध्ययन के प्रति बालक का उत्साह देखकर अत्यंत संतुष्ट होकर मतिबाबू ने इस नई व्यवस्था का अनुमोदन किया।

तभी सहसा चारु भी ज़िद कर बैठी, मैं भी अंग्रेज़ी सीखूँगी। उसके माता-पिता ने अपनी कन्या के इस प्रस्ताव को पहले तो परिहास का विषय समझकर स्नेहमिश्रित हँसी उड़ाई‒किन्तु कन्या ने तुरंत इस प्रस्ताव के परिहास्य अंश को प्रचुर अश्रु-जलधारा से पूर्ण रूप से धो डाला। अंत में इन स्नेह-दुर्बल निरुपाय अभिभावकों ने बालिका के प्रस्ताव को गंभीरता से स्वीकार कर लिया। तारापद के साथ-साथ चारु भी मास्टर से पढ़ने लग गई।

किन्तु पढ़ना-लिखना इस अस्थिरचित्त बालिका के स्वभाव के विपरीत था। वह स्वयं तो कुछ न सीख पाई, बस तारापद की पढ़ाई में विघ्न डालने लगी। वह पिछड़ जाती, पाठ कंठस्थ न करती। किन्तु फिर भी वह किसी भी प्रकार तारापद से पीछे न रहना चाहती। तारापद के उससे आगे निकलकर नया पाठ लेने पर वह बहुत रुष्ट होती, यहाँ तक कि रोने-धोने से भी बाज न आती। तारापद के पुरानी पुस्तक समाप्त कर नई पुस्तक ख़रीदने पर उसके लिए भी नई पुस्तक ख़रीदनी पड़ती। तारापद छुट्टी के समय स्वयं कमरे में बैठकर लिखता और पाठ कंठस्थ करता, यह उस ईर्ष्या-परायणा बालिका से सहन न होता। वह छिपकर उसके लिखने की कॉपी पर स्याही उँडेल देती, क़लम चुराकर रख लेती, यहाँ तक कि किताब में जिसका अभ्यास करना होता, उस अंश को फाड़ आती। तारापद बालिका की यह सारी धृष्टता आमोदपूर्वक सहता; असह्य होने पर मारता, किन्तु किसी भी प्रकार उसका नियंत्रण न कर सका।

दैवात् एक उपाय निकल आया। एक दिन बहुत खीझकर निरुपाय तारापद स्याही से रँगी अपनी लिखने की कॉपी फाड़ फेंककर गंभीर खिन्न मुद्रा में बैठा था; दरवाज़े के पास आकर चारु ने सोचा कि आज मार पड़ेगी। किन्तु उसकी प्रत्याशा पूर्ण नहीं हुई। तारापद बिना कुछ कहे चुपचाप बैठा रहा। बालिका कमरे के भीतर-बाहर चक्कर काटने लगी। बारंबार उसके इतने समीप से निकलती कि तारापद चाहता तो अनायास ही उसकी पीठ पर एक थप्पड़ जमा सकता था, किन्तु वह ऐसा न कर गंभीर ही बना रहा। बालिका बड़ी मुश्किल में पड़ गई। किस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करनी होती है, इस विद्या का उसने कभी अभ्यास न किया था, अतएव उसका अनुतप्त क्षुद्र हृदय अपने सहपाठी से क्षमा-याचना करने के लिए अत्यंत कातर हो उठा। अंत में कोई उपाय न देखकर फटी हुई लेख-पुस्तिका का टुकड़ा लेकर तारापद के पास बैठकर ख़ूब बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा, “मैं फिर कभी किताब पर स्याही नहीं फैलाऊँगी।” लिखना समाप्त कर वह उस लेख की ओर तारापद का ध्यान आकर्षित करने के लिए अनेक प्रकार की चंचलता प्रदर्शित करने लगी। यह देखकर तारापद हँसी न रोक सका‒वह हँस पड़ा। इस पर बालिका लज्जा और क्रोध से अधीर होकर कमरे से भाग गई। जिस काग़ज़ पर उसने अपने हाथ से दीनता प्रकट की थी, उसको अनंत काल के लिए और अनंत जगत् से बिलकुल लोप कर पाती तो उसके हृदय का गहरा क्षोभ मिट सकता।

उधर संकुचित-चित्त सोनामणि एक-दो दिन अध्ययनशाला के बाहर घूम-फिरकर झाँककर चली गई। सहेली चारुशशी के साथ और सब बातों में उसका विशेष बंधुत्व था, किन्तु तारापद के संबंध में चारु को वह अत्यंत भय और संदेह से देखती। चारु जिस समय अंतःपुर में होती, उसी समय का पता लगाकर सोनामणि संकोच करती हुई तारापद के द्वार के पास आ खड़ी होती। तारापद किताब से मुँह उठाकर सस्नेह कहता, “क्यों सोना! क्या समाचार है? मौसी कैसी है?”

सोनामणि कहती, “बहुत दिन से आए नहीं, माँ ने तुमको एक बार चलने के लिए कहा है। कमर में पीड़ा होने के कारण वे तुम्हें देखने नहीं आ सकतीं।”

शायद इसी बीच सहसा चारु आ उपस्थित होती। सोनामणि घबरा जाती, वह मानो छिपकर अपनी सहेली की संपत्ति चुराने आई हो। चारु आवाज़ को सप्तम पर चढ़ाकर भौंह चढ़ाकर मुँह बनाकर कहती, “हे सोना! तू पढ़ने के समय हल्ला मचाने आती है, मैं अभी जाकर पिताजी से कह दूँगी।” मानो वह स्वयं तारापद की एक प्रवीण अभिभावका हो; उसके पढ़ने-लिखने में लेश-मात्र भी बाधा न पड़े, मानो रात-दिन बस इसी पर उसकी दृष्टि रहती हो। किन्तु वह स्वयं किस अभिप्राय से इस असमय में तारापद के पढ़ने के कमरे में आकर उपस्थित हुई थी, यह अंतर्यामी से छिपा नहीं था और तारापद भी इसे अच्छी तरह जानता था। किन्तु बेचारी सोनामणि डरकर उसी क्षण हज़ारों झूठी कैफ़ियतें देतीं; अंत में जब चारु घृणापूर्वक उसको मिथ्यावादिनी कहकर संबोधित करती, तो वह लज्जित-शंकित-पराजित होकर व्यथित चित्त से लौट जाती। दयार्द्र तारापद उसको बुलाकर कहता, “सोना, आज संध्या समय मैं तेरे घर आऊँगा, अच्छा!” चारु सर्पिणी के समान फुफकारती हुई उठकर कहती, “हाँ, जाओगे? तुम्हें पाठ तैयार नहीं करना है? मैं मास्टर साहब से कह न दूँगी?”

चारु की इस धमकी से न डरकर तारापद एक-दो दिन संध्या के बाद पुरोहित जी के घर गया था। तीसरी या चौथी बार चारु ने कोरी धमकी न देकर धीरे-धीरे एक बार बाहर से तारापद के कमरे के दरवाज़े पर साँकल चढ़ाकर माँ के मसाले के बक्स का ताला लाकर लगा दिया। सारी संध्या तारापद को इसी तरह बंदी अवस्था में रखकर भोजन के समय द्वार खोला। गुस्से के कारण तारापद कुछ न बोला और बिना खाए चले जाने की तैयारी करने लगा। उस समय अनुतप्त व्याकुल बालिका हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बारंबार कहने लगी, “तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, फिर मैं ऐसा नहीं करूँगी। तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, तुम खाकर जाना!” इससे भी जब तारापद वश में न आया तो वह अधीर होकर रोने लगी; संकट में पड़कर तारापद लौटकर भोजन करने बैठ गया।

चारु ने कितनी बार अकेले में प्रतिज्ञा की कि वह तारापद के साथ सद्व्यवहार करेगी, फिर कभी उसे एक क्षण के लिए भी परेशान न करेगी, किन्तु सोनामणि आदि अन्य पाँच जनों के बीच में आ पड़ते ही न जाने कब कैसे उसका मिज़ाज बिगड़ जाता और वह किसी भी प्रकार आत्म-नियंत्रण न कर पाती। कुछ दिन जब ऊपर-ऊपर से वह भलमनसाहत बरतती, तभी किसी आगामी उत्कट-विप्लव के लिए तारापद सतर्कतापूर्वक प्रस्तुत हो जाता। आक्रमण हठात् किस कारण किस दिशा से होगा कहा नहीं जा सकता था। उसके बाद प्रचंड तूफ़ान के बाद प्रचुर अश्रु की वर्षा, उसके बाद प्रसन्न शांति।

इस तरह लगभग दो वर्ष बीत गए। इतने लंबे समय तक तारापद कभी किसी के पास बँधकर नहीं रहा। शायद पढ़ने-लिखने में उसका मन एक अपूर्व आकर्षण से बँध गया था; लगता है, वयोवृद्धि के साथ उसकी प्रकृति में भी परिवर्तन आरंभ हो गया था और स्थिर बैठे रहकर संसार की सुख-स्वच्छंदता का भोग करने की ओर उसका मन लग रहा था; कदाचित् उसकी सहपाठिनी बालिका का स्वाभाविक दौरात्म्य, चंचल सौन्दर्य अलक्षित भाव से उसके हृदय पर बंधन फैला रहा था।

इधर चारु की अवस्था ग्यारह पार कर गई। मतिबाबू ने खोजकर अपनी पुत्री के विवाह के लिए दो-तीन अच्छे-अच्छे रिश्ते जुटाए। कन्या की अवस्था विवाह के योग्य हुई जानकर मतिबाबू ने उसका अंग्रेज़ी पढ़ना और बाहर निकलना बंद कर दिया। इस आकस्मिक अवरोध पर घर के भीतर चारु ने भारी आंदोलन उपस्थित कर दिया।

तब अन्नपूर्णा ने एक दिन मतिबाबू को बुलाकर कहा, “पात्र के लिए तुम इतनी खोज क्यों करते फिर रहे हो! तारापद लड़का तो अच्छा है; और तुम्हारी लड़की भी उसको पसंद है।”

सुनकर मतिबाबू ने बड़ा विस्मय प्रकट किया। कहा, “भला यह भी कभी हो सकता है? तारापद का कुल-शील कुछ भी ज्ञात नहीं है। मेरी इकलौती लड़की है, मैं उसे अच्छे घर में देना चाहता हूँ।”

एक दिन रायडांगा के बाबुओं के घर से लोग लड़की देखने आए। वस्त्राभूषण पहनाकर चारू को बाहर लाने की चेष्टा की गई। वह सोने के कमरे का द्वार बंद करके बैठ गई‒किसी भी प्रकार बाहर न निकली। मतिबाबू ने कमरे के बाहर से बहुत अनुनय की, बहुत फटकारा, किसी प्रकार भी कोई परिणाम न निकला। अंत में बाहर आकर रायडांगा के दूतों से बहाना बनाकर कहना पड़ा कि एकाएक कन्या बहुत बीमार हो गई है, आज दिखाई नहीं हो सकेगी। उन्होंने सोचा, लड़की में शायद कोई दोष है, इसी से इस चतुराई का सहारा लिया गया है।

तब मतिबाबू विचार करने लगे, तारापद लड़का देखे-सुनने में सब तरह से अच्छा है; उसको मैं घर ही में रख सकूँगा, ऐसा होने से अपनी एकमात्र लड़की को पराये घर नहीं भेजना पड़ेगा। यह भी सोचा कि उनकी अशांत अबाध्य लड़की का दुरंतपना उनकी स्नेहपूर्ण आँखों को कितना ही क्षम्य प्रतीत हो, ससुराल वाले सहन नहीं करेंगे।

फिर पति-पत्नी ने सोच-विचारकर तारापद के घर उसके सारे कुल का हाल-चाल जानने के लिए आदमी भेजा। समाचार आया कि वंश अच्छा है, किन्तु दरिद्र है। तब मतिबाबू ने लड़के की माँ एवं भाई के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा। उन्होंने आनंद से उच्छ्वसित होकर सम्मति देने में मुहूर्त-भर की भी देर न की।

काँठालिया के मतिबाबू और अन्नपूर्णा विवाह के दिन-लग्न की आलोचना करने लगे, किन्तु स्वाभाविक गोपनीयताप्रिय सावधान मतिबाबू ने बात को गोपनीय रखा।

चारु को बंद न रखा जा सका। वह बीच-बीच में वर्गी5 के हमले की तरह तारापद के कमरे में जा पहुँचती। कभी रोष, कभी प्रेम, कभी विराग के द्वारा उसके अध्ययन-क्रम की निभृत शांति को अकस्मात् तरंगित कर देती। उससे आजकल इस निर्लिप्त मुक्त स्वभाव ब्राह्मण बालक के मन में बीच-बीच में कुछ समय के लिए विद्युतस्पंदन के समान एक अपूर्व चांचल्य का संचार हो जाता। जिस व्यक्ति का हल्का चित्त सर्वदा अक्षुण्ण अव्याहत भाव से काल-स्रोत की तरंग-शिखरों पर उतरकर सामने बह जाता था, वह आजकल प्रायः अन्यमनस्क होकर विचित्र दिवास्वप्न के जाल में उलझ जाता। वह प्रायः पढ़ना-लिखना छोड़कर मतिबाबू की लाइब्रेरी में प्रवेश करके तस्वीरों की पुस्तकों के पन्ने पलटता रहता; उन तस्वीरों के मिश्रण से जिस कल्पना-लोक की रचना होती, वह पहले की अपेक्षा बहुत स्वतन्त्र और अधिक रंगीन था। चारु का विचित्र आचरण देखकर वह अब पहले की भाँति स्वाभाविक परिहास न कर पाता, ऊधम करने पर उसको मारने की बात मन में उदय भी न होती। अपने में यह गूढ़ परिवर्तन, यह आबद्ध आसक्त भाव उसे अपने निकट एक नूतन स्वप्न के समान लगने लगा।

श्रावण में विवाह का शुभ दिन निश्चित करके मतिबाबू ने तारापद की माँ और भाइयों को बुलावा भेजा, तारापद को यह नहीं बताया। कलकत्ता के फ़ौजी बैंड को बयाना देने के लिए मुख्तार को आदेश दिया और सामान की सूची भेज दी।

आकाश में वर्षा के नए बादल आ गए। गाँव की नदी इतने दिन तक सूखी पड़ी थी; बीच-बीच में केवल किसी-किसी गड्ढे में ही पानी भरा रहता था; छोटी-छोटी नौकाएँ उस पंकिल जल में डूबी पड़ी थीं और नदी की सूखी धार में बैलगाड़ियों के आवागमन से गहरी लीकें ख़ुद गई थीं‒ऐसे समय एक दिन पिता के घर से लौटी पार्वती के समान न जाने कहाँ से द्रुतगामिनी जल-धारा कलहास्य करती हुई गाँव के शून्य वक्ष पर आ उपस्थित हुई‒नंगे बालक-बालिकाएँ किनारे आकर ऊँचे स्वर से नृत्य करने लगे, मानो वे अत्प्त आनंद से बारंबार जल में कूद-कूदकर नदी को आलिंगन कर पकड़ने लगे हों। कुटी में निवास करनेवाली स्त्रियाँ अपनी परिचित प्रिय संगिनी को देखने के लिए बाहर निकल आईं‒शुष्क निर्जीव ग्राम में न जाने कहाँ से आकर एक प्रबल विपुल प्राण-हिल्लोल ने प्रवेश किया। देश-विदेश से छोटी-बड़ी लदी हुई नौकाएँ आने लगीं‒बाज़ार का घाट संध्या समय विदेशी मल्लाहों के संगीत से ध्वनित हो उठा। दोनों किनारे के गाँव पूरे वर्ष अपने निभृत कोने में अपनी साधारण गृहस्थी लिये एकाकी दिन बिताते हैं, वर्षा के समय बाहरी विशाल पृथ्वी विचित्र पण्योपहार लेकर गैरिक वर्ण जल-रथ में बैठकर इन ग्राम-कन्याओं की खोज-ख़बर लेने आती है; इस समय जगत् के साथ आत्मीयता के गर्व से कुछ दिन के लिए उनकी लघुता नष्ट हो जाती है, सब सचल, सजग और सजीव हो उठते हैं एवं मौन निस्तब्ध प्रदेश में सुदूर राज्य की कलालापध्वनि आकर चारों दिशाओं को आंदोलित कर देती हैं।

इसी समय कुडूलकाटा में नागबाबुओं के इलाके में विख्यात रथ-यात्रा का मेला लगा। ज्योत्स्ना-संध्या में तारापद ने घाट पर जाकर देखा, कोई नौकाख़र्च लिये, कोई यात्रा करनेवालों की मंडली लिये, कोई बिक्री का सामान लिये प्रबल नवीन स्रोत की धारा में तेज़ी से मेले की ओर चली जा रही है; कलकत्ता की वाद्य-मंडली ज़ोर से द्रुतताल पर बाजे बजा रही है, यात्रा का दल बेले पर गीत गा रहा है और सम पर हा-हा-हा शब्द की ध्वनि हो रही है; पश्चिमी प्रदेश की नौका के मल्लाह केवल मृदंग और करताल लिये उन्मत्त-उत्साह से बिना संगीत के खचमच शब्द से आकाश को विदीर्ण कर रहे हैं‒उद्दीपनों की सीमा न थी। देखते-देखते पूर्व क्षितिज से सघन मेघराशि ने प्रकांड काला पाल तानकर आकाश के बीच खड़ा कर दिया‒चाँद ढक गया, पूर्व की वायु वेग से बहने लगी, मेघ के पीछे मेघ दौड़ चले, नदी में जल कल-कल हास्य करता उमड़ने लगा‒नदी-तीरवर्ती आंदोलित वनश्रेणी में अंधकार पूंजीभूत हो उठा, मेंढकों ने टर्राना शुरू कर दिया, झिल्ली की ध्वनि जैसे दराँत लेकर अंधकार को चीरने लगी हो। मानो आज सामने समस्त जगत् की रथ-यात्रा हो, चक्र घूम रहा है, ध्वजा फहरा रही है, पृथ्वी काँप रही है, मेघ उड़ रहे हैं, वायु दौड़ रही है, नदी बह रही है, नौका चल रही है, गीत उठ रहा है। देखते-देखते गुरु गंभीर ध्वनि में मेघ गरजने लगा, विद्युत आकाश को चीर-चीरकर चकाचौंध उत्पन्न करने लगी, सुदूर अंधकार में से मूसलाधार वर्षा की गंध आने लगी। केवल नदी के किनारे एक ओर काँठालिया ग्राम अपनी कुटी के द्वारा बंद करके दीया बुझाकर चुपचाप सो रहा है।

दूसरे दिन तारापद की माता और भाई आकर काँठालिया में उतरे; उसी दिन कलकत्ता से विविध सामग्री से भरी तीन बड़ी नौकाएँ काँठालिया के ज़मींदार की कचहरी के घाट पर लगीं एवं उसी दिन बहुत सवेरे सोनामणि काग़ज़ में थोड़ा-सा अमावट एवं पत्ते के दोने में कुछ अचार लेकर डरती-डरती तारापद के पढ़ने के कमरे के द्वार पर चुपचाप आ खड़ी हुई‒किन्तु उस दिन तारापद नहीं दिखाई दिया। स्नेह-प्रेम-बंधुत्व के षड्यंत्र-बंधुधन उसको चारों ओर से पूरी तरह से घेर लें, इसके पहले ही वह ब्राह्मण-बालक समस्त ग्राम का हृदय चुराकर एकाएक वर्षा की मेघ आच्छादित अंधाकारपूर्ण रात्रि में आसक्ति-विहीन उदासीन जनी विश्व-पृथ्वी के पास चला गया।

1. नौटंकी की भाँति बंगाल का लोक-नाट्यरूप।

2. लोग गीत-गायकों का दल।

3. प्रसिद्ध लोक-कथा है कि एक राजकुमार ने सोने की छड़ी छुआकर सोई हुई राजकुमारी को जगा दिया था, चाँदी की छड़ी छुआने से वह सो जाती थी। सोने की छड़ी प्रेम जाग्रत अवस्था की प्रतीक है।

4. हेमंतकालीन धान।

5. प्राचीन मराठा अश्वारोही लुटेरों का सैन्य दल।

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