समझदारी भरी बातें- गृहलक्ष्मी की कहानियां: Samajhdari
Samajhdari Bhari Batein

Samajhdari: मैने सही किया , मैने गलत किया, क्या मुझे यह करना चाहिए था,? क्या मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई ? इन सभी सवालों की उथल – पुथल प्रियंका के मन में चल रही थी। तभी रेलगाड़ी स्टेशन पर एक धीमे झटके के साथ रुकती है। चाय – चाय, गर्मा – गर्म समोसे, ठंडी कुल्फी , इन सभी आवाजों का आना शुरु हो गया था। तभी एक हाथ स्वेता की आंखों के आगे कुल्फी लेकर आता है, और एक आवाज आती है ” दीदी कुल्फी ले लीजिए ,10 रुपए की है एकदम  ठंडी है। प्रियंका अपने मन की उथल -पुथल से अचानक बाहर आती है और देखती है ,एक 12 वर्षीय बालक अपने हाथ में कुल्फी का डिब्बा लिए रेलगाड़ी में कुल्फी बेच रहा है,प्रियंका उसे झल्ला कर मना कर देती है। वह आगे बढ़ जाता है। तभी रेलगाड़ी झटके के साथ आगे चल देती है,सभी बच्चे जो रेलगाड़ी में सामान बेच रहे थे, वह सब उतर जाते हैं। मगर वह 12 वर्षीय बालक पैसे लेने के चक्कर में उतर नहीं पाता, और रेलगाड़ी अपनी रफ्तार पकड़ लेती है, वह रेलगाड़ी में ही रह जाता, और डिब्बे के गेट के सामने खड़ा हो जाता है, कुछ ही पलों के बाद वह रोने लग जाता है, सभी उसे देखने लग जाते हैं, और फ़िर नजरअंदाज कर देते हैं। 

प्रियंका जो पहले से ही अपने माता – पिता से झगड़ा करके घर छोड़कर आ जाती है, वह अब भी उन्हीं ख्यालों में थी,मगर उस बालक को इस हाल में देखकर उसको दया आ जाती है,वह उस बालक को कहती है – सुनो, रो मत,यहां आ जाओ मेरे पास। डरो नहीं , अगले स्टेशन से दूसरी रेलगाड़ी में बैठ जाना। वह बालक अपने डिब्बे के साथ प्रियंका की सीट पर जाकर बैठ जाता है, प्रियंका अपने पर्स से एक चॉकलेट निकल कर उसको देती है तभी उसे अपने पिता की याद आ जाती है,वह भी उसको रोने पर चॉकलेट देते थे । मगर प्रियंका ज्यादा ना सोचते हुए , उस बालक से उसका नाम पूछती है ? वह बालक अपना नाम राजू बताता है। 

प्रियंका उससे उसके घर और परिवार के बारे में पूछती है। राजू बताता है, कि उसका घर यहां पिछले स्टेशन के पीछे जो बस्ती है वहां है, और उसके माता-  पिता मजदूरी करते हैं। और वह स्टेशन पर रुकने वाली हर रेलगाड़ी में कुल्फी बेचता है।  जिसके जरिए वह अपनी स्कूल की फीस भर पाता है।  प्रियंका पूछती है – राजू तुम स्कूल जाते हो , कौनसी क्लास में पढ़ते हो ? राजू कहता है – मैं पांचवी कक्षा में पढ़ता हूं। मेरी बस्ती के पास में ही मेरा स्कूल है। प्रियंका आगे पूछती है – यह सब तुम्हारे दोस्त थे, क्या यह भी स्कूल जाते हैं ?

राजू कहता है – हां , हम सभी सुबह कुल्फी बेचते हैं और दोपहर में  स्कूल जाते हैं , बड़ा आदमी बनने के लिए, इसलिए तो मेरे माता -पिता इतनी मेहनत करते हैं।  प्रियंका  राजू से पूछती है – तुम्हें बड़ा होकर क्या बनना है ? राजू कहता है – इतना बड़ा बनना है, कि मेरे माता – पिता कभी  मजदूरी ना करें। 

प्रियंका राजू से पूछती है – मैं तुम्हे एक अच्छे से बड़े वाले स्कूल में बहुत अच्छी शिक्षा दिला सकती हूं,क्या तुम मेरे साथ चलोगे? राजू ने थोड़ी देर रूकने के बाद कहा – नहीं दीदी मैं आपके साथ नहीं चल सकता। प्रियंका ने पूछा – क्या मैं तुमको अच्छी नहीं लगती ? राजू ने कहा – अरे नहीं दीदी, ऐसी बात नहीं है,आप बहुत अच्छी हो। प्रियंका ने पूछा – तो फिर तुम क्यों मेरे साथ नहीं चल सकते।  क्या तुमको डर लग रहा है ?

राजू ने कहा – नहीं दीदी ,डर नाम की कोई भी चीज का अस्तित्व इस दुनिया में नहीं होता है। यह केवल मन द्वारा निर्मित है, टीचर ने स्कूल में बताया था। 

मैं अपनी पढ़ाई अपने ही घर में रहकर करना चाहता हूं,अपने माता – पिता के पास , अपनी मां  का बना हुआ खाना खाते ,अपने पिताजी से अच्छी चीजें सीखते , अपने दोस्तों के साथ,स्कूल जाते हुए।  मैं अपनी जिम्मेदारी खुद ही लेता हूं।  जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी लेते हुए जीवन में आगे बढ़ता है,वही अपने सपनों को पूरा कर पाता है। गांधी जी ने भी कहा है – स्वाभिमानी बनकर रहना चाहिए। मेरे माता और पिता ने बहुत मेहनत की है , मैं उन्हें धोखा नहीं दे सकता ,अपने फायदे के लिए तो कभी भी नहीं। 

प्रियंका ने पूछा – राजू फिर तुम रो क्यों रहे थे?

राजू ने कहा – मेरे वक्त पर घर नहीं पहुंचने के कारण मेरे माता – पिता मुझे कहां खोजेंगे, उन्हें तो पता भी नहीं होगा, कि मैं यहां रेलगाड़ी में हूं। 

प्रियंका इस बालक से यह सब सुनकर दंग रह गई,उसे समझ नहीं आया, कि समझदार कौन है? वह जिसके पास ज्ञान है,जिसके पास डिग्री है, जो उम्र में बड़ा है ? या फ़िर जो नादान है। 

अगले स्टेशन आते ही रेलगाड़ी की रफ्तार धीमे हो गई। राजू झट से रेलगाड़ी से नीचे उतरा और और दूसरे प्लेटफार्म पर जाकर खड़ा हो गया, वहां से उसने प्रियंका को अलविदा कहा और कुछ ही पलों बाद  रेलगाड़ी आई, जिसमें बैठकर वो अपने घर चला गया। 

कुछ ही  पलों के बाद में प्रियंका अपने सामान के साथ रेलगाड़ी से उतर गई और दूसरे प्लेटफार्म पर पहुंचकर रेलगाड़ी में बैठ गई, वह अपने टिकट के साथ – साथ अपनी उन सभी गलतियों को उस रेलगाड़ी में छोड़ आई , जो उसके घर की विपरीत दिशा में जा रही थी। 

प्रियंका की आंखों में आंसू कुछ खास थे, अपने घर जाने के खुशी साफ देखी जा सकती थी। अब उसके मन में सवालों की उथल पुथल नहीं बल्कि राजू की समझदारी भरी बातें थीं।  जो उसे अपनी बचकानी गलतियों पर हंसने के लिए प्रेरित कर रही थीं।

 अपने घर पहुंचकर प्रियंका  अपने माता – पिता से गले लगकर रोने लगी। उसके माता – पिता उसे धीरज बांधते हुए उसे उसकी बचकाने फैसलों और बातों के लिए क्षमा कर देते हैं। 

परिवार एक साथ बैठकर खाना खाता है, और फिर रेडियो पर गानों में खो जाते हैं।