googlenews
कुल्फी-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात
Kulfi-Balman ki Kahaniya

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक थी लड़की। नाम था शुचि। होगी लगभग आठ साल की। चौथी कक्षा में पढ़ती थी। वह चौथी कक्षा में आई तब उसकी मम्मी को टी. बी. (क्षयरोग) हुआ। अतः वह टी. बी. हॉस्पिटल में थी। शुचि नाना और नानाजी के पास रहती थी। उसके पप्पा दूर किसी गांव में शिक्षक की नौकरी करते थे।

शुचि जिस कन्या विद्यालय में पढ़ती थी उसके सामने रिसेस के समय एक कुल्फी वाला आता था। हाथ-लारी में एक ओर घर से उबालकर लाए गए दूध के दो-तीन कनस्तर होते और दूसरी ओर काले रंग की लंबी-लंबी, पोली नलियों में एक-एक सलाई होती थी। कुल्फी वाले कनस्तर में से उन सभी पोली नलियों में दूध भरते। फिर हाथ-लारी को हिलाते। थोड़ी देर में उन नलियों में कुल्फी जम जाती। फिर म्यान में से तलवार निकालने की अदा में नलियों में से सलाई पकड़कर उन पर जमी हुई कुल्फी को बाहर निकालते। लड़कियाँ तो कुलफियों पर टूट पड़ती। शुचि यह सब देखती रहती।

देखते-देखते उसका कुलफी खाने का मन होने लगा। लेकिन उसकी नानी उसे बाहर का कुछ खाने के लिए पैसे नहीं देती थी। केवल घर का गाँठिया (बेसन की तली हुई चीज) और शकरपारा छोटे से लंच बॉक्स में रखकर देती थी। इस कारण शुचि को केवल कुल्फी देखकर ही अपने मन को मना लेना पड़ता। गाँठिया और शकरपारा अब उसे अच्छे नहीं लगते थे क्योंकि उसका मन कलफी में अटका हआ था। एक बार उसने नानी से पैसे माँगकर देखे। “मुझे एक बार पैसे दीजिए न! मुझे कुल्फी खानी है। दूसरी बार नहीं माँगूंगी। “लेकिन नानी ने इनकार कर दिया, “यह पैसे ले जाने की आदत अच्छी नहीं है… और कुल्फी तो खाना ही नहीं चाहिए, जिससे बीमार पड़ जाएँ। वे नलियां बराबर साफ नहीं होती और दूध भी अच्छा नहीं होता।”

शुचि जानती थी कि नानी ने एक बार ‘ना’ बोल दिया सो बोल दिया। वह फिर कभी ‘हाँ’ नहीं कहेगी। शचि ने अब घर में टेबल की दराजों. अलमारी के खानों को टटोलना शुरू कर दिया- इस आशा से कि कहीं से थोड़े पैसे मिल जाए तो कुल्फी खाने का अवसर मिले। यह चोरी ही तो थी लेकिन शुचि का कुल्फी खाने का मन हो गया था। लेकिन नानी तो नानी ही थी। पैसे कहीं बाहर रखे ऐसी नहीं थी। अतः शुचि को एक-आध सिक्का भी हाथ नहीं लगा।

अब शुचिता को नानी और नानाजी पर गुस्सा आने लगा कि इस तरह पैसे छुपाकर रखने का क्या फायदा। दोनों बड़े होशियार लगते हैं। उसने नाना-नानी के साथ कुट्टी कर दी। वे कोई काम सौंपे तो “नहीं करना है जाओ” कहकर भाग जाती। वैसे यह आदत तो अच्छी नहीं थी। कृष्ण ने गीता में कहा है कि इच्छा पूरी न होने पर क्रोध आता है और क्रोध के कारण मनुष्य अच्छी बातों को भी भूल जाता है।

शुचि के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसने सोचा कि रिसेस में सभी लड़कियाँ क्लास से बाहर चली जाती हैं और क्लास में कोई नहीं रहता तब किसी के बस्ते में से पैसे चुरा लिए जाएँ तो बात बन जाएगी। बड़ों की कही बात कि चोरी नहीं करनी चाहिए मानों हवा में उड़ गई। एक दिन रिसेस में वह क्लास में अकेली रुक गई लेकिन किसी ने पकड़ लिया तो?’ इसी डर के मारे किसी का बस्ता खोलने की हिम्मत जवाब दे बैठी। इसलिए उसने चोरी नहीं की।

उसके बाद उसने एक सहेली से पूछा, “अगर मैं अपने लंच बॉक्स में से तुझे गाँठिया और शकरपारा खाने को दूँ तो तू मुझे उसके बदले में कुल्फी खाने को देगी?”

सहेली ने कहा “थोड़ी-सी खाने दूँगी। थोड़ी-सी ही सही, कुलफी चखने को तो मिलेगी, इस विचार से शुचि दूसरे दिन की रिसेस की राह देखने लगी। लेकिन दूसरे दिन जब अपनी जूठी कुल्फी उसे दी, तब शुचि को डर लगा कि सहेली का जूठा खाने से अगर कीटाणु लग गए और बीमार पड़ जाऊँ तो? उसने कुल्फी चखने से इनकार कर दिया।

ऐसे में एक दिन उसे एक तरकीब सूझी। बहुत सारी लडकियाँ हाथ-लारी पर चिल्ला-चिल्ला कर, “मैंने दो दिन से पैसे दे रखे हैं लेकिन तुम मुझे कुल्फी नहीं देते “मैंने पैसे दे दिये हैं, अब मुझे कुल्फी दो” बोल रही थी। यह सुनकर शुचि को भी लगा कि मैं भी इनमें शामिल हो जाऊँ तो किसी समय कुल्फी खाने को मिल सकती है और उसने ऐसा ही किया। लालच बुरी बला है। शुचि ने तो झूठ बोलना भी शुरू कर दिया। “ऐ भाई, मेरे पैसों की कुल्फी तुमने नहीं दी-मेरी कुल्फी बाकी है। “दो दिन तो कुल्फी वाले को यह चेहरा अनजाना-सा लगा, इसलिए उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। लेकिन तीसरे दिन उसके लिए शुचि का चेहरा जाना-पहचाना हो गया। इसलिए बेचारे को लगा कि शुचि ने पैसे दिए होंगे और उसकी कुल्फी बाकी होगी।

चौथे दिन शुचि ने कहा, “देखो भाई! तीन दिन से पैसे दे रखे हैं फिर भी तुम कुल्फी नहीं देते। अब मुझे मेरे पैसे वापस दे दो। “शुचि को लगा कि अब उसे अच्छी तरह से झूठ बोलना आ गया है- वह भी कुल्फी के कारण।

कुल्फी वाला कहने लगा, “कल दे दूंगा। लेकिन तू रिसेस पूरी होने की घंटी सुनकर क्लास में चली जाती है तो फिर मैं कैसे दूँ? कल रुकना तो दे दूँगा।”

शुचि अब क्लास में देर से जाने का गलत काम करने के लिए भी तैयार हो गई। सोचा, “सब पहली बार और आखिरी बार तो करना है न? “लेकिन गुनाह का काम करने वाले भी ‘बस एक ही बार तो करना है’ ऐसा तय कर लेते है और फिर बार-बार करने की उनमें आदत पड़ जाती है और अंत में उन्हें जेल भी जाना पड़ता है।

कुल्फी वाले ने ‘कल दे दूंगा’ कहा तो शुचि को संतोष हो गया कि अब मेरे पैसों के बारे में कोई शंका नहीं रही।

दूसरे दिन शुचि को कुल्फी मिलने वाली ही थी, तभी रिसेस पूरी हो गई। कुल्फी वाले ने कहा “बेबी, खाकर ही जाना।” और वह हाथ-लारी को हिलाने लगा। तब शुचि के पड़ोस में रहने वाली शिक्षिका वहाँ से जा रही थी। शुचि को वहाँ खड़ा देखकर उन्होंने सख्त शब्दों में कहा, “क्यों खड़ी है? कुल्फी खाना है? कह दूँगी तेरी नानी को। चल, रिसेस पूरी होने पर अच्छे बच्चे क्लास में चले जाते हैं, बाहर नहीं घूमते।” और शुचि की बाँह पकड़कर उसे क्लास में ले गई। शुचि को गुस्सा तो बहुत आया पर कुछ कह नहीं पाई।

शुचि ने सोचा कि कल रिसेस पूरी होने पर वह लारी के पीछे छुप जाएगी और यह मैडम वहाँ से निकल जाए, तब बाहर आकर आराम से कुलफी खाएगी। दूसरे दिन उसने ऐसा ही किया। कुल्फी वाला काली नली में से चाँदी की तलवार जैसी कुल्फी निकालकर शुचि को देने लगा। शुचि ने कुल्फी लेने के लिए हाथ आगे भी बढ़ाया, तब उसके मन में एक विचार आया। मन तो बहुत तेज गति से चलता है। एक-आध क्षण तो वह एक निबंध जैसा लंबा सोच सकता है। शुचि को याद आया कि आज ही गुजराती की पाठ्य पुस्तक में पढ़ाया गया कि गांधी जी ने बचपन में पैसों के लिए सोने का कड़ा चुपचाप कटवा लिया था। बाद में उन्हें लगा कि यह तो गलत काम है, तब उन्होंने पिता को चिट्ठी लिखकर किए गए गुनाह की माफी मांगी थी। पिता बीमार थे लेकिन चिट्ठी पढकर खटिया पर उठ बैठे।

और उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। चिट्ठी पढ़ने के बाद उन्होंने वह फाड़कर फेंक दी और फिर सो गए। यह बात शिक्षिका पढ़ा रही थी, तब शुचि ने देखा कि कोई भी लड़की नहीं रो रही थी, केवल उसकी आँखों में आँसू थे। यह सब याद आते ही शुचि की आत्मा ने टोका, “शुचि! सत्य का पाठ पढ़ते समय तुझे रोना आ रहा था और अब कुल्फी खाने के लिए तू झूठ बोल रही है? किस दिन तूने कुल्फी वाले को पैसे दिए थे? सच बोलने वाले गांधी जी के प्रति तुझे आदर-भाव होने लगा था और तू है कि ऐसा गलत काम कर रही है? तो फिर अच्छी-अच्छी बातें पढ़ने का क्या अर्थ? सत्य का पाठ पढकर असत्य का आचरण कर रही है?

इसे चोरी कहते हैं। शुचि, चोरी नहीं करनी चाहिए। “और कुल्फी खाए बिना स्कूल की ओर दौड़ी। क्लास में बैठी, तब पूरा समय उसे पछतावा होने लगा कि “एक सप्ताह तक तो मैंने पैसे दिए है, कुल्फी बाकी है” कहकर मैं झूठ बोलती रही। मैं रास्ता भटक गई थी। शुचि ने मन ही मन में ईश्वर का आभार माना कि कुल्फी मिलने वाली थी, उसी दिन ही गांधी जी का पाठ पढ़ने को मिला। यह अच्छा ही तो हुआ, मैं गलत काम करने से बच गई। ईश्वर तुम्हारा आभार!

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

Leave a comment