कथा-कहानी

‘जो तुम्हारी इच्छा हो करो, मैं नहीं जानती।’

‘अरे मुझे अपनी ही करनी होती तो मैं पागलों की भांति तुम्हें क्यों पूछता फिरता?’

राधा के व्यवहार ने राघव के अन्तर्मन में एक तूफान खड़ा कर दिया था।

‘ओह ! मुझे नहीं था मालूम कि ये वर्षों बाद भी मेरी आशाओं पर पानी फेरेगी। ये मेरी सारी कल्पनाओं के महल को ही ढहा देगी, किसे मालूम था?’

वह कमरे में इधर से उधर चक्कर पर चक्कर काटने लगा फिर झुझलाते हुए बोला-

‘सुनो राधा ! आज तक मैं तुम्हारी हर बात मानता रहा, मैंने हमेशा ही कोशिश की कि तुम्हें तनिक भी पीड़ा न पहुंचे। मैंने आज तक सभी अच्छी-बुरी बातों को दिल में दबाये रखा, सिर्फ इसलिए कि तुम आज नहीं तो कल अवश्य इस बात को समझोगी पर तुमने कभी मुझे समझने की कोशिश नहीं की।’

वह गुस्से में तेजी से बाहर निकल गया- ‘राधा अब यह बात हरगिज नहीं होगी। यह तुम निश्चित समझ लो।’

राधा भी तेवर चढ़ाते बोली-

‘तो तुम्हारी मनमर्जी नहीं चलेगी, यह भी तुम लिख लो।’

राधा के उल्टे-सीधे जवाब सुनकर एक बार तो राघव के तन-मन में आग लग गयी किन्तु किसी प्रकार अपना गुस्सा शान्त कर वह राधा के पास आकर उसे समझाने लगा-

‘अरे पगली ! तुम समझती क्यों नहीं कि परिवार की छोटी-छोटी बातें भी बाहर बतंगड़ बन जाती हैं। लोग तो इस ताक में रहते हैं कि कब किस परिवार की कमजोर नस उनके हाथ में आये और वे उसे तमाशा बना सकें, तुम्हें मालूम है कि आज लोग कुछ भी कहने में नहीं चूकते। तरह-तरह की बातें करते फिरते हैं।’

राधा रोने लगी और सिसकते हुए बोली-

‘क्यों नहीं करते होंगे लोग तरह-तरह की बातें? तुमने तो हमेशा ही मुझे लोगों के बीच बदनाम करने की कोशिश की। लोग सोचते हैं कि मैं ही बुरी हूं, तुम तो सबके लिए भले बन जाते हो।’

‘राधा तुम फिर मुझे गलत समझ रही हो।’

‘गलत नहीं मैं बिल्कुल सही समझ रही हूं, तुम मर्दों का काम ही औरत को बदनाम करना होता है।’

और फिर चिड़चिड़ाते हुए बोली-

‘मैंने पहले ही कह दिया था तुम्हें जो करना हो कर लो, मुझे कुछ नहीं कहना।’

‘राधा कुछ ठण्डे दिमाग से तो सोचो।’

‘सोच लिया मैंने बहुत।’

‘तुम सोचती तो इस तरह बोलती ही नहीं, तुम्हें थोड़ा भी महसूस नहीं होता कि सब कुछ होते हुए भी छोटा भाई अनाथों की तरह और मां बेसहारों की तरह दिन गुजार रही हैं?’

राघव बड़े शान्त भाव से राधा को समझाता रहा लेकिन राधा थी जो कुछ भी सुनने को तैयार न थी। बोली-

‘कौन से हम ठाट कर रहे हैं यहां? मैं भी तो घर के सारे काम कर-करके मर रही हूं, इसमें भी कहाँ चैन है तुम्हें? और ऊपर से माँ और भाई को लाने की जिद्द ठाने हो।’

‘राधा ! मैं तुम्हारी तरह जिद्दी होता तो..।’

‘तो क्या कर लेते तुम?’

‘बहुत कुछ कर लेता, वह भी कर लेता जो तुमने कभी सोचा तक न होता। अरे लोग तो परायों को भी सहारा देते हैं, फिर वह तो हमारी माँ है माँ! पर एक तुम हो जो..।’ वह कहते-कहते उसकी आंखें नम हो गई, अतीत के एक-एक क्षण उसके मन मस्तिष्क में चलचित्र की तरह उभरते चले गये।

…..जैसे-तैसे लिखाया पढ़ाया था माँ ने उसे। आठ तक पढ़ाना भी तो माँ की हिम्मत से बाहर की बात थी, फिर भी किसी तरह स्कूल भेजती रही। राघव को आज भी वे दिन याद हैं जब माँ को फीस की खातिर लोगों के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी। एक तो मजदूरी करना और ऊपर से लोग तरह-तरह के ताने मारते थे। अपनी फूटी किस्मत पर उसने हमेशा चुपचाप आंसू बहाने के सिवाय किसी को कुछ नहीं कहा।

अतीत से वर्तमान में पहुंचते ही उसका ध्यान राधा पर केन्द्रित हो गया। सभी गुणों से सम्पन्न होने पर भी राधा उसे कभी-कभी नितान्त खोखली नजर आने लगी थी। बेहद प्यार करने वाली राधा उसे यकायक कोसों दूर नजर आने लगी। वह अपने ही अन्दर अनेकानेक प्रश्नों के बीच घिर गया। उसे लगा कि उसकी और राधा की सोच में दिन-प्रतिदिन दूरी बढ़ती जा रही है।

राघव ने गरीबी को अधिक निकटता से देखा था। वह नितान्त अभावों में पला था, जबकि ठीक इसके विपरीत राधा ने कभी अभावों का मुंह तक न देखा था। इसलिए तो राधा की बातें उसे कई बार हीनता की चारदीवारी में धकेल देती थी।

अब जब भी उसे माँ और भाई की याद आती उसका शरीर कांप उठता, अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाते। वह असीम वेदनाओं के बीच घिर जाता।

दूसरे ही दिन वह जल्दी तैयार होकर अपनी नौकरी पर चल दिया। पर वहां भी उसका मन अशान्त रहा। वह अपनी ही उलझनों के बीच अपने को असहाय महसूस करने लगा। सिर पकड़े वह घण्टों गुजार देता था। सिर्फ इसी सोच में कि वह राधा को कैसे समझाये।

वह इस बात को भी जानता था कि यदि वह राधा की तरह जिद्दी हो गया तो यह छोटा सा परिवार एक होने की बजाय और छिन्न-भिन्न हो जायेगा। और उसका जीवन सदैव के लिए नरक बन जायेगा।

उधर माँ की चिन्ता भी उसे खाये जा रही थी। उठते-बैठते, खाते-पीते हर समय उसे गाँव में उपेक्षित छोटे भाई का भविष्य अन्धकारमय नजर आता। वह भाई को साथ लेकर शहर के किसी स्कूल में भर्ती करना चाहता था, किन्तु यह राधा की इच्छा के बिना कहां सम्भव था।

वह पेशोपेश में पड़ा रहा कि यदि वह जबरदस्ती भाई को ले भी आता है, और जैसा कि यह सब राधा नहीं चाहती है, ऐसी स्थिति में घर में तनाव अलग होगा और मैंने गुस्से में कभी कुछ कर बोल दिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे। पता चला कि अच्छा खासा परिवार बर्बाद हो गया।

उसे लगा जैसे उसकी सारी सोच व्यर्थ होती जा रही है। उसकी चिन्ता चिता में कभी भी बदल सकती है, जिसमें वह घुट-घुट कर कभी भी जलकर राख हो सकता है। वह भयभीत हो उठा। वह जीते-जी मरने के लिये नहीं बल्कि जीने के लिए जी रहा था।

दिनभर राघव तनाव से गुजरता रहा। इधर राधा भी कम परेशान न थी, क्योंकि आज राघव पहली बार उससे इतना बोला था। जब राघव देर रात तक भी घर नहीं लौटा तो राधा की चिन्ता और बढ़ने लगी। चाहे पति-पत्नी का कितना ही झगड़ा क्यों न हुआ होगा किन्तु राघव ने कभी इतनी देर नहीं की थी। आज तो वह बिना नाश्ता किए, बिना कुछ खाये-पिये ही घर से निकल पड़ा था।

जैसे-जैसे समय बढ़ता गया, राधा की बेचैनी शिखर छूने लगी। अन्दर-बाहर करती वह कितनी ही बार अड़ोस-पड़ोस में चली गई थी।

और अब जब राघव देर से घर पहुंचा तो आते ही बिस्तर पर लेट गया। राधा के खाना लाने के बाद भी तबियत खराब होने का बहाना बनाकर उसने खाना लौटा दिया। राधा की लाख कोशिशों के बाद भी उसने खाना नहीं खाया। राधा रोने लगी। रोते-रोते न जाने वह क्या-क्या नहीं बोल बैठी। राघव पहले तो राधा की बातें चुपचाप सुनता रहा और फिर जब बातें असह्मय हो गई तो तिलमिला कर बोला-

‘सुनो राधा! अच्छा हो कि तुम चुपचाप खाना खाकर सो जाओ।’

राधा चिल्लाते हुए बोली-

‘मुझे खाना ही होता तो इतनी देर इन्तजार क्यों करती? एक तो इतनी देर से घर पहुँचो और फिर ऊपर से मुझ पर रौब डालो। अब मुझसे नहीं हो सकेगा इतना कि मैं तुम्हारे घर का काम भी सम्भालू और तुम्हारी बातें भी सुनूं।’

‘इसीलिए तो कहता हूँ कि अब परिस्थितियां ऐसी ही आने वाली हैं। जब हम दोनों को एक दूसरे से अलग-अलग रहना पड़ सकता है। तब तुम्हें मेरे कामों से सदा के लिए मुक्ति मिल जायेगी।’

राघव की बात सुनकर राधा के पांवों तले जमीन खिसकने लगी। एक क्षण भी राघव से अलग होने की बात उसने सपने में भी नहीं सोची थी।

आंखों में आँसू लिए राधा भी बिना खाये ही लेट गई। किन्तु उसके मनोमस्तिष्क में राघव की बातें ज्वार-भाटे की तरह तेजी से उमड़ने-घुमड़ने लगी। कहीं सच में ही…।

रात खुली नहीं थी कि राघव अपने सूटकेश में कपड़े ठूंसने लगा। जो भी कपड़ा हाथ में आता उसे सूटकेश में रख देता। राधा चौंकी-

‘क्यों कहीं जाना है?’

‘हां आज ही जाना है।’

‘लेकिन ये अचानक….।’

‘किसी मीटिंग में जाना है, काफी दिन लग सकते हैं।’

राधा बोली- ‘आप आज नहीं जायेंगे।’

राघव तपाक से बोला-

‘आज ही जाऊंगा और हर कीमत पर जाऊंगा। दस-बीस दिन भी लग सकते हैं आने में।’

दस बीस दिन सुनकर तो राधा और चौंक उठी। अवाक् होकर बोली-

‘लेकिन आज तक तो आप एक-दो दिन से अधिक कहीं रहे ही नहीं।’

राघव की मधुर वाणी आज कठोरता लिए हुए थी। कर्कश स्वर में बोला-

‘आज तक नहीं रहा, अब रहना पड़ेगा। समय-समय की बात है।’ कहते-कहते वह कपड़े पहनने लगा, राधा को बिल्कुल भी विश्वास न था कि राघव यों सचमुच ही चल देगा। लेकिन देखते ही देखते चंद ही क्षणों में राघव तैयार होकर घर से चल दिया।

राधा आक्रोश और पीड़ा से घिर गई, राघव को जाते देखकर वह मूक कुछ भी तो नहीं कह पाई थी। उसने कितनी जल्दी की थी चाय बनाने में, किन्तु राघव ने इस चाय को भी ठुकरा दिया था। राधा के दुःख की कोई सीमा न रही, आज तो राघव ने राधा की हर बात को ठुकरा दिया था।

राधा को अब एक-एक पल काटना दूभर हो गया था। सैकड़ों हित और अहित की सोच के बीच वह बहुत बुरी तरह उलझ गई।

आज पहली बार उसे स्थिर मन से अपने और राघव के बारे में सोचने के लिए विवश होना पड़ा था। आज उसे आत्म विश्लेषण का अच्छा मौका मिला था। घंटों तक सोचने के बाद उसे लगा कि बात तो कुछ भी नहीं। सिर्फ भाई और मां को साथ रखने की बात है और फिर जिनके लिए राघव मुझसे दूर रहने को भी तैयार है वे हैं तो अपने ही, हमारा फर्ज बनता है उनकी चिन्ता करना। जब अपने ही अपने नहीं रहेंगे तो पराये क्या कद्र करेंगे। भाई को लिखाने-पढ़ाने की बात भी तो जायज है और फिर मां का हमारे सिवाय है भी कौन?

राधा को एकाएक किसी सफलता के मिल जाने की सी अनुभूति होने लगी। उसे लगा जैसे वह किसी घनघोर जंगल में भटक गई थी और अब उसे रास्ता मिल गया है।

अगले ही दिन राधा ने कुछ सामान खरीदा और गांव की ओर चल दी। कई घंटों के सफर के पश्चात गांव के स्टेशन पर उतर कर लगभग चार कि.मी. पैदल चलकर राधा रात पड़ने से पूर्व ही गांव पहुँच गई।

बहू को अचानक गांव में देखकर मां तो अचम्भित हो गई। जैसे ही राधा ने मां के चरण स्पर्श किये, ‘रुको बहू ! रुको। ये आज सूरज किधर से उग आया मेरे लिए। मां तेजी से अन्दर गई और अपने पल्ले पर चावलों की पोटली बांधे पहले तो बहू को बहुत देर तक चूमती रही और फिर चारों दिशाओं में चावलों की वर्षा करने लगी। मां इतनी खुश थी कि बोलते-बोलते खुशी से उसका गला रुंध गया था। आंखों में आंसुओं की धार रुकते नहीं बन थी। आज उसे सारी दुनिया की खुशियां अपनी झोपड़ी के अन्दर समायी दिखती थी, लेकिन थोड़ी ही देर बाद जब उसका ध्यान राघव की ओर गया तो वह चौंक उठी-

‘बहू तुम और अकेली ! मेरा रघू कहां है?’

माँ की घबराहट देखकर राधा तुरन्त बोली-

‘वे बाहर अपने ऑफिस के किसी काम से गये हैं उन्हें अचानक एक मीटिंग में जाना पड़ा। जाने से पहले मुझे कह गये थे कि तुम माँ और भाई को गांव से शहर ले आना, सो मैं आप लोगों को लेने चली आयी।’

राधा की बात सुनकर मां ने कुछ धीरज बांधा। इधर चन्द ही क्षणों में हवा की तरह राधा के आने की बात गांव में फैल गई। सारा गांव एक हो गया। शादी के वर्षों बाद तो आज पहली बार वह गांव आ रही थी।

खाना-खाने के बाद देर रात तक मां राधा को तरह-तरह की बातें पूछती रही। हर पांच मिनट के बाद वह अपने रघू के बारे में कुछ न कुछ अवश्य पूछ लेती। कब खाता है, नौकरी कब जाता है। वैसे ही कमजोर है? अब ठीक हो गया होगा न, सब्जी तो खाता ही नहीं, फिर खाने-पीने का भी तो ध्यान नहीं रखता, बड़ा लापरवाह है। और राधा भी मां के हर प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर देने की हर सम्भव कोशिश करती।

बातों-बातों में जब मां ने खेती-वाड़ी की बात कहकर साथ चलने से साफ इन्कार कर दिया तो राधा अपनी बात पर अड़ गयी।

‘नहीं मां जी ! मैं तो हर हालत में आपको साथ लेकर जाऊँगी आपको चलना ही होगा, नहीं तो मैं भी यहीं गांव में आपके पास रहूँगी।’

‘लेकिन मेरे रघू के खाने-पीने का क्या होगा?’ माँ अपने राघव की चिन्ता में डूब गई।

‘हमेशा से अकेला रहा वो, कोई सुख नहीं देखा उसने, बड़ी मुश्किल से उसने शादी की, कहां करना चाहता था वह शादी…।

नहीं-नहीं बहू उसका तो तुमको ही ध्यान रखना है….।’

‘तभी तो कहती हूँ कि आप लोग भी साथ चलो। उनकी इच्छा है कि चार सदस्य तो परिवार के कुल हैं सभी साथ रहें। पास रह कर एक दूसरे के दुःख-सुख में काम न आयें तो क्या फायदा? किशोर को भी वहीं अच्छी स्कूल में भर्ती कर देंगे। ये तो स्कूल में बात करके भी आ गये हैं।’

और अन्त में राधा के इस आत्मीय व्यवहार ने मां को चलने के लिए बाध्य कर ही दिया। चौथे ही दिन वह मां और किशोर को लेकर देहरादून चली आई।

राघव पांच-छः दिन बाद ही घर लौट आया। दूर से मां को घर पर देख कर उसे विश्वास ही नहीं हुआ। वह तेजी से आगे बढ़ा उसे अपनी आंखों पर भरोसा न हुआ। किन्तु जब बिल्कुल ही पास आकर उसने मां को देखा तो वह खुशी से उछल पड़ा और सामान वहीं छोड़ माँ पर लिपट पड़ा। कुछ देर बाद इधर-उधर झांकने के बाद जब उसे राधा नहीं दिखाई दी तो वह शंकित हो उठा।

‘मां राधा कहाँ है?’

‘बाजार गई है सामान लेने।’

‘लेकिन सामान तो सब कुछ……।’

‘हाँ ! हाँ सामान तो सभी कुछ था घर पर, लेकिन किशोर के लिए कुछ कपड़ों की बात कह रही थी इसीलिए उसको भी साथ लेकर गई है। मैंने तो मना कर दिया था कि बिना बात खर्चा कर रही है। अभी तो उसके पास कपड़े थे ही..।’

मां की बात सुनकर राघव की खुशी का ठिकाना न रहा। खुशी से उसकी आंखें नम हो आई।

‘लेकिन मां तुम अचानक चली आई यहां। किसके साथ आयी? एक चिट्ठी ही डाल देती तो मैं चला, आता। कब से सोच रहा था कि तुम्हें अपने साथ रखूं। पर मैं तो तुम्हारा नालायक बेटा हूं न, बस सोचता ही रह जाता हूँ…..।’

मां चक्कर में पड़ गई।

‘क्या तुमने नहीं भेजा था बहू को?’

‘मैंने !!! और फिर सिर झटकते हुए बोला- ‘अरे माँ आपकी बहू ने तो मुझे चकमा दे दिया। कब पहुँची राधा गांव में ?’

‘हमें आये तो आज कई दिन हो गये।

और जब माँ ने पूरी बात बतलाई तो राघव गद्गद हो गया। उसके दिल में राधा के प्रति पहले से भी कई गुना अधिक स्नेह उमड़ पड़ा। वह इतना भावुक हो उठा कि अपनी आंखों में आती आंसुओं की धारा प्रयास करने पर भी रोक न सका। उसे लगा जैसे उसे कोई नई जिन्दगी मिल गई है, जिसे पाने के लिए वह एक अरसे से तड़फ रहा था।

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