गृहलक्ष्मी की कहानियां

दरवाजे खोलते ही ही अपनी मम्मी का हाल जानने पहुंचे आयशा ने अपने अब्बू से पूछा-अब्बू अम्मी कैसी है?
आयशा की अम्मी आसमां का अभी कुछ दिन पहले ही हार्ट ट्रांसप्लांट का ऑपरेशन हुआ था, उन्हें काफी दिनों से हार्ट में दिक्कत चल रही थी, बड़ी मुश्किल से बहुत लंबे इंतजार के बाद किसी हिंदू महिला, जो बहुत ही बड़ी कृष्ण भक्त रही थी, जिनकी मृत्यु ब्रेन डेड से हो जाने के कारण उनका हार्ट आसमां को दिया गया था।
आयशा के अब्बू इकराम ने कहा, ‘तेरी अम्मी की तबीयत काफी बेहतर है,पर पता नहीं ऑपरेशन के बाद कुछ बातें बहकी- बहकी सी करती है, नमाज के समय में नमाज तो अदा करती है, लेकिन आदाब की जगह अब हर किसी को राधे कृष्णा बोलने लगी है और जिद करके एक लड्डू गोपाल जी की मूर्ति भी ले आई है।
उस मूर्ति से अकेले में बातें करती है, कहती है तुम मेरे मनमोहना हो,जबसे तुम्हें देखा है अपनी सुध—बुध बिसरा गयी हूं। मना करने पर कहती है,लड्डू गोपाल जी से उसका नाता जन्मों-जन्मो से रहा है।
मुझे तो लगता है आयशा बिटिया यह सब उस हिंदू महिला के दिल लगने की वजह से हुआ है, पर अब कर भी क्या सकते हैं कहते हुए इकराम अफसोस के साथ अपने सिर पर हाथ धर बैठता है, और कहता है हमारा समाज क्या कहेगा,एक मुस्लिम महिला गैर धर्म की इबादत कर रही है। जरा तू ही अपनी अम्मी को समझा कर देख …देख शायद उसे कुछ समझ आ जाए। लेकिन आहिस्ता से समझाना दिल पर दबाव न पड़े ऐसा डॉक्टर ने बोला है।
ठीक है अब आप चिंता ना करें अब्बू, मैं अम्मी से मिलकर अभी आती हूं, कहकर आयशा कमरे का पर्दा सरका कर अंदर वाले कोठे में जाती है।
और देखती है कि उसकी अम्मी लड्डू गोपाल जी की पोशाक बदल रही है और गुनगुना रही है
मनमोहना मनमोहना तेरी दिवानी हुई मैं तो बाबरी,
एक बार दर्शन दिखा दे शयामना, मेरे मनमोहना।


आयशा के अंदर आते ही उसे आसमां उसे राधे कृष्णा कहती है, और कहती है, ‘आज मेरे मनमोहना का जन्मदिन है,इसे अच्छे से सजाना है, तैयार करना है मीठा भी बनाना है, ढेरों काम करने है, अच्छा हुआ तू आ गई ,चल अब तू भी लल्ला के जन्मदिन की तैयारी में मेरी मदद करना।’
ये सब क्या चल रहा है अम्मी ?आयशा ने कहा। मैं अच्छे से जानती हूं यह सब हार्ट ट्रांसप्लांट का चक्कर तो है नहीं, आपने ही कुछ खेल रचाया है, आप अब्बू और सब घर वालों को बेवकूफ बना सकती हैं पर मुझे नहीं। मुझे याद है आप शुरू से ही लड्डू गोपाल के रूप को बेहद पसंद करती हो, जरा अब असलियत से मुझे रूबरू कराओ तो कुछ समझ में आये। और देखो हां सच—सच बताना,तभी मैं आपकी कुछ मदद कर पाऊंगी।
आयशा तूने मेरी चोरी पकड़ ली, तो चल मैं तुझे सब सच—सच बताती हूं,आसमां ने कहा।
मैं एक बार बचपन में अपनी सहेली ममता के घर जन्माष्टमी वाले दिन लड्डू गोपाल के जन्मदिन के उपलक्ष में गई थी, तो मैंने जब इस बाल गोपाल की मूरत देखी, तभी वह मेरे दिल में घर कर बैठा।
लेकिन तेरे नानू( मेरे अब्बा) कट्टर मुस्लिम थे, कभी कन्हैया की फोटो भी न लाने दी। निकाह हो कर घर परिवार की जिम्मेदारी में लग गई, लेकिन मनमोहना की मोहिनी मूरत मेरी आंखों में ताउम्र समाई रही, सोचती रही कभी तो लल्ला को घर लाऊंगी।

और आज जब जीवन की इस आखिरी बेला में घर की जिम्मेदारी से फारिग हुई और मुझे मौका मिला, तो सोचा ऐसे ना तो ऐसे ही सही कम से कम कुछ दिन तो कन्हैया के साथ रह पाऊंगी।
देख बेटा में किसी भी धर्म का अनादर नहीं करती पर मुझे अब मनमोहना की सेवा में लगना है। तू तो जानती ही है रसखान भी तो एक मुस्लिम थे, लेकिन किस तरह कन्हैया की मूरत देख कर बाबरे से हो गये और सच्ची कृष्ण भक्ति में ही अपना सारा जीवन न्यौछावर कर दिया, बस ऐसा ही कुछ मेरे साथ है। यह छलिया है ही इतना प्यारा।किसी को भी अपनी मोहिनी मूरत से दीवाना कर दे। पर मैं वादा करती हूं, कभी भी किसी को भी शिकायत का मौका नहीं दूंगी। बस अब मुझे अपने मनमोहना के साथ रहने दे। बाकी तेरी मर्जी।
आयशा मुस्कुराते हुए कहा तुम फिक्र ना करो, तुमने सारी उम्र हम सब की खिदमत में लगा दी, अब क्या हम तुम्हारी एक छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते।
मैं बाहर जाकर अब्बू से कह देती हूं, यह हार्ट ट्रांसप्लांट का ही असर है। अब तुम जितना चाहो अपने मनमोहना के साथ रहो।
ठीक है, अम्मी अपना ध्यान रखना और बेफिक्र होकर मनमोहना का जन्मदिन मनाना। कोई भी तुम्हें नहीं रुकेगा।

कंकाल- गृहलक्ष्मी की कहानियां

अच्छा खुदा हाफिज …ना ना आपकी तो राधे कृष्णा ही है। आयशा ने मुस्कुराते हुए कहा तो आसमां ने भी राधे कृष्णा कहकर उसका स्वागत किया और फिर से अपनी मनमोहना के जन्मदिन की तैयारी में जुट गई।

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