ठीक पीने नौ बजे घड़ी देखकर सोमेश दफ्तर के लिए निकल पड़ते । मैं बैग उठाकर उन्हें लिफ्ट तक छोड़ने के लिए दरवाजा खोलती तो खाली कचरे का डिब्बा घर की देहरी से सटा रखा होता । शायद यह बात सोमेश कई दिनों से गौर कर रहे थे कि कचरेवाली कचरा तो लेकर चली जाती है, मगर मैं इस बीच खाली डिब्बा ज्यों-का-त्यों पड़ा रहने देती हूं । घर से निकलते ही सबसे पहले खाली डिब्बे का दर्शन उन्हें अपशकुन प्रतीत होता । उनके इस वहम से परिचित होते ही मैंने अपनी आदत बदल ली थी और ऐसी स्थिति में मेरे और अंजा के औपचारिक परिचय ने आत्मीयता की प्रगाढ़ता ग्रहण कर ली थी ।

अब होता यह था, जैसे ही उसकी घंटी बजती, मैं फौरन अपनी व्यस्तता झटककर डिब्बा उठा अंजा के सामने पहुंच जाती और उसे तुरंत खाली कर देने के लिए कहती । एक-आध रोज तो इस परिवर्तन से उसे परेशानी हुई थी । कचरे का ‘झाबा’ अट्ठावन नंबरवाले फ्लैट के सामने ही वह हमेशा की तरह रखा छोड़ आती थी । पूछे बिना उससे रहा भी न गया था। मुहांसे भरे सांवले गालों की उभरी गोलाइयों के नीचे कुछ अधिक फटे होंठों में वह अर्थपूर्ण ढंग से मुसकराई थी-“इधर कचरे का डिब्बा चोरी नई होता ।”

उसके गलत मतलब निकालने पर एकाएक दिमाग भला उठा था । सुबह का वक्त था, संयत होकर जवाब दिया, “यह बात नहीं है, अंजा । असल में…सा’ब को दरवाजे पर पड़ा हुआ खाली कचरे का डिब्बा अपशकुन लगता है… बस इसीलिए…”

“क्या!” उसका मुंह अचरज से खुल गया। आंखें पटपटाकर बोली, “सा’ब इतना शिखेला-पढ़ेला मानुस होकर ये सब बात मानता है क्या? आजकल तो अपुन लोग भी ऐसा बात पे इस्वास नहीं करता, फिर…”

क्षण भर निर्विकार भाव से देखा मैंने उसे, फिर खाली डिब्बा लगभग उसके हाथ से झटककर अपना दरवाजा बंद कर लिया । इस प्रश्न का जवाब भी क्या था मेरे पास? जबरन सहेजा हुआ तटस्थ भाव रसोई तक पहुंचते-पहुंचते मोम-सा पिघलने लगा । एक तरह से उसका यह कटाक्षपूर्ण प्रश्न अच्छा लगा था; क्योंकि उसके प्रश्न में जिज्ञासा की तीव्रता के अलावा सोमेश के वहमी व्यक्तित्व के प्रति तिरस्कार का भाव भी था…

‘…इतना शिखेला-पढेला मानुस!’

अंजा के ये शब्द व्यस्तता के बावजूद मस्तिष्क के संवेदन तंतुओं में दुबके हथौड़े की धमक से निरंतर बजते रहे । लगा था, कभी अंजा को अपने करीब बैठाकर वह सब बता दूं…मैं एक नहीं, कई-कई वहमों की चोट से छिदी हुई हूं..और शुष्कता की हद तक जीवन मोह से विमुक्त…और जब अंजा की आंखों का प्रतिपल गहरा होता विस्मय एकाएक उपहास बनकर सोमेश के व्यक्तित्व पर गिट्टयां उछालेगा तो… शायद मैं एक सुखद राहत महसूस करूंगी । एक मामूली कचरे वाली का उपहास…मेरी अपनी टीसों पर ठंडा फाहा होगा…

ऐसा हो नहीं पाया । उसे अपने करीब फुरसत से बैठा तो नहीं पाई। बस परस्पर बोल-चाल निश्चय ही बढ़ गई। यह भी सोमेश से छिपा नहीं रहा । अपनी नाराजगी वे दबा नहीं सके। एक रोज झुंझलाकर बिफरे, “कचरा देने में इतना समय लगता है?” बात सुनकर भी मैंने अनसुनी कर दी।

मेरी यह ढिठाई उन्हें बेहद नागवार गुजरी-” मेरा नहीं तो पास-पड़ोसवालों का तो लिहाज करो ।”

सुनकर विद्रोह की एक तड़प-सी कौंधी। चीखों का ढका-दबा सैलाब फट पड़ने को हुआ, किंतु…हमेशा किसी तरह सब भीतर-ही-भीतर अंतस की गहराइयों में फूटता रहा…बहता रहा, बहुत पहले अपनी घुटन को अभिव्यक्ति दी थी…चश्मा उतारकर अपनी आंखें दिखाई थीं । इन आंखों में देखने की शक्ति है…मस्तिष्क सोचता भी है… हृदय में संवेदनशीलता भी है…

सुनकर सोमेश हंस दिए थे-“तुम्हारी आंखें सचमुच खूबसूरत हैं, दिवा; पर देखने के लिए उन्हें चश्मे के सहारे की जरूरत है?”

फिर जो निर्णय लादने की शुरुआत का सिलसिला शुरू हुआ, उसने शायद मेरे कंधों की मजबूती पहचान ली थी…शादी के चार साल बाद समीप हुआ था ।

…मेरी खरीदी हुई स्लेट तथा रंगीन चाकों का डिब्बा न जाने कहां पड़ा होगा, सुंदर जिल्दवाली अक्षर ज्ञान की किताबें अपने ऊपर रखी जानेवाली नन्ही कोमल उंगलियों के स्पर्श से वंचित न जाने किस दराज में पड़ी धूल खा रही होंगी । पांच साल का समीप मेरी कांपती हुई टांगों से लिपटा चीखें मारता रहा…मदर ने अंक में भरकर उसे बहलाते हुए गोद में उठा लिया था और सांत्वना से मेरे कंधे थपथपाते हुए कहा था-कीप पेशंस!…

… भाभी-भैया सोमेश को देखकर लौटे थे । भाभी ने कहा था, ‘उन्हें तो एम.ए. या पी.एच.डी., से नीचे पक्षी-लिखी लड़की चाहिए ही नहीं ।’ कई महीनों तक मुझे देख-दाख आने के बावजूद सोमेश के घरवालों ने मेरे संबंध में ब्याह का निर्णय लटकाए रखा था । शादी हो जाने के काफी अरसे बाद मौसी ने बताया था, चश्मे के बावजूद उन्हें इतनी सुंदर लड़की ढूंढ़े नहीं मिली थी । लड़कियां तो बहुत देखी गई थीं, पर सुंदरता, शिक्षा तथा जन्मपत्री का मिलना और बत्तीस गुणों तक मिलना मेरे साथ ही संभव हो पाया था और इसीलिए निर्णय में समय तो जरूर लगा, पर हुआ मेरे पक्ष में ।

उस रोज की घटना…सालों हो गए, मगर आज भी याद करते हुए सिहरती हूं । सोमेश दफ्तर के लिए निकल रहे थे और सहसा उनके दरवाजे के बाहर होते ही मुझे याद आया था कि मैं जल्दबाजी में उन्हें रूमाल देना भूल गई हूं । लपककर दरवाजा खोल कॉरीडोर में पहुंची तो पाया कि वे लिफ्ट के सामने खड़े उसके ऊपर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे ।

‘सुनिए!’ मैंने रूमालवाला हाथ आगे बढ़ाकर उन्हें पुकारा तो वे एकाएक मुड़े और तमतमाए से मेरे करीब आकर तकरीबन बांह से घसीटते हुए भीतर खींच ले गए। और इतनी जोर का धक्का मारा कि मेरा पूरा शरीर जड़ से उखड़े पेड़ की तरह ड्राईंगरूम की दीवार से टकरा गया । सुन्न होती देह और काले-काले धब्बों से भर गई। आंखों से मैंने उनका चेहरा कोशिश कर देखा था। वे लगभग चीख रहे थे, ‘आइंदा ऐसी हरकत मत दोहराना, समझी? कितना भी जरूरी काम क्यों न हो-एक बार मैं घर से निकल गया तो समझो, निकल गया । पीछे मुड़कर कभी न बुलाना । दफ्तर में फोन भले ही कर देना!’

उस वक्त अम्मा कुछ दिनों के लिए हमारे साथ थीं । मेरे प्रकृतिस्थ होते ही उन्होंने मुझे सोमेश के वहमी प्रकृति पक्ष और उसकी प्रामाणिकता पर लंबा-चौड़ा भाषण दे डाला था कि ऐसी टोका-टोकी से किस तरह बनते हुए काम बिगड़ जाते हैं, ‘इन सब बातों में तुम्हें ध्यान रखना होगा, बहू । सोच-विचारकर चलने की हमारी कुल परंपरा है । हम बीस बिसुआवाले कान्यकुब्ज जो ठहरे ।’

रूढ़ि और पाखंड के बवंडर से घिरा आहत मन क्षोभ और पीड़ा से छटपटा उठा था । भैया-भाभी के प्रति आक्रोश की उभड़ी चिनगारी शनैः-शनैः जवान आग की शक्ल अख्तियार करती जा रही थी कि तभी अचानक अंजा से भेंट हो गई थी और जानबूझकर मैंने उससे संसर्ग बढ़ाना शुरू कर दिया था, ताकि ऊंच-नीच की कुलीनता-अकुलीनता से प्रभावित रहनेवाली सोमेश की भावनाओं का मुंह बिरा सकूं…

एक दोपहर गहरी नींद में घंटी की आवाज सुनकर जब मैंने दरवाजा खोला तो पाया, सामने कचरेवाली अंजा खड़ी है । समझ में नहीं आया, इस वक्त वह क्योंकर आ सकती है । उसके असमय आने का प्रयोजन पूछना ही चाहती थी कि तब तक वह साधिकार भीतर दाखिल हो गई । पता नहीं क्यों, मुझे उसका आना अच्छा लगा । उससे बैठने के लिए कहकर सोत्साह वॉश-बेसिन पर जाकर मुंह-हाथ धोने लगी । फिर दो कप चाय बनाकर, उसे कपों में छान एक कप अंजा को थमा उसके निकट आकर बैठ गई । अकसर जब कभी उसे सुबह ‘फ्रिज’ का ठंडा पानी पीना होता था तो वह मुझसे ही मांगती थी । मैं निस्संकोच पानी गिलास में ढाल उसे थमा देती । गिलास में पानी लेते हुए वह संकोच से सिकुड़ उठती । कहती, ‘बाई, एक तुम्हीच हो जो अपने को बोईच बरतन में पानी पिलाता है जिसमें तुम खुद पीता है । नई तो अपुन को तो लोग उसीच कप में पानी देता है जो कचरे में फेंकनेवाला होता है । समझते हैं, हम इनसान नई, मैला है, मैला ।’

वह बिना कुछ बोले फौरन चाय सुड़कने में तन्मय हो उठी । उसके द्वारा ही कुछ कहने जाने की प्रतीक्षा करती रही । उसका चेहरा चिंतामग्न काफी उदास लग रहा था । मैंने उसे हमेशा हंसते हुए, मजाक करते हुए देखा है । बल्कि सुबह मुझे उसके रसीले बतकहाव की वजह से ही प्रतीक्षा रहती थी कि भेंट होते ही वह कोई-न-कोई टीका-टिप्पणी भरी बात करेगी, या फिर कुछ फूहड़ किस्म के मजाक, जो मुझे वस्तुतः अच्छे लगते थे । हमारे बीच दुबकी बैठी चुप्पी मैंने ही तोड़ी ।

“क्या बात है, अंजा? आज तुम बड़ी परेशान नजर आ रही हो?”

“हां…वो…बाई। मेरे को कुछ रुपया चइए था ।” वह संकोच से सहमती हुई साहस कर बोली।

“पैसे! क्या जरूरत आ पड़ी तुम्हें?”

“झोपड़ा लेने का मेरे को ।”

उसकी बात सुनकर मुझे अचरज हुआ । अपनी जिज्ञासा दबा नहीं पाई, “घर नहीं है क्या तेरे पास?”

“है, पन…” कहकर वह अपने मन की दुविधा झेलती कुछ पल मौन हो आई । लेकिन चाय खत्म होते-न-होते वह अपनी सारी परेशानी व्योरेवार बता गई । उसने तथा उसके तीसरे पति ने मिलकर खार झोपडपट्टी में एक झोपड़ी ली है, जिसके लिए उसे डेढ़ सौ रुपए डिपाजिट और पंद्रह रुपए चालू भाड़े का जुगाड़ करना था । मैंने देखा, घर के विषय में बताते हुए उसका उदास चेहरा खिले फूलों-सा निखर आया है। “अभी वाला घर में नल भी है, म्युनिसपेलिटी का संडास भी है । पिच्छू जहां हम रहता थान, वहां पानी का बोत दिक्कत था । बंबा से पानी भर के लाना पड़ता था । और संडास?… सुनेगा तो तुम हंसेगा-इश्वास नई करेगा-एकदम सुबू को उठकर सड़क का बाजू में… “

ऐसी दयनीय स्थिति सुनकर भी मैं अपनी हंसी रोक नहीं सकी थी ।

जाने के पहले डेढ़ सौ रुपए मैंने उसकी हथेली पर धर दिए थे । अंजा की आंखें अनायास स्नेहिल कृतज्ञता से भीग आई थीं । अचानक झुकी तो उसका हाथ मेरे पैरों पर टिक गया-“बाई! आपका जैसा दिल किसी का नई देखा अपुन ।”

घर!…मुझे अंजा को मनपसंद घर मिल जाने की खुशी हुई थी । अपना यह फ्लैट मुझे कभी घर की तरह नहीं लगा । किसी दौड़ती हुई ट्रेन के स्लीपर कंपार्टमेंट का हिस्सा भर महसूस हुआ, जिसका फर्श दूसरों के घर की छत है और छत किसी और के घर की जमीन….

दो-तीन कहानियां लगातार पड़ गई थी । आंखों में दर्द-सा महसूस होने लगा था । पता नहीं, चश्मे का नंबर बढ़ गया है या दोपहर भर लगातार पढ़ने का नतीजा था । कहानी की पत्रिका सिरहाने उठाकर रख दी । चश्मा उतारकर दोनों हथेलियों से दुखती आंखों को हलके-हलके दबाया । एक सुखद राहत से पलकें तंद्रिल हो उठीं । नहीं-नहीं, मैं सोना नहीं चाहती-

सोमेश महसूस ही नहीं करते कि अब मैं पढ़ते-पढ़ते थक गई हूं, सोते-सोते थक गई हूं, दिन भर टेबल-कुरसियां, कुशन झाड़ते-पोंछते थक गई हूं-सिर्फ उनकी और उनकी ही बातें सुनते-सुनते थक गई हूं । न किसी के संग उठना-बैठना, न कहीं मन-मुताबिक आना-जाना । आना-जाना भी हो तो सोमेश की उपस्थिति का दबाव हर पल किसी पीछा करते हुए व्यक्ति की कड़ी निगरानी के आतंक-सा मन को बंधक बनाए रहता ।

अंजा से मैंने अपनी इस ऊबन का जिक्र किया तो वह सुझाव देती सी बोली थी, “बाई, अक्खा दिन काय कू घर में पड़ा सड़ता है कि दूर ऑफिस-वापिस में काम-धंधा देख लो न । साबजी भी बोलता हय, तुम गुप-चुप काय को मान लेता हय? तुम शिखेला-पढ़ेला है न…परवा मत करो । जितना परवा करेगा न उतनाच वो तुमको आंख दिखाएगा । समझा…फिर बाबा का भी तो काम नई है । वो उधर शाणा में और तुम इधर घर में अकेला भूत सरखा ।”

उसकी बातों ने सचमुच घेरे को तोड़ने का विद्रोह पैदा कर दिया था । सोमेश को बिना बताए एक स्कूल में मैंने हिंदी अध्यापिका का प्रार्थना-पत्र भेज दिया । साक्षात्कार का बुलावा आने पर चुपचाप साक्षात्कार भी दे आई । अचानक एक दोपहर मुझे स्कूल के अधिकारियों का पत्र प्राप्त हुआ कि मुझे वहां एक हफ्ते के भीतर ज्वॉइन कर लेना है ।

सुबह नाश्ते की टेबल पर सोमेश को जब मैंने यह खुशखबरी दी तो प्रत्युत्तर में उनका क्षण भर पहले का मीठा स्वर चिड़चिड़ाहट में बदल गया ।

“नौकरी की तुम्हें क्या जरूरत आ पड़ी?”

“समीप के चले जाने के बाद से मैं दिन भर अकेली पड़ी ऊबती रहती हूं । बस, यही सोचकर आवेदन-पत्र भेज दिया था ।”

“समय ही काटना है न! लिख-पढ़कर भी तो समय गुजारा जा सकता है ।”

“कितना?”

“औरतें और भी बहुत-से काम घरों में करती हैं । तुम उनसे निराली हो?”

“निराली नहीं हूं, मगर वे बच्चे भी तो पालती हैं ।”

“दिवा!” उनकी आवाज उत्तेजना से कांपने लगी, “तुम्हारे वाहियात तर्कों के फेर में मैं नहीं आनेवाला । घर में रखकर समीप की जिंदगी नहीं बिगाड़नी है मुझे ।”

“मुझे क्यों घर में रख छोड़ा है?”

मेरे इस दुस्साहस की उन्हें रंचमात्र भी कल्पना नहीं थी । दाढ़ी का ‘ब्रुश’ गुस्से से बेसिन पर पटकते हुए वे तौलिया उठा भन्नाते हुए बाथरूम की ओर मुड़ गए-“पता नहीं हराम…क्या चाहती है! पांच लाख का फ्लैट है…बच्चा आराम से सिंधिया में पढ़ रहा है…ख्वाहमख्वाह आंसू टपकाने की आदत पड़ गई है । वह भी ठीक ऑफिस के लिए तैयार होने के समय ही…रेड मारकर रख दी । मल्होत्रा वाला अनुबंध आज तय होने से रहा ।”

बाथरूम का दरवाजा बंद करने से पहले उन्होंने मुझे आग्नेय नेत्रों से पूरा, फिर आदेश भरे स्वर में बोले, “फिजूल के तेवर दिखाने की जरूरत नहीं है। उन्हें अभी इसी वक्त पत्र लिखकर मना कर दो, ताकि वे किसी और को तुम्हारी जगह नियुक्त कर लें। समझीं!”

क्या मैं मात्र सोमेश की उंगलियों का संकेत भर हूं? वही और बस इतनी ही मेरी पहचान है और मेरे होने की शर्त अंजा ने तीसरे आदमी के साथ घर बसाया है-मैं…मैं..इस कटीली फेसिंग को सुरक्षा की चारदीवारी का भ्रम बनाए क्यों पेट में निवाले डालने की मजबूरी को जीवन का तालमेल और आपसी समझदारी जैसे अर्थहीन शब्दों की आड़ में जी रही हूं । अंजा के लिए नहीं, उसका और मेरा समाज-समाज का जीवन-दर्शन अलग-अलग है ।

बाथरूम से बाहर आकर सब कुछ पटका-पटकीवाले मूड में स्वतः किया गया । मेरे निकाले हुए कपड़े न पहनकर दूसरे निकाल लिये गए। पालिशवाले जूतों को परे सरकाकर गंदे साँडल पहने गए । रूमाल भी दूसरा ढूंढ़ा गया; पर शायद मिला नहीं । अतः रोष में वह भी साथ नहीं रखा गया…

दरवाजा इतनी जोर से बंद किया गया कि बड़ी देर तक कानों में एक अजीब-सी झन्नाहट गूंजती रही ।

उठकर दरवाजे तक मैं भी नहीं गई । हमेशा ही समझौते को प्रस्तुत रहनेवाली मेरी आदत ने एकाएक रुख पलटा था और इस ढिठाई के लिए मन को पछतावे जैसी भावना ने उद्वेलित भी नहीं किया । बस, आक्रोश का ज्वार निरंतर मन को बेधता रहा । कब तक यह सब सहना है? छह सौ रुपए की यह नौकरी मुझे अपने ढंग से खड़ा तो रहने दे सकती है । फिर …

…घृणा…घृणा…घृणा का अविराम बहाव कब से अंतर की अनदेखी गुहाओं में अबाध बहता रहा था, मुझे आभास ही नहीं हुआ! एक शख्स के इतने हिस्से कैसे कर दिए जाते हैं? बेटी, बहू पत्नी, मां-नारी…पैदा होते ही उसे समझाना शुरू कर दिया जाता है कि उम्र के हर टुकड़े को दूसरों की सुविधाओं के अनुकूल आत्मसात् करके जीने में ही उसका जीना है-एक निर्धारित स्वीकार…क्यों? आखिर क्यों? तकिया अमीबा की शक्ल में कई जगह से भीग गया ।

उठकर मैंने दीवारों-दरवाजों के इन हिस्सों को बार-बार छुआ था, पढ़ा था, जिन पर पिछली क्रिसमस की छुट्टियों में आए हुए समीप ने कहीं ए.बी.सी.डी. लिख दी थी तो कहीं सेब का अंडाकार आकार खींचकर ए फॉर एप्पल लिख दिया था …कहीं वन, टू थ्री, फोर…

रात को सोमेश मेहमानों के कमरे में ही सो गए । सुबह पता नहीं कब उठकर चले गए । दो बजे तक नींद ही नहीं आई । उठी । मेडीसिन बॉक्स से कंपोज निकाल खाया तब कहीं जाकर आंख लगी ।

किसी भी काम के लिए उठने की इच्छा नहीं हो रही थी। लेकिन कचरेवाली अंजा की घंटी और साथ-साथ ऊंची हुई लहकदार आवाज ने चुंबक-सा खींच लिया । उठकर रसोई में आई तो हाथ यंत्र-चालित से फ्रिज पर चले गए। देखा, दूध की चारों बोतलें स्टैंड में करीने से लगी हुई हैं । सोमेश ने उठकर ले ली होंगी । मुझे तो पता ही नहीं चला कि कब दूधवाले की घंटी बजी, कब पेपरवाले की। रसोई के प्लेटफॉर्म

पर चायदानी तथा एक जूठा कप भी पड़ा हुआ दिखा । परंतु मन को ग्लानि नहीं हुई । यह सब मुझे तकलीफ पहुंचाने की भावना से नहीं किया गया है, बल्कि यह दर्शाने का प्रयास है कि तुम्हारे बगैर भी इस घर में पत्ता खड़क सकता है । तभी मन को मथते तर्क-वितर्क को परे झटक मैं कचरे का डिब्बा उठाकर फुर्ती से बाहर आई । बाहर खड़ी वह मेरी प्रतीक्षा कर रही थी ।

कचरे का डिब्बा जैसे ही मैंने उसकी ओर बढ़ाया, तेज-तर्रार अंजा ने किसी अप्रिय घटना की परछाई मेरी आंखों में पढ़ ली ।

“क्या बात है, बाई? आंख तो ऐसा सुझेला हय जैसा रात को तुम बेवड़ा मारकर सोया हो ।” मजाक करके वह खुद ही ‘हो-हो’ करके हंस दी । परंतु मैं न हंस सकी । शून्य दृष्टि से उसके कचरे के झावे को घूरती भर रही ।

“रात सा’ब से लफड़ा हो गया था?” अंजा मेरी खामोशी पर तिक्त होती गंभीर हो आई।

“हां ।” मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।

“मरद जात कोई-कोई छोड़ के बोलेंगे तो…पक्का भड़ुआ होता है । अपन ने हिम्मत छोड़ी कि समझो उसके उनके खीसे में ।” उसने हिकारत से मुंह बिचकाया ।

उसकी इस गाली में शायद मिला-जुला आक्रोश था । सुनकर मैं अचकचा उठी । उसे शायद इस बात की परवाह नहीं थी कि इस तरह की कड़ुवाहट हमारे भीतर भी उठती है; किंतु ऐसी अशालीन शब्दाभिव्यक्ति में हम उसे सुनने-कहने के आदी नहीं होते…

अंजा का आक्रोश पीछे लौटता कहीं अपनी यंत्रणाओं की गलियों में भटकने लगा था…

“हम तो पहलेवाले मर्द को छोड़ा इसीलिए…अक्खा दिन किटकिट। जितना पगार उठाता था, सब दारू में खलास…तीन साल में तीन बच्चा । बोत मुश्किल से एक गेस्ट हाउस में झाडू-कचरा उठाने का नौकरी मिला । पगार बोलेंगे तो फकत अस्सी रुपया… साला, जब देखो तब भेज देता था गेस्ट हाउस के मेम सा च के पास-अंजा, पांच रुपया उधार मांगकर ला न मेम सा’ब से…दारू भी मेरे पैसे की पीता और धुत्त होकर हड्डी भी मेरी तोड़ता-बच्चा लोग दो जून पेट को तरसता…छह साल खडुस के संग कैसा निकला, बोलने को नई सकता । फिर सोचा, मर्द के साथ भी तो अपने हाथ का कमा के खाना पड़ता है । अकेला ही बच्चा लोग को पालेगा…

“पन बाई । जात-बिरादरीवाला अकेला भी तो नई रहने देता ।” कहते-कहते अंजा की आंखें पनिया आई ।” एक दिन हम भट्ठीवाला सेठ सद्धू के घर अपना तीनों बच्चा लेकर आ गया । कुछ दिन तलक तो वो हमकू बड़ा चाव से रखा । फिर लगा दिया भट्ठी के काम में…मैं नौसादर और गुड सड़ा के दारू बनाने लगी और वह हरामखोर…रात-दिन जुआ खेलने लगा । बाद को पता लगा, एक रंडी पन रखेली होती उसने…वहीं अक्खा रात-दिन पड़ा रहता । झगड़ा करने से भड़ुआ मेरीच पिटाई करता…

“कितना दु:ख रोएगा…सद्धू ने मेरे दोनों छोकरों को दारू पहुंचाने के काम में भिड़ा दिया…एक रोज दोनों मोटर का टियूब में दारू भरकर अंधेरी स्टेशन का पिच्छू एक होटल में पहुंचाने गया होता, तभी पोलिस का हाथ पड़ गया…और वो कुतरा ?…जामिन के वास्ते भी नहीं गया । बचा वो भी नई । एक दिन अक्खा झोपड़पट्टी पर पोलिस का भाड़ पड़ा । खोद-खोद के माल बाहर निकाला । सद्धू को भी पकड़ा । छोटेवाले बच्चे को लेकर मैं कैसा भी बच के भाग निकली। मंगतराम पेट्रोल पंप वाली झोपड़पट्टी में एक रिश्ते की भावज थी । उसी के पास… भावज बड़ा-बड़ा बिल्डिंग में कचरेवाली का काम करती थी । मैंने भी पेट पालने के लिए दो-चार घर पकड़ लिये । बाद में खबर लगा था, सद्धू को साल भर का तड़ीपार मिला है ।”

सहसा बगलवाले फ्लैट का दरवाजा खुलने से हमारी बातचीत में व्यवधान पड़ा । अंजा एकाएक खामोश हो गई । फ्लैट के मालिक मिस्टर पंजवानी बाहर निकल रहे थे । अंजा बड़े सहज भाव से चुपचाप अन्य घरों की ओर बढ़ती हुई उनकी घंटी बजाने लगी ।

मिस्टर पंजवानी ने मेरे करीब ठहरकर मुझसे ‘हलो’ की । प्रत्युत्तर में मैंने अपनी अटपटी स्थिति को ढकते हुए मुसकराकर उनसे प्रतिप्रश्न किया, “बहुत दिनों से आप दिखाई नहीं दिए?”

“जी, मैं करीब तीन महीने के लिए यूरोप की यात्रा पर था ।”

“अच्छा!” मैंने स्वर में भरसक विस्मय भरकर कहा ।

वे मुसकराते हुए लिफ्ट की तरफ बढ़ लिये । उनके जाते ही अंजा दरवाजे से बाहर प्रतीक्षा करते कचरों के डिब्बों की उपेक्षा कर पुन: मेरे करीब आ खड़ी हुई ।

“बाई!” उसका स्वर मेरी ओर झुकता हुआ अचानक फुसफुसाहट में बदल गया, “बाहर-बीहर कहीं नई गया था । तीन महीना जेल काट के आया है ये सा’ब, मालूम क्या!”

“क्या!” उसकी करुण कथा से अभिभूत मेरा हृदय एकाएक किसी सनसनीखेज घटना को जान लेने की तीव्र उत्सुकता में परिवर्तित हो उठा ।

“बोत बड़ा स्मगलर है ये…पकड़ा गया था…बचा नई…तुमको पता नई?”

“नहीं?” मेरे विस्मय का पारावार नहीं था ।

“बोत ऊंचा-ऊंचा लोग रहता है आपके पड़ोस में । चौंतीस लंबरवाली वो केशव मेम सा’ब है न । आपको तो यईच पता होगा कि वो नाच-वाच सिखाती हय…डांस का किलास चलता है उसका । पर असल में…” कहते-कहते अंजा संकोचवश तनिक ठिठकी, “धंधा करती है छोकरियों का…उनका घर का कचरे के साथ बोत सारा फैमिली प्लानिंग पड़ा रेता हय…क्या बोलेगा, छिह!” घृणा से मुंह बिचकाकर जैसे किसी से त्रस्त होकर नाक सिकोड़ी ।

“तुम्हें ये बातें कैसे मालूम पड़ जाती हैं?” मैंने अचरज से पूछा, “जबकि मैं पड़ोस में रहती हूं ।”

“तुम भी बाई, बुद्ध सरीखी बात करती । कचरा के साथ बहुत सारी बातें ये लोग खुद ही बाहर फेंक देता हय ।”

मेरा मन उसकी कुशाग्रता पर हतप्रभ हो उठा । कैसी आत्मविश्वास से पगी औरत है! कितनी तेज बुद्धि! कितने आधी-तूफान झेले, मगर छीज-छीजकर भी लड़ाई लड़ रही है…

आज वो घंटी नहीं बजी, न वो लहकदार आवाज ही सुनाई पड़ी जिसकी मुझे बेचैनी से प्रतीक्षा रहती थी ।

घंटी तो बजी थी और कचरे के लिए पुकार भी आई थी, लेकिन घंटी का अंदाज रोजवाला नहीं था । आवाज किसी आदमी की थी । मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। कचरे का डिब्बा उठाकर मैं हतोत्साहित-सी दरवाजा खोलकर खड़ी हो गई। मैंने अंजा की जगह पर एक बूढ़े को खड़ा पाया ।

“आज अंजा नहीं आई? तबीयत ठीक नहीं है क्या उसकी?” मैं अपनी जिज्ञासा कोशिश करके भी दबा नहीं पाई ।

प्रत्युत्तर में बूढ़े ने बुरा-सा मुंह बनाया और कटाक्ष भरे स्वर में बोला, “तबीयत क्या, बीबीजी! जिसकी एक के साथ नहीं निभी, दस के साथ क्या निभेगी! फिर आदमी और जगह बदल लेने से जिंदगी थोड़े ही बदल जाती है ।

“क्यों? ऐसा क्या हुआ?” मैंने आशंका से भरकर पूछा ।

“होना क्या था, बीबीजी । रात मियां-बीबी में खूब झगड़ा हुआ। मरद जात, लुगाई की सहन नहीं हुई…हाथ उठ गया सो उठ गया । अंजा ने ताव में कुछ खा-पी लिया । वाडिया अस्पताल में पड़ी है। अभी तक होश नहीं आया है । मुझे उसके मरद ने बदले में काम संभालने के लिए भेजा है ।”

सुनकर मैं अवाक् हो उठी हूं । काम में मन नहीं लग रहा । दिमाग में निरंतर बूढ़े की आवाज गूंज रही है-‘आदमी और जगह बदल लेने से जिंदगी थोड़े ही बदल जाती है ।’

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