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कच्ची उम्र की पक्की नौकरी-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां बिहार
Kacchi Umar ki Pakki Naukri

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

स्कूल से आते ही उस दिन लड़का देर तक चिल्लाता रहा कि उसे पॉकेट मनी चाहिए ही चाहिए, क्योंकि उसके सभी सहपाठियों को उनके पिता पॉकेट मनी देते हैं।

उसके माली पिता बड़ी मुश्किल से उसके लिए अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई के लिए खर्च जुटा पाते थे। वे अपनी असमर्थता से व्याकुल हो, बिना खाए-पिए हताशा में घर से बाहर निकल बस स्टैंड की तरफ जाने वाली गली में बढ़ गए।

इधर हल्ला मचा कर, थक कर लड़का भी रूठा-सा, घर के सामने मैदान में आ गया। किनारे रखे बड़े पाईप पर बैठ सुबकने लगा। थोड़ी दूरी पर नगर निगम द्वारा रखे गए कचरे के कंटेनर के पास कचरा चुनती, कुछ-कुछ बीनती, बैठी लड़की जो उसी के हमउम्र और उसकी पड़ोसन भी थी, उसके सुबकने की आवाज सुन पास आकर खड़ी हुई-

“क्या हुआ रे, काहे रोता है? किसी ने मारा है क्या?”

“मझे स्कल नहीं जाना है!” उसने सबकते हुए कहा।

“क्यों नहीं जाना? बस्ता लेकर स्कूल ड्रेस में तू तो साहेब जैसा बड़ा अच्छा लगता है!”

“साहेब जैसा! हुँह! खाली-पीली फोकटिया साहेब। सभी बच्चों को घर से पॉकेट मनी मिलता है। वे लोग सब साथ में बाहर जाते हैं। मैं वहां अकेला….!”

“अच्छा ये बात!” लड़की सयानी बनकर उसकी बात सुन फिर बोली”तुझे मालूम है कि मैं कचरे बीनकर रोज साठ रुपए कमाती हूँ?”

“साठ रुपए रोज, इस कचरे से?” कहते हुए उसने कचरे के कंटेनर की ओर देखा।

“हाँ, मैं ऐसे बहुत सारे कचरे के डिब्बे में जाकर काम की चीज ढूंढती हूँ, बोरा भरकर बीनती हूँ और कबाड़ी को तुलवा आती हूँ!” लड़की ने उसकी आँखों में देखते हुए उसे बताया।

“लेकिन मैं तेरे जैसे कचरा बीनने तो नहीं जा सकता?”

“तू मेरे लिए काम कर, तो रोज के बीस रुपए मैं तुझे दे सकती हूँ।”

“तेरे लिए काम…मैं करूं? जा भाग इधर से, नहीं तो मार खाएगी!” बच्चे ने हिकारत भरे भाव से कहा।

“मुझे मारेगा! अच्छा सुन, मास्टर बनकर पीटेगा तो पीट लेना। मार खा लूंगी।”

“मैं मास्टर!”

“तू रोज स्कूल में जो भी पढ़कर आएगा, बस वही सब मुझे रोज पढ़ा देगा, तो बदले में रोज के बीस रुपए दूंगी।”

“ट्यूशन पढ़ाने को बोल रही है तो सीधे-सीधे बोल नहीं सकती! चल, आज से ही पढ़ाना शुरू करता हूँ। यहीं रूक, अभी अपना बस्ता लेकर आता हूँ।” कहता हुआ, हौसलों से भरा लड़का तेजी से अपने घर की ओर दौड़ पड़ा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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