इसी के साथ अतीत की कुछ परछाईयां रंजना के सामने घूम गई।
‘‘एक समय था, जब रंजना अपने जन्मदिन की तैयारी महीनों पहले से शुरू कर देती थी, मिठाई का डिब्बा लेकर सबके पास जा-जा कहती थी।
‘‘जो मुझे गिफ्ट देगा, उसे मैं मिठाई खिलाऊंगी। अपने अपने गिफट तैयार रखना।” जब भाई मजाक में कहते।
‘‘अरे रंजू मैं तो गिफ्ट लाना ही भूल गया, ऐसा कर मिठाई खिला दे, मैं शाम को गिफ्ट ले आउंगा।”
तब रंजना मिठाई का डिब्बा पीछे छिपा लेती और मुंह चिढ़ा कर भाग जाती। इस तरह हंसी खुशी के साथ रंजना का जन्मदिन मानता जो हर बार एक यादगार होता। सब गिफ्ट तो तैयार रखते ही थे और इस तरह रंजना के पास बहुत सारे गिफ्ट इकट्ठे हो जाते थे। रंजना घर में छोटी और चंचल थी। इसलिए किसी और को अपना जन्मदिन भूलने नहीं देती थी, लेकिन आज यह कैसा संयोग है कि रंजना खुद ही अपना जन्मदिन भूल गई थी।
जब से दिवाकर उसकी जिन्दगी से गया है उसका जीवन कोरे कागज जैसा हो गया है, न खाने में रूचि न पहनने का शौक। दिवाकर की याद आते ही अतीत ने रंजना का फिर पीछा कर लिया था और रंजना उन पलों को पलकों में आनन्द महसूस कर रही थी।
‘‘दिवाकर और मेरी पहली मुलाकात भी एक इत्तेफाक थी हुआ यूं था कि दीदी की शादी में सब और हॅंसी खुशी का माहौल था, दीदी की शादी थोड़ी देर से हो रही थी। इसलिए मैं भी ब्याह योग्य हो गई थी। पहले तो मम्मी पापा ने कोशिश की कि दोनों के संबंध एक साथ कर दिये जाएं। परन्तु जब बात नहीं जमी तब दीदी की शादी तय कर दी लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मैं हर बात में दीदी की बराबरी कर रही थी, इसलिए उस दिन भी मैं दीदी की तरह ही चोली-लंहगे में सजी-संवरी सब तरफ इठलाती घूम रही थी।
वरमाला के समय मैं दीदी के पास खड़ी थी और जीजू के दोस्त दिवाकर उनके पास खड़े थे। वरमाला के समय जीजू के दोस्तों ने उन्हें गोद में उठा लिया था और दीदी असमन्जय की स्थिति में खड़ी थी। जब ऐसा ही हो-हल्ला का माहौल था उसी समय दीवाकर मेरे पास आये और कान में धीरे से बोले। ‘‘काश वक्त ठहर जाये और एक माला मैं भी आपके गले में डाल दूं।” मैं शरमा गई, लेकिन उस समय जब मैंने दिवाकर को करीब से देखा, फिर तो वह मेरे दिल में उतरते गये।
दिवाकर एयरफोर्स में पायलट थे। वक्त गुजरता गया मेरी और दिवाकर की फोन पर बातें होने लगी। दोनों ने एक दूसरे को समझ- परख लिया था, इसलिए परिवारों की रजामंदी से दोनों की शादी हो गई। रजामंदी से प्लानिंग करते हुए संजना हमारे बीच आ गई और हमें खुशियाें को खजाना मिल गया। समय अबाध गति से गुजर रहा था।
एक बार दिवाकर जहाज लेकर हिमालय की उॅंचाइयों पर थे। तभी जहाज क्रेश हो गया और रंजना की रंगीन जिन्दगी के रंग उड़ गये। उस दिन रंजना ने भरे दिल से दिवाकर को विदा किया और संजना को गले लगा लिया।
तभी झटके के साथ कार रूक गई और संजना ने कहा।
‘‘कहॉं खो गई थी, मॉम?”
अरे हां आपको गिफ्ट तभी मिलेंगे, जब आप मिठाई खिलायेंगी।”
और सब जोर से हंस दिये। रंजना सोच रही थी। संजना बिल्कुल उसी की तरह चंचल और शरारती है।
रंजना झेप गई और इस बात से ध्यान बंटाने के लिए बोली। और पढ़ाई कैसी चल रही है संजना इस बार किस रैंक की तैयारी है?
रंजना जी, आप बिल्कुल चिंता नहीं करें, संजना अब मेरी जिम्मेदारी है, उसकी पढ़ाई बहुत अच्छी चल रही है और प्लस रैंक तो पक्की है।”
सोमेश ने महसूस किया कि शायद वह कुछ ज्यादा ही बोल गया है। इसलिए अपनी बात को बदलते हुए वह बोला।
‘‘संजना अब घुमना फिरना बंद और पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना हैं” संजना ने भी हां में हां मिलाते हुए कहा।
‘‘जी, अंकल जी..”
रंजना ने कहा, ‘‘सोमेश जी आईये, आप मेरे जन्मदिन पर बिना कुछ खाये जाएं, यह तो ठीक नहीं ना..”
सोमेश रंजना की बात को टाल नहीं सका और अंदर आ गया।
रंजना सोच रही थी, सोमेश तो संजना के टीचर ही हैं, फिर वह सोमेश पर इतना अधिकार क्यों जताती है।
‘‘रंजना को एकाकी जीवन बिताते हुए 15 साल गुजर रहे थे। इस बीच वह महसूस कर रही थी स्त्री पुरूष एक-दूसरे के पर्याय हैं, यह जीवन एक-दूजे के बिना अधूरा है जब तक दिवाकर रहे, उसे जीवन में कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ, दोनों एक दूसरे के लिए संबल थे।”
दिवाकर के बाद बहुत कुछ बदल गया था। दिवाकर ने भी हिम्मत से समस्याओं का सामना करने की सीख दी थी। इसलिए यही बातें उसे अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए प्रेरित कर रहीं थी। रंजना ने नौकरी के लिए आवेदन दिया था और कोशिशों के बाद उसे नौकरी मिल गई थी।
सोमेश, डिग्री कालेज में लेक्चरार थे और रंजना की सहेली सरिता ने संजना की कोचिंग के लिए सोमेश का नाम प्रपोज किया था। सोमेश ने संजना के लिए न केवल कोचिंग दी बल्कि वह उसके गार्जियन की तरह उसको सहयोग करते थे।रंजना महसूस कर रही थी कि सोमेश दिल के अच्छे व्यक्ति थे। उन्होंने कभी भी रंजना के अतीत में छांकने की कोशिश नहीं की।
सोमेश भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते अपनी जिन्दगी में उलझे थे, और जब तक वह उससे निपट पाते तब तक देर हो चुकी थी अब सोमेश ने अपने परिवार की खुशियों को अपने जीवन का आधार बना लिया था।
संजना भी अब सयानी हो चली थी, संजना की पढ़ाई पूरी होने के बाद उसे सॉफ्टवेयर कम्पनी में नौकरी मिल गई थी, उसी की कम्पनी में मयंक भी था, मंयक और संजना ने एक दूसरे को पसंद कर लिया था।
एक दिन संजना और मंयक कम्पनी से घर के लिए निकल गये थे। मयंक की बाइक पर पीछे संजना बैठी थी। रास्ते में मयंक की गाड़ी खराब हो गई । वहां ठीक करने वाली कोई दुकान नहीं थी इसलिए अब मंयक गाड़ी पैदल खींच कर ले जा रहे थे और संजना पीछे से बाइक को धक्का दे रही थी। जिससे मंयक को गाड़ी खींचने में परेशानी न हो।
रंजना भी पीछे पीछे से आ रही थी उसने जब इन दोनों को देखा तो वह अपनी हंसी नहीं रोक सकी। लेकिन उसे दोनों का एक दूसरे के प्रति समर्पण बहुत अच्छा लगा। दोनों परिवारों की सहमति से संजना और मंयक की शादी तय हो गई है।
संजना की शादी में सोमेश बराबरी से हिस्सा ले रहे थे, और यह देख रहे थे कि इंतजाम में कहीं कोई कमी नहीं रह जाये। शादी की सभी रस्में पूरी होते हुए, विदाई के क्षण भी आ गये थे। संजना की शादी के बाद रंजना अकेली रह गई थी तथा सोमेश का आना भी अब कम हो गया था।
संजना और मंयक के बीच अच्छा तालमेल था, दोनों एक दूसरे को प्यार करते थे और सुख दुःख में बराबरी के सहभागी बनते थे संजना महसूस कर रही थी किः
‘‘ एकाकी जीवन में सहभागी का महत्व पता चलता है। दिन तो किसी तरह कट जाता है परन्तु लम्बी रातें काटे नहीं कटती हैं। संजना ने अपनी शादी के बाद अपनी मां के दर्द को समझा था।
संजना ने एक दो दिन मां के दिल को भी टटोला था। सोमेश के बारे में उनकी राय ली थी, जिसके उसे सकारात्मक परिणाम मिले थे। इसी तरह मंयक ने भी सोमेश के सकारात्मक रुख को देखा था। अब मंयक और संजना ने इस बारे में विचार कर कुछ निर्णय ले लिये थे।
संजना का आज जन्मदिन था जन्मदिन के मामले में संजना भी रंजना की तरह ही थी। वह फोन करके सब को बता रही थी कि ‘‘मेरे जन्मदिन की मिठाई खाना है तो गिफ्ट जरूर लाना। इसके बाद वह हंस देती थी। संजना ने अपना जन्मदिन मां के घर मनाने के लिए कहा।
शाम को सब लोग रंजना के घर इकट्ठे हो गए थे। संजना और मंयक दो सुन्दर माला और मिठाई वगैरह लेकर आये थे, तभी सोमेश केक लेकर आये और प्यार से संजना और मंयक के सिर पर हाथ रखते हुए आशीर्वाद दिया। सब लोग समझ रहे थे कि संजना और मयंक एक दूसरे को माला पहना कर फिर से अपनी वरमाला की यादों को ताजा करने के लिए यह लाए होंगे।
सोमेश ने केक टेबिल पर रख कर उसे संजना से काटने के लिए आग्रह किया। तब संजना ने कहा –‘‘मेरा जन्मदिन आज कुछ सरप्राइज गिफ्ट ले कर आया है। मैंने महसूस किया है कि ईश्वर ने हर स्त्री पुरूष के जीवन में जीवनसाथी की भूमिका क्यों रखी है। लम्बी जिन्दगी का सफर अपने जीवनसाथी के साथ कैसे कट जाता है मालूम ही नहीं पड़ता लेकिन यदि किन्हीं कारणों से जीवनसाथी रास्ते में बिछुड़ जाता है, तब उसका दर्द उसे सहन करने वाली समझ सकता है। जैसा कि मेरी मां ने सहा है। मेरी मां दुनिया की सबसे अच्छी मां हैं, उन्होंने अपने सुख से ज्यादा अपने परिवार अपने संस्कार और मेरी चिंता की है, लेकिन जब बच्चे सयाने हो जाएं तब उन्हें भी अपने मॉम-डेड के सुख के बारे में सोचना चाहिए।
हमारे परिवार से काफी समय से जुड़े सोमेश अंकल हमारे परिवार में सुख दुख के साथी रहे हैं। मैंने और मंयक ने निर्णय लिया है कि मेरी मां रंजना और सोमेश अंकल अब अकेले नहीं रहेंगे। जीवन का हर क्षण नये के लिए लालायित रहता है, कोरे कागज पर कभी भी अक्षर लिखे जा सकते हैं, बस वक्त का इंतजार रहता है।
अभी तक मैं अपने जन्मदिन पर मां और सोमेश अंकल से गिफ्ट लेती रही हूं, लेकिन आज मैं और मंयक भी उन्हें गिफ्ट देंगे।
तभी संजना ने रंजना और सोमेश को हार देते हुए कहा, ‘‘सोमेश अंकल, बहुत अच्छे हैं, मां। मेरे जन्मदिन पर मेरे लिए सबसे अच्छा उपहार यही होगा कि आपकी जिन्दगी के सफेद रंग को मिटा कर मैं हराभरा कर सकूं, जिससे आपका अकेलापन दूर हो।” संजना की आंखों से आंसू बह रहे थे।
उसे लग रहा था कि मां, सोमेश अंकल के साथ वैसे ही विदा हो रही है, जिस तरह मां ने उसे और मंयक को विदा किया था।
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