आज मिसेज सिंघवी का पचासवां जन्मदिन था और उनके विशेष आग्रह को निधि टाल नहीं पाई थी। जबकि वह अच्छे से जानती थी कि चाह कर भी वह समय से फारिक नहीं हो पाएगी। फिर विरेन से बहस होगी। और पचास एहसान जताते हुए वह उसे लेने आएगा। और यह एहसान न सिर्फ बातों से बल्कि उसकी हर एक लहजे से जताया जाएगा। एक बार नहीं बल्कि बार-बार। धीरे-धीरे यह एहसान से सने शब्द निधि के पोर-पोर में उदासी घोलते जाएंगे और यह उदासी कभी हफ्तों तो कभी महीनों तक उसे घेरे रहेगी।

“निधि! तुम अब तक यहीं हो? विरेन नहीं आया लेने? मैंने कहा था तुमसे आरूष छोड़ आएगा तुम्हें। न हो तो कैब ही कर लो। “मिसेज सिंघवी की आवाज़ में तल्खी थी पर अचरज नहीं। विरेन के स्वभाव से परिचित थी वे। 

पोर्च में गाड़ी आकर रूकी थी। निधि को उतरते देख विरेन तेजी से दरवाजा खोलते हुए उसके पास आया था और गुस्से से आँखें दिखाते हुए कहने लगा,” इतनी रात गये अकेले क्यूँ आई? समय का ध्यान नहीं रहता। क्या करती हो इतनी देर तक उस उबाऊ लाइब्रेरी में? कौन है? किसके साथ आई हो?”  

“वो… देर हो रही थी तो मिसेज सिंघवी ने अपने साथ कैब में बिठा लिया।” उसकी आवाज़ जैसे गले में ही अटक गई थी। 

“नमस्ते!हह… हहह.. ।मुझे कह दिया होता… ह.. ह.. हह।आपने क्यूँ तकलीफ़ की?” विरेन ने झेंपते हुए कहा था। 

“कब तक यहाँ अकेली खड़ी रहोगी? चलो अंदर पोर्च में बैठकर इंतज़ार कर लो।” मिसेज सिंघवी ने कंधे पर थपकी देते हुए कहा तो निधि सिहर गई। बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला और समझ पायी की यह सब पिछली बातें हैं जो उसके दिमाग में चल रही थी। वह निस्तेज सी पोर्च में लगी चेयर पर बैठ गयी। 

“घबराओ नहीं, न हो तो एक रात यहीं रूक जाओ। मैं विरेन को समझा दूँगी।” पानी का गिलास बढ़ाते हुए मिसेज़ सिंघवी ने कहा। 

“जी, रहने दिजीए मैम! वे आते ही होंगे।” 

“कितने साल हो गये शादी को?” 

“चार” 

“चार साल से यह वाहियात ज़िंदगी जीते उकता नहीं गयी तुम? और विरेन को कोई कुछ नहीं कहता? उसके माँ-बाप कहाँ हैं?”

“ये आप क्या कह रही हैं मैम। ऐसा कुछ नहीं है। वो तो बस गुस्से के तेज़ है। सिर्फ़ इस बात से कोई क्यूँ उकता जाएगा भला। और थोड़ा पजेसिव भी हैं मुझे लेकर बस और कुछ नहीं।”

“मुझसे झूठ बोल लोगी तो चलेगा पर खुद से यह झूठ बोलकर अपने आप को धोखे में न रखो। इस तरह कोई अपनी ज़िंदगी जाया करता है भला! तुम बहुत छोटी हो अभी। कितनी संभावनाएँ है तुम में, उन्हें यूँ बेमौत मत मारों।”

“मैम, मुझे एक साल से ज्यादा होने को आया है आपकी इस लाइब्रेरी में काम करते हुए। आप जैसी बॉस को पाना तो जैसे एक वरदान जैसा है मेरे लिए। कितना कुछ सीखने को मिला है आपसे। मैं आपसे क्यूँ झूठ बोलने लगी भला। इनके मम्मी – पापा को गुजरे तीन बरस हो चुके है। मेरी शादी के साल भर बाद चल बसे थे। फिर हम इस शहर में आ गये। अब देखो न मुझे कही अकेले आने-जाने नहीं देते। मेरी फिक्र रहती है इन्हें। मुझे नौकरी भी करने देते है। बाकी सबका स्वभाव एक सा नहीं होता। और मैं तो बहुत कम बोलती हूँ। दोस्त भी कम ही बनाती हूँ। इनका भी जीना दूभर हो जाता होगा मेरे जैसी उबाऊ बीवी के साथ।” निधि ने हँसते हुए कहा। 

अच्छा! जैसे मैं जानती नहीं। ख़ैर! अभी रहने दो। विरेन को फोन लगा कर दो, मैं बात कर लेती हूँ। बारह बजने को आये हैं कोई कितना इंतज़ार करे भला। 

निधि चार – पाँच बार नम्बर डायल करती है पर दूसरी तरफ़ से कोई ज़वाब नहीं आता। वह मिसेज सिंघवी से नज़र चुराने लगती है। उनकी चुभती नज़रों से नज़र मिलाने का साहस नहीं जुटा पाती वह। 

चलो अंदर चलो। जब भी विरेन आएगा, मैं उसे खुद आकर समझाउंगी। अब थोड़ा आराम कर लो। हम भी सुस्ता ले ज़रा। 

निधि कुछ कह नहीं पाई और मिसेज सिंघवी के पीछे-पीछे उनके घर में चली गई। गेस्ट रूम में रात गुजारने की व्यवस्था कर दी गई। 

बिस्तर पर लेटे हुए निधि को लगा जैसे कोई उसके हाथों को सहला रहा है। हौले से निधि के हाथों को बाँह पर से थामते हुए उसने उसे अपनी ओर खींच लिया। उसके हाथ निधि की बाँहों पर से फिसलते हुए पुरे बदन को सहलाने लगे। निधि अपनी थकान का वास्ता देती रही पर विरेन नहीं माना। निधि का बेजान हो कर पड़ा रहना विरेन को सहन नहीं हुआ और वह उसे लगभग धकियाते हुए कमरे से बाहर निकल गया। निधि की नींद उचट गई। वह पसीने से तर बतर थी। और उसकी देह रह रह कर कांप रही थी। 

उसने उठकर पानी पिया। उसे राहत महसूस हुई कि यह सब सपना था। तभी बाहर से किसी की सिसकियों की आवाज़ सुनाई देने लगी। निधि ने अपने कान बंद कर लिए। न जाने आजकल उसे क्या हुआ है? कैसी-कैसी आवाज़ें उसे सुनाई देती रहती है। पर जब देर तक सिसकियाँ बंद न हुई तो हिम्मत कर के वह कमरे से बाहर निकली। 

गेस्ट रूम से लगा हुआ हॉल था जिसे सोफे लगाकर बैठक का रूप दे दिया गया था। हॉल के अंत में ऊपर की तरफ़ जाती सीढियाँ थी जहाँ मिसेज़ सिंघवी का बैड रूम था। वह धीरे-धीरे सीढियाँ चढ़ने लगी। और सिसकियों के बीच अब उसे किसी की धमकी भरी आवाज़ भी सुनाई देने लगी। 

“तुम जानती हो न सब कुछ मेरे नाम है। अगर वह लाइब्रेरी वाला फ्लैट खाली नहीं किया तो मैं तुम्हें इस घर से भी निकाल दूँगा। बुढ़ापे में कहाँ जाकर मुँह छुपाओगी? ” 

“भाई के नाम पर धब्बा हो तुम! मैंने तुम पर भरोसा किया और तुमने! ये मत भूलो वो फ्लैट मेरे नाम है और ज़िंदगी भर मैने ही तुम्हें बैठे-बैठे खिलाया है। “

भाई!!!पसीने की एक लकीर निधि के कान के पास से निकल कर उसकी गर्दन को भिगो गई। घबराहट में उसके हाथ, पास ही रखी कलात्मक सुराही से टकरा गये और वह गिर कर टूट गई। बिना एक पल गँवाएं निधि गेस्ट रुम की तरफ़ लौट आई और बिस्तर पर निढ़ाल हो गई। कब उसे नींद आयी यह उसे ठीक से याद नहीं। 

दरवाज़े पर लगातार होती दस्तक से उसकी नींद खुली। नौकर तौलिया और कपड़े रखने आया था। मिसेज सिंघवी ने निधि को तैयार होकर गार्डन में बुलाया था। 

वह जल्दी से नहा कर तैयार होकर गार्डन में  पहुंच गयी। जितना जल्दी हो वह यहाँ से रूखसत होना चाहती थी। 

हल्के पीले रंग की सिफोन की साड़ी में निधि का रूप निखर आया था। 

ममता भरी नज़रों से निधि को देखते हुए वे बोली, “मि. सिंघवी मेरे असली पति नहीं है। वे मेरे देवर हैं। आरूष के होने के पाँच साल बाद ही वे कैंसर से चल बसे। उस समय बहुत समझ नहीं थी। मेरे आगे-पीछे भी कोई नहीं था। उस वक्त मैं बहुत टूट गयी थी। मुझे सहारे की ज़रुरत थी। इसी बात का फायदा उठाकर आशीष ने मुझ से झूठे प्यार का नाटक किया। और धीरे-धीरे सब कुछ अपने नाम करवा लिया। जब तक मैं सचेत होती और कुछ समझ पाती, बात मेरे हाथ से निकल चुकी थी। मेरे बेटे आरूष को वह जान से मारने की धमकी देता रहता। मुझे उस वक्त चुप रहना ही सही लगा क्योंकि मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। फिर मैनें धीरे-धीरे चुपचाप अलग से पैसे जोड़े और वह लाईब्रेरी और फ्लैट खरीदा। अब उसे इस बात की भनक लग चुकी है और वह घायल शेर की तरह दहाड़ता रहता है।”

“तो, अब आपने क्या सोचा है?” निधि ने झिझकते हुए कहा। 

कुछ कानूनी कार्यवाही बाकी है फिर मै आरूष के साथ यह घर हमेशा के लिए छोड़ दूंगी। देखो निधि आसमां में उड़ते ये उन्मुक्त पंछी कितने खुश लग रहे हैं। कहने को इनके पास सिर्फ इनके पंख हैं पर शायद यही सबसे बड़ी दौलत और राहत हैं इनके लिए। 

“आप में बहुत हिम्मत हैं मैम। आपका कद बहुत बढ़ गया है मेरी नज़रों में। जो और जितना संभव होगा मैं सहायता करूंगी आपकी।” निधि ने साड़ी के पल्ले को अंगुलियों में उलझाते हुए कहा। 

सहायता की मुझे नहीं तुम्हें ज़रूरत है निधि। मैं तुम्हें छत और साथ दूंगी। हो सके तो समय रहते संभल जाओ। मैं अपनी आँखों के सामने एक और मासूम को किसी हैवान के हाथों बर्बाद होते नहीं देख सकती। तुम स्वतंत्र रहोगी। जब चाहो अलग राह चुन  लेना। बस इस नरक से बाहर निकलो। 

निधि सिर झुकाए सुनती रही और पैरों से ज़मीन कुरेदती रही। 

************ एक महीने बाद *******

 लगातार फोन घनघना रहा था। निधि अपने एक सुटकेस के साथ खड़ी इंतज़ार कर रही थी। थोड़ी ही देर में मिसेज़ सिंघवी अपने सामान के साथ वहाँ पहुँचती हैं और दोनों कैब में बैठ कर निकल जाते हैं। 

विरेन का नम्बर रह- रह कर स्क्रीन पर चमकता है पर निधि दसवें माले में बने फ्लैट में बालकनी से आसमान में चमकते सितारों को निहारती रहती हैं। आज कोई डर उसे नहीं सताता। दिल की धड़कनें ज़रूर बढ़ी हुई हैं। पर यह एक नई उर्जावान जीवन की शुरूआत से पहले की घबराहट है। उसे अपने सीने में एक रोशनी भरती हुई महसूस होती है। सितारों सी मद्धिम लेकिन उमंग से भरी। 

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