दरअसल खाने-पीने की अन्य वस्तुएं बांटी गयी जिम्मेदारी के मुताबिक बच्चे अपने-अपने घरों से पकवाकर या बनी-बनायी संग ला ही रहे । लेकिन मामला दिन- भर का ठहरा । और जैसा कि उसके अपने बचपन का अनुभव उसे सचेत कर रहा कि अमूमन बच्चों को पिकनिक में कुछ अधिक ही भूख लगती है तो संभावना यह भी हो सकती है कि लगभग दो-ढाई किलो ‘फ्रूटक्रीम’ उनके लिए पर्याप्त न हो । जो भी हो, एक कटोरी वह केदार के लिए अलग निकालकर रख देगी । इतनी-सी बेईमानी उसके लिए अति आवश्यक है । केदार को मालूम है कि प्रिया की पिकनिक की खातिर आज घर पर ‘फ्रूटकीम’ बन रही । कार्यालय के लिए निकलने से पूर्व वे उसे याद दिलाते हुए निकले कि वह उनका हिस्सा अलग निकालकर रखना न भूले । अधैर्य के मामले में वे पांच पूरा कर रही के.जी. की विद्यार्थिनी बेटी प्रिया को प्रतिद्वंद्विता में पछाड़ते हुए उससे दो कदम आगे जा खड़े होने में सकुचाते नहीं । सुन क्यूं नहीं रही प्रिया?

ऊबकर उमा ने अटकाहट से मुक्ति के लिए उसे दुबारा गुहार लगायी । जवाब में ‘आयी मम्मी’ सुनकर खीझ छिटकी । ‘आया-आयी’ बाप-बेटी दोनों में ही किसी की बात को विशेष महत्त्व न दे उसे लटकाये रखने का अवगुण है । तय है कि बिना तीन-चार बार ‘आया-आयी’ करवाये हुए वे हाजिर होने से रहे ।

उसने प्रिया को तीसरी पुकार लगायी ।

फिर एहतियातन एक कटोरी ‘फ्रूटक्रीम’ अलग कर कटोरी फ्रिज में सरका दी । हालांकि जानती है कि कटोरी पकड़ाते ही केदार मुंह बिदकायेंगे-“मैडम, इसे मुंह में डालूं या कान में चुआऊं?”

छटांक-आध छटांक में उनकी गुजर नहीं होने की।

उनकी दशहरी आमों की खवाई का प्रसंग उसे किसी कष्टकर घटना से कम आतंकित नहीं करता। सेर खांड आम तुलवाना उन्हें तौहीन लगती । छह-सात चढ़े-तुले पिद्दी से आमों से भला उनका क्या होना? (स्वस्थ तगड़े आम सिर्फ विदेशी ही खा सकते हैं) किसी रोज कार्यालय से घर पलटते हुए वे ‘गोलचा’ वाली सब्जी मंडी से तीन-चार पेटी आम तिपहिया में रखवा लाते । मनोयोग से पेटियां खोली जातीं । खोलने के उपक्रम में उसकी रसोई की डसी, करछुल शहीद हो जायें तो उनके उत्साह उमंग में छदाम-भर खोट आने से रही । तदुपरांत आमों की छंटाई शुरू होती । तैयार आम धुलते और बाल्टी में फ्रिज की सारी ठंडी बोतलें उड़ेल भिगो दिए जाते । उस रोज भोजन का कार्यक्रम गोल कर बाप-बेटी जो कुहनियों तक सुआरियों के थूथन-से ओंठ सिकोड़ ‘सुड़प-सुड़प’ रस खींच आम चूसने पर पिलते कि उनकी सौंदी हुई मुखाकृतियां उसे भीतर तक घिना, सिहरा कई रोज तक आमों के निकट न फटकने देती ।

वितृष्णा से भर वह चेतावनी पर चेतावनी टिकाती हुई बर्राती कि इतने आम इकट्ठे खाने से उनके पेट में पांक पड़ सकती है, आंखें आ सकती हैं, फोड़े-फुंसियां हो सकती हैं; मगर केदार के संग पट्टू तोते-सी उनका अनुसरण करती हुई न वह बित्ते-भर की छोकरी चेतती, न केदार ।

“कुछ नहीं होने का ।” केदार उसकी फिजूल की चिंता पर लापरवाही से हाथ झटकते ।

“हांअंऽऽ, दो-चार रोज बाद पता लगेगा ।”

“कैसे पता लगेगा…बाल्टी-भर दूध पियेंगे ।”

“बाल्टी-भर दूध पियेंगे…बप्पा तुम्हारे भुर्री भैंस बंधवा गए दरवाजे? क्यों?” उसे चिढ़ छूटती ।

“चिढ़ती क्यूं हो, दरवाजे न सही, गली में बंधी नहीं हुई ‘मदर डेयरी’…मशीनी भैंस! और मेरे बप्पा ने न सही मालकिन, सरकार ने बंधवायी सही!”

“हुंह!” उसने मुंडी झटक जैसे केदार की बेहूदगियां झटकीं और प्रिया को चौथी कर्कश हुई हांक लगायी ।

स्वर में प्रखर हुई कर्कशता का अपेक्षित असर हुआ । फुदकती हुई प्रिया उसके निकट आ खड़ी हुई-“क्यूं बुला रहीं मम्मी?”

“पहाड़ ढो रही थी?”

“बालकनी में चटाई खोज रही थी मम्मी! मिल के ही नहीं दे रही?”

प्रिया की हाथ नचाकर बोलने की भोली-मुख मुद्रा ने उसकी खीझ रिझाई-“मुझसे कहा होता…चल, ‘फ्रूटक्रीम’ देख । पूरी पड़ जायेगी तुम सबको?”

ऊंचे प्लेटफार्म पर रखे डोंगे की ओर देखने के लिए प्रिया पंजों के बल उचकी । डोंगे पर नजर पड़ते ही उसके उल्लसित चेहरे की चमक कुम्हला आयी- “बस, इतनी थोड़ी?”

“कम लग रही?”

“और नहीं तो क्या?”

“और नहीं की बच्ची…इतनी देर से काहे के लिए मैं चिल्ला-चिल्ली मचाए हुए हूं? होगे कितने तुम सब?”

हम सब मिला केऽऽ…” सोचने की मुद्रा में आंखें ऊपर टांग प्रिया ने पलकें पटपटायीं-होंगे कोई ट्वेन्टी वन! मगर मम्मी, बबलू की मम्मी उसकी बीमार नानी को देखने गांव गयी हुई हैं…खाने के लिए वह अपने घर से कुछ भी नहीं ला सकता । उसके पापा हमारे पापा जैसे नहीं। …कहते हैं, इतने सारे बच्चों के लिए कुछ खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं! रिया कह रही थी, उसके पापा झूठ बोलते हैं । वे रोज रात को ड्रिंक करते हैं । ड्रिंक में पैसे नहीं लगते मम्मी?”

“लगते होंगे…तुझे पंचायत से मतलब ।”

“श्वेता बिचारी भी कुछ नहीं ला पा रही, “प्रिया ने उसकी झिड़की अनसुनी की-“पिकनिक पर भेजने को ही राजी नहीं हो रही थी उसकी मम्मी । हम लोगों ने आंटी को बहुत मनाया । कह दिया, साथ खाने-पीने को भले कुछ मत दीजिए आंटी… बस श्वेता को भेज दीजिए.. और मम्मी…”

“बस कर अपना पिकनिक पुराण”, ऊब कर टोक दिया उसने । फिर ढाई-तीन किलो का खाली स्टील का डिब्बा उसे दिखाकर पूछा कि क्या वह पूरी की पूरी फ्रूटक्रीम इसी डिब्बे में उड़ेलकर दे दे? प्रतिक्रिया में प्रिया की बांछें खिल उठीं । सिर हिलाते हुए हामी भरी उसने ।

“श्वेता की मम्मी बहुत गंदी है मम्मी!”

“क्यों? बड़ों के लिएऐसे नहीं बोलते!”

“क्यों नहीं बोलते? निक्की की मम्मी भी नौकरी पर जाती हैं । मगर वे आंटी साफ बोलीं । सुबह टाइम नहीं मिल पायेगा कोई खास ‘डिश’ बनाने के लिए…पर मैं एक काम कर सकती हूं । नीचे सब्जी वाले से कहकर तुम लोगों के लिए दो अंगूर की पेटी मंगवा दूंगी । आंटी अच्छी नहीं मम्मी?”

अबकी उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की । डिब्बा बंद कर उसे तौलिए में लपेटा और आहिस्ता से पिकनिक पर ले जाने वाली कंडी में सरका दिया । परोसने के लिए संग एक बड़ा-सा चम्मच और रख दिया । खाने के लिए कागज की प्लेटें । लकड़ी की चम्मचें ।” ध्यान से देख, कोई और चीज तो नहीं साथ रखनी?” कंडी की ओर संकेत कर उसने प्रिया से पूछा ।

स्वीकृति में चिबुक हिलायी प्रिया ने ।

“बोल?”

“हाथ पोंछने के लिए पेपर वाले रूमाल रखे तुमने?”

“ओह!” खिसियायी हुई-सी उसने माथे पर हाथ मार अपनी याददाश्त को कोसा-“कैसी भुलक्कड़ हो रही मैं?”

रसोई प्लेटफार्म के कैबिनेट की निचली दराज में से उसने फुर्ती से पेपर रूमालों की एक गड्डी निकाली और कंडी में सरका लगे हाथ प्रिया को हिदायत थमाई कि वह परोसने के समय जब भी ‘फ्रूटक्रीम’ के डिब्बे का ढक्कन खोले, तनिक सावधानी बरते । लबालब भरा हुआ है डिब्बा । असावधानीवश छलक सकता है । संतुष्ट भाव से कंडी उसने खाने की मेज के ऊपर लाकर रख दी । चलो जिम्मा निपटा ।

“तादल (चादर) भी इछी कंडी में लाकल लख दूं मम्मी?” प्रिया ने पूछा । “ले आ ।” आनंदातिरेक में प्रिया एकदम से लड़ियाकर तुतलाने लगती है । उसे बुरा नहीं लगता । बुरे लगते हैं उसके अटपटे-से सवाल । टी.वी. का एक विज्ञापन देखते हुए अभी परसों ही उसने अचानक पूछा-“ऐसी ‘ब्रा’ हम कित्ते बड़े होकर पहनेंगे मम्मी?”

“चुप कर…फालतू के सवाल न किया कर? “कनखियों से केदार की ओर देख प्रिया को बुरी तरह घुड़का उसने । असंतुष्ट-सी प्रिया अचकचाकर टी.वी. के परदे की ओर घूरने लगी । उनके समय में बच्चे ऐसे बेहूदे सवाल कर सकते थे? तब वे सवाल कम करते और सुनते अधिक थे । और उसकी मनोवैज्ञानिक धारणा ही नहीं विश्वास है कि सुनने वाले बच्चे अक्सर चिंतन-मनन ही नहीं करते, गुनने में भी अव्वल होते हैं । चटाई लाकर उसने कंडी की बगल में रख दी । मगर चिंता हुई-“सामान तू अकेली उठायेगी कैसे एक साथ इतना? छोड़ आऊं तुझे ऊपर चल के?”

“नई, नई… अपना सामान हम खुद उठा के ले जायेंगे ।” आत्मविश्वास से भरी नन्ही जान ने प्रतिवाद किया । फिर घर के खुले दरवाजे की ओर प्रतीक्षारत उत्सुकता से देखा ।

सीढ़ियों पर लिफ्ट का दरवाजा ‘धाड़-धाड़’ बंद होने और खुलने से बच्चों में व्याप्त उत्सव जैसी चटकई की हलचल का शोर-शराबा ताजा बयार के लयात्मक आलोड़न-सा घर में दाखिल हो रहा । उन्हें ठीक साढ़े नौ बजे बिल्डिंग की छत पर एकत्र होना है । साढ़े नौ होने को है । उसे उम्मीद नहीं कि वे दस तक भी? पर इकट्ठे हो पायेंगे । आहट पर नजर उठी तो पाया कि नीचे वाले आरिफ खान साहब का छोटा बेटा सिराज बगल में कैरम बोर्ड दबाये, दूसरे कंधे पर खाने का सामान का थैला लटकाये प्रिया को वहीं से पुकारता हुआ घर में प्रविष्ट हुआ । कैरम बोर्ड सिराज की बगल में दबा हुआ देख उमा को हंसी आ गयी । उसने चुटकी ली ।

“ये कैरम बोर्ड लादके कहां चल दिए मियां?”

“पिकनिक में खेलने के लिए आंटी!” सिराज जवाब में हुलसा ।

“वो तो ठीक है, लेकिन इसमें तो सिर्फ चार जने ही बैठकर खेल पायेंगे और तुम लोग इतने कम नहीं?”

सिराज ने असमंजस से भरकर प्रिया की ओर देखा ।

“ऊपर से जो खेल तुम घर पर बैठकर खेलते हो वही पिकनिक में जाकर खेलोगे तो पिकनिक का मजा ही क्या रहा? वहां तुम सबको वो खेल खेलना चाहिए जिसे तुम सब मिलकर एक साथ खेल सको…नई प्रिया?”

“चल छोड़ दे इसे यहीं ।” उसके तर्क से प्रिया सहमत हुई-“ऊपर मिलकर हम सब तय करेंगे…कौन से खेल खेलें। अंत्याक्षरी हम सब खेलेंगे ही…खो-खो खेल सकते हैं, नईं मम्मी?”

“सिराज कुछ पल ऊहापोह में ठिठका हुआ खड़ा रहा, फिर एकदम से मुड़ा-“मैं कैरम घर पर न रख जाऊं?”

“जल्दी दौड़ के रख के आ…देखना, हम सबसे पीछे पहुंचेंगे पिकनिक में ।” प्रिया अधीर हुई।

अचानक उमा को ख्याल आया । रोजमर्रा के कामों में उलझने से पहले वह तनिक प्रिया से यह जान ले कि पीने के पानी की ऊपर कोई ठीक से व्यवस्था कर रखी है उन लोगों ने या नहीं? वरना कहीं ऐसा न हो कि ऐन शिकार के समय कुतिया हगाशी हो ।

“हमारा इंतजाम कोई आपकी तरह भूल-भुलक्कड वाला नहीं मम्मी । सब रख के पेपर रूमाल रखना ही भूले जा रही थीं?” प्रिया ने कटाक्ष किया-“कीरत ला रहा है न पानी का बड़ा-सा मयूर जग । पीने के लिए प्लास्टिक के छोटे-छोटे गिलास भी ।”

कैरम बोर्ड रखकर सिराज हांफता हुआ ऊपर आया । सिराज को देखते ही प्रिया फुर्ती से अपनी कंडी उठाने दौड़ी। चटाई-भर उठवाने के लिए मदद के अभिप्राय से उसने सिराज की ओर देखा । सिराज ने लपककर उसकी चटाई उठा ली । लदे-फदे बच्चों को घर से निकलते हुए देखकर अनायास वह भावुक हो आयी। उसके नथुनों को सहसा ईंटों के भट्टे में पकती कच्ची ईंटों की सीजन की सीजी-सीजी धुआं छोड़ती महक सुवासित कर गयी ।

घर का दरवाजा बंद करने लिए पलट ही रही थी कि अचानक एक अन्य आशंका ने धर दबोचा । अबोध बेसब्र मय सामान कहीं सीढ़ियों से ही छत की ओर न चल दें । घर उसका है दूसरे माले पर और छत सातवें से ऊपर। उचित यही होगा कि वह उन्हें अपने सामने ही लिफ्ट में चढ़ा दे । दिमाग तभी निश्चित हो पायेगा । पलटकर घर से बाहर हुई और तेजी से कॉरीडोर में खड़े बच्चों की ओर बढ़ी। अचानक सीढ़ियों पर किसी की उतरती तालबद्ध पदचाप ने उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया । पांचवें माले वाले एम.एम.टी.सी. के सिन्हा साहब इकहरी काया अकड़ाये हुए सीढियां उतरते दिखे । बच्चों को लिफ्ट की प्रतीक्षा में खड़े हुए पाकर सहसा वे उसे संबोधित करते हुए उबल पड़े-“इन बेहूदों को देख रहीं मिसिस सिंह? पिकनिक क्या मन रही इनकी सुबह से, आफत मचा रखी है कमबख्तों ने! ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे-सेकण्ड भर के लिए भी लिफ्ट खाली नहीं छोड़ रहे। दूध वाला अलग भिनक रहा था । खैर उसकी छोड़िए । मैं स्वयं अभी पांच मिनट तक लिफ्ट का बटन दबाये खड़ा लिफ्ट की प्रतीक्षा करता रहा मगर जिसे देखो वही अपने फ्लोर पर लिफ्ट रोके बैठा हुआ है।”

“बच्चे आपको वर्जिश का मौका देना चाह रहे । जानते हैं कि इधर आपका घूमना-फिरना कम हो रहा!”सिन्हा साहब के क्रोध को सहिष्णु बनाने की चेष्टा में चुहल की उसने ।

“वर्जिश की भली कही आपने, “सिन्हा साहब उसका चुहल गुटक तैश से भर आये-“गठिया का रोगी हूं। बायीं टांग एकदम साथ नहीं दे रही…मेरी छोड़िए-मेरे सामने वाले मेहता साहब एंजाइना के मरीज ठहरे । चार कदम चलना उनके लिए घातक हो सकता है । उन्हें दौरा पड़ने से इसलिए नहीं रुक सकता मिसिस सिंह कि हमारी सोसाइटी के बच्चे सिर्फ आज-भर के लिए पिकनिक मना रहे?”

वह सिन्हा साहब के विवेकहीन क्रोध से उलझने से बचने की खातिर चुप हो रही ।

“सवाल अनुशासन का है मिसिस सिंह । पिकनिक मनाने से कौन रोक रहा बच्चों को? जरूरत इस बात की है कि कायदे से सब एक जगह इकट्ठे हों और दो-तीन खेपों में ऊपर चढ़-उतर लें । एक इन नौनिहालों के बाप भी हैं कि घर में मुंह छिपाये बैठे स्टार टी.वी. देख रहे होंगे ।”

“केवल माएं…” उसने उनकी भूल सुधारी ।

सिन्हा साहब भन्नाये हुए-से नीचे बढ़ दिए।

सिन्हा साहब की तकलीफें और तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं, मगर उनकी बदमगजी के मुंह लगना उसे उचित नहीं लगा । सिन्हा साहब के विवादी मिजाज से वह अपरिचित नहीं । संयोग से वे दोनों ही सोसायटी की कार्यकारिणी समिति के सदस्य हैं। बच्चों के किसी भी कार्यक्रम के प्रति वे कभी उत्साही नहीं होते । चाहे सोसाइटी द्वारा आयोजित खेलकूद हो या दीवाली मेला या फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता; उसे

उनका स्वभाव कुछ विचित्र ही लगता है । उसकी समझ में नहीं आता कि वे हरदम नाखुश क्यों रहते हैं और हर काम में मीन-मेख क्यों निकालते रहते हैं । उन्हें यह भी लगता रहता है कि लोगों में न बातचीत का सलीका रहा और न नागरिक चेतना । ऐसा नहीं कि लोगों की असुविधा उसे समझ में नहीं आ रही । सुबह का समय लोगों के कार्यालय जाने का व्यस्त समय होता है । उतरने-चढ़ने की परेशानी स्वाभाविक है। विशेष रूप से ऊपर वालों के लिए। पुरानी इमारत है । उतनी ही पुरानी लिफ्ट । सीखचों वाले दरवाजे वाली । असावधानीवश दरवाजा बंद होने में ढीला छूट गया तो नीचे लोग लिफ्ट बुलाने के लिए चाहे जितनी घंटियां बजाते रहें वह मानचढ़ी मेहरिया-सी टस से मस नहीं होने की । चौबीस परिवारों के मध्य एकमात्र लिफ्ट । उसे सोसाइटी की खस्ताहाल लिफ्ट और सिन्हा साहब की अड़ियल मानसिकता में एकरूपता नजर आयी…

तकरीबन तीन-चार बजे उसने जनरल बॉडी की मीटिंग में लिफ्ट बदलवाने के प्रस्ताव पर विचार-विमर्श रखवाया कि सदस्य खर्च उठाने के लिए तैयार हों तो ‘ओटिस’ वालों से बात की जा सकती है । मगर सदैव की भांति टंगड़ी लगाने में माहिर सिन्हा साहब उसकी मरम्मत का पक्ष लेकर बात आगे ही न बढ़ने देते । केदार उलटा उसे डपटते । तुम्हें क्या पड़ी! हमारा क्या! छह साल आये हो रहे दिल्ली में । किसी भी वक्त तबादले का आदेश आ सकता है । अपनी वे जानें ।

नीचे आती हुई लिफ्ट अचानक चौथे माले पर रुक गयी । दरवाजा खुला । सामान चढ़ाने की खड़बड़-खड़बड़ से नीचे लटके हुए लिफ्ट के रस्से भूडोल से डोलते नजर आये । दिमाग में एक बात कौंधी । लिफ्ट के सीखचों से वे क्यों न अपने सामान चढ़ाते हुए साथियों को पुकारकर उनसे अनुरोध करें कि वे लिफ्ट ऊपर ले जाने के बजाय नीचे लाकर उन्हें भी अपने संग ले लें?

बच्चों को उसका सुझाव रुचा ।

वे सीखचों में मुंह दे अपने मित्रों को हांक लगाने लगे ।

वही ढाक के तीन पात ।

घर में दाखिल होते ही जहन में अपनी दिनचर्या का सूचना-पट्ट टंग गया । तीस हो रही । दोपहर तीन बजे के बाद उसे ‘सुपर बाजार’ का चक्कर मारना होगा । पहली को सामान भराने का अर्थ होता दुकान से सड़क पार तक लम्बाती पंक्ति का पसीना निचोड़ते हुए कभी दायीं तो कभी बायीं टांग पर अपना भार ढोते वैतरणी पार करने की साध्यता अनुभव करना । उसे अक्सर लगता कि दिल्ली की आबादी बढ़ने की रफ्तार अगर इसी भांति स्पूतनिक पर सवारी साधे रही तो सुपर बजार की पंक्तियां उसे हरियाणा : राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा लांघती नजर आयेंगी और उन पंक्तियों में लगने के लिए उन्हें टैक्सियों में जाना होगा और टैक्सियों में बैठे हुए ही अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करनी होगी ।

केदार की दुरात्मा में यदा-कदा ‘आंधी’ के नायक संजीव कुमार की पुण्यात्मा प्रविष्ट कर जाती और वे अचानक चोला बदल उसके लिए सहयोगी, साझीदार पति में परिवर्तित हो उठते । उसकी कठिनाई को महसूस करते हुए उन्होंने ही एक रोज उदार हो सुझाव दिया कि क्यों वह पहली तारीख की मारामारी में गर्क होने को दुबलाती रहती है? क्यों नहीं बैंक से अग्रिम रुपये निकाल उस जहालत से बचने की खातिर पहली से पहले राशन-पानी भर लेती? शुरू में अपनी चिरकुटी मनोवृत्ति के चलते एक ही संकोच हुआ उसे कि वह मामूली-सी सहूलियत के लिए बचत के पैसे खर्च किए डाल रही । फिर अपनी फोकल बुद्धि पर तरस आया कि माना कि गणित उसका सदैव कमजोर रहा, लेकिन यह सवाल बहुत मामूली है कि जो कुछ खर्च हो रहा उसे पहली के बाद जमा भी तो कराया जा सकता है ।

‘केबल’ पर ग्यारह बजे ‘आंधी’ फिल्म दिखा रहे । केदार से कहती भी है वह कि अपने अब तक के जीवन में (उम्र बताना जरूरी नहीं) उसे चार फिल्में सबसे अधिक पसंद आयीं । जिन्हें वह हर दिन तो नहीं लगभग हर हफ्ते अवश्य देख सकती हैं और उनके नाम हैं, ‘आंधी’, ‘अमर प्रेम’, ‘अभिमान’, ‘आनंद’! केदार चुटकी लेते, ‘अ’ से तुम्हारी आशनाई का राज मैडम ।

कपड़े कोहनी में लटकाये हुए स्नानघर में घुसने को हुई कि ठीक उसी क्षण घर की घंटी बजी । अड़ोसन-पड़ोसन नहीं हो सकती । ‘केबल’ एक वही नहीं देखती । निश्चित ही प्रिया होगी । उसे ‘पोटी’ आयी होगी । पट्ठी की एक ही बुरी आदत है। पाखाने में घुसने से घबराती है।…

अनुमान गलत नहीं निकला । दरवाजे पर प्रिया और कीरत खड़े मिले । मगर उसकी अपेक्षा के विपरीत प्रिया उसे बगल हटाती हुई तीर की भांति पाखाने की ओर नहीं दौड़ी । उसे उसकी गोटे और मुकेश लगी ओढ़नी चाहिए थी । वही ओढ़नी जिसे करवा-चौथ की व्रत की रात ओढ़कर वह चन्द्रमा को अर्घ्य देने छत पर पानी की टंकी के ऊपर चढ़ती। सुनते ही वह पसोपेश में पड़ गयी। ओढ़नी निकालने की खातिर उसे पुराने कपड़ों वाला ट्रंक खोलना होगा । पुराने कपड़ों वाला डंक बर्तन-भांडों वाले ट्रंक के नीचे दबा रखा हुआ । बर्तनों वाला ट्रंक उठाना तो क्या उसे तिल-भर अपनी जगह से खिसकाना भी उसके बूते का नहीं । जरूरत पड़ने पर यह काम वह केदार से ही करवाती । इतने भारी-भरकम ट्रंक बनवाकर वास्तव में अब वह पछता रही। लेकिन सच यही है कि तबादलों के चक्कर में सामान की सुरक्षा की दृष्टि से उसने ये भारी-भरकम ट्रंक विशेष रूप से बनवाये ।

प्रिया जिद पर अड़ी रही । बदले में उसे कोई अन्य सादी ओढ़नी नहीं चलेगी । उसे वही ओढ़नी चाहिए।

प्रिया के हठ ने झिंकाया-“मामला क्या है? कोई सादी ओढ़नी क्यों नहीं चलेगी?”

“क्यों बतायें अभी से?” रहस्य बनाये रखने की मंशा से प्रिया इठलायी । उसकी असहिष्णुता सिर उठाती हुई रोष में परिवर्तित होने लगी-“वही ओढ़नी चाहिए थी तो सुबह पापा के घर पर होते हुए तुमने क्यों नहीं निकलवायी ओढ़नी?”

“बोर न कीजिए मम्मी।” कीरत के सामने उसके रूखे व्यवहार से क्षुब्ध हुई प्रिया कटु हो आयी, “सुबह कैसे बता देते…सुबह हमारा खेलने का प्रोग्राम बना हुआ था?” “अब हम लोग गुड्डे-गुड़िया का खेल खेलने जा रहे आंटी ।” विवाद से बचने के लिए कीरत ने फौरन स्पष्टीकरण देना मुनासिब समझा ।

जवाब सुनकर उमा अचानक टूटी मटकी-सी बह आयी!

अपने बचपन की स्मृतियां तरल होने लगीं । सावन के महीने में वे भी अपनी दादी से पुरानी चिंदियां मांग-जोड़ गुड्डे-गुड़िया बनाया करते और सखियों के संग समधी-समधिन बनकर धूमधाम से उनका ब्याह रचाया करते । बिला गया गुड्डे-गुड़िया का खेल! कहां खेलते हैं बच्चे नगरीय जीवन में संवेदनाएं गहराते, संबंधों को रेशे-रेशे जोड़ते गठियाते शक्लें पहनते, भावनाओं से ओतप्रोत गुड्डे-गुड़िया का खेल, पैंया-पैंया चलना । खड़े होना आरंभ नहीं कर पाते शिशु कि उन्हें जबरन पकड़ा दिए जाते हैं खेलने के लिए बुद्धि को तराशते धार देते पजल्स ।

निरे बेवकूफ हैं ये बच्चे । उसे जरा-सी भी भनक देते तो वह एक से एक सजीले गुड्डे-गुड़िया नहीं बना देती उनके लिए। देखते ही नादानों की आंखें फैल जातीं । अधिक तर्क-वितर्क रंग में भंग डालने जैसा ही अरुचिकर होगा । सोचते हुए वह अपने सोने के कमरे में प्रविष्ट हुई । ट्रंक पर रखा सामान हटाया । बर्तन-भरे ट्रंक को पूरी शक्ति और एकाग्रता निचोड़ पहले एक ओर को खिसकाया । फिर साहसपूर्वक उसे नवा कर उसका एक सिरा फर्श पर टिका, संतुलन बनाये रखकर, उचकाकर नीचे उतारा । इसी प्रयास में चट्टान उचकाने जैसी अथकता से चूर हो बुरी तरह हांफ गयी । नाल उखड़ने की आशंका ने ऊपर से डराया । मगर अपने भय को झटक ट्रंक अपने बल-बुद्धि के बूते अकेले नीचे उतार लेने की सफलता ने उसे नयी शक्ति और स्फूर्ति से भर दिया ।

ओढ़नी ढूढ़नी नहीं पड़ी । पुरानी धोती में जतन से सहेजी-लपेटी ऊपर ही रखी मिली ।

ओढ़नी देखते ही प्रिया की बटन जैसी गोल आंखें कारूं का खजाना हासिल करने जैसी खुशी से उद्दीप्त हो टिमटिम कर उठीं । मौके का लाभ उठाते हुए स्वर में फुसफुसाहट घोल उसने अपनी जिज्ञासा दोहराई-“बताया नहीं तुम लोगों ने कि आखिर अढ़ाई गज की ओढ़नी का करोगे क्या?”

मतलब सध गया । फुसलाहट बेअसर रही । पोटली ले वे दोनों फुदकते हुए जाने के लिए मुड़े । उनका मतलबी होना गहरे अवसन्न कर गया । उसे भारी-भरकम ट्रंक अकेले चढ़ाता हुआ देख सहायता को आगे आने की बात तो दरकिनार रही, कुछेक पल अकेले निकट खड़े रहने भर को भी उन्हें राजी हुआ न पा खिन्नता चिढ़ में बदल गयी-‘ओढ़नी लिथड़ने न पाये प्रिया…मेरे चढ़ाये की है…सुनाऽऽ…?”

प्रत्युत्तर में दरवाजा बंद होने की कर्कश ‘धड़ाम’ कानों में धमकी ।

अपने को समझाया । कैसी नादान हो रही । बच्चों का अपनी पिकनिक में मग्न होना स्वाभाविक है और उनकी वह संलग्नता उसकी उपेक्षा नहीं।

घड़ी की ओर नजर उठी । बड़ी देर से ठेली पड़ी बेचैनी हरियायी । बच्चों के तमाशे में देर में देर । उसकी फिल्म गयी । गयी कैसे? बेवजह दिक्क हो रही। टी.वी. चलाकर के नहाने के लिए क्यों नहीं घुसती? कुछ नहीं तो नल बंद होने की अवस्था में संवादों की झांय-झांय कानों में पड़ती हुई उसे तसल्ली देती रहेगी कि उसके देखने से कुछ विशेष नहीं छूटा । पार्श्व संगीत के मात्र उतार-चढ़ाव सुनकर ही वह अनुमान लगाने में सक्षम है कि ‘आंधी’ में इस समय पर्दे पर कौन-सा दृश्य चल रहा होगा ।

टी.वी. चलाते ही पर्दे पर संजीव कुमार दिखायी दिया । उफ्, किस कदर भद्र दिखायी पड़ता है संजीव! शरत के नायकों-सा कुलीन, भद्र । सामने से न हट पाने का प्रलोभन दुरियाती हुई वह फौरन स्नानघर में जा घुसी । कहीं ऐसा न हो, किसी आवश्यकतावश बच्चे दुबारा घर की घंटी बजायें? बजायें, बजाते रहें । दरवाजे की भनभनाहट से प्रिया को अनुमान हो जायेगा कि मम्मी जरूर नहा रही होंगी । अपना अभीष्ट वे कहीं से भी पूरा कर लेने और करवा लेने में समर्थ हैं । कीरत, विशु, सिराज, रिया शानू के घर की घंटी बजा । बस उसे एक ही अनमनाहट हो रही । ऊपरी तौर पर सामान्य बने रहने की चेष्टा के बावजूद । उसकी चढ़ाये की ओढ़नी सत्यानास न करके रख दें बच्चे । गुड्डे-गुड़िया की चर्चा न होती तो शायद वह इस सीमा तक भावुक न हो उठती कि प्रिया के हठ के सामने घुटने टेक दे । पुरानी आदत है । करके पछताये, न करे तो बिलबिलाये ।

नल बंद कर दिया अचानक उसने, सुचित्रा सेन की ही आवाज है न?…भारी, भावुक, भुरभुरी ।

संवाद पूरा होते ही नल की धार पूर्ववत् खोल दी । कुछ-न-कुछ लापरवाही होगी ही ओढ़नी के संग । सयानों और बच्चों के इस्तेमाल में फर्क जो ठहरा । दादी ने नहीं एक बार उसकी दुलहिन गुड़िया के श्रृंगार की खातिर अपना गोटा लगा जरूर कतर दिया था विमोहित हो?

फिल्म समाप्त होते ही अवसाद-भरे मन से उसने रसोई का चक्कर लगाया । कटोरदान खोलकर देखा । तरकारी का ढक्कन उठाया । तरकारी सूंघी । फिर भी खाने की इच्छा नहीं हुई।

अपने लिए वह दो रोटी अधिक सेंककर नहीं रखती। ऊपर से आज प्रिया के खाने से भी निरताहट है । लेकिन अनिच्छा का कारण न प्रिया की अनुपस्थिति है, न उसकी अपनी अस्वस्थता । संजीव को छोड़कर आरती (सुचित्रा सेन) का अपनी राह हो लेना ही उसके भावुक हृदय को सघन उदासी में, शिकार दबोच जल में उतर गए घड़ियाल-सा खींच ले गया…

विचित्र अनुभव है। अवसाद के घटाटोप में एक किस्म की एकान्तिकता का निरासक्त आनंद अनुभव करते हुए वह उससे बाहर निकलने को राजी नहीं, मगर महीने की तीस तारीख अपना कटोरा लिये खड़ी अवदान मांगती बाहर आने के लिए विवश कर रही…

सुघड़ गृहिणी-सी बहुत सारे नियमों में उसने यह नियम भी बना रखा है कि माह के आखिरी सप्ताह में स्टील के डिब्बों और भरनियों की शेष अन्न, दालें, मसाले पॉलीथिन की थैलियों में खाली कर; डिब्बे, भरनियां महरी से धुलवा, धूप में अंधा, पोछ-पांछ चमका सहेज रख लेती । ताकि राशन आने पर फटाफट चीज-बस्त भर यथा-स्थान रख सके । पारंपरिक भोजन विधियों में उसे विशेष रुचि है । केदार और प्रिया को उतनी ही अरुचि ।

उसकी रसोई की चमक केदार की आंखों में खटकती। अवसर न चूक वे फिरकी लेते । वस्तुओं के नाम लिखे, लेबल लगे, चौंध पैदा करते डिब्बे-भरनियां सजी उसकी रसोई उन्हें किसी वैद्याचार्य की छोटी-मोटी दुकान का भ्रम देती-सी प्रतीत होती ।

केदार का कटाक्ष वह उधार नहीं रखती । फौरन तरकश कस लेती । आखिर उसके रसोई प्रेम में बुराई? उसे तो कम-से-कम उसके इस लगाव से परम संतुष्ट होना चाहिए कि उनकी खानदान की नाम रखने के लिए पाक-कला में दक्ष कोई एक बहू घर आयी। जो उनके पुश्तैनी धंधे में गहरी रुचि रखते हुए प्रकट करने में लज्जित नहीं होती कि उसके ददिया ससुर और ससुर जी की सण्डीला स्टेशन के बायें निकलते ही चौरस्ते से लगी छोटी-सी ‘गुप्ता मिष्टान्न भंडार’ नाम की दुकान थी । कि उसके ददिया ससुर सण्डीले के ख्यात असली घी के स्वादिष्ट लड्डुओं के थोक व्यापारी थे । कि पारिवारिक हित में जिनके बेटों ने उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दाखिला लेते ही दो क्रांतिकारी कदम उठाये । अपने नाम केदारनाथ, बद्रीनाथ के आगे गुप्ता हटाकर सिंह जोड़ लिया और पिता की चलती दुकान व्यवसाय बदलने की एवज में बिकवा दी। लड्डू आज भी छोटी-छोटी डलियों में सजे सण्डीला स्टेशन पर बिकते हैं, लेकिन लोग कहते हैं कि उन लड्डुओं में वह अनोखा स्वाद कहां जो स्टेशन पर गाड़ियों के लगते ही ठसाठस हुए पड़े डिब्बे में से सवारियों को प्लेटफॉर्म पर उतरने के लिए विवश कर दे ।

अनपेक्षित प्रहार से खिसियाये हुए केदार बगल झांकते फौरन प्रिया की ओर देखने लगते जो उनकी परस्पर ‘झौं-झौं’ से विरक्त चल रहे टी.वी. के सामने खड़ी हू-ब-हू नायिका का अनुसरण करती, उसी की भांति अपनी बटन जैसी आंखें चमकाती, कूल्हे मटकाती, कमर बलखाती, टांगें-हाथ झटकती, सपाट छाती थर्राती गीतों के तालबद्ध बोलों पर ओंठ चलाती नृत्य में (कह लेने में हर्ज?) लीन होती-‘रात सैंया ने ऐसी बॉलिंग करी एक ओवर भी मैं खेल पायी नहीं… ‘ देखकर केदार राहत की सांस भरते। ‘केबल’ न होता तो शर्तिया उनकी इज्जत बचनी मुश्किल हो जाती ।

हो चुका आराम। बिस्तर छोड़ देना चाहिए उसे । दिमाग सांप और नेवले-सा अपने को ही निगलने को आतुर पल-पल पैंतरे भांजता घात लगाये हुए है….कपड़े-लत्ते बदलकर तैयार हो ले फटाफट ।

साड़ी लपेटते हुए उसे बच्चों का ख्याल हो आया । फिर स्वयं को फटकारा । नाहक परेशान हो रही। बच्चे अम्मत-गम्मत करते मस्त होंगे अपनी हुडदंगों में । पानी की टंकी पर न चढ़ने, मुंडेर पर न लटकने आदि-आदि चेतावनियां उनका कार्यक्रम बनते ही पिलानी शुरू कर दी थीं उसने । उनकी खैर-खबर लेने एक वही नहीं पहुंचेगी छत पर तो क्या? कोई न कोई पहुंच ही रहा होगा । मिसिस दुग्गल वैसे भी अधीर हृदय और आशंकित रहने वाली महिला हैं । अक्सर जो नहीं होने वाला उन्हें होता हुआ नजर आता । ऊपर से रक्तचाप की मरीज । न खुद चैन से बैठ पातीं, न औरों को बैठा हुआ सह पातीं । छत का चक्कर अब तक लग चुका होगा उनका मुआयने के लिए कि कहीं ऐसा न हो कि खेल-खेल में कोई हुड़दंगी बच्चा सातवें माले से नीचे टपक पड़े ।

होने को यह भी हो सकता है कि सभी महतारियां एक-दूसरे के विषय में यही सोच रही हों और पूरी दोपहरी ‘केबल’ से चिपकी उसी की भांति ‘आंधी’ देखने में लगी रही हों?

उसे गृहस्थिनों के छद्म पर बेआवाज हंसी आयी ।

‘केबल’ से दिन-रात गुड़ से चिपके चींटों की भांति चिपकी रहने वाली यही गृहस्थिनें (चुड़ैलों ने) सोसाइटी द्वारा भेजे गए परिपत्र में ‘केबल’ कनेक्शन लगवाने पर ‘केबल’ ऑपरेटरों द्वारा प्रस्तावित सामूहिक छूट के लाभ के मुद्दे पर कैसे बोरिया-बिस्तर बांधकर पिली थीं उस पर? हो चुकी बच्चों की पढ़ाई । स्कूल से लौटते ही बच्चे अपने लिए विशेष रूप से प्रसारित होने वाली कार्टून फिल्में देखेंगे या फिर ‘एम’ टी.वी. के ‘होइऽऽ, हाऽऽऽ’ नंगे नाच । उनका गृहकार्य कौन निबटायेगा, उनकी माएं? मिस्टर सिन्हा पांचवें माले वाली मिसिस कृपलानी के सुर में सुर मिलाते हुए अपनी किताबी हिंदी में भाषण झाड़ते-से उन्हें समर्थन देते हुए कहने लगे कि अबोध वय में प्रत्येक क्रियाकलाप बच्चों के लिए कौतूहल और जिज्ञासा का विषय होते हैं, जिन्हें वह केवल जानना ही नहीं चाहते, स्वयं अनुभूत भी करना चाहते हैं । बंदर और बच्चों में फर्क नहीं । वास्तविकता यह है कि उनकी स्वाभाविक प्रकृति अनुकरण की होती है…

सिन्हा साहब सोसाइटी की कार्यकारिणी समिति की बैठक में ‘केबल’ वाले मुद्दे पर उसे प्रगतिशील विचारों के सबसे बड़े दुश्मन नजर आये। वह भी नम्बरी अड़ियल ठहरी । कौन उनके प्रभाव में आने वाली । आक्रामक हो एकदम किटकिटाई-“इसका मतलब यह हो गया कि हम जहां हैं वहीं ठहरे रहें? कुएं के मेढक बनें?”

“ठीक कह रहीं मिसिस सिंह ।” कार्यकारिणी समिति के एक अन्य सदस्य अहलूवालिया उसके तर्क से सहमत हुए।

अहलूवालिया के समर्थन के पीछे उनकी आपसी अनबन थी या उसके आधुनिक विचारों में अपनी मान्यताओं की पुष्टि, उस समय उसके लिए विश्लेषित कर पाना संभव न था । केवल तसल्ली के लिए इतना ही पर्याप्त लगा कि उनके समर्थन ने उसके पक्ष को मजबूत ही नहीं किया बल्कि उसका साहस बढ़ा उसे सिन्हा साहब से उलझने की नयी स्फूर्ति से भर दिया-“उन समस्याओं और दबावों को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते जो दिन पर दिन सामाजिक जीवन को कठिन बना रहे…”

सिन्हा साहब ने उसे चुभती नजरों से देखा ।

“मंहगाई की चौतरफा मार को लेकर सोचना होगा सिन्हा साहब । पच्चीस रुपये का टिकट खरीदकर सिनेमा देख पाना संभव है आज के जमाने में? ऊपर से थियेटर परिवार के संग बैठकर फिल्में देखने लायक बचे हैं?”

उसने पैंतरा भांजा-“आप कह सकते हैं, फिल्में देखनी जरूरी हैं मनोरंजन के लिए? तो साहब! मुझे लगता है कि जटिल, बेस्वाद सामाजिक जीवन में मनोरंजन के लिए मनचाही सुविधा और साधन उपलब्ध ही कहां हैं लोगों के पास कि वे विदेशों की भांति हर शनिवार वीकेंड मनाने ऊटी और कोवलन बीच निकल जाया करें? क्यूं अहलूवालिया जी?”

“गलत नहीं ।”

जोश ने ठाठें मारते हुए नेतई टोपी अगुवा ली।” हद कर रहे सिन्हा साहब । इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर रहे बच्चों को गुलेल और गुल्ली-डंडा के युग में लौटा ले जाने का हठ कर रहे…हर्जा नहीं । मगर फिर अपने नाती-पोतों को आप क्रिकेट बल्ले और टेनिस रैकेट क्यों लाकर पकड़ा रहे?”

तर्क करते हुए महसूस हुआ कि वह सिन्हा साहब के अन्तर्विरोधों को नहीं उधेड़ रही, उनकी आड़ में स्वयं उधड़ रही ।

बेमौके अपने को कठघरे में घसीट रही आन्तरिक उधेड़बुन को कंधे पर आ चिपकी बरसाती पांखी-सा झटका उसने-” ‘केबल के सकारात्मक पक्ष देखिए…पूरी दुनिया सिमटकर आपकी बैठक में आ गयी । खेलकूद, भ्रमण, जीवन-शैली, राजनीतिक हलचलें, आविष्कार, शिक्षाप्रद फीचर्स…सोच को खुली हवा और खुला दायरा ही नहीं देते, मानसिक खुराक भी देते हैं और ज्ञान, दृष्टि, सौन्दर्यबोध, साहस, आत्मविश्वास सभी कुछ आपमें पैदा करते हैं। इन उपलब्धियों को कैसे उपेक्षित किया जा सकता है?” अपनी विश्लेषणात्मक क्षमता ने एक बार फिर आत्ममुग्ध किया । उपजी अपेक्षित प्रतिक्रिया ने कुछ और ।

कार्यकारिणी के दुविधाग्रस्त सदस्यों के मनोभावों पर अपना लोहा ठोस होता नजर आया-“सोचिए, चार साल का बच्चा अखबार नहीं पड़ता, लेकिन यह जरूर जानता है कि अमरीका के राष्ट्रपति क्लिंटन हैं और टेनिस मैच का नतीजा क्या निकला…माइकल जैक्सन और टीना टर्नर कौन हैं; कैसे?”

सदस्यों के चेहरे अभिभूत हुए। विजित भाव ने मूंछें मरोड़ी ।

उसे लगा प्रस्ताव के हक में अब और अधिक कुछ बोलने-कहने की जरूरत नहीं । गिनाने को अब अन्य बहुत-से फायदे धाराप्रवाह गिना सकती है। तरकश में तीर चूके नहीं । मसलन ‘केबल’ का प्रणेता चाहे जो भी व्यक्ति रहा हो, निर्विवाद रूप से वह मनोचिकित्सक जैसी गहरी सूझ-बूझ का चमत्कारी व्यक्ति रहा होगा जिसने दिनोंदिन दुश्वार होते जा रहे मनुष्य जीवन को विक्षिप्त होने से बचा लिया । जिन सोसाइटीज में ‘केबल’ पहुंच गया वहां महिलाओं में आपसी प्रपंच खत्म हो गए।

अभी कुछ रोज पहले केदार के कार्यालय सहकर्मी कुलकर्णी साहब की पत्नी तिलोत्तमा बता रही थीं कि पहले उनकी सोसाइटी में पत्ता खड़कता तो लोगों में परस्पर कानाफूसी शुरू हो जाती । अब हाल यह है कि पिछले दिनों उनके ऊपर वाले पड़ोसी चौधरी मोशाय की कॉलेज छात्रा बेटी चौबीसवें माले वाले मुसलमान लड़के के घर अपनी ही बिल्डिंग में भाग गयी और तुर्रा यह कि पट्ठी ने नियमित कॉलेज आना-जाना नहीं छोड़ा । फिर भी उन लोगों को हफ्तों खबर ही नहीं लगी । तिलोत्तमा अपना एक निजी अनुभव उससे बांटे बिना न रह पायी कि एक समय था कि उनके और कुलकर्णी साहब के मध्य भयंकर मतभेदों के चलते संबंध विच्छेद होने की नौबत पैदा हो गयी थी । उन लपटों पर गागर उडेली ‘केबल’ ने ।” सोचो, दिन में तीन-तीन-फिल्म देखने में व्यस्त दिमाग को आपसी कडुवाहटों को लेकर सोचने-झींकने, तनावग्रस्त होने की फुरसत ही कहां रह गयी उमा!”

प्रस्ताव हस्ताक्षरित होने के समय सिन्हा साहब एक बार फिर पानी में डूबने से पूर्व भकभकाती बाल्टी-से बौखलाये और जीवन को शुष्क और श्रीहीन बनाने वाले पोंगापंथी समाज सुधारकों जैसे बहकने लगे । वह मोर्चे पर पुनः आ डटी और उनकी अनर्गल दुश्चिन्ताओं को ‘खच-खच’ काटती हुई तर्क देने लगी-“समाज के लिए जो कुछ असंस्कारी है, अश्लील है, अहितकर है, उसका हम डटकर विरोध करेंगे और उसे बदलेंगे…चिंता क्यों करते हैं?”

“बदल चुके ।” मिस्टर सिन्हा ने उनकी बड़ बस्ती से चिढ़कर घृणा से होंठ सिकोड़े-“नए के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है…दुश्मनी हमारी भी नहीं लेकिन सच्चाई कड़वी है मिसिस सिंह! नए को हम आने तो देते हैं मगर उससे अगले नए से अभिभूत होकर एक तरह से एक नशे से ऊब दूसरे का मजा चखने को लालायित हो हम उस दुश्चक्र का हिस्सा हो उसे व्यसन बना लेते हैं…विरोध की फुरसत ही कहां होती है?”

कुछ नहीं हो सकता । उन्हें समस्या बोने-काटने की बीमारी है । वह छूत खतम नहीं होने की ।

सनकी बुड्ढ़े की शिकायतें बदस्तुर जारी हैं…

मिस्टर सिन्हा आजकल सोसाइटी में व्याप्त अव्यवस्था से असंतुष्ट हो रहे । उन्हें लग रहा कि इसके लिए सरासर सोसाइटी की कार्यकारिणी के गैरजिम्मेदार सदस्य दोषी हैं । वे परस्पर मिलते हैं तो केवल मीटिंगों में मिलते हैं और मीटिंगें करने-भर के लिए मिलते हैं । नतीजतन माली की बीवी अक्सर बीमार रहती है । प्लम्बर का अलसर फूटते-फूटते बचता है । बिजली वाले की हर तीसरे रोज कमर उतर जाती है । जिसे देखो हरामखोरी करने पर तुला हुआ है । सोसाइटी का बगीचा अब इस लायक नहीं रहा कि वहां सुबह की हवाखोरी निर्भय होकर हो सके । बड़ी हुई बेतरतीब घास उन्हें सर्प-बिच्छुओं की शरणस्थली बनी नजर आती । सीढ़ियों के लट्टू जब देखो तब फ्यूज लोग घरों से बाहर निकलें तब न दिखायी दे उन्हें सीढ़ियों का अंधेरा । जब उन्हें नहीं कुछ सुनायी दिखायी देता तो आखिर बिजली वाले को क्या पड़ी है अंधेरा दूर करने की?

सुबह कैसे वे बेमुरव्वत हो बच्चों की पिकनिक पर मिनक उठे ।

खली लोग उसे कतई पसंद नहीं । उसे क्या किसी को भी नहीं । बूढ़े लोग केवल उसे अपनी दादी जैसे ही प्रिय होते हैं । जो पूरी तरह से बहूरियों को सत्ता सौंप नाती-पोतों के संग हिलमिल हुड़दंग मचाती उन्हीं में से एक छीना हो उठती थीं…

खाद्य वस्तुओं की सूची और नकद पर्स के हवाले करते हुए उसके मन में दुबारा इस विचार ने सिर उठाया कि घर से निकलते ही वह छत का एक चक्कर मार ले । प्रिया को सूचित भी कर देगी कि वह सवा एक घंटे के लिए जरा ‘सुपर बाजार’ होकर आ रही । सूचित करना कोई जरूरी नहीं मगर हर्ज कोई नहीं । वैसे भी उनकी पिकनिक शाम छत-सात से पहले समाप्त होने वाली नहीं ।

कार्यक्रम बनाते हुए बच्चों ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे दिया-बत्ती से पूर्व नीचे उतरकर आने से रहे । गर्मियों के दिन हैं । सात से पहले अंधेरा वैसे भी नहीं होता । संभावना यह भी हो सकती है कि वे सात तक भी नीचे न उतरे और अंत में उन्हीं लोगों को छत पर पहुंचकर उन्हें धर-पकड़कर नीचे लाना पड़े ।

पिछले मंगल को कीरत और विशु ने सोसाइटी की कार्यकारिणी की सदस्या होने के नाते उससे अनुरोध किया था कि वह छत पर उनकी पिकनिक का ख्याल कर एकाध लट्टू लगवा दे ताकि अंधेरा घिरने पर उन्हें अपना तम्बे-तंगाड़ा उखाड़ने में अड़चन न हो । उसने बिजली वाले रामप्रसाद से कहकर लिफ्ट की गुमटी से डंडा बंधवा दो लट्टू लटकवा दिए थे । इस चेतावनी के साथ कि लट्टू लगवा का यह अर्थ हरगिज नहीं कि उन्हें देर रात तक पिकनिक मनाने की छूट हासिल हो गयी । दरअसल ऐसा कहते हुए कहां उसके भीतर हल्का अपराध-बोध हुआ ।

वैसे भी दिल्ली में छोटे बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में अभिभावकों के संग कहीं सैर-सपाटे पर न निकल पायें तो उनका घर से बाहर निकल पाना संभव नहीं होता । लू-लपट के भय से घरों में बंद कूलरों की तरावट में कैद ‘केबल’ से चिपके हुए ही उनकी लगभग पूरी छुट्टियां समाप्त हो जातीं । शाम को कुछ देर के लिए वे नीचे उतरते अवश्य लेकिन अधिक समय मिल-बैठ परस्पर खेल नहीं पाते । सोसायटी की टेनिस की मेजें झूले धसरघुण्डी-सब खाली पड़े रहते । क्योंकि छुट्टियों के गृहकार्य की चिंता के साथ-साथ उन्हें अपने मनपसंद धारावाहिक भी देखने होते । इन परिस्थितियों में जब उन्हें कहीं सैर-सपाटे के लिए बाहर ले जाना मुमकिन नहीं तो फिर उनके मनोरंजन का ले-देकर एकमात्र साधन टी.वी. ही बचता । उन्हें कंठस्थ हो गया है कि किस दिन किस समय कौन-सा धारावाहिक किस चैनल पर आने वाला है । उसे कोई कार्यक्रम याद ही नहीं रहता । प्रिया ही उसे याद दिलाती । प्रिया की स्मरणशक्ति उसे चमत्कृत करती । कमबख्त एकदम कम्प्यूटर है चलता-फिरता! घर का दरवाजा बंद कर वह लिफ्ट की ओर बढ़ी । सातवें माले और छत के दरमियान यही कोई आठ-दस सीढ़ियों का फासला होगा । सीढ़ियां पार कर वह छत में दाखिल हुई । छत का नजारा देख पल-भर को वह मंत्रमुग्ध-सी खड़ी रह गयी । कमाल कर दिया नन्हे बच्चों ने! ऐसी रौनक? मानो किसी उत्सव का पंडाल सजा हो!

घर से लायी हुई चादरों को मुंडेरों से लगे हुए पाइपों के सहारे बांधकर बड़ी कुशलता से उन्होंने चारों ओर कनातें-सी तान रखी थीं । कुछेक चादरों को गठियाकर धूप से बचने के लिए सिर के ऊपर चंदोबा । फर्श के खुरदुरेपन को चटाइयों और दरियों से ढका हुआ था । उन्हीं पर खाने के टिफिन बॉक्स थर्मस झूठी-सुच्ची पेपर तश्तरियां प्लास्टिक के गिलास चम्मचें और यत्र-तत्र बिखरे मुंह-हाथ पुंछे मुंजड़ पेपर रूमाल । उस बिखराव से अलिप्त वे गोलबन्द बैठे हुए अलमस्ती में डूबे ताली पीट-पीटकर झूमते हुए गाने में मग्न थे-‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त तू चीज बड़ी,’ गोल के बीच विश और नन्ही रिया कूल्हे मटकाते तालबद्ध थिरक रहे थे । पंजों के बल थिरकने और फिरकी की भांति गोल चक्कर मार दो-चार ठुमके भर लेने के अलावा थी उनमें कहीं ऐसी गजब की लोच ।

बच्चों को उसकी उपस्थिति का आभास नहीं हुआ । उसने घड़ी खांड उनके आत्मविस्मृत उल्लास का आनंद लेने के अभिप्राय से अपनी उपस्थिति प्रकट भी नहीं करनी चाही । अचानक रस-मग्न हो उसका ध्यान गया कि बच्चों के गोल में प्रिया कहीं दिखाई नहीं दे रहीं? गोलबंद बच्चों की ओर उसने गौर से देखा । बैठे हुए बच्चों की उसकी ओर पीठ थी । मगर प्रिया को वह किसी भी मुद्रा में बैठे होने के बावजूद पहचानने में समर्थ थी । यहां नहीं तो कहां गयी? दुबारा गौर करते हुए उसने अपने भ्रम का निवारण करना चाहा । प्रिया वहां होती तो दिखाई देती ।

अनिष्ट की आशंका अनायास काले पत्थर के टुकड़े पर उस्तरे-सी उलट-पलट होती धार पाने लगी । कहीं मिसिस दुग्गल वाली दुश्चिन्ता सत्य न निकले, लेकिन । दूसरे ही पल उसने अपने कमजोर पड़ते मन को फटकारा । बच्चों के गोल में प्रिया की अनुपस्थिति का अर्थ यह भी हो सकता है कि वह किसी काम से अपने किसी हमजोली के संग उसके घर गयी हुई हो । आखिर ओढ़नी लेने वह कीरत के संग अपने घर आयी नहीं? कोई अनहोनी घट जाये और बच्चों को उसकी भनक तक न लगे संभव है?

धीरज सीढ़ियों पर पांव रपटी देह-सा लुढ़कने लगा ।…किसी बच्चे को बुलाकर पूछना ही होगा ।

सोचा, गोल से बाहर वेफर्स की थैली से पेपर प्लेट में वेफर्स निकालते हुए घुटनों के बल बैठे-बैठे मस्ती में उचक रहे शानू को न गुहार लगा ले? न-न, उसकी आवाज उनके जमे-जमाये रंग में भंग डाल सकती है । तब? एक उपाय है।

उसने मुंह से ‘स्सीऽऽऽ स्सीऽऽऽ’ की सिटकारी भरकर शानू का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश की । दूसरे प्रयत्न के साथ ही चिहुंककर शानू ने उसकी ओर देखा और खिलता हुआ उसकी ओर बढ़ आया- “आंटी, आप! हमारी पिकनिक देखने आयी हैं?” उसने छटपटाकर शानू को छत के किवाड़ के पल्ले की ओट में खींच लिया-“सुनो शानू प्रिया दिखाई नहीं दे रही?”

“प्रिया?” शानू उसके अप्रत्याशित प्रश्न से अचकचाया । फिर तनिक असमंजस से भरकर उसकी ओर देखा ।

“गयी कहां प्रिया?” शानू के असमंजस ने उसे घबरा दिया ।

“वो, वो हनीमून मनाने गयी आंटी!” शानू ने मुसकराते हुए कानों तक दांत फाड़े ।” दिमाग ठिकाने है तेरा?”

“मैं ठीक कह रहा हूं आंटी! प्रिया सिराज के साथ हनीमून पर गयी… “

“मतलब ये न आंटी, हम लोगों ने सिराज और प्रिया को गुड्डे-गुड़िया बनाया । रिया, प्रिया, श्वेता किसी के पास कोई नयी डॉल नहीं थी न! उन्हें गुड-गुड़िया बनाकर हमने उनकी शादी की…उनकी बारात लेकर आये…उनका रिशेप्सन किया और फिर..फिर वे दोनों ‘हनीमून’ मनाने स्विट्जरलैंड चले गए…” शानू ने हाथ नचाते हुए बात पूरी की ।

उसकी जान में जान आयी । चेहरे की अबूझियत छिटकी । उनके जमाने में गुड्डे-गुड़ियों के खेल में दुलहिन ससुराल पहुंचकर मुंह दिखायी और पैलगी की प्रथा पूरी कर रही होती…” ठीक है, ठीक है…कहां है तुम्हारा स्विट्जरलैंड?”

“बताऊं आंटी…?”

“बताओ, जरा मैं भी स्विट्जरलैंड घूम लूं ।” स्वर में परिहास घुल आया ।

“वोऽऽऽ उधर पानी की टंकी के पीछे ।” शानू ने तर्जनी उठाकर छत के दाहिने हिस्से की ओर संकेत किया ।

“जाऊं आंटी?”

उसके ‘जाओ’ कहने के साथ ही शानू मृगशावक-सा पलटकर अपनी वेफर्स की तश्तरी की ओर लपका ।

वह दबे पांव स्विट्जरलैंड की ओर बड़ी । सोचा, अचानक प्रिया के निकट पहुंचकर उसे ‘भौऊ’ कर चौंका देगी और देखेगी कि महारानी उसकी सगुन की ओढ़नी ओढ़े दुलहिन गुड़िया बनी कैसी लग रही!

मुंडेर और पानी की टंकी की दीवार के बीच एक चादर तनी हुई दिखी । उसने आहिस्ता से नीचे झुककर स्विट्जरलैंड की चादर उठा भीतर की ओर झांका । भीतर का दृश्य उसे स्तब्ध कर गया । उसकी ओढ़नी बिछाये लेटी प्रिया के ऊपर सिराज औंधा लेटा हुआ था…

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