“मैं पन साथ में टॉर्च लाना भूल गया । दिन पाली में जरूरत भी नई पड़ता न ।” कुछेक सीढ़ियां उससे ऊपर अभ्यस्त अंदाज में चढ़ते हवलदार पवार ने उसकी परेशानी भांपते हुए संकोचपूर्वक सफाई दी ।

हवलदार पवार की बात सुनकर उसने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । उसे सीढ़ियां किसी दुर्गम पहाड़ी रास्ते की कठिन चढ़ाई की सतर्कता से जकड़े हुए थी । ध्यान बंटाकर वह किसी प्रकार का खतरा आमंत्रित करने के मूड में नहीं थी । यहां तक आने का निश्चय ही अपने आपमें एक ललकारती चुनौती थी । वह चाहती तो कुछेक खोजी पत्रकारों के लेखों और विश्लेषणों के आधार पर बड़ी आसानी से देह-व्यापार की दुनिया अपने इर्द-गिर्द बुन लेती और उसकी रिपोर्टिंग तैयार हो जाती । मगर रह-रहकर उसके अंतर्मन को यही प्रश्न उमेठता रहा कि क्या वह दूसरों के गढ़े आईनों में मनुष्यता की देह पर कोढ़ सदृश गल रही इन विद्रूप सच्चाइयों के वास्तविक चेहरे टटोल पाएगी?

‘खरर!’ अचानक अंधेरे में माचिस की तीली सुलगी । उसके और हवलदार पवार के बीच की दूरी तय करती कुछेक सीढ़ियां पीली कांपती लौ में क्षणांश उजिया आईं।

पता नहीं कैसे उसकी असुविधा का यह समाधान हवलदार पवार को सहसा सूझ आया । उसे अच्छा लगा । एक तीली बुझती कि तुरंत पवार दूसरी सुलगा के उसके सामने कर देता ।

“हमें कोई आपत्ति नहीं । आप जाना ही चाहती है तो एक हवलदार संग किए देते हैं । वह आपको रेड लाइट एरिया का कुछ हिस्सा दिखा देगा ।” कहकर पुलिस उपायुक्त श्री श्याम सुंदर सिन्हा पल भर को कारुणिक खामोशी में उतर गए प्रतीत हुए । दुबारा दृष्टि उसके चेहरे पर टिकी तो वे उसके मनोभावों की दृढ़ता तौलते हुए बोले, “उनकी अभावग्रस्त जिंदगी वाकई नरक है, नरक । आप चाहें तो एकाध औरत को हम यहीं बुलवाकर आपसे मुलाकात करवाए देते हैं ।”

“इतने से काम चल जाता तो आपके पास आने की जरूरत न पड़ती ।” कटाक्ष उसके स्वर में स्पष्ट हो आया था ।

“अभी अपुन आ गए ।” सीढ़ियों का एक घुमावदार मोड़ मुड़ते ही प्रसन्नचित्त पवार का स्वर उसे भी उत्फुल्ल कर गया । अपनी फूलती सांसों को काबू करने का प्रयास करते हुए पवार ने बताया कि हमें चौथे माले पर ही पहुंचना था और अब हम चौथे माले पर पहुंच गए हैं । फातिमाबाई पच्चीस नंबर में रहती है । पवार का प्रसन्न होना स्वाभाविक लगा । लग रहा था कि वे वस्तुतः किसी दुर्गम गुफा को पार कर गंतव्य तक पहुंच पाने में सफल हुए हैं ।

सीढ़ियों से लगा एक लंबा सहन था, जिसके चारों ओर चालनुमा खोलियां फैली हुई थीं । उसे अंदाज हो आया । इन्हीं खोलियों की पिछली दीवारों पर, जिनमें जंगलेनुमा खिड़कियां सड़क की दाहिनी ओर खुलती हैं, लड़कियां उत्तेजक भाव-भंगिमाओं में खड़ी हुई ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करती दिखती हैं ।

पवार ने गलियारे में प्रवेश करने से पहले उसे ठहरने का संकेत किया ।” मैडम, मैं जरा फातिमाबाई का पता लगा के आता ।”

मिनट भर भी नहीं गुजरा होगा कि वह चेहरे पर फतह भाव चुपड़े मुसकराता उसके पास आ खड़ा हुआ, “फातिमाबाई जग गई हैं ।”

चीकट परदे को एक ओर सरकाते ही पलंग पर से जैसे किसी औंधे घड़े ने गरदन उठाई हो, “आओ पवार, सुबू-सुबू कैसे तकलीफ की?”

समझ गई कि सवाल पवार के बहाने उससे ही किया गया है । पवार तो उनसे मिनट भर पहले ही मिलकर गया है । उद्देश्य भी उसने जरूर स्पष्ट कर दिया होगा । उत्तर उसी ने दिया, “अपनी कुछ लड़कियों से बात करवा देंगी?”

फातिमाबाई की सुरमा लिपी मिचमिची आंखों ने दाहिनी भी चढ़ाकर पवार को साभिप्राय देखा-“करवाना ही पड़ेगा । मगर एक बात बता दूं आपको, यहां गैर-कानूनी धंधा नहीं होता । हम लड़की बाद में लाते, लाइसेंस पहले बनवा लेते ।” फिर बिस्तर पर से उतरते हुए उससे कुरसी पर बैठने का आग्रह करती ताना मारते से स्वर में कहने लगी, “बोलो मेम सा’ब! ये पोलिसवाले तो सुबू-शाम अपनी हाजिरी लेते ही हैं…अब अखबारवाले भी चक्कर लगाने को लगे हैं । बाकी सब तो खैरियत है, पन मैं बोलती कि कुछ इसके बारे में भी आप लोग लिखिए कि सरकार हमारी इमारतें भी थोड़ा दुरुस्त कराए । पानी हफ्ते-हफ्ते ऊपर नहीं चढ़ता-संडास भर रहे हैं । टूटे पाइप से अक्खा दिन मैला रिसता रहता है । बदबू के मारे गिराक ऊपर नई चढ़ता । धंधे का खोटी कैसे सहन करें, आप ही बोलो?” शिकायत करते-करते अचानक फातिमाबाई को चेत आया कि अपना दुखड़ा रोने के पीछे अब तक उन्होंने उसकी आवभगत का कोई उपक्रम नहीं किया । फौरन आवाज देकर, एक छोकरे को पास बुलाकर गुर्राए हुए स्वर में आदेश देती बोलीं, “लौंडे। जा फटाफट ‘लिम्का’ की दो ठंडी बोतलें ले आ ।” लड़के को भेज एक सायास विनम्र मुसकराहट उछालती वे उसकी ओर पलटीं, “अभी बुलाती छोकरियों को ।”

“बुलाती क्यों हैं, वहीं चलकर मिलवा दीजिए जहां वे रह रही हैं ।”

उसका अभिप्राय भांपकर फातिमाबाई क्षणांश विचारमग्न हुई । फिर सहज होकर बोलीं, “ठीक है, चलिए।”

उसने उठते हुए हवलदार पवार को संकेत से वहीं ठहरने का इशारा किया और स्वयं फातिमाबाई के पीछे हो ली ।

“ये बड़ा खोली है । इसमें चार छोकरी एक साथ रहती हैं । सबको किला (क्लास) के मुताबिक रखते हैं । हमारे पास अच्छे गिराक भी आते हैं न! जागा तो आपने देखा, कितना घाण है । सरकार बोलती जास्ती कुछ करने के नाम पर इल्ले । हमने कई दफे लिख के भेजा भी है कि सरकार को हमारे वास्ते किदर भी एक अच्छा कॉलोनी बना के देना चाहिए । हम कोई भेड़-बकरी तो नहीं हैं ” वे पुनः अपनी परेशानियों का रोना दोहरातीं, आगे बढ़ती सहसा एक खोली के सामने रुकीं । दरवाजे पर पड़ा चीकट परदा एक ओर सरकाकर भीतर झांकती अचानक चीखीं, “उठने को नई भी! बोत हरामी है ये छोकरी लोग, सीधे बोलने से सिर चढ़ते हैं ।”

उसके कान गरम हो उठे ।

लड़कियां सचमुच सोकर उठी थीं । उनके चेहरों पर रात का अंधेरा बदरंग धब्बों में पुता हुआ था ।

“ये जरीना, ये रेशमा, ये केतकी, ये शहनाज । शहनाज नेपाली है।” उनके परिचय के बाद वे उन्हें उसका परिचय देती बोलीं, “ये मेम अखबार में तुम्हारी बातचीत लिखेंगी । इनको जो पूछें वो साफ-साफ बोलना ।”

वह संकेतों में चाबुक फिराने की चतुराई भांप गई । लड़कियों के लिए स्पष्ट चेतावनी थी कि जो भी बोलना, सोच-समझकर बोलना, वरना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना ।

वह बिस्तर पर बैठती सकुचाई तो केतकी ने अपने गोद के बच्चे को सिरहाने लिटाते हुए व्यंग्य कसा, “गिराहक को हम इधर नहीं निपटाते । अराम से बैठिए ।” वह कटकर रह गई ।

फातिमाबाई थोड़ी हड़बड़ी में दिखी-“आप बात करो, मैं अभी आई ।”

फातिमाबाई के खोली के बाहर होते ही एकाएक वातावरण दबावमुक्त हो आया । उसे यही दुविधा सता रही थी कि अगर उनके बीच फातिमाबाई डटी रहीं तो वह न उनसे खुलकर मिल पाएगी, न बात ही कर पाएगी । लड़कियों के तो सहज होने का प्रश्न ही नहीं उठता ।

…रेशमा ने बताया कि वह बेहद गरीब घर की लड़की थी । यहां तक कि दो-दो दिन हो जाते रोटी का मुंह देखे । सौतेली अम्मी के पहले मर्द से चार बच्चे थे, तीन हम । गुजर हो तो कैसे, एक रोज अम्मी बोली कि चल, तुझे काम पर लगाना है। काम कुछ नहीं है, फकत एक बूढ़ा-बुढ़िया को पानी-वानी देते रहना है। बुढ़िया तो ठीक थी; मगर जैसे ही वह घर से बाहर जाती, बूढ़ा उससे फ्रॉक उतार देने को कहता । अम्मी को बताया । पर उलटा वे उसे ही धांधने लगी थीं कि खबरदार जो वह काम छोड़कर आई और किसी से उसने इस बात की चर्चा की । अम्मी ने ही सिखलाया कि आइंदा जब वह बूढ़ा उससे फ्रॉक उतारने को कहे तो मचल जाना कि पहले हाथ में कुछ रुपए रखे ।

दिन बीतते रहे । लेकिन एक दिन उसे महसूस हुआ कि पैसे अम्मी के हाथ में रखने के बावजूद उसके लिए रोटी नहीं बचती । उन्हीं दिनों वह फ्लैट की अन्य नौकरानियों के संपर्क में आई। उन्होंने उसकी भेंट एक फ्लैट की मालकिन से करवाई, जो दलाली लेकर लड़कियों से धंधा करवाती थी । वहीं से फिर फातिमाबाई से भेंट हुई । तब से यहीं पर है । जिस घोर नरक को मंझाती वह यहां तक पहुंची थी, तसल्ली इस बात की है कि यहां वे मुखौटे नहीं हैं, जो अम्मी और अब्बा की पाक सूरत की आड़ में नीच कर्म को विवश करते हैं ।

“मान लो तुम्हें कल एक बेहतर सामाजिक जिंदगी जीने का आश्वासन मिले, तो क्या यह जगह छोड़ सकोगी?” उसने उद्वेलित स्वर में रेशमा से सवाल किया ।

“नहीं ।” एक निःश्वास उसकी ओर उछला ।

उसके चेहरे पर विस्मय रेंग आया ।

रेशमा की आवाज उसे किसी गहरे कुएं से आती प्रतीत हुई, “बेहतर जिंदगी!….अच्छी जगह, साफ-सुथरे कपड़े, क्या यही बेहतर जिंदगी की उम्मीदें हैं? क्या साफ-सुथरे कपड़ों के नीचे मर्द के हाथ औरत का जिस्म टटोलने से ठिठकते हैं? यहां, अपने भरोसे मैं ज्यादा सुरक्षित और सुखी हूं ।”

“हरामजादी डायलॉग मारती, हां! झूठ बोलती, झूठ!” अचानक केतकी गुस्से से बिफरती उस पर झपटी ।

वह केतकी के इस अप्रत्याशित हमले से हतप्रभ रह गई । अन्य लड़कियों ने उसे इस अभद्र हरकत के लिए लताड़ा, फिर समझा-बुझाकर शांत किया । मगर केतकी का आक्रोश शांत नहीं हुआ । वह रेशमा को चुनौती देती-सी बोली, “सुख की बात करती इदर सुखी है? ऐसे बोलती है जैसे इदर आने वाले राजा राम के अवतार हैं । अरे, कोई निकल के जाना भी चाहे तो कैसे पांव उठा सकती है? खाल उधेड़ के भूसा नहीं भर देंगे! दिखाऊं? दिखाऊं इस नरक की सड़न को? देख!” उसने आंचल हटा अपने ब्लाउज के बटन ‘चट-चट’ खोल दिए । उसके मातृत्व से भरे- भरे उघड़े स्तन नील और खरोंचों से क्षत-विक्षत बाहर लटक आएं ।

पीड़ा से सिहरकर उसने आंखें मींच लीं । उफ तक शर्म से होंठों पर आने से पहले ही घुट गई ।

केतकी पर तो जैसे उन्माद तारी हो उठा । वह भूल ही गई कि भले इस क्षण फातिमाबाई खोली में मौजूद नहीं है, किंतु उसकी उद्दंडता की खबर उनसे छिपी नहीं रहेगी । मगर वह किसी भी आतंक और दबाव से निर्भय होकर बताने लगी कि अभी उसकी जचगी हुए तीसरा महीना भी पूरा नहीं हुआ है कि निर्दयी फातिमाबाई ने उसे धंधे के लिए विवश कर दिया । उसका एक चहेता ग्राहक है भट्ठी चलानेवाला जोसफ । लगभग हर रात वह धुत्त होकर उसके पास पहुंचता है, रात गुजारता है, वह तो कोई बात नहीं, मगर जिस नृशंसता और कामुकता से वह उसकी देह से खिलवाड़ करता है, उसकी गवाह ये छातियां हैं । और तो और, हरामखोर छातियां चूस…वह तड़पकर रह जाती है । चिरौरी करती है, गिड़गिड़ाती है, अपने दुधमुंहे बच्चे का वास्ता देती है; लेकिन वह एक नहीं सुनता । जब तक स्वयं बिस्तर नहीं छोड़ देता, उसे भी नहीं हिलने देता । सुबह जब वह अपने बच्चे के पास पहुंचती है, बच्चा निचुड़ी छातियों से मुंह नहीं लगाता । फातिमाबाई से कितनी दफे रोई है, पर वो उलटे ही घुड़क देती हैं कि एक रात के पंद्रह रुपल्ली थमाता है जोसफ । उसके जैसी एक बच्चे की अम्मा को तो कोई टके को न पूछे । और बच्चा रात भर उसका दूध नहीं चिंचोरेगा तो क्या उसके प्राण निकल जाएंगे? पूरे साढ़े तीन महीने महारानी ने खटिया तोड़ी है । नुकसान कौन भरेगा?

केतकी की तरल आंखें प्रश्नों की बौछार करती सीधे उस पर टिक गई । पुतलियों के चारों ओर झल-झल करता गहरा नीला वृत्त मानो किसी लपलपाते अग्नि गोलों में परिवर्तित हो उठा । एक क्षण को उसे लगा कि इन पुतलियों से वह परिचित है । नीले वृत्त से घिरी पुतली जो आम आंखों से अपने को अलग खड़ा कर लेती हैं । अलग से याद भी रहती हैं। मगर कहां देखा है इन्हें? कब? शायद उसे भ्रम हो रहा है। केतकी से कहीं मिलना संभव भी कैसे हो सकता है? मगर नहीं । दुबारा दृष्टि टकराई तो फिर यही एहसास कुनमुनाया । परिचय है । मस्तिष्क को खंगालना शुरू किया तो सहसा बिजली-सा एक किशोर चेहरा मानस-पट पर कौंधा। एक नाम होठों पर कुनमुनाया-‘शैला?’ केतकी चौंक गई । जलती आंखें झुककर फर्श कुरेदने लगीं ।

“क्या मैं केतकी से अकेले…” उसने आग्रह किया तो तीनों लड़कियां उठकर खोली से बाहर हो गई ।

उसके बीच चुप्पी शब्द खोजने लगी ।

…एक-एक सेकेंड महीने-दर-महीने की लंबाई फलांगता हुआ पीछे लौट रहा है। आठ साल पीछे….

वह पंजाब मेल की यात्रा थी । वह ग्वालियर से अपनी बीमार छोटी बहन को देखकर मुंबई लौट रही थी । आरक्षण न हो पाने पर उसे महिलाओं के चालू डिब्बे में बहनोई ने इस आश्वासन के साथ दाखिल करा दिया था कि इस ठूसम-ठूस से घबराने की कोई बात नहीं है । झांसी आते ही डिब्बा खाली हो जाएगा । हुआ भी ऐसा ही । झांसी पर लगभग आधा डिब्बा खाली हो गया । अच्छी तरह से बैठने की जगह ही नहीं मिल गई, अपितु ऊपरवाली बर्थ पर उसने तुरंत अपना बिस्तर खोल सोने की सुविधा भी जुटा ली । झांसी से जैसे ही गाड़ी आगे सरकी, अचानक टिकट चेकर ने प्रकट होकर जांच-पड़ताल शुरू कर दी । उसकी सीट के निकट पहुंचकर उसने भौंहें उछालकर टिकट दिखाने का इशारा किया । उसने टिकट आगे बढ़ा दिया ।

“लड़की का?”

“कौन लड़की?”

“यह लड़की आपके साथ नहीं है?”

उसने इंगित लड़की की ओर दृष्टि घुमाई । यह तो वही लड़की थी जिसके साथ वह पिछले रास्ते मजे से गप्पें मारती चली आ रही थी । इसी भ्रम में कि वह? सामनेवाली थुलथुल महिला यात्री की अपनी बेटी है । उसने स्पष्ट मना कर दिया कि वह लड़की कतई उसके साथ नहीं है । “मगर यह तो कहती है कि यह आपके साथ है!”

उसने पाया कि गाड़ी की तेज रफ्तार से ऊंघ रही आस-पास की मुंदी दृष्टियां अचानक चौकन्नी हो उस पर टिक गई । वह खीझ आई। अच्छा लफड़ा है। मगर अपने को संयत रखकर बोली, “जनाब, मेरा परिचय तो इस लड़की से डिब्बे में ही हुआ है । इसके कहने से क्या होता है! सोचने की बात है, अगर यह मेरे साथ होती तो जब मैं अपना टिकट खरीद सकती हूं तो इसका नहीं!”

उसका झुंझलाना था कि लड़की आहिस्ता से उसके निकट आ बैठी और सहमे चेहरे से बोली, “प्लीज आंटी, प्लीज! कह दीजिए न कि मैं आपके साथ हूं । नहीं तो यह मुझे उतार देगा ।”

“कैसे कह दूं! तुम्हारे पास टिकट तो है नहीं ।” उसने खीझकर कहा ।

प्रत्युत्तर में लड़की ने गरदन झुका ली ।

“सर में क्या कोई तुम्हारे साथ है?”

उसने इनकार में सिर हिलाया ।

“तो?”

“आप मेरा मुंबई तक का टिकट ले दीजिए। स्टेशन पर मुझे लेने मेरे अंकल आएंगे ही । मैं आपके पैसे दिलवा दूंगी ।” उसका स्वर रुंध आया ।

यह पूछने पर कि उसके साथ हुआ क्या, लड़की ने बताया कि भीड़ में किसी ने उसका बटुआ मार दिया है । बटुए में ही टिकट था, पैसे थे, पता था ।

“मुंबई में किधर रहते हैं अंकल?”

“वरली में ।”

“पता क्या है?”

“मालूम नहीं।”

“मान लो, स्टेशन पर तुम्हारे अंकल नहीं पहुंचे तो तुम घर कैसे पहुंच पाओगी?”

“अंकल को बाबूजी ने पहले ही तार कर दिया है।”

“काम कहां करते हैं?”

“गलैक्सी लेबोटरीज में ।”

तब तो अंकल का पता लगाना मुश्किल नहीं होगा । वह उधेड़-बुन में पड़ गई कि क्या करे । यात्राएं अब निरापद नहीं रहीं और यह भी अविश्वास लायक बात नहीं है कि तकरीबन चौदह-पंद्रह साल की लड़की गाड़ी में अकेले यात्रा नहीं कर सकती । पिछले दिनों ही अपनी आठ वर्षीय भतीजी को उन्होंने एयर इंडिया के विमान द्वारा अकेले लंदन भेजा है । भाई-भाभी पहले ही रवाना हो चुके थे ।

लड़की देखने-सुनने, पहनावे-उढ़ावे से तो भले घर की प्रतीत हो रही है । अगर वह उसकी मदद नहीं करती और टिकट चेकर उसे शेष यात्रा पूरी नहीं करने देगा तो निश्चय ही स्टेशन पर उसे लिवाने आए अंकल दुश्चिंता में पड़ जाएंगे । उधर घरवाले परेशान होंगे सो अलग । क्या फर्क पड़ता है सत्तर-अस्सी रुपयों में । ज्यादा-से-ज्यादा यही होगा न कि पैसे वापस नहीं मिलेंगे, जिसकी कि संभावना कम है । अंकल ग्लैक्सो में काम करते हैं । अच्छी स्थिति में ही होंगे और नहीं भी मिले तो कौन-सा अंटी से हाथी निकल जाएगा। सोच लेगी कि खाने-पीने में खर्च हो गए। उसने देखा कि लड़की की भयभीत दृष्टि टिकट चेकर की पीठ पर टिकी हुई है । लग रहा है कि पीठ जैसे ही इस ओर मुड़ेगी, उसका दम निकल जाएगा । करुणा उमड़ पड़ी । उसने हौले से उसके कंधे थपथपाए, “घबराओ नहीं, मैं तुम्हारे टिकट के पैसे भर दूंगी ।” लड़की ने पल भर को उसे अविश्वास से देखा, फिर विभोर होकर उसके कंधे से अपना सिर सटाकर कृतज्ञता व्यक्त की ।

मगर तभी निरपेक्ष खामोशी से उनकी बातचीत सुन रही सामने थुलथुल महिला एकाएक जैसे नींद से जागी और सयानों सी सीख देती बोली, “कहां फंस रही हैं, बहनजी! आप तो पढ़ी-लिखी हैं । दिमाग लडाइए कि इसके मां-बाप ने अगर इसे अकेला ही भेजना होता तो चालू डिब्बे में बैठा देते छोरी को? साथ खाना-पीना न बांधते? कपड़ा-लता न देते?”

थुलथुल महिला के दखल देते ही एकाएक वातावरण चैतन्य हो उठा ।

“ठीक कह रही हैं ।” सामनेवाली सीट पर घुटने पर घुटना चढ़ाए बैठी महिला ने उनका समर्थन किया, “अभी आधा घंटे पहले की बात है । मैंने इससे पूछा था कि बेटी, कहां से चढ़ी तो बोली-दिल्ली से, आंटी । किसके साथ हो, तो कहने लगी बाबूजी मर्दाना डिब्बे में बैठे हैं । अब किस बात का विश्वास करें?” फिर सहसा सतर्क मुद्रा बनाकर उसकी ओर झुकती हुई कुछ इस अंदाज में फुसफुसाई कि आस-पास के सभी लोग सुन लें, “अखबार में पढ़ा ही होगा आपने । पिछले दिनों ललितपुर में जो डकैती पड़ी थी उसमें सबसे पहले एक छोरी ने ही चिरौरी-विनती करके डिब्बे का दरवाजा खुलवाया था । पीछे ग्वालों के वेश में धड़धड़ाते हुए डाकू डिब्बे में घुस आए। क्या पता इसके साथ भी कोई टोली होवे। रात तो अभी पड़ेगी । आप टिकट-विकट के फेर में न पड़ो । टिकट तो हम भी ले के दे देवें, मगर इसकी तो गारंटी होवे कि जो बोल रही है, सही बोले । ऊपर से ये जनाना डिब्बा । जनानी नंगी तो ‘रहे नहीं । सभी ने कुछ-न-कुछ पहन- ओढ़ रखा है ।”

उसमें प्रतिवाद किया, “होने को तो कुछ भी हो सकता है; मगर जानबूझकर एक बच्ची को मुसीबत में छोड़ देना…”

“और अगर सब मुसीबत में पड़ गए तो?” थुलथुल देह ने नथने फुलाकर कपाल पर भौंहें चढ़ाई ।

“पड़ सकते हैं जी, जरूर पड़ सकते हैं ।” एक औरत ने अपनी हथेली पर हथेली पटककर शर्त-सी बदी, “हमें टिकट चेकर पर भरोसा करना चाहिए । वह तो मिनटों में अता-पता उगलवाकर इसे इसके मां-बाप के सुपुर्द कर देगा…कोई ऊंच-नीच मामला होगा, वह भी निबटाएगा । सरकारी जिम्मेदारी है। कोई मजाक है।” फिर लड़की को संदेह भरी नजरों से घूरती हुई बोलीं, “जरा गौर कीजिए। लड़की अच्छे नयन-नवा की है । हो सकता है, सिनेमा-विनेमा के चक्कर में घर से भागी हो । कहीं मां-बाप ने आप पर बरगलाने का आरोप ठोंक दिया तो सफाई देते नहीं बनेगी…पुलिस कचहरी में…परली बहनजी गलत नहीं कह रहीं, बटुआ गुम हो गया, सो माना…पर साथ का सामान कहां गायब हो गया?”

वे पलांश जैसे सांस लेने को ठहरीं, फिर अपने तर्कों के प्रमाण में ‘मनोहर कहानियां’ का ताजा अंक उसके सामने खोलती हुई बोलीं, “यह देखिए…हू…ब…हू ऐसा ही केस । एक डॉक्टर की खूबसूरत बीवी फिल्मों के चक्कर में भागकर मुंबई पहुंची । मुंबई में बाल-बच्चेवाली जिस महिला ने उसे घर में आसरा दिया उसके पति ने उसी पर जालसाजी का मुकदमा ठोंक दिया । औरत पुलिस की आए दिन होने वाली पूछताछ और अखबारों में उछले नाम की वजह से पुलिस के नाम एक खत लिखकर खटमल मारने वाली दवा पीकर हमेशा के लिए सो गई।”

वह चारों ओर से निरंतर बढ़ रहे दबाव को झेलती निरस्त हो आई । तर्क अपनी जगह थे । जनमत लड़की को टिकट चेकर को सौंप देने के पक्ष में था । उसे वही करना चाहिए। यह सही है कि जानबूझकर संकट न्यौतना बुद्धिमानी की बात नहीं होगी । उस लड़की के पीछे, जिसके बारे में वह स्वयं भी आश्वस्त नहीं है कि वह वास्तव में सच बोल रही है या झूठ? व्यावहारिक यही है कि झंझट में पड़ना फिजूल है । टिकट चेकर पर उसे भी भरोसा करना चाहिए। उसे समय नहीं लगेगा अभिभावकों से संपर्क करते ।

उसने फौरन दुविधा झटककर अंतर्द्वद्व के कपाट बंद कर दिए और चेहरे पर सख्त अपरिचित भाव ओढ़कर उस महिला पत्रिका में अपने को तल्लीन कर लिया, जिसमें आदिवासी महिलाओं के बीच प्रगति कर रहे साक्षरता अभियान को उसने अपने एक खोजपूर्ण लंबे-विवेचनात्मक लेख में बड़ी गहराई से रेखांकित किया था…

फातिमाबाई के द्वारा भिजवाया गया ‘लिम्का’ वह आधा भी नहीं पी पाई । छोटे-छोटे घूंट जैसे दीर्घ असमंजस बनकर उन दोनों के मध्य एक विशाल शून्यवृत्त खींच रहे हैं, जिसके एक छोर पर शैला है और दूसरे पर वह । वह शैला को देख नहीं रही, किंतु अनुभूत कर रही है कि वह शिथिल हाथों से अपने अब तक खुले पड़े ब्लाउज के बटन लगा रही है ।

केतकी को प्रश्नोत्तरों से जोड़ना मुश्किल न था, मगर शैला के सामने उसकी हतप्रभ वाक्शक्ति संवाद के लिए जैसे मनोबल जुटा रही है । कोशिश कर इतना ही पूछ पाई, “तुमने मुझे पहचान लिया?”

नि:शब्द शैला ने स्वीकृति में सिर हिलाया ।

“तो तुम्हारा संबंध वाकई गलत लोगों के साथ था?”

नहीं ।”

“फिर यहां कैसे?”

“आपकी कृपा से ।”

“मेरी…”उसने अविश्वास और अचरज से शैला को देखा ।

“जी, आप ही की ।” शैला का आहत तिक्त स्वर अनायास भर्रा आया, “आप अगर उस दिन मुझे अपने साथ लिये जातीं तो आज मैं यहां हरगिज न दिखाई देती…”

और शैला ने भीगे करुण स्वर में दिल दहला देनेवाले जिस वीभत्स सत्य का उद्घाटन किया, उसे सुनकर उसका रोम-रोम स्वयं को धिक्कार उठा । टिकट चेकर ने शैला का केस रेलवे मजिस्ट्रेट के समक्ष विचारार्थ रख दिया था । वह आतंक और भय से मन-ही-मन कांप रही थी । सोच रही थी कि फेल होने पर अपनी मां की जिस निर्मम पिटाई से खफा होकर वह विरोधस्वरूप घर से भागी थी, जरूर उसे वहीं वापस भेज दिया जाएगा । अब तो उसकी खैर नहीं । चार लड़कियों के बोझ से त्रस्त मां उसका गला ही घोंट देंगी । बाबूजी दारू पीकर उसे ही नहीं, उसकी खातिर मां की भी पिटाई करेंगे । वह शौचालय जाने के बहाने महिला पुलिसकर्मी को चकमा देकर भाग ली थी । फिर आगे का घटनाक्रम …उफ्! उसे सुनना भी एक असाध्य यंत्रणा थी । किस तरह वह गलत लोगों की सहानुभूति का शिकार होकर काम दिलाए जाने के प्रलोभन में दलालों के शिकंजे में फंस गई । ऐसे ही एक रात उसने अपने को फातिमाबाई के कोठे पर पाया । फातिमाबाई ने उसे खरीदा था ।

अपनी नादानी पर पश्चाताप करते हुए उसने चुपके से मां-बाबूजी को कई पत्र लिखे कि वे आएं और पुलिस की सहायता से उसे इस नरक से मुक्त कराएं । लंबी प्रतीक्षा के बाद चंद लाइनें बाबूजी ने लिखकर भेजी थीं कि तुम अब हमारे लिए मामा-मामी के गांव के तालाब में नहाते हुए अचानक डूबकर मर गई हो…

बड़ी मुश्किल से पूछ पाई, “यह बच्चा?”

“जोसफ से पहलेवाले बनिए का है ।”

उसके भीतर कुछ चटख रहा है…प्रश्नों के पैने तीर रोम-रोम में बिंध रहे हैं…वह शैला को बचा सकती थी, उसे बहला-फुसलाकर अपने विश्वास में ले सकती थी…सच्चाई उगलवा सकती थी…उसके समाजभीरु मां-बाप को समझा-बुझा सकती थी…डिब्बे में मौजूद औरतों की बनिस्वत वह निश्चय सुशिक्षित, संवेदनशील और जागरूक विचारोंवाली थी…लेकिन…

आहट पर नजर उठी तो परदा सरकाकर फातिमाबाई को प्रवेश करते देख वह अपने भीतर चौक पड़ी । वह तो बैठी है, फिर कमरे में कैसे प्रवेश कर रही है।

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