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हथियार-गृहलक्ष्मी की कहानियां

अब भी उनकी निगाह मेन्यू से लिपटी हुई है ।उसकी आंखें उनकी ऊपर-नीचे टोहती, सरकती नजर को छूकर, अनमनी-सी इधर-उधर उचकती, ठहरती, अपनी गढ़ाती ऊब को नियंत्रित नहीं कर पा रही हैं । बूढ़े होने को आए, जाने इतना समय क्यों लगाते हैं चीजें चुनने में कि उनके स्वाद की ललक ही क्षीण हो जाए? […]

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रक्षक-भक्षक – गृहलक्ष्मी की कहानियां

हम मंदिर के प्रांगण में प्रवेश कर चुके थे । चढ़ावे का सामान बेचने वालों की नजर हम पर पड़ चुकी थी । वे बाकड़ों से लगभग लटक-लटककर पूजा की सामग्री अपनी-अपनी दुकान से खरीदने को हमें आमंत्रित कर रहे थे । मैंने पाया कि उनकी हांकों और आमंत्रणों से बेखबर मम्मी की दृष्टि प्रांगण […]

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बहू से सेवा सुख की चाह – गृहलक्ष्मी की कहानियां

कल्पना जी की कल्पनाओं को पर तो उसी दिन लग गए थे जिस दिन उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। तब से लेकर अब तक कल्पना जी की बस यही अभिलाषा है कि वह अपनी बहू से वो सारी सेवाएं करवाएंगी जो अब तक वे अपनी सास के लिए करती आई हैं। ज ब […]

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चांदनी – गृहलक्ष्मी की कहानियां

गौरी के आंसू उसके अंदर का दर्द बयां करते थे। वह खुद को बहुत ही बेबस और लाचार पाती थी। उसके माता-पिता भी बहुत दु:खी रहने लगे। मगर उनके ऊपर दु:खों का असली पहाड़ तो अभी टूटना बाकी था। गौरी की शारीरिक संरचना की खबर उड़ते-उड़ते किन्नर समाज तक जा पहुंची। आज शर्माजी के यहां […]

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गुप्त धन – गृहलक्ष्मी की कहानियां

अमावस्या की आधी रात थी। मृत्युंजय तांत्रिक मतानुसार अपनी प्राचीन देवी जयकाली की पूजा करने बैठा। पूजा समाप्त करके जब वह उठा तो निकटस्थ आम के बग़ीचे से प्रातःकाल का पहला कौआ बोला। मृत्युंजय ने पीछे घूमकर देखा, मंदिर का द्वार बंद था। तब उसने देवी के चरणों में एक बार माथा टेककर उनका आसन […]

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पाठ – गृहलक्ष्मी की कहानियां

निकट भविष्य में सरकार गिरने की संभावना ने प्रदेश के जनसेवक की वातानुकूलित नींद में खलल डाला । उन्होंने निश्चय किया-स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते देश के नौनिहालों की चिंता में दुबले होना उनका परम कर्तव्य है । देर आए, दुरुस्त आए । अब वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रत्येक सरकारी स्कूल का दौरा करेंगे […]

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वैष्णवी – गृहलक्ष्मी की कहानियां

मैं लिखता रहता हूँ, लेकिन लोकरंजन मेरी क़लम का धर्म नहीं, इसलिए लोग मुझे हमेशा जिस रंग से रंजित करते रहे हैं, उसमें स्याही का हिस्सा ही अधिक होता है। मेरे बारे में बहुत बातें ही सुननी पड़तीं; भाग्यक्रम से वे हितकथा नहीं होती और मनोहारी तो बिलकुल नहीं। शरीर पर जहाँ चोटे पड़ती रहती […]

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बावजूद इसके – गृहलक्ष्मी की कहानियां

स्टाफ बस से उतरकर प्रीति अपने घर वाली गली में मुड़ ही रही थी कि अम्मा कंडी लटकाए सामने से आती दिखीं । सब्जी खरीदने जा रही होंगी । कई बार भाभी से झड़प हुई है, फ्रिज में हफ्ते- भर की सब्जी लाकर भर देने के पक्ष में-‘ये छह हजार रुपये सिर्फ पानी की बोतलें […]

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विपदा जीवित है – गृहलक्ष्मी की कहानियां

खद्दर का मैला-कुचैला सा कुर्ता, उसके ऊपर वास्कट, नीचे काले रंग की पैंट और बाहर से काली त्यूंखी पहने हुये बड़ा मायूस सा चेहरा। उम्र यही कोई 35 वर्ष के लगभग, किन्तु वेशभूषा वृद्धों जैसी। ठीक मेरी दाहिनी ओर बैठा था वह व्यक्ति। उसके बगल में बैठा था उसी की वेशभूषा का उसका साथी। बस […]

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दुलहिन – गृहलक्ष्मी की कहानियां

पसीने से नहाए हुए वह जेठ के तपते सन्नाटे को दरवाजे पर छोड़ देहरी लांघने को ही हुआ कि एकाएक ठिठक गया । किसी के उबकाने के तीखे-तीखे स्वर करेरे-करेरे-से खिंच रहे सुनाई दिए । लगा कि भीतर मथती उमथाहट कलेजे समेत बाहर आ जाना चाहती है, लेकिन मुंह तक आते-आते पनियाती पलट पड़ती है। […]

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