स्टाफ बस से उतरकर प्रीति अपने घर वाली गली में मुड़ ही रही थी कि अम्मा कंडी लटकाए सामने से आती दिखीं । सब्जी खरीदने जा रही होंगी । कई बार भाभी से झड़प हुई है, फ्रिज में हफ्ते- भर की सब्जी लाकर भर देने के पक्ष में-‘ये छह हजार रुपये सिर्फ पानी की बोतलें सजाकर रखने के लिए तो नहीं खर्च किए हैं! ‘ भाभी तर्क करतीं । मगर अम्मा हैं कि उन्हें ताजा सब्जी खरीदने की खब्त है । गठिया से टांगें बेकार हो रही हैं, फिर भी बाजार जाएंगी-ही-जाएंगी । उनकी समझ में कभी नहीं आता कि कौन लखनऊ है, जो सब्जी ताजा मिलेगी! सारा कुछ तो बाहर से आता है। फ्रिज के नाम से ही उन्हें कुछ चिढ़-सी है ।

पास पहुंची तो उसके चेहरे पर दृष्टि पड़ते ही अम्मा चिंतित हो उठीं, “तबीयत तो ठीक है तेरी?” एक हाथ से उसका माथा छूकर देखा, “इतनी उतरी-उतरी क्यों है?”

“कुछ भी तो नहीं ।”

“कोई बात जरूर है । दफ्तर में कोई कहा-सुनी हो गई क्या?”

“होगा क्या! जरा सिर में दर्द है । तुम्हें फालतू वहम होने लगता है ।” उसने लापरवाही दर्शाई ।

“अच्छा जा! जा के आराम कर । गोली-वोली मत खाना । मैं अभी घंटे-भर में आई । ठंडे पानी की पट्टी धर दूंगी।” कहकर अम्मा आगे बढ़ी ही थीं कि फिर मुड़ लीं, “मेज पर गोयल की चिट्ठी धरी है । पढ़ लीजो । अब दिल नहीं, दिमाग से काम लो…बहुत हो गया । हर वक्त अपनी नाक ऊंची किए रहती है ।”

रास्ता भी नहीं देख रहीं । अपनी ही बिल्डिंग के एक-दो लोग पास से गुजरे । मगर अम्मा हैं कि बोलने लगती हैं तो सही या गलत जगह का ध्यान ही नहीं रहता!

गोयल को लेकर अम्मा कभी किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंचीं और न उसे पहुंचने देती हैं । आजकल तो एकाएक उसे लगने लगा है कि अपने बारे में उसे जो भी निर्णय लेना है, अपने- आप ही लेना है । अम्मा उसे इस मामले में कभी ताकतवर नहीं बना सकतीं। असहायता-बोध अवश्य भरती रहती हैं। हां, यदाकदा उन्हें उसका पढ़ा-लिखापन कचोटता है । केवल तब वे उसे गोयल की अमानुषिकताओं के खिलाफ खड़ा होने के लिए उकसाती हैं; पर यह भावना अधिक देर नहीं टिकती । यह भी संशय उठता है कि इतना साथ देना भी महज इस कारण होता है कि वह उसकी अकेली लड़की है । गोयल की ज्यादतियों को वह शायद इस वजह से भी बरदाश्त नहीं कर पातीं! नहीं तो, उन्होंने खुद उसकी पीठ के नीलों पर हल्दी और चूना मला है । वह भी तब, जब मोना पेट में था । पहले जब-जब उसने गोयल के विषय में बताया, अम्मा ने कभी विश्वास नहीं किया । विश्वास होता भी कैसे! गोयल की ओढ़ी हुई शालीनता हमेशा उसके संपर्क में आने वालों को अभिभूत कर लेती । उसके मैनरिज्म इस तरह वशीकरण फेंकते कि कोई उसकी भीतरी तहों की कंटीली फेसिंग से न तो टकरा पाता, न उसके अहंकारी स्वभाव से उसका साक्षात्कार हो पाता । वास्ता बहुत ऊपरी पड़ता, धारणा भी उसी पर खड़ी हो जाती ।

जिंदगी जीने के उसके अपने तेवर थे । क्लब में रात एक-दो बजे तक ‘ब्रिज’ जमा रहता । साथ पीना-पिलाना भी । खाना भी ज्यादातर किसी बड़े होटल में खाया जाता या फिर किसी दोस्त के घर लौटकर । उसे एकाध बार साथ ले भी गए, मगर लगातार कई दिनों की कोशिश के बावजूद वह अन्य दोस्तों की बीवियों की तरह ‘ब्रिज’ सीख नहीं पाई, न व्हिस्की का ‘दूसरा पेग’ ले सकी । अंग्रेजी फिल्में उसने देखी ही कम थीं, फिर दृश्यों की चर्चा कैसे कर पाती । न उसे ‘बोनीयम’ के रिकॉर्ड्स पर नाचते हुए मि. खन्ना का हलके से अपने खुले कंधे पर होंठ रख देना ही गवारा हुआ था ।

“टेक इट इजी ।” गोयल ने उसकी झिझक तोड़ने की मंशा से पुचकारा था ।

क्यों न कहता? आंख बचाकर वह भी तो मौका लेता था । कभी-कभी तो सुरूर इतना गहरा हो उठता कि आंख बचाने की जरूरत भी नहीं पड़ती थी । लगता था, सब अंधे हो गए हैं । अपनी ही उंगलियों से अपनी पुतलियों को फोड़ बैठे हैं…

इस ‘एक्सिक्यूटिव’ सभ्यता का विनिमय न उसे स्वीकार हुआ था, न सहा। नतीजा! झगड़ा, जो फिर मार-पीट में तब्दील हो उठा । न वह खुद को बदल सकी, न गोयल अपने को । बदलने की कोशिश हुई थी, मगर उसने पाया कि वह स्त्रीगत द्वेष से छुटकारा नहीं पा पाई । गोयल यहीं सफल नहीं हो सका । वह छूट देना भी चाहता था, छूट लेना भी…और एक दिन वह पीठ पर नीलों के धब्बे चिपकाए देवर जतिन के साथ अपने शहर लौट आई थी। जतिन तीन ‘दिन के लिए सरकारी दौरे पर मुंबई जा रहा था । हालांकि मांजी उसके इस तरह आने के एकदम खिलाफ थीं । इतना कुछ होना उन्हें मात्र ‘मियां-बीवी में तुन्न-मुन्न होना’ भर ही लगा । जतिन विरोध में बराबर तर्क करता रहा कि गरमा-गरमी तक तो ठीक है, पर भैया का हाथ उठाना निश्चित ही अमानुषिकता है। उसने मांजी के समक्ष ही उसे चुनौती दी थी-‘एक दिन अपनी हत्या करवाओ, इससे बेहतर है कि अपने भरोसे खड़े होकर जीने की कोशिश करो ।’

उन्हीं दिनों जतिन की शादी की बातचीत चल रही थी। और उसने पहले ही घोषणा कर दी थी कि ऐसी स्थिति में कतई एक साथ रहना संभव नहीं है। या तो भैया अलग घर ले लें, जो वे आसानी से ले सकते हैं, या फिर वह अपने लिए कोई अलग ठौर-ठिकाना खोज लेगा…’ बहरहाल मैं अपनी पत्नी को आए दिन होने वाले इस नंगे नाच से दूर ही रखना चाहूंगा ।’

रास्ते में हल्का-सा रक्तस्राव शुरू हो गया । वह बेचैन और आशंकित हो उठी थी । कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो जाएगी । जतिन को उसने नहीं बताया । वह ख्वामख्वाह घबरा जाता । मगर घर पहुंचते ही उसने फौरन अम्मा से स्थिति स्पष्ट की ।

अम्मा और भाभी उसे तुरंत डा. सिन्हा के मैटरनिटी होम ले गई और डॉक्टर ने उसे घर लौटने ही नहीं दिया ।

वे अम्मा को समझा रहे थे-‘टोटल बेड रेस्ट की जरूरत है । यहीं रहना ठीक होगा । वैसे तो एक्सेप्शन होता है प्रेगनेंसी पीरियड में ब्लीडिंग होना, केस बिगड़ भी सकता था; पर मौके से ले आई आप…सब ठीक हो जाएगा । डोंट वरी!’

उसे चार दिनों तक मैटरनिटी होम में ही रहना पड़ा । इंजेक्शनों के कोर्स के साथ-साथ ग्लूकोज भी चढ़ाया गया । पलंग का पायताना ऊंचा रखा गया । डॉ. सिन्हा ने भरसक उसकी वजह जाननी चाही थी । वे डायग्नोज करते रहे थे ।

पेट में मोना और खुद ठीक-ठाक वह डॉ सिन्हा की मैटरनिटी से लौट आई थी ।

पीठ पर पड़े नील तब भी नहीं मिटे थे । रंग बदलकर लच्चर हो गया था । अम्मा ने लेप लगाते, सेंक देते गोयल को दसियों बार राक्षस बनाया, बीसियों बार जानवर कहा और भैया से आग्रह करती रहीं कि वे तुरंत गोयल को कड़ा विरोध-पत्र लिखें । रास्ते में पड़ी तो उठाकर नहीं ले गए… अनाथ समझ रखा है क्या?

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