जाने भैया ने पत्र में कुछ लिखा या नहीं; पर यह सब जान लेने के बावजूद उन्होंने कोई रोषपूर्ण टिप्पणी नहीं की । निर्लिप्त बने रहे । और अम्मा भी कैसे पलट गई। जैसे ही उसने यह कहा कि वह अब उस घर में लौटकर जाना नहीं चाहती, गोयल के प्रति उफना घृणाभाव एकाएक शांत हो गया-‘इतना बुरा तो नहीं है…ऐसे-ऐसे जाहिल मर्दों से पाला पड़ता है…अरे, अपने बाप की पूछ! आज जिंदा नहीं है तो कहते भी जुबान कटती है…देव न हो तो मर्द कैसा! और तेरी ऐंठ क्या कम है! कौन खाता-पीता नहीं आजकल? फिर पिए हुए आदमी के मुंह लगती ही क्यों है?’

भैया और गोयल ने जुहू होटल में बियर पी । वह और भाभी कोक पीते रहे ।

भाभी रास्ते-भर गोयल के चुटकुलों पर ठहाके भरती रहीं और ‘गजब की जिंदादिली!’ दोहराती रहीं ।

रात सोने की व्यवस्था साथ-साथ ही थी ।

गोयल ने अपने व्यवहार के लिए लगातार माफी मांगी और यह आश्वासन दिया कि उसे अपने ढंग से रहने की छूट भी दी जाएगी ।

‘मुझे अपने ढंग से रहने की छूट नहीं, घर चाहिए, जहां अपने-अपने ढंग से नहीं, दोनों साझीदार होकर जी सकें ।’ उसने खुद को स्पष्ट किया था-‘जो कुछ बाहर चलता है वो घर पर बैठकर भी तो हो सकता है!’

‘ओके., मैडम! ‘ उसने हथियार डाल दिए थे ।

अम्मा ने लौटकर बताया था कि मांजी भी भविष्य में उसके साथ अभद्रता न होने का आश्वासन दोहराती रही थीं ।

जतिन की शादी में मोना ढाई महीने की थी । घर कितना भरा-भरा हो उठा था। मोना की किलकारियों और उषा के रंग-बिरंगे परिधानों तथा भरी-भरी कलाइयों की खनक हवा में महमहाती तैरती रहती । गोयल शाम को घर पर ही रहता; मगर यह वह बराबर महसूस कर रही थी कि एक अनमनाहट उसमें छटपटाती रहती है । ज्यादा दिन न वह खुद को रोक सकती है, न उसके आसपास का माहौल उसे रुकने देगा। पर मोना के आगमन से वह जरूर उसमें ही व्यस्त हो गई थी ।

गोयल ने तय मुताबिक न्यू अलीपुर में नया फ्लैट खरीद लिया था । उनके नए घर जाने की घटना पर सबसे अधिक दु:खी मांजी हुईं । मोना- घर में पहला बच्चा थी और पैदाइश के साथ ही उनके उबाऊ दिनों की व्यस्तता बन गई थी । नया घर पाने की खुशी उसे कतई नहीं हुई । यहाँ जो भी होता था, मांजी थीं, जतिन था जो अक्सर उसके पक्ष में गोयल के समक्ष ढाल-तलवार उठा लेता । वह अधिक सुरक्षित महसूस करती थी ।

महीना खत्म होते-न-होते गोयल आया था मांजी के साथ। मांजी नासिक जाकर पंचवटी के दर्शन करना चाहती थीं । अम्मा को भी साथ मिल गया । भैया ने गाड़ी की व्यवस्था कर दी । उसकी भी इच्छा हुई कि साथ चली जाए, पर गोयल का सामना बरदाश्त नहीं हो पा रहा था । हालांकि वह उसे एकदम सहज लगा । पिछला राई-रत्ती चेहरे पर या व्यवहार में नहीं था । पहले ही की तरह भाभी से भरवां टमाटरों की फरमाइश हुई । हर दो घंटे पर कॉफी मांगता रहा । शाम सबको ‘चायनीज’ के लिए बाहर ले गया । वहां से जुहू जाना भी नहीं भूला । बीच पर उससे बार-बार नारियल पीने का आग्रह करता रहा । फिर उससे बोला, ‘मैडम! चिल्ड बियर पिलवा दो तो बस इस हाईटाइड में मजा आ जाए!’

मगर साथ रहा नहीं जा सकता था । जतिन रहना भी नहीं चाहता था । पीने-पिलाने वाली आदत से उसे सख्त नफरत थी, चाहे वह घर पर ही बैठकर क्यों न हो । कितनी बार उससे कहा था जतिन ने, “यह बाल-बच्चेवाला झंझट भी गले डाल लिया; पर सच कहूं भाभी, चलेगा नहीं यह ज्यादा दिन…अपने को खत्म करना तय ही कर लिया है तो अलग बात है…मैं तो चाहता था कि तुम नई जिंदगी शुरू कर लेतीं ।’

गलत कहां कहा था जतिन ने!

Leave a comment