अनमनापन नए फ्लैट में पहुंचकर निरंकुश हो उठा । कई बार वह संभावित घरों में फोन करती, क्लब का नंबर मिलाती । वह यही समझता कि उसके पीछे जासूसी की जा रही है…तब भी यही समझा, जब मोना डॉक्टरों के लिए भी असाध्य हो उठी । उसे ‘वाडिया’ में दाखिल करना पड़ा । किसी दोस्त के यहां बैठा मिल भी गया तो कितने संवेदनहीन शब्दों में वह अपनी मजबूरी जताकर चीखा था, ‘जो कुछ करना है, डॉक्टर को ही करना है न! मेरे साथ रहने या पास बैठने से जादू तो नहीं हो जाएगा । फिर तुम्हें क्या काम रहता है…तुम घरेलू भाग-दौड़ भी नहीं कर सकतीं?’ अपनी बच्ची भी ‘औरों’ की तरह हो गई थी । देखने आता था तो विजिटिंग आवर्स में…

मांजी को भी उसका उद्दंड आचरण चुभा था । उसके शब्दों की व्यथा वह महसूस कर सकी थीं-‘दिमाग तो नहीं चल गया इसका? काम बच्ची से ज्यादा जरूरी है क्या?”

उषा और जतिन बारी-बारी से चक्कर लगाते रहे । उषा और मांजी उससे नाराज भी हुईं कि लगातार छह दिनों से वह अस्पताल में ही है, एक रात घर जाकर आराम कर ले । हममें से कोई रात मोना के पास ठहर जाएगा । ऐसे में तो वह भी बिस्तर से लग जाएगी । मगर वह न मानी । मन अजीब-अजीब खयालों से भरा धुकपुकाता रहा । कहीं ऐसा न हो कि…

उस रात उसके बढ़ते हुए रक्तचाप की दलील देकर डॉक्टर ने उसे कंपोज खिलाकर कुछ घंटों के लिए आराम करने को बाध्य कर दिया था और नर्स को मोना के पास बने रहने की ताकीद कर दी थी । पर जैसे ही नींद उचटी थी, उसने पाया कि मोना के करीब ऑक्सीजन का सिलेंडर रखा है ।

ऑक्सीजन की नलियों ने कुछ घंटों की उम्र को जिलाए रखा था । फिर डॉ. रस्तोगी ने उसके कंधों पर दिलासा का स्पर्श टिका कुछ शब्द बुदबुदाए थे-‘ सारी, वेरी सॉरी!’

वह अबूझ-सी मोना की सफेद पड़ गई देह को बस घूरती खड़ी रही थी । स्टैंड हटाने, सिलेंडर खिसकाने, ग्लूकोज की बॉटल उतारने की खटपट कमरे को घेरे थी । एकाएक उसे महसूस हुआ था कि यह शोर मोना की अशक्त नन्ही देह बरदाश्त नहीं कर पाएगी वह सहसा चीख उठी थी, ‘स्टॉप इट, प्लीज बाबा! प्लीज…प्लीज…!’

आगे का उसे कुछ भी याद नहीं!

लंबे समय तक उसे नींद का इंजेक्शन देकर सुलाए रखा गया । आंखें खुलीं तो गोयल को सिरहाने बैठा पाया । उसकी उंगलियां उसके बालों को सहला रही थीं । माथे पर कुछ बूंदों की तरलता का भी अहसास हुआ । रो रहा था शायद । उसकी नाटकीय संवेदना पर हैरत हुई । क्या उसे भी दु:ख हुआ? हो भी सकता है? भीतर द्वंद्व का ज्वार पछाड़ें खाने लगा । क्यों नहीं होगा? मोना को प्यार कम नहीं करता था… भले प्रदर्शन न करता रहा हो । रात को दो बजे लौटता तो भी सोती हुई मोना को जाकर छू-भर लेता । कभी-कभी गुदगुदाकर जगा भी देता । वह नाराज हो उठती-‘दिन में कभी बेटी नहीं याद आती?’

वह ताना पचा नहीं पाता और तनाव निश्चित रूप से खिंच आता ।

तभी उसे याद हो आए थे गोयल के वे वाक्य, जो उसने मोना की बीमारी के दौरान चीखकर कहे थे । माथे पर ठहरी हुई तरलता सहसा घड़ियाल के आंसू-सी संवेदनहीन हो उठी । प्रतिहिंसी हो उसने पूछा था, ‘यह मोना के जाने का दु:ख है या छुटकारे का सुख?’

प्रश्न के साथ ही बालों को सहलाती हुई उंगलियां सिर से हट गईं । एक दीर्घ उच्छ्वास के साथ वह करीब से उठ खड़ा हुआ । शायद पितृत्व आहत हो उठा था । कटाक्ष सह नहीं पाया ।

हालांकि मोना के मृत्युपरांत गोयल में तमाम परिवर्तन हुए थे । जब तक वह उस घर में थी, वह दफ्तर से सीधा घर आता । उसकी बातों को अन्यथा न लेता । उसे लगता, वह जबरन अपने-आपको बदलने की चेष्टा में है । मगर उसके भीतर भी हुए कई परिवर्तनों ने कुछ निर्णय ले लिए थे । इसलिए भी कि अपने प्रति बरती गई अमानुषिकता को उसने उसका मानसिक ऐब मान लिया था; किंतु मोना के प्रति बरती गई गैरजिम्मेदारी उसे क्रूर उपेक्षा ही लगी, जिसे वह कतई क्षमा नहीं कर सकी । तब घर छोड़ते हुए यही लगा, जो कुछ खत्म हो जाता है, मर जाता है, वह फिर कभी जिंदगी का जीवंत हिस्सा नहीं बन पाता । गोयल का लौटना अब उसे लौटा नहीं सकता था । रोक भी नहीं सकता था…मोना को खोकर तो कतई नहीं…

चिट्ठी के लिए कोई उत्सुकता नहीं थी । इत्मीनान से नहा-धोकर उसने दो कप कॉफी बनाई । भाभी को कॉफी पहुंचाने उनके कमरे तक गई । वे बिस्तर पर अधलेटी ‘चेज’ पढ़ रही थीं । कप लेकर सीधी बैठ गईं-“बैठो, बिट्टो ।”

“अम्मा नीचे मिली थीं । बता रही थीं कि साहब बहादुर की चिट्ठी आई है, जाकर देख लूं जरा ।”

भाभी ने सुनकर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की । उसके जिद्दी स्वभाव से अच्छी तरह परिचित हैं । एकाध बार उन्होंने उसे समझाना चाहा तो उसे बुरा लग गया । कड़वी बात कह दी थी उसने-‘पास रखना भारी पड़ रहा है क्या?’ तलाक के प्रश्न पर भी भाभी उसका विरोध ही करती रहीं । उन्होंने तो उसके आत्मनिर्भर होने के भ्रमजाल को यहां तक झटका था कि ‘घर से बाहर निकलकर चार अन्य लोगों का शोषण और लताड़ बरदाश्त कर सकती हो, पर अकेले पति को सहन नहीं कर सकतीं! यह कैसा स्वाभिमान है?’

वह बौखला उठी थी ।

‘लात-घूसोंवाला शोषण तो नहीं होगा?’

‘किस तरह का होगा, यह कौन कह सकता है?’

‘किसी भी तरह का हो, स्वेच्छा तो होगी । आरोपित तो नहीं होगा? फिर आप मुझे इतना गिरा हुआ क्यों समझ रही हैं? उन लोगों से मेरी कोई अपेक्षा नहीं होगी! किसी हक की बात तो नहीं होगी । लात-घूंसों की चोट से भी अधिक पीड़ादायक जख्म होता है अधिकारच्युत होने का । सामने है, फिर भी नहीं मिलता या नहीं दिया जाता । आप नहीं समझ सकतीं!’ वह उनके पास से उठ दी थी ।

यही सोचकर भैया हर वक्त हथेलियों पर रखते हैं । कभी उनके भारी हाथों की उंगलियों ने भाभी के अस्तित्व को नहीं नकारा, न ही आहत किया, न ही क्षुद्र समझा । वे उसकी पीड़ा को कैसे महसूस कर सकती हैं? अगर वे उसकी टीसों को मात्र अहंकार का प्रलाप मानती हैं तो उनका दोष भी तो नहीं है । कभी दोहरी जिंदगी की दुविधा वे बनीं नहीं जो…

कॉफी खत्म हुई तो मेज पर कप सरकाकर उसने गोयल की चिट्ठी खोल डाली । पिछली चिट्ठियों में उससे लौट आने का किया गया मनुहार अब धमकियों में बदल गया था । एक विद्रूप चेहरे पर खिंच आया । पुरुष के अहं का सब्र छोटा होता है । चूक ही जाएगा । डेढ़ साल से ऊपर हो रहा है उसे अलग हुए। आए हुए खतों का जवाब वह देती नहीं थी, मगर ‘यहां तुम्हारे विषय में यह चर्चा है कि तुम्हारे इस तरह मुझसे अलग होने के पीछे वहां तुम्हारा कोई पुराना सिलसिला है’ जैसे शब्दों ने उसे उत्तेजित कर दिया था कि वह कोई जवाब दे ही दे । वह जानती थी, गोयल इस नीचता तक एक दिन उतरेगा ही । इतने दिनों तक वह बदल जाने का ढोंग ओढ़े नहीं रह सकता था । चर्चा की बात तो फिजूल है । अपनी भड़ास को वह चर्चा का माध्यम बनाकर उसे जलील करना चाहता है…प्रयोजन वह अच्छी तरह समझती है। वह जानता है कि उसे आहत, अशांत करना है तो कहां प्रहार करना निशाने पर बैठेगा…पर अब उसे यह चुनौती इस स्तर पर भी स्वीकार है ।

लिखने बैठी तो बिना किसी लाग-लपेट के बात कह गई ।

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