‘पत्नी मैं तुम्हारी बन नहीं सकती…किसी अन्य नाजायज रूप में मुझे तुमसे रहने-खाने के मुआवजों की दरकार नहीं । अब जिंदगी अपनी भी जीना चाहती हूं । चूक गए संबंधों की चर्चा अब तुम्हें सालती क्यों है? अगर स्वीकार ही कर लूं कि यह सब किन्हीं पूर्व संबंधों का ही परिणाम है तो तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? और एक गुजारिश-जलील करना चाहते हो तो दिक्कत क्या है? टुच्चे बहानों के कंधे क्यों आजमाते हो?
‘विच्छेद के कागजात मेरा वकील भेज रहा है । जो स्थिति है उसके सच को स्वीकार कर लेना ही दोनों के लिए बचा-खुचा विकल्प है । अलग होने के लिए मैं तुम पर कोई कारण नहीं थोप रही । बस मैं अलग होना चाहती हूं । छुटकारा चाहिए। मां, भैया और भाभी इस पक्ष में नहीं; किंतु अब मैं किसी पक्ष-विपक्ष की दुविधा बनकर नहीं जी सकती । मोना जीवित होती तो शायद उसे बाप का नाम देना जरूरी होता । या शायद मेरा यह सोचना भी गलत हो । शायद तब भी यही करती, खैर…
“यहां गोल्डन कांटीनेंटल में रिसेप्शनिस्ट के पद पर हूं । अच्छी तनख्वाह है । इस नौकरी के लिए गैर-शादीशुदा ही आवेदन कर सकते हैं । मैंने यही जाहिर किया है । यानी, पत्नीत्व की भावना से मैं पहले ही मुक्ति पा चुकी हूं । अब औपचारिकताओं पर तुम्हें मात्र हस्ताक्षर करना है… ‘
पत्र लिफाफे में बंद किया-बड़ा भारी काम निबटा दिया आज! पूर्णविराम लगाकर अपनी बात कह दी । बात कहने की जरूरत भी न होती, अगर इतने अरसे की चुप्पी को ही गोयल जवाब समझ लेता । चलो, अब ही सही ।
उसे लगा, वह एकदम हल्की हो उठी है। अंतर पर अविचल जमी चट्टानें कहीं सरक गई हैं । मगर नहीं, हल्के हो जाने की बात उसने सोची- भर है । एक तय भाव! भीतर से बोझ कतई नहीं सरका, न हल्का हुआ, सोच-भर लेने से क्या होता है । सोचे हुए के मुताबिक मन कहां परिवर्तन ग्रहण करता है कहां? अपने ही भीतर दो विपरीत प्रवाहों की टकराहट कब तक झेलती रहेगी? जब-जब उसने जीना तय किया है, उसका ‘भीतर’ उसे कभी सामान्य नहीं होने देता, उसके तय पर पंजा तान लेता है! सतीश के साथ वह अकसर कॉफी पी लेती है । सतीश कभी उससे ‘कॉफी पीने चलोगी’ नहीं कहता-‘चलो, कॉफी पी आएं’ कहता है । जैसे वह जान गया है कि उसे सोचने का मौका देना खतरे से खाली नहीं है। कई बार उसके खोएपन को लेकर वह उखड़ जाता है ।
‘तुम्हें तो किसी मंदिर में होना चाहिए ।’
‘क्यों भई?’
‘वहां कुछ करना नहीं पड़ेगा । पुजारी घंटा-घड़ियाल टुनटुनाते रहेंगे और तुम उन प्रस्तरों में से एक ओर जड़वत् मूर्ति-सी… ‘
‘सलाह बुरी नहीं ।’ वह टिप्पणी पर हंसी से दोहरी होने लगती है । लॉबी की कई जोड़ी नजरें उन पर कौतूहल उछालती टिक जातीं ।
‘अरे यार! डोंट लॉफ दिस मच…द्विवेदी का बच्चा फौरन केबिन से बाहर निकल आएगा । तुम तो चुप्पी साध लोगी, मगर अपना तो भाजीपाला हो जाएगा । आधा घंटा वह कंधे उचका-उचकाकर, तौर-तरीकों पर भाषण पिलाते हुए मुहब्बत फरमाएगा । कौन झेलेगा!’
बगलवाले काउंटर से इला ने आंखें तरेरीं ।
वह चुप होने को होती है, पर हंसी है कि फिर भी नहीं सधती-‘ठीक है, बाहर आने दो । मैं झेल लूंगी ।’
‘क्या गजब करती हो!’ स तीश उसकी चूड़ियों भरी कलाई पर हथेली धर देता है-‘इला को छोड़ दो । तुमने उस तरफ देखा भी तो… ‘
‘कल्लेआम हो जाएगा । यही न…प्रीति, तुम इस बंडल के झांसे में मत आना । यह तुमसे पहले हमारे लिए भी कत्ल हो चुका है।’
पूरा रिश्सेप्शन मिनटों हंसी से भरा-भरा लहकता रहता…
मगर फिर वहीं घंटे-आध घंटे परिहास में शरीक हो वह अपने में लौट-सिमट आती ।
दरवाजे की घंटी बजी। तन्मयता भंग हुई । अम्मा बाजार से लौट भी आई हैं । चट लिफाफा उठाकर उसने अपने पर्स में सरका दिया । अम्मा की दृष्टि पड़ गई और गोयल का नाम उस पर पढ़ लिया तो उठते-बैठते जिरह शुरू-‘क्या लिखा है तूने? नए-नोखे नौकरी हाथ लग गई है तो धरती-आसमान न उठा । जिंदगी नहीं कटती अकेले । बुलाने के लिए चिट्ठियां लिखता रहता है, यह उसकी भलमनसाहत ही समझ, वरना…’
‘भलमनसाहत या हथेलियां खुजलाती होंगी मरम्मत के लिए?’ वह हंसते हुए अम्मा को छेड़ती । मगर उनकी बड़बड़ाहट एल.पी.सी. चलती रहती ।
ड्राइवर ने वैन सीधी बिल्डिंग के सामने ले जाकर खड़ी कर दी। रात के करीब ढाई बज रहे हैं । नाइट ड्यूटी होती हो तो सबको घर छोड़ते-छोड़ते इतना समय हो ही जाता है । वह भीतर बैठे अन्य साथियों को ‘विश’ करती हुई नीचे उतर आई । वैन ने गली खत्म कर मेन रोड पर मोड़ लिया । सड़क पर सुस्ताता, मरकरी से सफेद हुआ अंधेरा सहसा तीखी घरघराहट को पीता हुआ थर्राया । खड़ी देखती वह दहशत से घिरी सिहर-सी उठी । सन्नाटे में किसी भी तरह की आवाज कैसी चीख-सी लगती है…भोथरी चीख ।
ऊपर देखा । उसके और अम्मा के सम्मिलित कमरे से रोशनी छन रही है, कभी-कभी वे उसे बालकनी में खड़ी प्रतीक्षा करती हुई भी मिलती । वह ग्लानि से भर उठती कि अम्मा कितना कष्ट झेल रही हैं उसके लिए। वह समझाती-‘सो जाया करो न!’ मगर वे नहीं मानतीं । हालांकि यह भी सोचती है कि मान लो, उसके आग्रह के मुताबिक वे उसे जगती हुई न मिलें, तो? अच्छा नहीं लगेगा । जब सोचकर ही खिन्न हो उठती है तो प्रत्यक्ष कितना पीड़ित करेगा! कहने के लिए कह- भर देती है-बहुत-सी कही जाने वाली बातों की तरह ।
एक अम्मा ही तो हैं जो घर पर उसके वजूद की अहमियत का आभास खुद उसे भी देती रहती हैं। वरना तो…उसके और गोयल के तनावों की प्रतिक्रिया-स्वरूप भैया कितने औपचारिक रह गए हैं । बोलते तो वे पहले ही कम थे, मगर इतना कम नहीं कि कभी उसे अपनी उपेक्षा महसूस हुई हो । अम्मा उसे समझाती हैं। यह उसके दुःखी मन का भ्रम है । पहले की अपेक्षा वे कुछ अधिक गंभीर अवश्य हुए हैं, किंतु उसे लेकर कोई कलुष- भाव नहीं है । उसके भविष्य की चिंता उनके मन को बराबर कुरेदती है । शायद अम्मा से उनकी बात होती होगी । यह वह अच्छी तरह जानती है कि वे उसके होटल में नौकरी करने के बेहद खिलाफ हैं; फिर वह चाहे ‘फाइव स्टार’ ही क्यों न हो!
अगले वर्ष से भाभी रीतू और अभय को यहीं किसी कॉन्वेंट में भरती करने की सोच रही हैं । अभी दोनों पंचगनी में हैं । तब जगह की समस्या भी होगी । वैसे तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता । बच्चों का कमरा है । पर प्रश्न एकाध साल गुजारने का तो नहीं है और अब उसकी नौकरी ऐसी है कि कहीं भी एकाध कमरे का मकान लेकर वह अकेले रह भी सकती है । ढाई-तीन सौ में वन रूम-किचन आसानी से मिल जाएगा । खाने-पीने का उसका विशेष खर्चा है ही नहीं । होटल में ही एक रुपये के कूपन पर उसे रियायती भोजन मिलता है । अपनी इस मंशा से उसने अम्मा को अवगत करा दिया है । यह प्रस्ताव रखा कि अगर वे उसके साथ रहने को राजी हो जाएं तो उसे मानसिक तौर पर बड़ा सहारा रहेगा । यहां भी तो पड़ी ही रहती हैं । वहां भी उन्हें क्या करना होगा ।
पर अम्मा सुनकर किस कदर भन्नाई थीं-‘देख बिट्टो, मेरे तो ये सत्संग में जीने-मरने के दिन हैं…बेटे की रूखी-सूखी भी भली, तेरे तो पांव पूजे हैं । साथ रह-खाकर अपनी मिट्टी खराब करूं क्या? फिर कौन ये लोग मुझे घर से धक्का दे रहे हैं…मैं तो मनाती रहती हूं रे कि तेरा भरा-पूरा घर है…दिन फिरे…और तू… ‘
‘ठीक है । तुम मनाती रहो ।’ वह रुंध-सी जाती-एक ही रटनघिसी-पिटी!
एक जतिन ही है जो हमेशा हिम्मत बंधाता रहता है-‘नए सिरे से जिंदगी शुरू कर लो । भैया से मामला साफ हो जाए तो हम तुम्हारे लिए दूल्हा भी खोज देंगे । हम तो अब साथ देने से रहे । रही इधर की बात, तुम्हारे रहने, न रहने से भैया को कोई फर्क नहीं पड़ता । सामाजिक मर्यादा की बात मां के ताने-तुक्कों से एकाएक जागती है, बाकी जो कुछ है वह उनके अहं की, मर्दानगी की ऐंठन है कि तुम उनके बगैर समाज में कैसे खड़ी हो! तुम्हारे लौट आने का आग्रह भी इसी का चोंचला है । ध्यान ही मत दो…’
चाबी पर्स में होती है । कमरे में पहुंची तो पाया, अम्मा बिस्तर पर बैठी, आंखें ढांपे जाप में डूबी हैं । गोदी में पड़ी हुई रुद्राक्ष की माला का एक-एक मनका बड़े सधे हुए ढंग से अंगूठे के पोरों के मध्य, बुदबुदाते हुए होंठों की मौन प्रार्थना के साथ सरक रहा है ।
बिना आहट किए दरवाजे के पीछे लगी खूंटी पर टंगा गाउन उतारकर कपड़े बदलने लगी। एक कप कॉफी की जरूरत महसूस हो रही थी । अम्मा अगर जाप में न होतीं तो उसके कहे बगैर ही बना लातीं । अब इच्छा होने के बावजूद उसे किचन तक जाने में आलस आ रहा है। छोड़ो भी। बिस्तर के एक तरफ आहिस्ता से सरककर उसने आंखें बंद कर लीं । काम ही क्या होता है। मेहमानों को चाबी दो, चाबी लो । उनकी कोई आवश्यकता है, शिकायत है तो संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाना, और बस, जबरन मुसकराते रहना । फिर भी थकान इतनी हो जाती है जैसे दिन- भर कुदाल चलाई हो । दिमाग भारी हो उठता है और तिस पर…
आज चार-साढ़े चार के करीब द्विवेदी ने बुलाया था ।
समझ में नहीं आया कि क्यों बुलाया है । हालांकि कभी-कभी तो वह बड़े सड़ियल-से कारणों को लेकर भी बुला लेता है, जैसे-‘मिस! आज आपने बाल शैंपू नहीं किए? खुला रखने का शौक है तो…’ या ‘चेहरे पर इतनी मुर्दन क्यों है? जरा फेशियल करा लिया कीजिए न!’ या ‘मेहमान के सामने आप बैठी क्यों थीं?’ यह सही है कि वह खुद बड़ा चुस्त-दुरुस्त रहता है और इस नौकरी की आवश्यकता भी चुस्त-दुरुस्त बने रहने की है; मगर जिस तरह बुलाकर वह मामूली-मामूली-सी बातों पर झिड़कता रहता है या पास ठहरकर टोक देता है, चिढ़ छूटती है । अपमान-सा महसूस होता है । यूं भी पुरुष के मुंह से ये हिदायतें बड़ी अटपटी लगती हैं ।
वह केबिन में पहुंची थी और द्विवेदी ने उससे बैठने के लिए कहने की भी औपचारिकता नहीं बरती-‘ मिस! आपने हमारे यहां लिखित दिया हुआ है कि आप शादीशुदा नहीं हैं । पर्सनल डिपार्टमेंट में आपके पति मि. गोयल ने यह पत्र भेजा है कि आपने झूठ बोला है । आप दोनों अभी भी पति-पत्नी हैं । आप अपने मिजाज की वजह से उनसे कुछ दिनों से अलग हैं…इज टू?’ प्रमाणस्वरूप द्विवेदी ने फाइल खोलकर उसकी तरफ खिसका दी, ‘जस्ट सी, प्रीति…’
फाइल में नत्थी पत्र टंकित था, पर नीचे हस्ताक्षर गोयल के ही थे । उसे पैरों के तलवे सैंडिलों पर नहीं, बर्फ की सिल्लियों पर टिके महसूस हुए । क्यों किया गोयल ने ऐसा? क्यों…क्यों…? इसलिए कि विच्छेद के कागज उसने वकील से भिजवाए? आत्मनिर्भर होने का संदेश भेजा? उसकी दया-दृष्टि नकारी? रहने-खाने का मुआवजा अस्वीकार किया? जीने की इच्छा स्पष्ट की?
‘प्लीज सिट डाउन प्रीति, इतना नर्वस होने की जरूरत नहीं । प्लीज डू सिट ।’ उसके चेहरे पर दृष्टि गड़ाए द्विवेदी के स्वर ने एकाएक पैंतरा बदला । स्वर की मुलायमियत से वह इस नाजुक स्थिति में भी चौंकी । खड़ी नहीं रह पा रही थी। मजबूरन कुर्सी खिसकाकर बैठ गई ।
‘यह आश्वासन मैं दे सकता हूं । आई कैन सेव यू क्रम दिस प्रॉब्लम । बट, लेट मी नो अबाउट योर डिसीजन।’ उसने अनबूझ दृष्टि उठाई थी, ‘लेटर तब तक फॉरवर्ड नहीं होगा…’
‘मैं समझी नहीं ।’ वह ठंडे पसीने से नम होती एक घुटती सांसत में जकड़ गई ।
‘आई मीन, तुम गेस्ट्स को एंटरटेन करना पसंद करोगी? थिंक ओवर दिस! आज की मॉड लड़कियां इसे बेजा नहीं समझतीं, यू नो बेटर…अरेबियन गेस्ट्स आर वेरी रिच…फॉर कंपनी सेक…वे मनचाहा पे करते हैं…बट, शर्त यह है कि किसी को भनक नहीं लगनी चाहिए, न मैं लगने देता हूं । कॉफी शॉप में सिल्विया थी-काफी पहले । उसने तो अपने अरेबियन दोस्त से शादी भी कर ली । आज ठाठ से बहरीन में है!’ वाक्यों को चबा-चबाकर उगलते हुए द्विवेदी लगातार उसके चेहरे पर नजर गड़ाए था ।
‘छन्न!’ तपते तवे पर छिटकी बूंद-सी वह छटपटा उठी थी । सीधे-सीधे यह नहीं कहा द्विवेदी ने कि नौकरी बनाए रखना है तो…
उठने के लिए कुर्सी को झटका देकर पीछे खींचा था । थप्पड़ वह मार नहीं सकती थी, न पेपरवेट उठाकर सिर ही फोड़ सकती थी । कुछ भी करने की रोक नहीं थी, मगर कुछ कर गुजरने की ताकत तो स्वयं में होनी ही चाहिए न! स्वर भी इच्छा के विरुद्ध संयत था-‘शुड आई गो?’
‘ओ। श्योर, श्योर प्रीति! ‘ जैसे कह रहा हो- ऑल द बेस्ट! सूली तैयार है! कहां आ खड़ी हुई है वह?
हजार रुपये की नौकरी आसानी से हाथ नहीं लगती । इसे पाने के लिए भी तो इतना बड़ा झूठ शर्त थी; हालांकि यह झूठ उसके लिए गलत नहीं था । लिखते हुए न झिझक हुई थी, न किसी प्रकार का भय । खुद के लिए यही महसूस होता रहा । मगर पर्सनल डिपार्टमेंट को उसके मानने से क्या वास्ता!
“सो गई, बिट्टो?” अम्मा ने पुकारा ।
“नहीं तो!” आंखें खोल उनकी तरफ करवट भरी ।
अम्मा रुद्राक्ष की माला सिरहाने दबाती हुई बोलीं, “कड़ी बनी थी रे सांझ । तेरे लिए बाहर ही रख छोड़ी है । उठ तो…गरम करके ले आती हूं ।”
“रहने दो ।” उसने अनिच्छा जाहिर की । मन सचमुच नहीं हो रहा था ।
“तू उठ तो । दोपहर में तो कह के गई थी कि आज कड़ी बना सकी तो…अब क्या हो गया?” वे रसोई में चली गईं ।
क्या कहे उनसे कि क्या हो गया! बता दे गोयल की हरकत? बड़ा पक्ष लेती रहती हैं न…पर उनका भरोसा भी नहीं । क्या पता, यही कह दें कि ठीक तो किया उसने । तू ऐसे थोड़े आने वाली है रास्ते पर । हो सकता है, नाराज भी हों ।
पर ख्वामख्वाह परेशान क्यों करें! उसका दिमाग तो खराब हो ही उठा है…वैसे भी उसकी खातिर दिन-रात हैरान रहती हैं ।
तब?
‘लेट मी नो अबाउट योर डिसीजन?’
डिसीजन?
क्या डिसीजन है उसका? क्या हो सकता है? जो स्थिति आज है वही कल होगी, वही परसों…और वही…वह चैन से नहीं बैठने देने वाला । उठकर अपनी मेज पर आ गई।
पैड और पेन ले त्यागपत्र लिखने बैठ गई । त्यागपत्र में उसने पर्सनल डिपार्टमेंट के समक्ष अपने झूठ की स्वीकारोक्ति की और क्षमा मांगी।
ऊपर पर्सनल आफिसर का नाम लिख, पत्र लिफाफे में बंद कर अपने बैग में रख लिया । कल खुद ही जाकर पहुंचा देगी ।
दूसरा खत गोयल को लिख डाला । लिखे बगैर रह नहीं पा रही थी ।
‘तुम्हारा षड्यंत्र सफल रहा । विद अ बॉटल ऑफ शैंपेन सेलीब्रेट कर डालना । तुम्हारी जिंदगी में औरतों की कमी नहीं है । सेल्स एक्जीक्यूटिव हो न! हर स्टेशन तुम्हें कंपनी देता है…फिर भी, मैं कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूप में तुम्हें उद्विग्न कर रही हूं । यह जितना स्वीकार तुमने मुझे करवाया है, खुद भी कर रहे हो । जाहिर है, मैं तुम्हारे लिए चुनौती हो रही हूं।’
क्यों बेवकूफी पर उतर रही है? क्यों लिख रही है यह सब? अनजाने महत्त्व नहीं दे रही क्या गोयल को? गलतियां हो नहीं जातीं, जानबूझकर दोहराती है..खत पाकर खुश ही होगा-विजयी भाव से मुदित हो । यही तो तात्पर्य है उसका…मारो साली को । तिल-तिलकर मारो । कोंच-कोंचकर मारो…और फिर भी लिख रही है । यह उसकी जीत की बधाई होगी या अपने लूले-लंगड़े होने की सूचना?
छिह! छिह!
पूरा पन्ना पैड से जुदा हो मुट्ठी में गुड़मुड़ा गया ।
ऐसी की तैसी!
उठकर टहलने लगी-विरक्त भाव को लपेट । एक पत्रिका के फड़फड़ाते पन्नों से ध्यान बंटा । पंखा फुल पर चल रहा था ।
अंधेरे में हाथ बढ़ा रेगुलेटर एक पर कर दिया । पंखे का आधा हिस्सा बाई दीवार से सटे टेबल लैंप के अर्द्धवृत्त उजाले में धीमे-धीमे गुजरने लगा । डैनों की परछाइयां कितनी लंबी हो दौड़ रही हैं!
अंधेरे में ही अम्मा के आंचल-ढके चेहरे पर दृष्टि ठहरी । ठहरी ही रही डबडबाहट भर जाने तक। फिर पलकें ढांप लीं । संयत हुई तो आहिस्ता से अपनी अलमारी खोली। ऊपरी खाने में तहाए हुए कपड़ों के नीचे उंगलियों ने डायरी टटोल ली ।
मृत्युपरांत खाली-खाली क्षणों में उसने मोना को तमाम खत लिखे थे । कभी दर्ज हुआ एक खत खुल गया ।
‘मोना! कल शाम को हमेशा की तरह लगा कि तुम्हें प्राम में बैठाकर सड़क पर निकल जाऊं और चौराहे से सटे उस तिकोने पार्क में सूरज डूबने तक घुमाती रहूं । याद है, अंधेरा होते ही बीचों-बीच बने उस वृत्ताकार फव्वारे से सतरंगी प्रकाश-किरणें फूट पड़ती थीं । भीगती-सिहरती । तुम प्राम छोड़ गोद में चढ़ आतीं और लटककर अपनी नन्ही-नन्ही हथेलियों से उसे छूने को मचलने लगतीं । तुम्हारी फ्राक नमी से भर उठती । मगर तुम्हारी जिद होती कि मैं तुम्हें वहीं लिए खड़ी रहूं । तुम्हारी आंखों की किलकारियां उन धुआं- धुआं फुहारों से किस कदर खेलती ।’
‘मोना! प्राम को मैंने फव्वारे की रेलिंग से सटाकर खड़ा कर दिया था । तुम्हें गोद में उठा लिया था! लेकिन…तुमने हमेशा की तरह मचलकर फुहारों के धुएं को मुट्ठियों में भरने के लिए हथेलियां क्यों नहीं बढ़ाई… ‘
आगे नहीं पढ़ सकी। अकुलाहट पिघलने लगी थी । हिचकियां तेज हों, उससे पहले वह उठकर गुसल की तरफ बढ़ दी । अम्मा झपकियों में सोती हैं । जग गई तो जाप करते रात बीतेगी…
सुबह उसे जल्दी तैयार होती देख अम्मा ने पूछ ही लिया, “शिफ्ट बदल गई है क्या रे?”
“नहीं तो । जरूरी काम है जरा । अभी घंटे-डेढ़ घंटे में लौटकर आती हूं ।” काम क्या है, यह पूछने की इच्छा हुई उनकी, पर टोका-टाकी उसे पसंद नहीं, यही सोचकर इच्छा दबाकर बोलीं, “जाने से पहले जरा अपने भैया से मिल लेना । कह रहे थे, कोई जरूरी बात करनी है । शाम को तो तू मिलेगी नहीं ।”
“कोई खास बात है?”
“मुझे तो नहीं बताया ।”
बालों को ब्रश से ‘सर-सर’ झटकते हुए खयाल आया, पिछले हफ्ते से तकरीबन एक दफा भी भैया से भेंट नहीं हुई। सुबह सोकर उठती है तो ग्यारह बज रहा होता है । वे दफ्तर के लिए निकल चुके होते हैं । रात लौटते ढाई बजते हैं । वे गहरी नींद में सो रहे होते हैं ।
अनुमान नहीं लगा सकी कि वास्तव में बात क्या हो सकती है । शायद किसी नौकरी के सिलसिले में बात करना चाहते हों । यह नौकरी उन्हें पसंद नहीं है । भाभी ने भी कुछ रोज पहले बातचीत में संकेत किया था कि ये एकाध जगह बातचीत चला रहे हैं । अगर ऐसा होगा तो उसे तिनके का सहारा मिल जाएगा ।
भैया ड्रेसिंग टेबल के सामने मुड़े पर बैठे शेव कर रहे थे । शीशे के भीतर से ही वह दिख गई । उसे बैठने का आदेश देकर वह आफ्टर-शेव लोशन हथेलियों में मलकर दाढ़ी पर छपछपाने लगे ।
भाभी कपड़े वगैरह निकालने भीतर आई । चाय के लिए पूछ बैठीं । भैया चाय नहीं पीते, मगर अपने लिए भी कह बैठे ।
पलंग की पाटी पर बैठी वह चौकन्नी फर्श को घूरती रही। भैया बातें कम करते हैं। जो कुछ कहना-सुनना होता है, नपा-तुला, संयत होता है। मसला चाहे विस्फोटक ही क्यों न हो ।
मसलन-उसके और गोयल के तनाव को लेकर न वे कभी उत्तेजित हुए, न उन्होंने कोई निर्णय ही लादा । उनका एक निश्चित रवैया रहा कि कमजोरियां कमोबेश हर शख्स में होती हैं । उसमें भी हैं, तुममें भी हैं । अपनी-अपनी लेकर अड़ जाने से बात नहीं बनती । थोड़ा- थोड़ा झुकने से रास्ता निकल आता है । अपनी गलतियां उसने महसूस जरूर की हैं । तुझे वापस बुलाने की खतो-किताबत. …सॉर्ट ऑफ रियलाइजेशन ही है, वरना दूसरा ब्याह कर लेना उस जैसे आदमी के लिए कोई कठिन नहीं…जबकि तुम्हारी तरफ से तो उसे छूट मिली ही हुई है।
भैया के इन मुरदा तर्कों ने उसे कभी ढाढ़स नहीं दिया, बल्कि अपने प्रति यह उसे एक ठंडा रवैया ही लगा । भूले-भटके अगर उन्होंने आज यही सब दोहराया तो यह तय है कि बड़प्पन का लिहाज छोड़ वह कुछ बरदाश्त नहीं करेगी । अब वह किसी भी फैसले के लिए प्रस्तुत है ।
चाय खामोशी में ही खत्म हो गई। उसकी बेचैनी चरम पर थी । द्वंद्व कुछ अधिक गहरा प्रतीत हुआ । रहा नहीं गया ।
“बुलाया था, भैया?”
“हां, तूने जो सेपरेशन के कागजात भिजवाए थे वे…”
कनपटियां गरम होने लगीं । धड़कन ‘ धब्ब- धब्ब ‘ उछलने लगी । क्षण-भर पहले का साहस निचुड़ गया तो…
“गोयल ने वे बिना दस्तखत के मेरे पास वापस भेज दिए हैं । साथ लंबा-चौड़ा खत है । किसी भी तरह की आपसी साझेदारी के लिए वह राजी नहीं है। तुम्हें लौट जाना चाहिए, यही दोहराया है । साथ जलील भी किया है हमें । तेरा होटल में काम करना उसे चकले की नौकरी लगती है । यह आरोप भी लगाया है कि उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर कीचड़ उछलवाने तथा बहन की कमाई से गुलछर्रे उड़ाने का यह मेरा षड्यंत्र है…शह है । उनकी फैक्टरी के चीफ इंजीनियर किसी सेमिनार के सिलसिले में मुंबई आए थे । तुम्हारे होटल में ही ठहरे थे । तुम्हें देखकर पसोपेश में पड़ गए । गोयल को यह सब बड़ा अपमानजनक लगा।”
भैया का क्षुब्ध चेहरा नहीं देखा । स्वर में आक्रोश स्पष्ट था-गोयल के भर्त्सना-भरे वाक्यों ने गहरी चोट की थी ।
“कमीना आदमी है! किसी भी हद तक उतर सकता है । तुम क्या, कोई भी उसके संग निबाह नहीं सकता । मुझे बस इतना ही कहना है । निश्चिंत होकर नौकरी करो । अच्छे- अच्छे घरों की लड़कियां काम करती हैं होटलों में । एंड इट्स अ वेल-पेड जॉब । स्पष्ट लिख रहा हूं उसे-तुम्हारे लौटने की बात निकाल दे दिमाग से ।” यंत्रचालित-सी उठ खड़ी हुई, “चलती हूं ।” जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर सहन पार कर वह दरवाजे की ओर बढ़ गई । एक झटके में किवाड़ खोल बाहर आ गई ।
कल तक भैया की दृष्टि में गोयल कमोबेश सही व्यक्ति था । जो कुछ टूटा, उसका दोष विभाजित था । इसलिए भी उसकी तरफ ठंडा रुख अख्तियार किए रहे और जब गोयल ने उन्हें भी घसीट लिया तो तटस्थता का मुखौटा चढ़ाए नहीं रख सके । आज उनका अपमान-बोध, उसके ही कंधों को माध्यम बना, अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ने की व्यूह-रचना कर रहा है । वह क्या है? मात्र दोनों ही पक्षों की प्रतिष्ठा? या दांव? उसकी छटपटाहट उन्होंने कब महसूस की? महसूस करना भी चाहते थे क्या? जतिन की सलाह उन्हें कितनी अपरिपक्व और बचकाना लगी थी-‘बेहतर होगा कि लेट हर स्टैंड ऑन हर ओन फीट!’ और उन्होंने तिक्त स्वर में कहा था, ‘यूं निर्णय होते हैं? लिए जाते हैं?’ आगे जतिन ने बहस करना उचित नहीं समझा था । तटस्थ रहना अलग बात है, मगर उसे भैया का रवैया अविवेकपूर्ण लगा था ।
अंतिम मोड़ की सीढ़ियां उतरते-उतरते ठिठक गई । कहां-कहां से भागेगी? गोयल के लिए नौकरी छोड़ दे? लौट जाए? भैया के लिए करती रहे? द्विवेदी! द्विवेदी तो हर दफ्तर के केबिन में मौजूद हो सकता है । लड़ाई खुद की है, फिर? कोई अंत है?…कोई अंत नहीं…उसके हिस्से में नहीं । तो जूझने की चुनौती क्यों न स्वीकारे? मोहरों-सी क्यों इस्तेमाल हो? त्यागपत्र निकालकर उसने चिंदी-चिंदी कर डाला ।
मुड़ी । खट्-खट् बदहवास-सी जीना चढ़ने लगी ।
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