कथा-कहानी

इसलिए इस बारे में उनके कुछ संकोच प्रकट करने पर कठिन हृदय तारा दुगने उत्साह के साथ बोली, “ऐसे पति के रहने की अपेक्षा सात-सात जन्मों तक विधवा होना कहीं अच्छा है।” यह कहते हुए वह बीच सभा से उठकर चली गई।

शशि ने मन-ही-मन कहा, ‘पति के ऐसे किसी अपराध की कल्पना वह नहीं कर सकती, जिससे उसके प्रति मन का भाव इतना कठिन हो सके।’ इस बात की मन-ही-मन आलोचना करते-करते उसके कोमल हृदय का समस्त प्रतिरस उसके प्रवासीपति की ओर उच्छ्वसित हो उठा, शय्या पर उसके पति जिस तरफ़ सोते थे, उस हिस्से पर बाँह फैलाकर लेटे हुए उसने सूने तकिए का चुंबन लिया, उसमें पति के सिर की सुगंध का अनुभव किया और द्वार बंद कर लकड़ी के बक्से से पति का बहुत दिनों से आँखों से ओझल तस्वीर और हाथ की लिखी चिट्ठियाँ निकालकर बैठ गई। उस दिन की निस्तब्ध दोपहरी इस प्रकार निभृत-कक्ष में एकांत चिन्ता में पुरानी स्मृतियों और विषाद के अश्रुजल में बीती।

शशिकला और जयगोपाल का नवदांपत्य हो ऐसा नहीं। बाल्यकाल में विवाह हुआ था, इस बीच संतान भी हुई हैं। दोनों बहुत दिनों तक एक साथ ही रहे थे, नितांत साधारण सहज भाव से ही दिन बीते हैं। किसी भी ओर अपरिमित प्रेमोच्छ्वास का कोई लक्षण नहीं दिखाई दिया। क़रीब सोलह वर्ष एक ही भाव से एक साथ बिताकर अकस्मात् कार्यवश उसके पति के विदेश चले जाने पर शशि के मन में एक प्रबल प्रेमावेग जाग्रत हो उठा। विरह द्वारा बंधन में जितना ही खिंचाव पड़ा, कोमल हृदय को प्रेम के फंदे ने उतना ही सख़्त हो जकड़ लिया; शिथिल अवस्था में जिसके अस्तित्व का वह अनुभव न कर पाई, अब उसकी वेदना उसे कसकने लगी।

इसीलिए आज इतने दिनों के बाद इतनी उम्र में, संतान की माँ होकर, शशि वसंत मध्याह्न में निर्जन कमरे में विरही शय्या पर उन्मेषित यौवन-नववधू का सुख-स्वप्न देखने लगी। जो प्रेम अज्ञात भाव से जीवन के सामने से प्रवाहित हो गया है, सहसा आज उसी के कलगीति शब्द से जाग्रत हो मन-ही-मन उसी स्रोत के विपरीत बहते दोनों तीरों पर बहुत दूर कई सोने की नगरियाँ अनेक कुंजवन देखने लगी‒पर उस अतीत की सुख संभावना के बीच अब फिर पदार्पण करने का अवसर नहीं। सोचने लगी, ‘अब जब पति को निकट पाएगी, तब जीवन को नीरस और वसंत को निष्फल नहीं होने देगी।’ कितने दिन कितनी ही बार बेकार की बहसों में, छोटे-छोटे विवादों में उसने पति के प्रति अत्याचार भी किए थे। आज अनुत्तप्त चित्त हो एकांत में से संकल्प किया, फिर कभी भी वह असहिष्णुता प्रकट नहीं करेगी, पति की इच्छा में बाधा खड़ी नहीं करेगी। पति का आदेश पालन करेगी, प्रीतिपूर्ण नम्र हृदय से पति के भले-बुरे सभी आचरण सहेगी; क्योंकि पति ही सर्वस्व हैं, पति प्रियतम है, पति देवता है।

शशिकला लंबे समय तक अपने माता-पिता की एकमात्र लाड़ली कन्या रही थी; और जयगोपाल हालाँकि मामूली नौकरीपेशा था, फिर भी भविष्य की उसे कोई भी चिन्ता नहीं थीं। गाँव में राजसुख से रहने के लिए उसे उसके ससुर की यथेष्ट संपत्ति मिली हुई थी।

इसी समय नितांत असमय ही प्रायः वृद्धवय में शशिकला के पिता कालीप्रसन्न के एक पुत्र संतान जन्मी। सच कहें तो माता-पिता के इस अनपेक्षित असंगत अन्याय आचरण के लिए शशि मन-ही-मन अत्यंत क्षुब्ध हुई थी; जयगोपाल को भी यह बात सचमुच अच्छी नहीं लगी थी।

अधिक आयु में लड़के के प्रति माता-पिता का स्नेह अत्यंत प्रबल हो उठा। इस नवागत, लघुकाय, स्तन्यपिपासु, निद्रातुर साले ने अनजाने ही दो निर्बल हाथों के छोटी-छोटी बंद पड़ी मुट्ठी द्वारा ही जयगोपाल की सारी आशाओं और भरोसों का जब अपहरण कर लिया, तब उसने आसाम के एक चाय-बाग़ान में नौकरी कर ली।

पास ही किसी स्थान में नौकरी की तलाश के लिए सभी ने उससे ज़ोर-ज़बरदस्ती की थी, पर एक तरह से हर किसी पर गुस्से के कारण या फिर चाय के बग़ीचे में जल्दी आगे बढ़ने के उपाय की जानकारी के कारण, जयगोपाल ने किसी की बात पर कान नहीं दिया; शशि को बच्चों के साथ उसके मायके में रख वह आसाम चला गया। विवाहित जीवन में पति-पत्नी का यही प्रथम विच्छेद था।

इस घटना के कारण नन्हे से भाई पर भी शशिकला को बड़ा क्रोध आया। जिस मन के आक्षेप को मुँह खोलकर कहने का उपाय नहीं, उसी का आक्रोश सबसे अधिक होता है। यह नन्हा-सा प्राणी आराम से माँ का दूध पीता और आँखें मूँदकर सोया रहता और उसकी बहन‒दूध गरम, भात ठंडा, लड़के के स्कूल जाने में देरी आदि कई बहानों को ले दिन-रात मान-अभिमान करके स्वयं परेशान होती और सबको तंग करती।

थोड़े दिनों के बाद ही लड़के की माँ की मृत्यु हो गई, मरने के पहले माँ अपनी कन्या के हाथों शिशु को सौंप गई।

जल्दी ही उस मातृहीन लड़के ने अपनी दीदी के हृदय पर अधिकार जमा लिया। हुँ-हुँकार शब्द करते उसके ऊपर कूदकर बड़े आग्रह के साथ अपना नन्हा पोपला-सा मुँह खोलकर उसके मुँह, आँख और नाक को निगलने की चेष्टा करता, छोटी-सी मुट्ठी में उसके बालों की लटों को थामकर किसी भी तरह छोड़ना नहीं चाहता, सूर्योदय के ही पहले जग जाता और लुढ़कता-फुदकता उसके पास आकर कोमल स्पर्श से उसे पुलकित कर ज़ोर-ज़ोर से चिहुँकना आरंभ कर देता‒और जब धीरे-धीरे वह उसे दीदी और दीदी‒माँ कहकर बुलाने लगा, काम-काज के मौक़े पर और दूसरे समय भी निषिद्ध काम कर, निषिद्ध खाद्य खाकर, निषिद्ध स्थान में गमनपूर्वक उसके प्रति विधिवत् अत्याचारी के निकट पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर दिया। लड़के की माँ नहीं थी, इसलिए उसके प्रति उसका आधिपत्य कहीं अधिक था।

लड़के का नाम रखा गया नीलमणि। उसकी उम्र जब दो वर्ष की हुई, तब उसके पिता को एक गंभीर बीमारी ने आ दबोचा। जयगोपाल के पास तत्काल चले आने के लिए पत्र भेजा गया। जयगोपाल जब बहुत कोशिशों के बाद छुट्टी लेकर आ पहुँचा, तब कालीप्रसन्न का मृत्युकाल निकट था।

मृत्यु से पहले कालीप्रसन्न ने नाबालिग लड़के की देखरेख का भार जयगोपल को सौंपकर संपत्ति का चौथाई हिस्सा पुत्री के नाम लिख दिया।

इसलिए ज़मीन-जायदाद की रक्षा के लिए जयगोपाल को नौकरी छोड़कर चले आना पड़ा।

काफ़ी दिनों के बाद पति-पत्नी का पुनर्मिलन हुआ। किसी जड़ पदार्थ के टूटने पर उसके जोड़ में जोड़ मिला दिया जा सकता है, पर दो मानव-मन को जहाँ विच्छिन्न किया जाता है, दीर्घ विच्छेद के बाद भी रेखा के साथ रेखा नहीं मिल पाती, क्योंकि मन एक सजीव पदार्थ है, पल-पल उसका स्वभाव परिणत और परिविर्तित होता रहता है।

शशि के लिए इस नए मिलन में नए भाव का संचार हुआ। उसने जैसे एक बार फिर पति के साथ विवाह किया हो। पुरातन दांपत्य में चिराभ्यास वश जो जड़ता पैदा हो गई थी, विरह के आकर्षण में अपसृत हो उसने अपने पति को जैसे पूर्वापेक्षा पूर्णतर रूप से प्राप्त किया; उसने मन-ही-मन प्रतिज्ञा की, “जैसे भी दिन आएँ, जितने भी दिन जाएँ, पति के प्रति इस दीप्त प्रेम की उज्जवलता को कभी भी म्लान नहीं होने दूँगी।”

इस नए मिलन में जयगोपाल के मन की अवस्था भिन्न थी। पहले जब दोनों संयोग में एकत्र थे, तब पत्नी के साथ उनके सारे स्वार्थ और विचित्र अभ्यासों का ऐक्यबंधन था, पत्नी तब जीवन की नित्य सत्य हो उठी थी‒उसे छोड़ने पर दैनिक अभ्यास जाल में सहसा बहुत-सा भाग ख़ाली रह जाता। इसलिए बाहर जाकर पहले-पहल तो जयगोपाल अगाध जल में गिरा। लेकिन धीरे-धीरे उसके उस अभ्यास-विच्छेद में नए अभ्यास की पैबंद लग गई।

और इतना ही नहीं। पहले नितांत निश्चेष्ट-निश्चिन्त भाव से उसके दिन कटते। बीच में दो वर्ष तक अपनी स्थिति में उन्नति की चेष्टा उसके मन में ऐसे प्रबल रूप में जग उठी थी कि उसके मन के सामने और कुछ भी नहीं था। इस नए नशे की तीव्रता की तुलना में उसका पूर्व जीवन वस्तुहीन छाया के समान दीखा। स्त्रियों की प्रकृति में प्रधान परिवर्तन लाता है प्रेम और पुरुषों में दुश्चेष्टा।

दो वर्ष बाद, जब जयगोपाल लौटा तो उसने अपनी पत्नी को ठीक पहले जैसा नहीं पाया। उसकी पत्नी के जीवन में इस शिशु साले ने आकर एक नया परिसर ही रच डाला। यह हिस्सा उसके लिए पूरी तरह अपरिचित था और इसमें पत्नी के साथ उसका कोई योग नहीं था। उसकी पत्नी उसको इस शिशु-स्नेह में स्थान देने की बहुत चेष्टा करती, पर वह इसमें पूरी तरह सफल हुई या नहीं, कह नहीं सकता।

शशि नीलमणि को गोद में लिये मुस्कराती हुई पति के आगे बढ़ा देती‒नीलमणि प्राण-पण से शशि के गले से लिपट उसके कंधे में मुँह छिपा लेता, किसी प्रकार आत्मीयता की रक्षा नहीं करता। शशि की इच्छा होती कि उसके इस छोटे भाई के जितनी तरह की लुभावनी कलाएँ हैं‒सब जयगोपाल के सामने प्रकट करे; किन्तु जयगोपाल इसके लिए विशेष आग्रह नहीं दिखाता और शिशु भी कोई विशेष उत्साही नहीं था। जयगोपाल किसी भी तरह समझ नहीं पाता, इस दुबले-पतले, भारी से सिरवाले और गंभीर से चेहरेवाले साँवले से लड़के में ऐसा क्या है, जिसके लिए उसके प्रति इतने स्नेह का अपव्यय किया जा रहा है।

स्नेह के रंग-ढंग को स्त्रियाँ बड़ी जल्दी भाँप लेती हैं। शशि ने अविलंब समझ लिया कि जयगोपाल नीलमणि के प्रति विशेष अनुरत नहीं। तब भाई को वह बड़ी सावधानी से आड़ में कर रखती‒पति की स्नेहहीन और उदासीन दृष्टि से उसे दूर-दूर रखने की चेष्टा रखती। इस प्रकार बालक उसके गोपन का जतन-धन, उसके अकेलेपन की स्नेह-सामग्री बन बैठा। सभी जानते हैं कि स्नेह जितना गोपन, जितना एकांत होता है, उतना ही प्रबल होता है।

नीलमणि के रोने पर जयगोपाल बुरी तरह खीज उठता, इसलिए शशि उसे जल्दी से सीने में छुपा, जी-जान से हृदय से, उसे चुप करने की चेष्टा करती‒विशेष रूप से तब, जब नीलमणि के रोने से रात में उसके पति की नींद में बाधा पड़ती। पति इस क्रंदनपरायण बालक के प्रति अत्यंत ईर्ष्यालु रूप से घृणा प्रकट करता हुआ जर्जर चित्त से गरज़ उठता। तब शशि अपराधिनी-सी संकुचित और त्रस्त-व्यस्त हो उठती। उसी क्षण उसे गोद में ले जाती और एकांत में सानुनय स्नेह स्वर में, “मेरा सोना, मेरा धन, मेरा रतन” कहकर सुलाती।

बच्चों के बीच अनेक बहाने लेकर झगड़े-विवाद होते ही रहते हैं। पहले ऐसे अवसरों पर शशि अपनी संतानों को दंडित कर भाई का पक्ष लेती; क्योंकि उस बेचारे की माँ नहीं थी। अब न्यायकर्ता के साथ-ही-साथ दंडविधि में भी परिवर्तन हुआ। तब हमेशा ही निरपराध और अविचार के कारण नीलमणि को कठिन दंड भोगना पड़ता। यह अन्याय शशि के हृदय में नटसाल की तरह बिंध जाता; इसलिए वह अपने दंडित भाई को कमरे में ले जाकर मिठाई और खिलौने देकर उसे दुलारकर चुंबन लेकर शिशु के आहत हृदय को यथाशक्ति सांत्वना देने की चेष्टा करती।

नतीजा यह हुआ कि शशि नीलमणि से जितना ही स्नेह करती, जयगोपाल नीलमणि के प्रति उतना ही खीजता, और जयगोपाल नीलमणि के प्रति जितना ही विराग प्रकट करता, शशि उतना ही उसे स्नेहसुधा से अभिषिक्त करती रहती।

वैसे जयगोपाल कभी भी अपनी पत्नी के प्रति किसी प्रकार का कठोर व्यवहार नहीं करता और शशि चुपचाप नम्रता और प्रेम के साथ पति की सेवा करती रहती; केवल इस नीलमणि को लेकर अंदर-ही-अंदर एक-दूसरे को रात हो या दिन आघात पहुँचाने लगे।

इस प्रकार नीरव द्वंद्व का गोपन घात-प्रतिघात खुले विवाद की अपेक्षा कहीं अधिक दुःसह होता है।

नीलमणि के सारे शरीर में सिर ही सबसे प्रधान था। ऐसा लगता, मानो विधाता ने एक पतली-सी सींक में फूँक मार उसके सिरे पर एक बड़ा-सा बुद्बुद पैदा कर दिया है। डॉक्टर भी अकसर यह आशंका प्रकट करते कि लड़का भी किसी बुलबुले के समान क्षण-भंगुर क्षणस्थायी होगा। बहुत दिनों तक उसने बोलना और चलना भी नहीं सीखा। उसके उदास और गंभीर चेहरे को देखकर लगता, उसके माता-पिता अपने बुढ़ापे की सारी चिन्ताओं का भार इस छोटे शिशु के सिर पर लाद गए हैं।

दीदी की जतन और सेवा से नीलमणि ने अपने विपदकाल को पार किया, छठे वर्ष में पाँव रखा।

कार्तिक महीने में भैयादूज के दिन नया कुर्ता, चादर और लाल किनारे की धोती पहनाकर, बाबू बने नीलमणि का शशि तिलक करने जा ही रही थी कि पूर्वोक्त स्पष्टभाषिणी पड़ोसिन तारा ने आ बातों ही बातों में शशि के साथ झगड़ा छेड़ दिया।

उसने कहा, “पीठ-पीछे भाई का सर्वनाश कर भाई के माथे पर तिलक लगाने का कोई लाभ नहीं।”

शशि यह सुनकर विस्मय, क्रोध, वेदना से वज्राहत हुई। अंत में जाकर सुना, दोनों पति-पत्नी परामर्श कर, लगान की अदायगी न होने के कारण नाबालिग नीलमणि के हिस्से की संपत्ति नीलाम कराकर उसके पति के फुफेरे भाई के नाम बेनामी कर ख़रीद रहे हैं।

यह सुनकर शशि ने अभिशाप दिया, जो लोग इस सफ़ेद झूठ का प्रचार कर सकते हैं, उनका मुँह कोढ़ से गल जाए।

यह कहकर वह रोती हुई पति के पास जा पहुँची और इस अफ़वाह की बात सुनाई।

जयगोपाल बोले, “आजकल किसी पर विश्वास करने का उपाय नहीं। उपेन तो मेरा सगा फुफेरा भाई है, उस पर ज़मीन-जायदाद का भार सौंपकर मैं पूरी तरह निश्चिन्त था‒उसने कब पीछे लगान बाक़ी रख हासिलपुर महल अपने नाम ख़रीद लिया है, मैं जान भी नहीं पाया।”

शशि ने आश्चर्य से पूछा, “उस पर मुक़दमा नहीं चलाओगे?”

जयगोपाल ने कहा, “भाई के ऊपर मुक़दमा करूँ? और ऐसे मुक़दमे से कोई लाभ भी नहीं, बस पैसों की बर्बादी होती है।”

पति की बात पर विश्वास करना शशि का परम कर्तव्य था, पर वह किसी भी तरह विश्वास न कर सकी। तब यह सुखी परिवार, यह प्रेम की गृहस्थी, सहसा उसके लिए अत्यंत विकराल और वीभत्स स्वरूप धारण करती दिखाई दी। जिस गृहस्थी को वह अपना परम आश्रय मानती रही, अकस्मात् एक निष्ठुर फंदा जान पड़ा, जिसमें उन दोनों भाई-बहनों को चारों ओर से फाँस लिया गया है। अकेली स्त्री, असहाय नीलमणि की कैसे रक्षा करे, काफ़ी सोच-विचार कर भी वह कोई उपाय नहीं सोच पाई। वह जितनी ही चिन्ता करती, उसका हृदय उतना ही भय और घृणा से तथा इस विपन्न बालक भाई के प्रति अपरिसीम स्नेह से भर उठता। उसे लगा, अगर वह कोई उपाय जानती, तब सीधे लाट साहब के पास जाकर निवेदन करती, यहाँ तक कि महारानी के पास पत्र लिखकर अपने भाई की संपत्ति की रक्षा कर लेती। महारानी कभी भी नीलमणि के वार्षिक सात सौ अट्ठावन रुपए मुनाफ़े के हासिलपुर महल को बेचने नहीं देतीं।

शशि जब इस प्रकार एकबारगी महारानी के पास अर्ज़ी भेजकर अपने फुफेरे देवर को पूरी तरह मज़ा चखाने का उपाय सोच ही रही थी, तभी नीलमणि को अचानक ज्वर ने आ घेरा। उसे ऐंठन के साथ-साथ मिर्गी के दौरे पड़ने लगे।

जयगोपाल ने किसी गाँव के गँवई डॉक्टर को बुलाया। शशि के अच्छे डॉक्टर के लिए अनुरोध करने पर जयगोपाल बोला, “क्यों, मतिलाल बुरा डॉक्टर है?”

तब शशि ने उसके पैरों पर गिर, सिर की क़सम दी। जयगोपाल ने कहा, “अच्छा, शहर से डॉक्टर बुलवा रहा हूँ।”

शशि नीलमणि को गोद में ले सीने से लगाए पड़ी रही। नीलमणि भी एक क्षण के लिए उसे आँख से ओझल नहीं होने देता; कहीं बहाने से वह चली न जाए, इस भय से उससे चिपटा रहता, यहाँ तक कि सोने पर भी आँचल नहीं छोड़ता।

सारा दिन इसी प्रकार बीत गया। शाम ढल जाने के बाद जयगोपाल ने आकर कहा, “शहर में डॉक्टर बाबू नहीं मिले, वे कहीं दूर रोगी देखने गए हैं।” यह भी कहा, “एक मुक़दमे के सिलसिले में मुझे आज ही कहीं बाहर जाना पड़ रहा है, मैं मतिलाल से कहता जा रहा हूँ, वह रोगी को बराबर देख जाया करेगा।”

रात में नीलमणि नींद में बड़बड़ाने लगा। प्रातःकाल ही शशि बिना आगा-पीछा विचारे बीमार भाई को लिए नाव पर चढ़ी और एकदम शहर के उस डॉक्टर के घर पहुँची। डॉक्टर घर पर ही थे, शहर छोड़कर कहीं बाहर नहीं गए थे। उन्होंने भद्र महिला देख जल्दी से किराए का मकान ठीक करके एक बूढ़ी विधवा की देख-रेख में शशि को रुक जाने को कहा और बालक का इलाज शुरू कर दिया।

दूसरे दिन ही जयगोपाल आ पहुँचे। क्रोध में आगबबूला होकर उसने पत्नी को उसी क्षण साथ लौट जाने को कहा। पत्नी बोली, “तुम अगर मुझे काट भी डालो तो भी मैं अभी नहीं लौटूँगी; तुम लोग मेरे नीलमणि को मार डालना चाहते हो; उसके माँ नहीं, बाप नहीं, मुझे छोड़ उसका कोई भी नहीं है, मैं उसकी रक्षा करूँगी।” जयगोपाल क्रोध से बोले, “घर तो मेरे भाई का है।”

जयगोपाल बोला, “अच्छा, वह देखा जाएगा।”

मुहल्ले के लोगों ने कुछ दिनों तक इस घटना को लेकर बड़ा हंगामा मचाया। पड़ोसिन तारा बोली, “पति के साथ झगड़ा करना है तो घर बैठकर क्यों नहीं करती? घर छोड़कर जाने की क्या ज़रूरत। हज़ार हो, आख़िर पति तो है ही।”

पास में जो रुपए थे, सब ख़र्च कर गहने आदि बेच शशि ने अपने भाई की मौत की मुँह से रक्षा की। तभी उसे ख़बर मिली कि द्वारीग्राम में उनकी जो बड़ी जोतवाली ज़मीन थी, साथ ही उस पर जो घर बना था; और जिसकी आय किसी भी तरह सालाना डेढ़ हज़ार रुपए से कम न होगी, उस जोत ज़मीन को ज़मींदार के साथ मिलकर जयगोपाल ने अपने नाम से करवा दिया है। अब सारी संपत्ति जयगोपाल की है, उसके भाई की नहीं।

बीमारी से ठीक होने के बाद नीलमणि करुण स्वर में कहने लगा, “दीदी, घर चलो।” उसे अपने साथी भानजों की याद आ रही थी, इसी से बार-बार कहने लगा, अपने उसी घर में चलो न!” यह सुनकर उसकी दीदी कुछ बोली नहीं, बस रोने लगी, “अब वह हम लोगों का घर कहाँ!”

लेकिन रोने से ही कोई लाभ नहीं था, उस समय सारी दुनिया में दीदी को छोड़कर भाई का दूसरा कोई नहीं था। यह सोच आँखों के आँसू पोंछकर शशि ने डिप्टी मजिस्ट्रेट तारिणी बाबू के अंतःपुर में जाकर उनकी पत्नी के सामने दुखड़ा रोया।

डिप्टी बाबू जयगोपाल को पहचानते थे। भले घर की महिला घर के बाहर निकल ज़मीन-जायदाद के लिए पति के साथ झगड़े में प्रवृत्त होना चाहती है, इस बात से शशि के प्रति वे बुरी तरह खीज पड़े। उसे भुलावे में रखकर उन्होंने उसी समय जयगोपाल को पत्र लिखा। जयगोपाल दौड़ा आया, साले के साथ अपनी पत्नी को ज़बरदस्ती नाव पर चढ़ाकर घर पहुँचा दिया।

पति-पत्नी में दूसरी बार संबंध-विच्छेद के बाद फिर से यह दुबारा मिलन हुआ। प्रजापति ब्रह्मा की इच्छा।

बहुत दिनों बाद घर लौटकर पुराने साथियों के साथ नीलमणि बड़े आनंद से खेलता फिरने लगा। उसके उस निश्चिन्त आनंद को देख भीतर ही भीतर शशि का हृदय विदीर्ण होता रहता।

सर्दियों के दिन थे। मजिस्ट्रेट साहब ने शहर का दौरा करते हुए एक दिन शिकार की खोज में गाँव के बीच तंबू डलवाया। गाँव के रास्ते पर साहब के साथ नीलमणि की मुलाक़ात हुई। दूसरे बालक उन्हें देख चाणक्य के श्लोक में कुछ परिवर्तनपूर्वक नखी, दंत, शृंगी आदि के साथ साहब को भी मिलाकर काफ़ी दूर निकल गए, लेकिन गंभीर प्रकृति नीलमणि अटल कौतूहल और प्रशांत भाव से साहब को आँखें फाड़-फाड़कर देखता रहा।

साहब ने बड़े विनोद से उसके पास आकर पूछा, “तुम पाठशाला में पढ़ते हो?”

बालक ने नीरव भाव से सिर हिलाकर बताया, “हाँ।”

साहब ने फिर पूछा, “तुम कौन-सी किताब पढ़ते हो?”

नीलमणि किताब शब्द का अर्थ न समझ चुपचाप मजिस्ट्रेट की ओर ताकता रहा।

नीलमणि ने मजिस्ट्रेट साहब के साथ अपने परिचय का पूरा हवाला बड़े उत्साह के साथ अपनी दीदी को जा सुनाया।

दोपहर में चपकन, पैण्ट, पगड़ी पहन जयगोपाल मजिस्ट्रेट को सलाम करने गया। हर तरफ़ अर्थी-प्रत्यर्थी, चपरासी और सिपाहियों की भीड़ ही भीड़! साहब गर्मी के भय से तंबू के बाहर खुली छाया में कैम्प मेज़ लगवाकर बैठे थे और जयगोपाल को चौकी पर बैठाकर उससे स्थानीय हालचाल पूछ रहे थे। जयगोपाल अपने गाँववाले सर्वसाधारण के सामने इस गौरव आसन पर जमे मन-ही-मन फूल रहा था और सोच रहा था, ‘इस समय चक्रवर्ती और नंदी में से कोई भी आकर देख जाता तो अच्छा होता।’

इतने में नीलमणि को साथ लेकर घूँघट से मुँह ढँके एक महिला मजिस्ट्रेट के बिलकुल सामने आ खड़ी हुई और कहा, “साहब, आपके हाथों मैंने अपने इस अनाथ भाई को सौंप दिया, अब आप ही इसकी रक्षा करें।”

साहब अपने उस पूर्व परिचित वृहत मस्तक गंभीर प्रकृति बालक को देख और स्त्री को भद्र महिला समझकर उसी क्षण उठ खड़े हुए, बोले, “आप अंदर तंबू में आइए।”

महिला बोली, “मुझे जो कहना है, मैं यहीं कहूँगी।” जयगोपाल का चेहरा फक पड़ गया। वह बेचैनी का अनुभव करने लगा। गाँव के कौतूहील लोगों ने परम विनोद का अनुभव किया और चारों ओर से अधिक निकट आने की चेष्टा की। साहब के बेंत उठाते ही सब भाग खड़े हुए।

शशि अपने भाई का हाथ पकड़े उस पितृ-मातृहीन बालक का सारा इतिहास आद्योपांत बता गई। जयगोपाल ने बीच-बीच में उसे रोकने की कोशिश की। मजिस्ट्रेट का चेहरा सुर्ख होता चला गया और वे उठे ‘चुप रहो’ और बेंत के अगले सिरे से उसे चौकी पर से उठ जाने और सामने खड़े होने का निर्देश दिया।

जयगोपाल मन-ही-मन शशि के प्रति गुर्राता हुआ चुप खड़ा रहा। नीलमणि दीदी से चिपका यह सब चुपचाप सुनता रहा।

शशि की बात समाप्त होने पर मजिस्ट्रेट ने जयगोपाल से कुछ प्रश्न किए और उसका उत्तर सुन बहुत देर तक चुप रहे। फिर शशि को संबोधित करते हुए बोले, “बेटी, यह मुक़दमा हालाँकि मेरे पास नहीं आएगा, फिर भी तुम निश्चिन्त रहो‒इस संबंध में जो भी उचित होगा मैं करूँगा। तुम अपने भाई को लेकर निर्भय घर लौट जा सकती हो।”

शशि बोली, “साहब, जितने दिनों तक उसे अपना घर वापस नहीं मिलता‒उतने दिनों तक अपने भाई को मैं घर ले जाने का साहस नहीं जुटा पाती। इस समय नीलमणि को आपके पास न रखने पर इसकी रक्षा कोई नहीं कर सकेगा।”

साहब ने पूछा, “तुम कहाँ जाओगी?”

शशि बोली, “मैं अपने पति के साथ घर लौट जाऊँगी। मुझे अपनी कोई चिन्ता नहीं।”

साहब थोड़ा हँसे। गले में ताबीज़ पहने कृशकाय श्यामवर्ण गंभीर प्रशांत मृदु स्वभाव बंगाली लड़के को साथ ले जाने को किसी तरह राज़ी हुए।

लेकिन शशि के विदा लेते समय बालक ने उसके आँचल को कसकर पकड़ लिया। साहब बोले, “बेटे, तुम्हें कोई डर नहीं‒आओ।”

घूँघट में से अविरल आँसू बहाते-बहाते शशि बोली, “राजा भैया, जा भैया‒दीदी के साथ तेरी फिर मुलाक़ात होगी।”

यह कहते हुए उसे चिपटाकर, उसके सिर और पीठ पर हाथ फेरते किसी प्रकार अपना आँचल छुड़ा जल्दी से वहाँ से चली गई; तुरंत साह ने नीलमणि को बाएँ हाथ से कसकर पकड़ा, वह ‘दीदी रे दीदी’ कहकर ज़ोर-ज़ोर से रोने-चिल्लाने लगा। शशि ने एक बार मुड़कर देखा फिर दूर से फैलाए दाहिने हाथ द्वारा उसके प्रति नीरव सांत्त्वना भेजकर विदीर्ण हृदय से चली गई।

बहुत दिनों के बाद फिर उसी चिर-परिचित पुराने घर में पति-पत्नी का मिलन हुआ। प्रजापति का निर्बन्ध!

लेकिन यह मिलन अधिक दिनों तक टिक नहीं पाया। क्योंकि, इसके थोड़े समय के बाद ही, एक दिन सुबह-ही-सुबह ग्रामवासियों को ख़बर मिली कि पिछली रात शशि हैज़े से आक्रांत हो मर गई और रात ही में उसे फूंक दिया गया।

किसी ने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा। केवल वह पड़ोसिन तारा रह-रहकर गरज़ उठती, पर सब ‘चुप-चुप’ कह उसका मुँह बंद कर देते।

विदा के समय शशि भाई को वचन दे गई थी, फिर मुलाक़ात होगी। उस वचन की रक्षा कहीं हुई कि नहीं, मालूम नहीं।

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