डॉक्टर को इधर-उधर ढूंढा, किन्तु कहीं डॉक्टर नहीं मिला। लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा था। कुछ युवा तो गाली-गलौज पर उतर आये थे, उत्तेजित युवा मरने-मारने की बात करने लगे। उधर बच्चों की हालत और बिगड़ती गई, उनका बुरी तरह छटपटाना देखा नहीं जा रहा था।

एक युवा बोला- ‘वैसे तो एकाध डॉक्टर यहां पर ठीक हैं, पर बाकी तो….।’ एक ने डॉक्टर तिवारी का नाम लिया, ‘वह तो पास ही रहते हैं। तुरन्त आ भी जायेंगे, चाहे ड्यूटी हो या न हो।’ दूसरा बोला- ‘स्साले ! एक जैसे हैं, सब चोर हैं, कहां बात कर रहे हो……।’ एक युवक उसका हाथ पकड़ कर बोला, ‘कैसे कह दिया कि सारे एक जैसे होते हैं ? अरे ! सबको एक ही तराजू में नहीं तोलना चाहिये……।’

परस्पर तरह-तरह की चर्चायें होती गई, बीमार तड़फते बच्चों की ओर किसी का ध्यान ही न था, सब आपस में एक दूसरे की छींटाकशी में ही लग गये थे।

एक आदमी बोला- ‘…….सारा तन्त्र भ्रष्ट हो गया, जिसको देखो वही गैर जिम्मेदारी और वही गैर जिम्मेदार। किससे कहें? जायें तो जायें कहां ? किसी से किसी के बारे में बोलना स्वयं बुरा बनना है बस, अधिकारी भी कहां सुनते हैं? पहले के अधिकारी होते तो……। कहां चला गया वो जमाना……।’

एक बुजुर्ग जो बहुत देर से यह सब देख रहे थे, अपने को रोक न सके और जोर-जोर से चिल्लाकर बोले-

‘यही समय है बहस का, यहां तो बच्चे मर रहे हैं और एक तुम लोग हो जो इस मौके पर भी बहस के सिवा कुछ नहीं कर रहे हो। लाओ जो भी डॉक्टर मिलता है, पकड़कर लाओ ।’

इतने में अपने में ही खोये मुस्कराते, घूमते-टहलते डॉ. तिवारी आ पहुंचे तो लोग यकायक उन पर टूट पड़े। जितना कुछ भी लोग कह सकते थे उल्टा-सीधा, गाली-गलौज, सभी कुछ कह डाला। डॉ. तिवारी के बारे में जो लोग जानते थे, उन्हें बुरा लग रहा था, ‘डॉ. तिवारी ही तो सारे अस्पताल में एक ऐसे डॉक्टर हैं जो दीन-दुःखियों की बात सुनते हैं, आदमी की सहायता करते हैं। जो भी जाये उसकी सुनते हैं। पिछले दिनों तो सबसे बड़े डाक्टरों तक से उनका झगड़ा हो गया था। हमेशा उन्होंने जनता की भलाई की बात की है। अरे…..! मारना है तो उनको मारो, उनको गाली-गलौज दो, जिन्होंने खुलेआम लूट मचा रखी है। मरीज श्वासें गिनता रहता है और ये कहते है……पहले पैसा रखो, फिर मरीज को देखेंगे। कसाई से भी बढ़कर हैं ये। मानवता नाम की तो कोई चीज ही नहीं रह गई इनमें।’

‘डॉक्टर तो भगवान होते हैं, दूसरा जीवन देते हैं, किन्तु यहां तो…..।’

‘पता नहीं कैसे-कैसे लोग पेशे में आ जाते हैं…..?’

‘अरे केवल पैसा कमाने के लिए ही डॉक्टर बनते हैं…….।’

‘ये सब अमीरों के लड़के होंगे, इन्होंने गरीबी और मजबूरी तो देखी ही नहीं है, तनिक सी भी गरीबी देखी होती तो इतने निर्दयी कभी न होते……।’

‘अरे……! गरीब आदमी के बस की कहां जो अपने बच्चों को डॉक्टर बना सकें?

‘……सच तो यह है कि लोगों ने अपना ईमान-धर्म सब खो दिया है। संस्कार तो परिवार से ही आते हैं। यदि इनके मां-बाप ने इन्हें कुछ सिखाया होता तो आज ये दशा नहीं होती……’

इधर लोगों में तरह-तरह की बातें होती रही। इतना सब कुछ सुनने के बाद भी डॉ. तिवारी के चेहरे पर शिकन तक न आई थी।

जब डॉक्टर तिवारी को पता चला कि बेहद बुरी स्थिति में कुछ बच्चे छटपटा रहे हैं तो भीड़ की परवाह किये बिना वह तेजी से आपातकालीन कक्ष की ओर बढ़ने लगे। छात्र गाली-गलौज करते जा रहे थे, उनका तेजी से जाना कुछ छात्रों को ऐसे लगा मानों वे भीड़ से भागने की कोशिश कर रहे हों, फिर क्या था, एक छात्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।

डॉक्टर तिवारी ने पहले तो आग्रह किया परन्तु छात्र ने हाथ नहीं छोड़ा। डॉक्टर बोले- ‘पहले मुझे मरीजों को तो देखने दो, ये सब बातें बाद में भी हो जायेंगी। कमरे में मरीज छटपटा रहे हैं, बेहोशी की हालत में अस्पताल आये हैं……।’

किन्तु छात्र थे जो एक न माने। डॉक्टर तिवारी जो हमेशा विपरीत स्थितियों में भी मुस्कराते रहते थे और इतनी गाली-गलौज सुनने के बाद भी जिनका मुस्कराना बन्द न हुआ था, अब उनका चेहरा गुस्से से तमतमाने लगा था। उन्होंने एक बार जोर का झटका देकर हाथ छुड़ाने का प्रयत्न किया, परन्तु हाथ न छूटा तो उस युवा पर उन्होंने एक थप्पड़ मार दिया, ‘…..क्या करोगे, मारोगे मुझे? लो मार डालो, किन्तु उन बच्चों की भी तो सोचो जो एक-एक श्वांस गिन रहे हैं।’ छात्र के गाल पर थप्पड़ मारते ही उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे और वह आंसू बहाते हुये ही बेहोश मरीजों तक पहुंचे।

हलात बेकाबू देखकर एक बार तो वे घबरा गये थे। जल्दी-जल्दी बिस्तर पर लिटाकर उन्होंने प्रत्येक को इन्जेक्शन लगाया। कभी इधर, कभी उधार, कभी इस आलमारी में, कभी उस आलमारी में। तमाम दवाओं को निकालते हुए आधे घण्टे के अन्दर-अन्दर उन्होंने अन्तिम सांसें गिनते बेहोश मरीजों को खतरे से बाहर कर दिया था। जबकि लोगों को यह अंदेशा हो चला था कि अब इन बच्चों को नहीं बचाया जा सकेगा।

इस बीच पूरे अस्पताल में भीड़ जमा हो गई थी, सारा नगर जैसे एक हो गया था। डॉक्टर ने कमरा बन्दकर आधा घण्टा जी जान से एक कर दिया था।

बाहर लोग तरह-तरह की बातें करने में लगे थे। बेहोश मरीजों के परिजन रो रहे थे, साथ ही जनता को कोस भी रहे थे। बड़ी मुश्किल से तो डॉ. तिवारी बिना ड्यूटी के भी आ गये थे, परन्तु बच्चों को दिखाने के बजाय लोग नेतागिरी करने लगे, अब न जाने क्या होगा।

मरीजों की स्थिति देखकर तो सबको संदेह था कि मुश्किल से ही बच्चों को बचाया जा सकेगा। किन्तु आधे घण्टे बाद डॉ. तिवारी बाहर निकले तो वे बच्चों के पिता को दिलासा देते हुये बोले- ‘ईश्वर ने तुम्हारी सुन ली……सब ठीक हो जायेगा’ लोग गदगद हो गये। छात्र जिन्होंने डॉ. तिवारी को भला बुरा कहा था, डॉ. तिवारी के पांव पड़ गये- ‘डॉक्टर साहब गलती हो गई, असलियत में इस अस्पताल में कोई किसी की नहीं सुनता…..।’

डॉक्टर ने चुपचाप बात सुनी और अपने घर की ओर चल दिये।

दूसरे दिन डॉक्टर तिवारी के घर के आगे पूरा शहर एक हो रखा था। मैंने सोचा शायद आज फिर से हंगामा हो गया, कुछ न कुछ बात अवश्य हो गई है। मैं तेज कदमों से भीड़ के समीप पहुंचा। डॉक्टर तिवारी को भीड़ ने घेरा हुआ था व युवा नारे लगाते जा रहे थे-

हम ऐसा नहीं होने देंगे,

अपना डॉक्टर नहीं खोने देंगे ।

चाहे जो कुर्बानी होगी,

जनता डॉक्टर को जाने न देगी ।।

तरह-तरह के नारे लग रहे थे, मेरी कुछ समझ में नहीं आया। विरोधी नारे भी नहीं हैं, फिर इतनी भीड़ क्यों ?

‘क्या बात हो गई ?’ मैंने पास खड़े व्यक्ति से पूछा……।’

‘अरे साहब……! बात क्या होनी है, ले-देकर तो एक अच्छा डॉक्टर था उसको भी……।’

‘…….क्या हुआ उनको ?’ मैंने जल्दी-जल्दी पूछा।

‘उनको तो क्या होना है, हुआ तो इस जनता को है। पता चला है कि कल कुछ लोगों ने डॉ. साहब को गाली-गलौज ही नहीं की, उनके साथ हाथापाई भी कर दी थी, इतना देवता आदमी……..दुनिया में ढूंढकर भी ऐसा डॉक्टर नहीं मिलेेगा……।’

‘लेकिन वो बात तो कल वहीं खत्म हो गई थी, लोगों ने महसूस भी कर दिया था कि उनसे गलती हो गई……..?’

‘अरे साहब ! ये डॉक्टर हैं न…… बहुत स्वाभिमानी हैं, किसी का एक न लेता न किसी को एक देता…..ये तो गरीब जनता का मसीहा था। इन बड़े लोगों का क्या, अच्छा डॉक्टर यहां नहीं होगा तो ये कहीं भी जा सकते हैं, लेकिन गरीब जनता का क्या होगा ? किसको परवाह है इन गरीबों की……..।’

बगल में दूसरा व्यक्ति बहुत भावुक हो गया था, ‘बहुत बुरा हो गया, डॉ. साहब का ट्रांसफर हो गया…..।’ मैं चौंका…..! ‘ट्रांसफर हो गया ! लेकिन क्यों ?’ ‘…..देखा नहीं आपने, क्या व्यवहार किया गया उनके साथ……? जिस आदमी ने इस अस्पताल के लिये रात-दिन एक किया, हमने कभी सोते हुये इस आदमी को नहीं देखा, सुबह सात बजे भी घर पर भीड़ लगी रहती है। फिर आठ बजे अस्पताल में आते हैं, तो शाम चार-पांच बजे जाकर उनका खाना होता है, और फिर ग्यारह बजे तक बीमारों को देखते रहते हैं, रात दो बजे भी अस्पताल के चक्कर काटते हुये वे किसी भी आदमी को दिखाई दे सकते है।’

‘इस आदमी ने तो शादी तक नहीं की, अपनी तनख्वाह भी गरीब बच्चों पर लगा देता है। क्या हो गया इस जमाने को ? अच्छे आदमी की तो अब कोई पूछ ही नहीं है। कुल मिलाकर एक तो डॉक्टर था जो मरीजों का ध्यान रखता था, उसे भी नहीं टिकने दिया।’

लोगों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। जो भी सुनता डॉ. तिवारी का स्थानान्तरण हो गया, वही अस्पताल की ओर भागता, लोग हाथ जोड़ते……।

‘डॉक्टर साहब हमें इतनी बड़ी सजा न दें, हमें आप जो सजा देना चाहें मंजूर है, उन लड़कों की ओर से हम क्षमा मांग रहे हैं, हम हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहें हैं…….आप अपना स्थानान्तरण निरस्त करा लीजिये, हम किसी की भी कीमत पर आपको यहां से जाने नहीं देंगे।’

मैं भीड़ को चीरता हुआ अन्दर पहुंचा। डॉ. साहब का सामान बंध चुका था, जाने की पूरी तैयारियां कर चुके थे। मैंने उन्हें झिंझोडकर पूछा- ‘डॉक्टर साहब !’ आपने ऐसा क्यों किया? क्यों जा रहें है आप हमें छोड़कर ?

बड़े अनमने भाव से डॉक्टर तिवारी बोले- ‘लोगों से अभद्र व्यवहार जो करता हूं।’

मेरा तन-मन जल उठा- ‘कौन कहता है ऐसा ? सारा शहर तो यहां उमड़ा पड़ा है आपको रोकने के लिए ! बाहर खड़ी भीड़ आपकी लोकप्रियता की साक्षी है।’

‘इसीलिए तो…….’ मुस्करा कर उन्होंने जेब से अपना स्थानान्तरण आदेश निकाल कर मेरे हाथ में रख दिया। मैंने पढ़ना आरम्भ किया-

‘स्थानीय जनता व मरीजों से रोज-रोज अभद्र व्यवहार करने के दण्डस्वरूप आपको जोशीमठ स्थानान्तरित किया जाता है।’

इस एक लाईन के ट्रांसफर आदेश को पढ़कर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। मैंने डॉ. तिवारी की तरफ देखा तो वे मुस्कराते हुये दिखे। वहीं परिचित शान्त और सौम्य मुस्कराहट।

यह भी पढ़ें –दीदी – गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji