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कथा-कहानी

गृहलक्ष्मी की कहानियां

ओ हो! ये क्या हाल बना रखा है आपने अपना! और देखो तो सही पलंग पर भी कैसे सामान फैला रखा है? कोई बैठना चाहे तो बैठ भी ना सके।
अरे लेक्चर ना सुनाओ मुझे, जैसा रखा है वैसा ही रखा रहने दो तुम मेरा सामान। तुम तो सफाई के नाम पर कहीं का कहीं रख देती हो और फिर मैं घंटों ढूंढता रहता हूं।
अच्छा चलो सामान की बात छोड़ो अपनी सेहत की बात बताओ।
सेहत को क्या हुआ है, ठीक है। हां बस ज़रा सी खांसी है ठीक हो जाएगी वो भी।

आप शुरू से ही अपनी सेहत के प्रति लापरवाह रहे हो पर अब बुढ़ापे में लापरवाही सही नहीं है। सोनू कह रहा था कि आप सुबह जल्दी उठकर सर्दी में भी नंगे पैर घूमने लगते हो। ना मफलर पहनते हो ना टेापी। आपको तो वैसे भी जल्दी ही ठंड जकड़ लेती है। आपके लिए एक से एक टोपी, मफलर और मोजे अपने हाथों से बुनकर रखे हैं पर आपको तो उसकी कोई कद्र ही नहीं। पहन लोगे तो आपको ही फायदा होगा मुझे नहीं।
अरे इतना परेशान मत हो,सोनू लाया था मेरी दवा। खा रहा हूं उसे,अब फायदा होने में टाइम तो लगेगा ही।


अरे बुढ़ापे में तो अपनी ज़िद छोड़ दो। सारी उम्र तो आपने अपनी मनमानी ही की है। किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा क्यों नहीं देते? आपको तो कोई कुछ नहीं कहेगा पर सब सोनू पर ही उंगली उठाने लगेंगे कि वह अपने में ही मस्त रहता है,आप पर ध्यान ही नहीं देता, जबकि ऐसा नहीं है। वह आपकी बहुत परवाह करता है। मुझसे कह रहा था,’पापा को फेफड़ों में इन्फेक्शन हो गया है पर पापा डॉक्टर के पास चलने को तैयार ही नहीं हैं, हाल कहकर ही दवा लाया हूं’। आप इतनी सी बात क्यों नहीं समझते कि आपको परेशान देखकर सोनू और मेरा मन दुखी हो जाता है। आपसे रिक्वेस्ट है प्लीज डॉक्टर के पास चले जाना।

मनीष जी ने बात को टालने के उद्देश्य से हामी भर ली।
थोड़ी देर बाद ही उन्हें खांसी उठने लगी ।
वो अपनी पत्नी को आवाज देने लगे,’ निम्मो, कहां चली गयी? ज़रा एक गिलास गर्म पानी तो दे दो।’
अपने पिता की आवाज़ सुनकर सोनू भागा – भागा आया और उन्हें पानी पकड़ाते हुए बोला ,’आप किससे पानी मांग रहे थे?’
सोनू की बात सुनकर मनीष जी एकदम सकते में आ गये। उन्हें अब समझ आया कि वो तो सपना देख रहे थे। निम्मो को तो इस दुनिया से गये कई महीने गुज़र गये हैं।
वो सोनू से बोले,’ तेरी मां को मरने के बाद भी मेरा कितना ख्याल है। मुझे समझाने आई थी कि मैं अपने अड़ियल स्वभाव को छोड़कर तेरी बात मानकर डॉक्टर को दिखा आऊं।’
अपने पापा की बात सुनकर सोनू की आंखों में नमी तैर आई। वो थोड़ी देर पहले अपनी मां को याद करके उनसे कह रहा था कि अगर आप ज़िंदा होतीं तो सब संभाल लेतीं, पापा तो मेरी सुनते ही नहीं है। आपको तो मैं खो ही चुका हूं पर अब पापा को खोने की हिम्मत नहीं है मुझमें। सोनू आश्चर्यचकित था कि इतनी जल्दी मां तक उसकी बात पहुंच भी गई और पापा को समझा भी गयीं।
अरे क्या सोच रहा है? चल डॉक्टर के पास। अब उसे वचन दिया है तो निभाना तो पड़ेगा ही वरना फिर आकर सौ सवाल करेगी तो क्या जवाब दूंगा उसे। और हां मेरे मोजे, मफलर और टोपा भी दे दे, मुझे पहने देख तेरी मां खुश हो जाएगी।

एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह अपने पापा को मम्मी का कहना मानता देखकर उसे आश्चर्य मिश्रित खुशी हो रही थी। मां को खुश करने के लिए वो सब कुछ करने के लिए तैयार थे,शायद उन्हें उम्मीद थी कि वो फिर आकर सारे अपडेट लेगी। ये प्रेम की पराकाष्ठा थी। अब सोनू आश्वस्त था कि उसके पापा जल्दी ही ठीक हो जाएंगे। उसने मन ही मन अपनी मम्मी का धन्यवाद अदा किया और फिर दोनों डॉक्टर के पास चल दिए।

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